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आर्य अष्टांगिक मार्ग

लेखक: भिक्खु कश्यप
| २५ मिनट
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परिचय

आर्य अष्टांगिक मार्ग भगवान बुद्ध की पूरी शिक्षा का मूल सार है। यह वह प्रथम उपदेश है जो उन्होंने बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के बाद अपने पहले पाँच शिष्यों को दिया था, और यही वह अंतिम सत्य है जो उन्होंने महापरिनिर्वाण से ठीक पहले अपने अंतिम शिष्य सुभद्द को सिखाया था।

इसे ‘आर्य’ (महान या श्रेष्ठ) इसलिए कहा गया है क्योंकि जब इसके आठों अंग पूर्ण रूप से विकसित हो जाते हैं, तब यह किसी भी साधारण मनुष्य को पूर्णतः बदलकर संबोधि के प्रथम सोपान—श्रोतापत्ति—पर खड़ा कर देता है और उसे ‘आर्य-जन’ बना देता है।

यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि यह मार्ग कोई अंतिम मंज़िल नहीं है, बल्कि उस परम लक्ष्य तक पहुँचने का एकमात्र साधन है। शुरुआत में यह मार्ग एक कठोर साधना और अनुशासन का क्रम प्रतीत होता है; परंतु जैसे-जैसे यह भीतर विकसित होता है, यह स्वयं साधक को निर्वाण की ओर ले जाने वाला एक स्वचालित वाहन बन जाता है।

तीन स्तंभ

आर्य अष्टांगिक मार्ग के आठ अंग दरअसल तीन मुख्य श्रेणियों या स्तंभों में विभाजित हैं:

  • प्रज्ञा (अंतर्ज्ञान): सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प
  • शील (आचरण): सम्यक वाणी, सम्यक कर्मांत, सम्यक आजीविका
  • समाधि (एकाग्रता): सम्यक प्रयास, सम्यक स्मृति, सम्यक समाधि

यहाँ एक बहुत ही गहरा रहस्य छिपा है। ध्यान दें कि शील, समाधि या प्रज्ञा का कोई भी अंग अपने-आप में ‘आर्य’ नहीं होता। गलत शील, गलत समाधि और गलत प्रज्ञा भी संभव है। एक चोर भी किसी तिजोरी को खोलने के लिए बहुत गहरी एकाग्रता (समाधि) और प्रयास लगा सकता है, लेकिन वह ‘सम्यक’ नहीं है। यहाँ तक कि आठों सम्यक अंग भी तब तक ‘आर्य’ नहीं बनते, जब तक वे सभी एक-साथ मिलकर, परिपक्व होकर एक-दूसरे को पूर्ण न कर दें।

क्रमिक और समग्र विकास

आर्य अष्टांगिक मार्ग हमारे चित्त में दो तरीके से काम करता है:

  • क्रमिक विकास: यह एक सीढ़ी की तरह है। साधक पहले अपनी दृष्टि सम्यक करता है, फिर आचरण सुधारता है, और फिर ध्यान में बैठता है। हर मोड़ पर कोई नया गुण प्रकट होता है, अभ्यास से पुष्ट होता है, और फिर अगले चरण के गुणों को बल देता है।
  • समग्र विकास: मार्ग का हर अंग दूसरे अंग के साथ गहराई से जुड़ा है। दरअसल, मुक्ति के लिए जो भी गुण चाहिए, वे बीज-रूप में हमारे भीतर पहले से मौजूद हैं—हमें बस उन्हें पहचानना, सींचना और संतुलित करना है। जब ऐसा होता है, तो वे सातों अंग स्वयं ही साधक को लक्ष्य तक पहुँचा देते हैं।

इसे एक बच्चे के चलना सीखने के रूपक से आसानी से समझा जा सकता है। एक बच्चा जब पहली बार खड़ा होता है, तो डगमगाता है। उसके हाथ, पैर और शरीर का संतुलन अलग-अलग दिशाओं में भागता है। लेकिन जैसे-जैसे वह अभ्यास करता है, उसका दायाँ और बायाँ पैर एक-दूसरे का आधार बनने लगते हैं। धीरे-धीरे चलना इतना सहज हो जाता है कि वह उसके लिए कोई ‘प्रयास’ नहीं रहता, बल्कि उसकी स्वाभाविक जीवनशैली बन जाता है।

ठीक वैसे ही, यह अष्टांगिक मार्ग हमारे भीतर के गुणों को निखारता है, उन्हें आपस में संतुलित करता है, और अंततः मुक्ति की यात्रा को बिल्कुल सहज बना देता है।

मार्ग के दो स्तर

इस अष्टांगिक मार्ग की यात्रा दो स्तरों पर पूरी होती है—पहला ‘लौकिक’ (सांसारिक) और दूसरा ‘लोकुत्तर’ (संसार से पार, या आर्य)।

मार्ग का लौकिक स्तर श्रद्धा और नैतिक अनुशासन से शुरू होता है। इसमें कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धांत पर अटूट विश्वास, नैतिक जीवन का पालन, और इस सत्य पर आस्था शामिल है कि बुद्ध और उनके श्रावक सचमुच मुक्त हो चुके हैं। यह लौकिक ‘सम्यक दृष्टि’ है। यह मार्ग की सबसे अनिवार्य नींव है, क्योंकि कर्म-सिद्धांत पर दृढ़ श्रद्धा के बिना साधना का कोई महल खड़ा नहीं हो सकता।

इसी दृष्टि पर टिककर भीतर एक ‘संकल्प’ जागता है कि ऐसा कोई आचरण नहीं करना है जो दुःख का बीज बोए। इसके बाद साधक अपनी वाणी, कार्य और आजीविका को संयमित करता है। फिर वह सम्यक प्रयास, स्मृति और समाधि के सहारे अपने भीतर की प्रज्ञा को जगाता है।

