✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
बल की भावना मुख्य > लेख 3. लेख पटिपदा बलबोधिपक्खिय धम्म

— कुशल कैसे बढ़ाएँ —
सतिपट्ठान | सम्मपधान | इद्धिपाद | इन्द्रिय | बल | बोज्झङ्ग | अट्ठङ्गिक मग्ग

पाँच बल

लेखक: भिक्खु कश्यप
| ११ मिनट
▶️ नीचे ऑडियो चलाकर पढ़ें।
0:00 0:00



परिचय

साधना के मार्ग पर जो पाँच इन्द्रियाँ (श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञा) हमारे चित्त का मार्गदर्शन करती हैं, जब वे अपने अभ्यास की भट्टी में तपकर पूरी तरह परिपक्व हो जाती हैं, तो वे ही ‘बल’ (आध्यात्मिक शक्ति) बन जाती हैं। जैसे शारीरिक बल हमारी मांसपेशियों से उपजता है, वैसे ही हमारी परम आध्यात्मिक शक्ति इन्हीं पाँच इन्द्रियों के संयम और प्रशिक्षण से प्रकट होती है।

अब एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है—इन बलों की आवश्यकता क्या है? इन्हें क्यों विकसित किया जाए? और यदि कोई साधक इन बलों को न बढ़ाए, तो उसकी साधना में क्या हानि होती है?

उत्तर अत्यंत स्पष्ट है: बिना ‘बल’ के कोई भी साधक संसार के झंझावातों और अपने ही मन के गहरे विकारों को पार नहीं कर सकता। इन बलों के माध्यम से ही हम अपने भीतर जन्मीं अकुशल प्रवृत्तियों (पाप कर्मों) को उखाड़ फेंकते हैं और कुशल धर्मों (सद्गुणों) को एक चट्टान की तरह स्थापित कर पाते हैं।

आध्यात्मिक अखाड़ा

कोई भी व्यक्ति माँ के गर्भ से पहलवान बनकर नहीं निकलता। उसे व्यायामशाला (अखाड़े) में उतरना पड़ता है, रोज़ाना पसीना बहाना पड़ता है, और जीभ को ललचाने वाले स्वादिष्ट परंतु हानिकारक खाद्य-पदार्थों का त्याग कर कठोर और पोषक आहार अपनाना पड़ता है। तब जाकर धीरे-धीरे उसके शरीर की दुर्बलता मिटती है और एक अदम्य शक्ति का संचार होता है।

ठीक इसी प्रकार, ये पाँच बल कोई जन्मजात वरदान नहीं हैं, और न ही ये इन्द्रियाँ जन्म से सशक्त होती हैं। इन्हें आध्यात्मिक अखाड़े में विकसित किया जाता है—निरंतर साधना से, तप से, अनुशासन से और सतत सम्यक-प्रयास से।

जिस प्रकार एक दुर्बल व्यक्ति जीवन के ज़रा-से दबाव में ही टूट कर बिखर जाता है, वैसे ही आध्यात्मिक रूप से कमज़ोर व्यक्ति भी सांसारिक आकर्षणों (काम-भोग), प्रतिकूल परिस्थितियों, भय या मोह के सामने घुटने टेक देता है। उसकी साधना का संकल्प ज़रा-सी कठिनाई आते ही डगमगा जाता है। इसके विपरीत, जिस साधक ने अपने भीतर ये पाँच बल अर्जित कर लिए हैं, वह कठिन से कठिन साधना को भी सहजता से पूर्ण कर लेता है—बिल्कुल उस बलवान पर्वतारोही की तरह जो दुर्गम पर्वत की चोटी पर जा पहुँचता है, जबकि दुर्बल व्यक्ति रास्ते की पहली चढ़ाई में ही थककर हार मान लेते हैं।

बहाने नहीं, साधना करें

अक्सर लोग अपनी आध्यात्मिक दुर्बलता को छुपाने के लिए ‘भाग्य’ या ‘पारमी’ (पूर्व जन्मों के पुण्यों) का बहाना बनाते हैं। वे सोचते हैं कि बुद्ध या उनके महान शिष्यों को तो ये शक्तियाँ वरदान में मिली थीं। लेकिन यह मार्ग किसी विशेष पुण्य के सहारे या केवल पूर्व-जन्मों की कमाई से नहीं चलता। जो साधक आज अभ्यास करेगा, वही कल आगे बढ़ेगा।

इसलिए, बहाने छोड़ें और अभ्यास में जुटें। आध्यात्मिक बल अर्जित करने का यह महान मार्ग सब के लिए खुला है—ज़रूरत है तो बस एक अजेय संकल्प, अडिग श्रद्धा और कभी न रुकने वाले प्रयास की।

इन्द्रिय और बल में क्या अंतर है?