जब यह साधना पूरी गहराई पर पहुँचती है, तो एक चमत्कारिक छलांग लगती है। साधक की सम्यक दृष्टि ठोस होकर ‘आर्य’ (लोकुत्तर) स्तर पर पहुँच जाती है, जहाँ उसे चार आर्य सत्यों का प्रत्यक्ष दर्शन होता है। जैसे ही दृष्टि लोकुत्तर होती है, मार्ग के शेष सात अंग भी उसी श्रेष्ठ स्तर पर पहुँच जाते हैं। अब यह मार्ग केवल एक ‘अभ्यास’ नहीं रहता, बल्कि प्रज्ञा और समाधि का एक ऐसा एकीकृत अनुभव बन जाता है जहाँ ‘चित्त की शुद्ध अवस्था’ ही मार्ग बन जाती है।

दस अंगों का पूर्णत्व

जब यह अष्टांगिक मार्ग पूर्णतः एकरूप होकर विकसित होता है, तो साधक ‘श्रोतापन्न’ (जिसने निर्वाण की धारा में प्रवेश कर लिया है) बन जाता है। इसके बाद के उच्च स्तरों—सकृदागामी और अनागामी—तक पहुँचने के लिए भी इन्हीं आठ अंगों को बार-बार चित्त में गहरा करना होता है।

परंतु जब साधक परम लक्ष्य (अरहत्त्व) की पूर्णता पर पहुँचता है, तब इस अष्टांगिक मार्ग में दो अत्यंत विलक्षण अंग और जुड़ जाते हैं—सम्यक ज्ञान और सम्यक विमुक्ति

इन दस अंगों के पूर्ण होते ही साधक की यात्रा समाप्त हो जाती है। तब यह अष्टांगिक मार्ग उसे कहीं पहुँचाने वाला ‘साधन’ नहीं रहता, बल्कि यह उसका अपना सहज ‘निवास’ बन जाता है—जहाँ उसका शील, उसकी समाधि और उसकी प्रज्ञा, स्वयं उसके लिए एक परम शांति और दुनिया के लिए एक जीवित प्रेरणा बन जाते हैं।

आर्य अष्टांगिक मार्ग भावना

अकुशल स्वभाव के पनपने में ‘अविद्या’ नेतृत्व करती है। उसके पीछे-पीछे निर्लज्जता (“अहिरी”) और निःसंकोच (“अनोतप्प”) चलकर आते हैं।

  • अविद्या में डूबे, धर्म न सुने आम-आदमी में मिथ्या-दृष्टि उत्पन्न होती है।
  • जिसकी दृष्टि मिथ्या हो, उसमें मिथ्या-संकल्प उत्पन्न होते है।
  • जिसके संकल्प मिथ्या हो, वह मिथ्या-वचन बोलता है।
  • जिसके वचन मिथ्या हो, वह मिथ्या-कार्य करता है।
  • जिसके कार्य मिथ्या हो, उसकी मिथ्या-आजीविका होती है।
  • जिसकी जीविका मिथ्या हो, वह मिथ्या-प्रयास करता है।
  • जो प्रयास मिथ्या करे, उसमें मिथ्या-स्मृति पनपती है।
  • जिसमें स्मृति मिथ्या पनपे, उसे मिथ्या-समाधि मिलती है।
  • जिसकी समाधि मिथ्या हो, उसे मिथ्या-ज्ञान मिलता है।
  • जिसे ज्ञान मिथ्या मिले, उसकी मिथ्या-विमुक्ति होती है।
  • जिसकी विमुक्ति मिथ्या हो, उसका आसक्ति-संग्रह बने रहता है।
  • जिसका आसक्ति-संग्रह बने रहे, उसका अस्तित्व निरोध नहीं होता।
  • जिसका अस्तित्व बने रहे, वह फ़िर जन्म में पड़ता है, और उसे रोग, बुढ़ापा, और मौत के साथ-साथ शोक, विलाप, दर्द, व्यथा, और निराशा होती रहती है।

इसके विपरीत, कुशल स्वभाव के पनपने में ‘विद्या’ नेतृत्व करती है। उसके पीछे-पीछे लज्जा (“हिरी”) और संकोच (“ओतप्प”) चलकर आते हैं।

  • विद्या में प्रतिष्ठित किसी जानकार-व्यक्ति में सम्यकदृष्टि उत्पन्न होती है।
  • जिसकी दृष्टि सम्यक हो, उसमें सम्यक-संकल्प उत्पन्न होते हैं।
  • जिसके संकल्प सम्यक हो, वह सम्यक-वचन बोलता है।
  • जिसके वचन सम्यक हो, वह सम्यक-कार्य करता है।
  • जिसके कार्य सम्यक हो, उसकी सम्यक-जीविका होती है।
  • जिसकी जीविका सम्यक हो, वह सम्यक-प्रयास करता है।
  • जो प्रयास सम्यक करें, उसमें सम्यक-स्मृति पनपती है।
  • जिसमें स्मृति सम्यक पनपे, उसे सम्यक-समाधि मिलती है।
  • जिसकी समाधि सम्यक हो, उसे सम्यक-ज्ञान मिलता है।
  • जिसे ज्ञान सम्यक मिले, उसकी सम्यक-विमुक्ति होती है।
  • जिसकी विमुक्ति सम्यक हो, उसका आसक्ति-संग्रह निरोध हो जाता है।
  • जिसका आसक्ति-संग्रह निरोध हो, उसका अस्तित्व निरोध हो जाता है।
  • जिसका अस्तित्व निरोध हो जाए, वह फ़िर जन्म में नहीं पड़ता, और उसे रोग, बुढ़ापा, और मौत के साथ-साथ शोक, विलाप, दर्द, व्यथा, और निराशा भी नहीं होती।

— संयुत्तनिकाय ४५:१ + मज्झिमनिकाय ११७



मार्ग विस्तार से

“यह आर्य अष्टांगिक मार्ग क्या है?

बस यही, आर्य अष्टांगिक मार्ग। अर्थात, सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वचन, सम्यक कर्मांत, सम्यक जीविका, सम्यक प्रयास, सम्यक स्मृति, और सम्यक समाधि।

सम्यक दृष्टि क्या है?

  • दुःख की वास्तविकता (पाँच उपादान स्कन्ध) पता रहना,
  • दुःख उत्पत्ति की वास्तविकता (तीन तृष्णा) पता रहना,
  • दुःख अन्त की वास्तविकता (तृष्णा का विराग) पता रहना,
  • दुःख अन्तकर्ता मार्ग की वास्तविकता (आर्य अष्टांगिक मार्ग) पता रहना।

सम्यक संकल्प क्या है?

  • निष्काम (संन्यास) का संकल्प,
  • दुर्भावना मिटाने का संकल्प,
  • अहिंसा का संकल्प।

सम्यक वचन क्या है?

  • झूठ बोलने से विरत रहना,
  • फूट डालने वाले वचन से विरत रहना,
  • कटु वचन से विरत रहना,
  • निरर्थक वचन से विरत रहना।

सम्यक कर्मांत क्या है?

  • जीवहत्या से विरत रहना,
  • चुराने से विरत रहना,
  • अब्रह्मचर्य (=काम-स्वभाव) से विरत रहना।

सम्यक जीविका क्या है?

  • मिथ्या-जीविका त्यागना,
  • समजीविका से अपना जीवन यापन करना।

सम्यक प्रयास क्या है?

  • जो पापी अकुशल स्वभाव अभी प्रकट न हुआ हो—वह आगे भी प्रकट न हो, उसके लिए चाह पैदा करना, मेहनत करना, ज़ोर लगाना, इरादा बनाकर जुटना ।
  • जो पापी अकुशल स्वभाव प्रकट हुआ हो—उसे त्यागने के लिए चाह पैदा करना, मेहनत करना, ज़ोर लगाना, इरादा बनाकर जुटना ।
  • जो कुशल स्वभाव अभी प्रकट न हुआ हो—उसे प्रकट करने के लिए चाह पैदा करना, मेहनत करना, ज़ोर लगाना, इरादा बनाकर जुटना ।
  • जो कुशल स्वभाव प्रकट हुआ हो—उसे बनाएँ रखने और बढ़ाने के लिए, उसमें वृद्धि और प्रचुरता लाने के लिए, उन्हें विकसित कर परिपूर्ण करने के लिए चाह पैदा करना, मेहनत करना, ज़ोर लगाना, इरादा बनाकर जुटना ।

सम्यक स्मृति क्या है?

  • लोक के प्रति लालसा या नाराज़ी हटाकर—काया को काया देखते हुए रहना—तत्पर, सचेत और स्मृतिमान।
  • लोक के प्रति लालसा और नाराज़ी हटाकर—वेदना को केवल वेदना देखते हुए रहना—तत्पर, सचेत और स्मृतिमान।
  • लोक के प्रति लालसा और नाराज़ी हटाकर—चित्त को केवल चित्त देखते हुए रहना—तत्पर, सचेत और स्मृतिमान।
  • लोक के प्रति लालसा और नाराज़ी हटाकर—स्वभाव को केवल स्वभाव देखते हुए रहना—तत्पर, सचेत और स्मृतिमान।

सम्यक समाधि क्या है?

  • त्याग का आलंबन बनाकर समाधि लगाना और चित्त एकाग्र करना । कामुकता से विलग, अकुशल-स्वभाव से विलग होकर—वितर्क और विचार सहित, विलगता से जन्मे प्रीति और सुख वाले प्रथम-ध्यान में प्रवेश कर विहार करना।
  • आगे वितर्क और विचार के थमने पर, भीतर से आश्वस्त हुआ मानस एकरस होकर—बिना-वितर्क बिना-विचार के, समाधि से जन्मे प्रीति और सुख वाले द्वितीय-ध्यान में प्रवेश कर विहार करना।
  • आगे प्रीति से विरक्त हो जाता है, और उपेक्षा के साथ स्मृतिवान और सचेत होकर शरीर से सुख महसूस करता है। जिसे आर्यजन ‘उपेक्षक, स्मृतिमान, सुखविहारी’ कहते हैं—उस तृतीय-ध्यान में प्रवेश कर विहार करना।
  • और आगे, सुख और दुःख के त्याग से, तथा सौमनस्य और दौमनस्य के पहले ही मिट जाने के कारण—वह न सुख, न दुःख वाली, तथा उपेक्षा और स्मृति की शुद्धता से युक्त चतुर्थ-ध्यान में प्रवेश कर विहार करना।

— संयुत्तनिकाय ४५:८ : विभङगसुत्त



मार्ग पर प्रश्नोत्तर

विशाख: “क्या यह आर्य अष्टांगिक मार्ग संस्कृत है, अथवा असंस्कृत?”

भिक्षुणी धम्मदिन्ना: “यह आर्य अष्टांगिक मार्ग संस्कृत है।”

विशाख: “क्या (शील, समाधि, प्रज्ञा के) तीन स्कंध आर्य अष्टांगिक मार्ग में निहित हैं, अथवा आर्य अष्टांगिक मार्ग तीन स्कंधों में निहित हैं?”

भिक्षुणी धम्मदिन्ना: “तीन स्कंध आर्य अष्टांगिक मार्ग में निहित नहीं हैं। बल्कि आर्य अष्टांगिक मार्ग तीन स्कंधों में निहित हैं। सम्यक वाणी, सम्यक कार्य, सम्यक आजीविका—‘शील’ स्कंध में आते हैं। सम्यक प्रयास, सम्यक स्मृति, सम्यक समाधि—‘समाधि’ स्कंध में आते हैं। और सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प—‘प्रज्ञा’ स्कंध में आते हैं।”

(इस बातचीत के बाद, भगवान बुद्ध ने भिक्षुणी धम्मदिन्ना के द्वारा दिए गए उत्तरों को दोहराते हुए अपनी स्वीकृति दी।)

मज्झिमनिकाय ४४



दृष्टि का परिणाम

“मैं कोई अन्य स्वभाव नहीं देखता, जिससे अनुत्पन्न अकुशल स्वभाव उत्पन्न होने लगते हैं, और उत्पन्न अकुशल स्वभाव बढ़कर विकसित होने लगते हैं—जैसे, मिथ्या दृष्टि!