चूँकि पाँच इन्द्रियाँ और पाँच बल नाम और रूप में एक ही हैं, तो भगवान बुद्ध ने इन्हें दो अलग-अलग श्रेणियों में क्यों रखा? इन दोनों के बीच एक बहुत ही सूक्ष्म और मनोवैज्ञानिक अंतर है।

इन्द्रियाँ साधक के मन को नियंत्रित और मार्गदर्शित करने वाले गुण हैं। साधना के शुरुआती चरणों में ये इन्द्रियाँ विकसित तो हो रही होती हैं, लेकिन वे अस्थिर और असंतुलित हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, किसी साधक के भीतर ‘श्रद्धा’ की इन्द्रिय बहुत प्रबल हो सकती है, लेकिन यदि ‘प्रज्ञा’ कमज़ोर हो, तो वह अंधभक्ति में बदल सकती है। इसी तरह, ‘वीर्य’ की इन्द्रिय बहुत तेज़ हो सकती है, लेकिन ‘समाधि’ के अभाव में वह चित्त को बेचैन और विक्षिप्त कर सकती है। इन्द्रियों के स्तर पर भटकाव की संभावना बची रहती है।

किंतु, जब निरंतर अभ्यास से ये पाँच इन्द्रियाँ अपना पूर्ण संतुलन पा लेती हैं, अविचल रूप से दृढ़ हो जाती हैं, तब इन्हें ‘बल’ कहा जाता है।

‘बल’ का अर्थ है एक ऐसी अजेय आध्यात्मिक शक्ति जो किसी भी विरोधी परिस्थिति या मार-शक्ति से डगमगाए नहीं:

  • जब श्रद्धा बल बनती है, तो दुनिया का कोई भी संदेह उसे हिला नहीं सकता।
  • जब वीर्य बल बनती है, तो कोई भी आलस्य या सुस्ती उसे बुझा नहीं सकती।
  • जब स्मृति बल बनती है, तो कोई भी प्रमाद (लापरवाही) उसे भटका नहीं सकता।
  • जब समाधि बल बनती है, तो कोई भी विक्षेप उसे तोड़ नहीं सकता।
  • और जब प्रज्ञा बल के रूप में परिपक्व होती है, तो घोर से घोर अज्ञान और मोह भी उसके प्रहार को रोक नहीं पाते।

निष्कर्षतः, इन्द्रियाँ साधना को दिशा देने वाले ‘मार्गदर्शक’ गुण हैं, जबकि बल वे ही गुण हैं जो अब साधक के भीतर एक स्थायी, संतुलित और ‘अडिग शक्ति’ बन चुके हैं।

आइए, अब सीधे भगवान बुद्ध के वचनों में जाने कि ये बल हमारे भीतर कैसे काम करते हैं और राजसी गढ़ (क़िले) की सुरक्षा में इनकी भूमिका क्या है:

बल भावना

“ये पाँच बल हैं—

  • श्रद्धा बल
  • वीर्य बल
  • स्मृति बल
  • समाधि बल
  • प्रज्ञा बल

श्रद्धा-बल क्या है?

जैसे किसी राजसी गढ़ पर ध्वजखंभ स्थापित किया जाता है—भीतरी प्रजा की रक्षा के लिए, और बाहरी शक्तियों को दूर रखने के लिए, गहराई तक गड़ा, मज़बूती से स्थापित, अविचल, और स्थिर!

उसी तरह, कोई साधक श्रद्धा स्थापित करता है। वह तथागत की बोधि को लेकर आश्वस्त होता है कि ‘वाकई भगवान ही अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध है—विद्या और आचरण से संपन्न, परम लक्ष्य पा चुके, दुनिया के ज्ञाता, दमनशील पुरुषों के अनुत्तर सारथी, देवों और मनुष्यों के गुरु, बुद्ध भगवान!’