और, उसी तरह, मैं कोई अन्य स्वभाव नहीं देखता, जिससे अनुत्पन्न कुशल स्वभाव उत्पन्न होने लगते हैं, और उत्पन्न कुशल स्वभाव बढ़कर विकसित होने लगते हैं—जैसे, सम्यक दृष्टि!

जैसे, किसी नम भूमि पर नीम, करेला, या कड़वे ख़रबूज़े का बीज पड़ जाए। वह बीज नम भूमि से अब जो पोषण लेगा, जितना भी पोषण लेगा—सब कड़वावट ही लाएगा, कटु ही लगेगा, स्वाद में नापसंदीदा ही होगा। क्यों?

—क्योंकि बीज ही वैसे कड़वे स्वभाव का है।

उसी तरह होता है जब कोई मिथ्यादृष्टि में पड़ता है! मिथ्यादृष्टि में पड़कर, कोई जो भी शारीरिक कर्म, वाणी के कर्म, या मानसिक कर्म आरंभ करता है, या जो भी इरादे, निश्चय, संकल्प, या कोई रचना आरंभ करता है—सब अप्रिय, असुखद, अनाकर्षक, अलाभ, और दुःख की ओर ही जाते हैं। क्यों?

—क्योंकि दृष्टि ही वैसे पापी स्वभाव की है।

किंतु, यदि किसी नम भूमि पर गन्ना, चावल, या अंगूर का बीज पड़ जाए। वह बीज नम भूमि से अब जो पोषण लेगा, जितना भी पोषण लेगा—सभी मिठास ही लाएगा, स्वादिष्ट ही लगेगा, स्वाद में पसंदीदा ही होगा। क्यों?

—क्योंकि बीज ही वैसे मंगलकारी स्वभाव की है।

उसी तरह होता है जब कोई सम्यक दृष्टि में प्रतिष्ठित होता है! सम्यक दृष्टि में प्रतिष्ठित होकर, कोई जो भी शारीरिक कर्म, वाणी के कर्म, या मानसिक कर्म आरंभ करता है, या जो भी इरादे, निश्चय, संकल्प, या कोई रचना आरंभ करता है—सभी प्रिय, सुखद, आकर्षक, लाभदायक, और सुख की ओर ही जाते हैं। क्यों?

—क्योंकि दृष्टि ही वैसे मंगलकारी स्वभाव की है।”

— अंगुत्तरनिकाय १:१८१~१८२, १८९~१९०



आर्य सम्यक समाधि

भिक्षुओं, जब चित्त की एकाग्रता इन सात अंगों से परिष्कृत हो—यही सम्यक-दृष्टि, सम्यक-संकल्प, सम्यक-वचन, सम्यक-कर्मांत, सम्यक-जीविका, सम्यक-प्रयास और सम्यक-स्मृति— तब उसे ‘आर्य सम्यक-समाधि’ कहते हैं, उसके नींव के साथ, और उसके अनिवार्य अंगों के साथ।

सम्यक-दृष्टि

उनमें, भिक्षुओं, पहले सम्यक-दृष्टि आती है। पहले सम्यक-दृष्टि कैसे आती है?

मिथ्या-दृष्टि को ‘मिथ्या-दृष्टि’ समझता है, और सम्यक-दृष्टि को ‘सम्यक-दृष्टि’ समझता है—ऐसी होती है सम्यक-दृष्टि ।

मिथ्या-दृष्टि क्या है, भिक्षुओं?

‘दान (का फ़ल) नहीं है। यज्ञ (=चढ़ावा) नहीं है। आहुति (=बलिदान) नहीं है। सुकृत्य या दुष्कृत्य कर्मों का फ़ल-परिणाम नहीं हैं। लोक नहीं है। परलोक नहीं है। न माता है, न पिता है, न स्वयं से प्रकट होते (“ओपपातिक”) सत्व हैं। न ही दुनिया में ऐसे श्रमण-ब्राह्मण हैं जो सम्यक-साधना कर सम्यक-प्रगति करते हुए विशिष्ट-ज्ञान का साक्षात्कार कर लोक-परलोक होने की घोषणा करते हैं।’

—यह, भिक्षुओं, मिथ्या-दृष्टि है।

और, सम्यक-दृष्टि क्या है, भिक्षुओं?

सम्यक-दृष्टि, भिक्षुओं, मैं दो प्रकार की बताता हूँ—

  • (लौकिक) सम्यक-दृष्टि—आस्रव सहित, पुण्य पक्ष की, उपधि में पकने वाली (=संग्रह कराने वाली);
  • आर्य सम्यक-दृष्टि—अनास्रव (=बिना आस्रव के), लोकुत्तर (=संसार के परे ले जाने वाली), मार्ग का अंग।

(लौकिक) सम्यक-दृष्टि क्या है, भिक्षुओं?

‘दान होता है; चढ़ावा होता है; आहुति होती है। अच्छे या बुरे कर्मों के फल-परिणाम होते हैं। लोक होता है; परलोक होता है। माता होती है; पिता होते है। स्वयं से उत्पन्न सत्व होते हैं। और ऐसे श्रमण-ब्राह्मण होते हैं, जो सम्यक-साधना कर, सम्यक-प्रगति करते हुए विशिष्ट-ज्ञान का साक्षात्कार कर, लोक-परलोक होने की घोषणा करते हैं।’

—यह सम्यक-दृष्टि आस्रव सहित, पुण्य पक्ष की, उपधि में पकने वाली है।

आर्य सम्यक-दृष्टि क्या है, भिक्षुओं?

आर्य-चित्त के, अनास्रव चित्त के, आर्य-मार्ग में समर्पित, आर्य-मार्ग विकसित करने वाले की प्रज्ञा, प्रज्ञा-इंद्रिय, प्रज्ञा-बल, धम्म-विचय संबोध्यङ्ग, सम्यक-दृष्टि मार्ग-अंग। 1

—इसे कहते हैं, भिक्षुओं, सम्यक-दृष्टि—आर्य, अनास्रव, लोकुत्तर, मार्ग का अंग।

मिथ्या-दृष्टि को त्यागकर सम्यक-दृष्टि को अपनाने का प्रयास—‘सम्यक-प्रयास’ है। स्मृतिमान होकर मिथ्या-दृष्टि को त्यागते हुए और स्मृतिमान होकर सम्यक-दृष्टि को अपनाते हुए विहार करना—‘सम्यक-स्मृति’ है। 2 इस प्रकार, तीन धम्म ‘सम्यक-दृष्टि’ के गोल-गोल दौड़ते रहते हैं, चक्कर काटते हैं—सम्यक-दृष्टि, सम्यक-प्रयास और सम्यक-स्मृति।

सम्यक-संकल्प

उनमें, भिक्षुओं, पहले सम्यक-दृष्टि आती है। पहले सम्यक-दृष्टि कैसे आती है?

मिथ्या-संकल्प को ‘मिथ्या-संकल्प’ समझता है, सम्यक-संकल्प को ‘सम्यक-संकल्प’ समझता है—ऐसी होती है सम्यक-दृष्टि ।

मिथ्या-संकल्प क्या है, भिक्षुओं?

  • कामुक संकल्प;
  • दुर्भावनापूर्ण संकल्प;
  • हिंसक संकल्प।

—यह, भिक्षुओं, मिथ्या-संकल्प है।

और, सम्यक-संकल्प क्या है, भिक्षुओं?

सम्यक-संकल्प, भिक्षुओं, मैं दो प्रकार की बताता हूँ—

  • (लौकिक) सम्यक-संकल्प—आस्रव सहित, पुण्य पक्ष की, उपधि में पकने वाली;
  • आर्य सम्यक-संकल्प—अनास्रव, लोकुत्तर, मार्ग का अंग।

(लौकिक) सम्यक-संकल्प क्या है, भिक्षुओं?

  • निष्काम (“नेक्खम्म” =कामुकता से संन्यास) संकल्प;
  • दुर्भावना-विहीन संकल्प;
  • अहिंसक संकल्प।

—यह सम्यक-संकल्प आस्रव सहित, पुण्य पक्ष की, उपधि में पकने वाली है।

आर्य सम्यक-संकल्प क्या है, भिक्षुओं?

आर्य-चित्त के, अनास्रव चित्त के, आर्य-मार्ग में समर्पित, आर्य-मार्ग विकसित करने वाले की सोच, विचार, संकल्प, ठहराव, तल्लीनता, मन लगाना और वचन-संस्कार। 3

—इसे कहते हैं, भिक्षुओं, सम्यक-संकल्प—आर्य, अनास्रव, लोकुत्तर, मार्ग अंग।

मिथ्या-संकल्प को त्यागकर सम्यक-संकल्प को अपनाने का प्रयास—‘सम्यक-प्रयास’ है। स्मृतिमान होकर मिथ्या-संकल्प को त्यागते हुए और स्मृतिमान होकर सम्यक-संकल्प को अपनाते हुए विहार करना—‘सम्यक-स्मृति’ है। इस प्रकार, तीन धम्म ‘सम्यक-संकल्प’ के गोल-गोल दौड़ते रहते हैं, चक्कर काटते हैं—सम्यक-दृष्टि, सम्यक-प्रयास और सम्यक-स्मृति।

सम्यक-वचन

उनमें, भिक्षुओं, पहले सम्यक-दृष्टि आती है। पहले सम्यक-दृष्टि कैसे आती है?

मिथ्या-वचन को ‘मिथ्या-वचन’ समझता है, सम्यक-वचन को ‘सम्यक-वचन’ समझता है—ऐसी होती है सम्यक-दृष्टि ।

मिथ्या-वचन क्या है, भिक्षुओं?

  • झूठ बोलना,
  • फूट डालने वाली बात करना,
  • कटु वचन बोलना,
  • निरर्थक बातें करना।

—यह, भिक्षुओं, मिथ्या-वचन है।

और, सम्यक-वचन क्या है, भिक्षुओं?

सम्यक-वचन, भिक्षुओं, मैं दो प्रकार की बताता हूँ—

  • (लौकिक) सम्यक-वचन—आस्रव सहित, पुण्य पक्ष की, उपधि में पकने वाली;
  • आर्य सम्यक-वचन—अनास्रव, लोकुत्तर, मार्ग का अंग।

(लौकिक) सम्यक-वचन क्या है, भिक्षुओं?

  • झूठ बोलने से विरत रहना,
  • फूट डालने वाले वचन से विरत रहना,
  • कटु वचन से विरत रहना,
  • निरर्थक वचन से विरत रहना।

—यह सम्यक-वचन आस्रव सहित, पुण्य पक्ष की, उपधि में पकने वाली हैं।

आर्य सम्यक-वचन क्या है, भिक्षुओं?

आर्य-चित्त के, अनास्रव चित्त के, आर्य-मार्ग में समर्पित, आर्य-मार्ग विकसित करने वाले की चार प्रकार के वाणी दुराचार से विरति, परहेज, परिवर्जन, परिहार।

—इसे कहते हैं, भिक्षुओं, सम्यक-वचन—आर्य, अनास्रव, लोकुत्तर, मार्ग अंग।

मिथ्या-वचन को त्यागकर सम्यक-वचन को अपनाने का प्रयास—‘सम्यक-प्रयास’ है। स्मृतिमान होकर मिथ्या-वचन को त्यागते हुए और स्मृतिमान होकर सम्यक-वचन को अपनाते हुए विहार करना—‘सम्यक-स्मृति’ है। इस प्रकार, तीन धम्म ‘सम्यक-वचन’ के गोल-गोल दौड़ते रहते हैं, चक्कर काटते हैं—सम्यक-दृष्टि, सम्यक-प्रयास और सम्यक-स्मृति।

सम्यक-कर्मांत

उनमें, भिक्षुओं, पहले सम्यक-दृष्टि आती है। पहले सम्यक-दृष्टि कैसे आती है?

मिथ्या-कर्मांत को ‘मिथ्या-कर्मांत’ समझता है, सम्यक-कर्मांत को ‘सम्यक-कर्मांत’ समझता है—ऐसी होती है सम्यक-दृष्टि ।

मिथ्या-कर्मांत क्या है, भिक्षुओं?

  • जीवहत्या,
  • चोरी,
  • व्यभिचार।

—यह, भिक्षुओं, मिथ्या-कर्मांत है।

और, सम्यक-कर्मांत क्या है, भिक्षुओं?

सम्यक-कर्मांत, भिक्षुओं, मैं दो प्रकार की बताता हूँ—

  • (लौकिक) सम्यक-कर्मांत—आस्रव सहित, पुण्य पक्ष की, उपधि में पकने वाली;
  • आर्य सम्यक-कर्मांत—अनास्रव, लोकुत्तर, मार्ग का अंग।

(लौकिक) सम्यक-कर्मांत क्या है, भिक्षुओं?

  • जीवहत्या से विरत रहना,
  • चुराने से विरत रहना,
  • व्यभिचार से विरत रहना।

—यह सम्यक-कर्मांत आस्रव सहित, पुण्य पक्ष की, उपधि में पकने वाली हैं।

आर्य सम्यक-कर्मांत क्या है, भिक्षुओं?

आर्य-चित्त के, अनास्रव चित्त के, आर्य-मार्ग में समर्पित, आर्य-मार्ग विकसित करने वाले की तीन प्रकार के शारीरिक दुराचार से विरति, परहेज, परिवर्जन, परिहार।

—इसे कहते हैं, भिक्षुओं, सम्यक-कर्मांत—आर्य, अनास्रव, लोकुत्तर, मार्ग अंग।

मिथ्या-कर्मांत को त्यागकर सम्यक-कर्मांत को अपनाने का प्रयास—‘सम्यक-प्रयास’ है। स्मृतिमान होकर मिथ्या-कर्मांत को त्यागते हुए और स्मृतिमान होकर सम्यक-कर्मांत को अपनाते हुए विहार करना—‘सम्यक-स्मृति’ है। इस प्रकार, तीन धम्म ‘सम्यक-कर्मांत’ के गोल-गोल दौड़ते रहते हैं, चक्कर काटते हैं—सम्यक-दृष्टि, सम्यक-प्रयास और सम्यक-स्मृति।

सम्यक-जीविका

उनमें, भिक्षुओं, पहले सम्यक-दृष्टि आती है। पहले सम्यक-दृष्टि कैसे आती है?

मिथ्या-जीविका को ‘मिथ्या-जीविका’ समझता है, सम्यक-जीविका को ‘सम्यक-जीविका’ समझता है—ऐसी होती है सम्यक-दृष्टि ।

मिथ्या-जीविका क्या है, भिक्षुओं?

  • ढोंग-पाखंड करना, मस्का लगाना, संकेत देना, दूसरों को नीचा दिखाना, लाभ से लाभ ढूँढना। 4

—यह, भिक्षुओं, मिथ्या-जीविका है।

और, सम्यक-जीविका क्या है, भिक्षुओं?

सम्यक-जीविका, भिक्षुओं, मैं दो प्रकार की बताता हूँ—

  • (लौकिक) सम्यक-जीविका—आस्रव सहित, पुण्य पक्ष की, उपधि में पकने वाली;
  • आर्य सम्यक-जीविका—अनास्रव, लोकुत्तर, मार्ग का अंग।

(लौकिक) सम्यक-जीविका क्या है, भिक्षुओं?

  • जीवहत्या से विरत रहना,
  • चुराने से विरत रहना,
  • व्यभिचार से विरत रहना।

—यह सम्यक-जीविका आस्रव सहित, पुण्य पक्ष की, उपधि में पकने वाली हैं।

आर्य सम्यक-जीविका क्या है, भिक्षुओं?

आर्य-चित्त के, अनास्रव चित्त के, आर्य-मार्ग में समर्पित, आर्य-मार्ग विकसित करने वाले की मिथ्या जीविका से विरति, परहेज, परिवर्जन, परिहार।

—इसे कहते हैं, भिक्षुओं, सम्यक-जीविका—आर्य, अनास्रव, लोकुत्तर, मार्ग अंग।

मिथ्या-जीविका को त्यागकर सम्यक-जीविका को अपनाने का प्रयास—‘सम्यक-प्रयास’ है। स्मृतिमान होकर मिथ्या-जीविका को त्यागते हुए और स्मृतिमान होकर सम्यक-जीविका को अपनाते हुए विहार करना—‘सम्यक-स्मृति’ है। इस प्रकार, तीन धम्म ‘सम्यक-जीविका’ के गोल-गोल दौड़ते रहते हैं, चक्कर काटते हैं—सम्यक-दृष्टि, सम्यक-प्रयास और सम्यक-स्मृति।

सम्यक-विमुक्ति तक

उनमें, भिक्षुओं, पहले सम्यक-दृष्टि आती है। पहले सम्यक-दृष्टि कैसे आती है?

  • सम्यक-दृष्टि से, भिक्षुओं, सम्यक-संकल्प होने लगते हैं;
  • सम्यक-संकल्प से सम्यक-वचन होने लगते हैं;
  • सम्यक-वचन से सम्यक-कर्मांत होने लगते हैं;
  • सम्यक-कर्मांत से सम्यक-जीविका होने लगती है;
  • सम्यक-जीविका से सम्यक-प्रयास होने लगता है;
  • सम्यक-प्रयास से सम्यक-स्मृति होने लगती है;
  • सम्यक-स्मृति से सम्यक-समाधि होने लगती है;
  • सम्यक-समाधि से सम्यक-ज्ञान होने लगता है;
  • सम्यक-ज्ञान से सम्यक-विमुक्ति होने लगती है। 5

—इस प्रकार, भिक्षुओं, आठ अंगों से युक्त साधक (“सेक्ख” =सीखने वाला) दस अंगों से युक्त अरहंत होता है।

अभ्यास की पूर्णता

यहाँ सम्यक-ज्ञान से अनेक पाप अकुशल स्वभाव दूर हटने पर अभ्यास अपनी परिपूर्णता प्राप्त करती है। उनमें, भिक्षुओं, पहले सम्यक-दृष्टि आती है। पहले सम्यक-दृष्टि कैसे आती है?

✦ सम्यक-दृष्टि से, भिक्षुओं, मिथ्या-दृष्टि की निर्जरा (=नष्ट) होती है; और मिथ्या-दृष्टि के आधार पर, जो अनेक पाप अकुशल स्वभाव उपजते थे, उनकी निर्जरा होने लगती है। जबकि, सम्यक-दृष्टि के आधार पर अनेक कुशल स्वभाव विकसित होकर परिपूर्ण होने लगते हैं।

✦ सम्यक-संकल्प से, भिक्षुओं, मिथ्या-संकल्प की निर्जरा होती है; और मिथ्या-संकल्प के आधार पर, जो अनेक पाप अकुशल स्वभाव उपजते थे, उनकी निर्जरा होने लगती है। जबकि, सम्यक-संकल्प के आधार पर अनेक कुशल स्वभाव विकसित होकर परिपूर्ण होने लगते हैं।

✦ सम्यक-वचन से, भिक्षुओं, मिथ्या-वचन की निर्जरा होती है; और मिथ्या-वचन के आधार पर, जो अनेक पाप अकुशल स्वभाव उपजते थे, उनकी निर्जरा होने लगती है। जबकि, सम्यक-वचन के आधार पर अनेक कुशल स्वभाव विकसित होकर परिपूर्ण होने लगते हैं।

✦ सम्यक-कर्मांत से, भिक्षुओं, मिथ्या-कर्मांत की निर्जरा होती है; और मिथ्या-कर्मांत के आधार पर, जो अनेक पाप अकुशल स्वभाव उपजते थे, उनकी निर्जरा होने लगती है। जबकि, सम्यक-कर्मांत के आधार पर अनेक कुशल स्वभाव विकसित होकर परिपूर्ण होने लगते हैं।

✦ सम्यक-जीविका से, भिक्षुओं, मिथ्या-जीविका की निर्जरा होती है; और मिथ्या-जीविका के आधार पर, जो अनेक पाप अकुशल स्वभाव उपजते थे, उनकी निर्जरा होने लगती है। जबकि, सम्यक-जीविका के आधार पर अनेक कुशल स्वभाव विकसित होकर परिपूर्ण होने लगते हैं।

✦ सम्यक-प्रयास से, भिक्षुओं, मिथ्या-प्रयास की निर्जरा होती है; और मिथ्या-प्रयास के आधार पर, जो अनेक पाप अकुशल स्वभाव उपजते थे, उनकी निर्जरा होने लगती है। जबकि, सम्यक-प्रयास के आधार पर अनेक कुशल स्वभाव विकसित होकर परिपूर्ण होने लगते हैं।

✦ सम्यक-स्मृति से, भिक्षुओं, मिथ्या-स्मृति की निर्जरा होती है; और मिथ्या-स्मृति के आधार पर, जो अनेक पाप अकुशल स्वभाव उपजते थे, उनकी निर्जरा होने लगती है। जबकि, सम्यक-स्मृति के आधार पर अनेक कुशल स्वभाव विकसित होकर परिपूर्ण होने लगते हैं।

✦ सम्यक-समाधि से, भिक्षुओं, मिथ्या-समाधि की निर्जरा होती है; और मिथ्या-समाधि के आधार पर, जो अनेक पाप अकुशल स्वभाव उपजते थे, उनकी निर्जरा होने लगती है। जबकि, सम्यक-समाधि के आधार पर अनेक कुशल स्वभाव विकसित होकर परिपूर्ण होने लगते हैं।

✦ सम्यक-ज्ञान से, भिक्षुओं, मिथ्या-ज्ञान की निर्जरा होती है; और मिथ्या-ज्ञान के आधार पर, जो अनेक पाप अकुशल स्वभाव उपजते थे, उनकी निर्जरा होने लगती है। जबकि, सम्यक-ज्ञान के आधार पर अनेक कुशल स्वभाव विकसित होकर परिपूर्ण होने लगते हैं।

✦ सम्यक-विमुक्ति से, भिक्षुओं, मिथ्या-विमुक्ति की निर्जरा होती है; और मिथ्या-विमुक्ति के आधार पर, जो अनेक पाप अकुशल स्वभाव उपजते थे, उनकी निर्जरा होने लगती है। जबकि, सम्यक-विमुक्ति के आधार पर अनेक कुशल स्वभाव विकसित होकर परिपूर्ण होने लगते हैं।

मज्झिमनिकाय ११७



श्रोत और श्रोतापन्न क्या है?

भगवान ने सारिपुत्त भंते से पूछा, “सारिपुत्त, लोग ‘श्रोत श्रोत’ कहते हैं। यह ‘श्रोत’ क्या है?”

सारिपुत्त भंते ने भगवान को उत्तर दिया, “भंते, ‘आर्य अष्टांगिक मार्ग’ ही श्रोत है।”

“और, सारिपुत्त, लोग ‘श्रोतापन्न श्रोतापन्न’ कहते हैं। यह ‘श्रोतापन्न’ क्या है?”

“भंते, जो व्यक्ति ‘आर्य अष्टांगिक मार्ग’ में संपन्न हो, उसे ही ‘श्रोतापन्न’ कहते हैं।”

“साधु, साधु, सारिपुत्त! तुमने सम्यक उत्तर दिया!”

— संयुत्तनिकाय ५५:५



भगवान की अंतिम घोषणा

भगवान ने अपने अंतिम शिष्य सुभद्द से कहा:

“जिस धर्म-विनय में ‘आर्य अष्टांगिक मार्ग’ पता नहीं चलता है, उसमें प्रथम-स्तर के श्रमण, द्वितीय-स्तर के श्रमण, तृतीय-स्तर के श्रमण, या चतुर्थ-स्तर के श्रमण भी पाए नहीं जाते हैं।

किन्तु, जिस धर्मविनय में ‘आर्य अष्टांगिक मार्ग’ पता चलता है, उसी में चारों स्तरों के श्रमण भी पाए जाते हैं।

(मेरे) इसी धर्मविनय में ‘आर्य अष्टांगिक मार्ग’ पता चलता है, और इसी (संघ) में चारों स्तरों के श्रमण भी पाए जाते हैं। अन्य धर्म संप्रदाय ज्ञानसंपन्न श्रमणों से खाली है।

और, यदि भिक्षु ठीक से रहें, तो यह दुनिया अरहंतों से खाली नहीं रहेगी।”

महापरिनिब्बान सुत्त


  1. इन सभी अंगों को, “चार आर्य सत्यों” के आलोक में देखा जाए, तो वे “प्रज्ञा” के ही रूप माने जाते हैं। “धम्मविचय संबोध्यङ्ग”, अर्थात स्वभावों की जाँच, तभी विकसित होता है, जब मन स्वभावों को ठीक से परखता है और देखता है कि क्या कुशल है और क्या अकुशल। यही बात संयुक्तनिकाय ४६.५१ में स्पष्ट की गई है, जहाँ चार आर्य सत्यों और कुशल–अकुशल कर्म के प्रश्न के बीच का संबंध सामने आता है। इसी संदर्भ में मज्झिमनिकाय ९ भी देखने योग्य है। ↩︎

  2. यहाँ स्मृति की भूमिका को ठीक से समझना ज़रूरी है। स्मृति कोई निष्क्रिय अवस्था नहीं है कि बस सही–गलत को स्वीकार करते रहे। बल्कि इसके विपरीत, स्मृति की भूमिका पूरी तरह सक्रिय है, यहाँ भी और मार्ग के हर अंग के साथ भी। अपने मूल अर्थ में स्मृति का मतलब है किसी बात को लगातार याद में बनाए रखना। इसी कारण स्मृति बार-बार चेताती रहती है कि मिथ्या-मार्ग के अंगों को छोड़ना है, और सम्यक-मार्ग के अंगों में प्रवेश करके उन्हीं में टिके रहना है। अकुशल स्वभावों को छोड़ने और कुशल स्वभावों को विकसित करने की इस सक्रिय साधना में स्मृति कैसे काम करती है, इसे अंगुत्तरनिकाय ४.२४५ और ७.६३ में विस्तार से देखा जा सकता है। ↩︎

  3. मज्झिमनिकाय ४४ के अनुसार वाचा-संस्कार “वितक्क” और “विचार” हैं। यहाँ आर्य सम्यक-संकल्प की जो परिभाषा दी गई है, वह प्रथम-ध्यान में उपस्थित संकल्पों की ओर संकेत करती प्रतीत होती है (देखें मज्झिमनिकाय ७८); इस प्रकार यह आर्य सम्यक-संकल्प को सम्यक-समाधि से जोड़ देती है। ↩︎

    • कुहना (ढोंग-पाखंड करना) का सीधा अर्थ है भीतर कुछ, बाहर कुछ। यानी साधु-वेश या आचरण के ज़रिये ऐसा प्रभाव पैदा करना कि लोग अधिक दान करें, जबकि भीतर त्याग या वैराग्य की वास्तविक भावना न हो।
    • लपना (मस्का लगाना) का मतलब है चिकनी-चुपड़ी बात करना, जिनका उद्देश्य सामने वाले को प्रसन्न कर के कुछ हासिल करना हो।
    • नेमित्तिकता (संकेत देना) सीधे माँगने के बजाय संकेतों, इशारों, शिकायतों, या बनावटी विनय के ज़रिये दान की परिस्थिति बनाना।
    • निप्पेसिकता (दूसरों को नीचा दिखाना) का अर्थ है प्रतिद्वंदी भिक्षुओं या अन्य सन्यासियों को तुच्छ, अयोग्य, या कम साधक बताना, ताकि दान और सम्मान उन्हीं से हटकर अपने पक्ष में आ जाए।
    • लाभेन लाभं निजिगीसनता का भाव है—मिले हुए लाभ को आधार बनाकर आगे और लाभ साधने की प्रवृत्ति। दान को संतोष का कारण मानने के बजाय उसे रणनीति बना लेना: कहाँ रुकने से, किससे जुड़ने से, या कैसे व्यवहार करने से आगे अधिक लाभ मिलेगा।

    यह मिथ्या जीविका की बात विशेष तौर पर संन्यासियों और भिक्षुओं पर लागू होती है, जहाँ वे ज़रूरत की चीज़ें और भौतिक लाभ गलत या अशुद्ध तरीकों से हासिल करते हैं। अंगुत्तरनिकाय ५.१७७ में गृहस्थों के लिए गलत आजीविका के पाँच प्रकार बताए गए हैं—

    • शस्त्र-हथियारों का व्यापार,
    • जीवों का व्यापार,
    • मांस का व्यापार,
    • नशे की चीज़ों का व्यापार,
    • ज़हर का व्यापार।
     ↩︎
  4. संयुक्तनिकाय ४८.४६ में आर्य विमुक्ति को “समाधि-इन्द्रिय” के समकक्ष बताया गया है (संयुक्तनिकाय ४८.१० भी देखें)। ↩︎