वह ऐसी ध्वजखंभ-रूपी श्रद्धा स्थापित कर अकुशल का त्याग करता है, और कुशलता को बढ़ाता है। वह पाप का त्याग करता है, और निष्पापता को बढ़ाता है। और स्वयं का शुद्धता से ख्याल रखता है। इस तरह, वह श्रद्धा-संपन्न होता है।

—यही उसका श्रद्धा-बल है।


वीर्य-बल क्या है?

जैसे किसी राजसी गढ़ पर शक्तिशाली सेनाएँ नियुक्त की जाती हैं—भीतरी प्रजा की रक्षा के लिए, और बाहरी शक्तियों को दूर रखने के लिए। जैसे, हाथीरोही सेना, अश्वरोही सेना, रथिक सेना, धनुर्धर सेना, ध्वजरोही सेना, निवास-आपूर्ति अधिकारी, भोजन-आपूर्ति सैनिक, लोकप्रिय राजकुमार, छापामार वीर सेना, पैदल सेना, एवं गुलाम सेना!

उसी तरह, कोई साधक वीर्य जगाकर रहता है—अकुशल स्वभाव को त्यागने के लिए, और कुशल स्वभाव को धारण करने के लिए। वह निश्चयबद्ध, दृढ़, और पराक्रमी होता है। कुशल स्वभाव के प्रति अपने कर्तव्य से जी नहीं चुराता।

वह ऐसी शक्तिशाली सेनारूपी वीर्य जगाकर अकुशल का त्याग करता है, और कुशलता को बढ़ाता है। वह पाप का त्याग करता है, और निष्पापता को बढ़ाता है। और स्वयं का शुद्धता से ख्याल रखता है। इस तरह, वह वीर्य-संपन्न होता है।

—यही उसका वीर्य-बल है।


स्मृति-बल क्या है?

जैसे किसी राजसी गढ़ पर एक चतुर, समर्थ और बुद्धिमान द्वारपाल होता है—भीतरी प्रजा की रक्षा के लिए, और बाहरी शक्तियों को दूर रखने के लिए, जो संदेहास्पद लोगों को बाहर रखता है, और परिचित भले लोगों को ही भीतर प्रवेश देता है।

उसी तरह, कोई साधक स्मृतिमान होता है, याददाश्त में बहुत तेज़! पूर्वकाल में किया गया कर्म, पूर्वकाल में कहा गया वचन भी स्मरण रखता है, और अनुस्मरण कर पाता है।

वह ऐसी द्वारपाल-रूपी स्मृति जगाकर अकुशल का त्याग करता है, और कुशलता को बढ़ाता है। वह पाप का त्याग करता है, और निष्पापता को बढ़ाता है। और स्वयं का शुद्धता से ख्याल रखता है। इस तरह, वह स्मृति-संपन्न होता है।

—यही उसका स्मृति-बल है।


समाधि-बल क्या है?

• जैसे किसी राजसी गढ़ पर बहुत घास, काष्ट (=लकड़ी) और जल संचित किया जाता है—भीतरी प्रजा के सुख, सुविधा व आराम के लिए, और बाहरी शक्तियों को दूर रखने के लिए।

उसी तरह, कोई आर्यश्रावक स्वयं की सुख, सुविधा व आराम के लिए, और निर्वाण को जागृत करने के लिए—कामुकता से विलग, अकुशल-स्वभाव से विलग होकर—वितर्क और विचार सहित, विलगता से जन्मे प्रीति और सुख वाले प्रथम-ध्यान में प्रवेश कर विहार करता है।

• आगे, जैसे किसी राजसी गढ़ पर बहुत चावल और जौ का भंडार किया जाता है—भीतरी प्रजा के सुख, सुविधा व आराम के लिए, और बाहरी शक्तियों को दूर रखने के लिए।

उसी तरह, कोई आर्यश्रावक स्वयं की सुख, सुविधा व आराम के लिए, और निर्वाण को जागृत करने के लिए—वितर्क और विचार के थमने पर, भीतर से आश्वस्त हुआ मानस एकरस होकर—बिना-वितर्क बिना-विचार के, समाधि से जन्मे प्रीति और सुख वाले द्वितीय-ध्यान में प्रवेश कर विहार करता है।

• आगे, जैसे किसी राजसी गढ़ पर बहुत तिल, मूँग, और चनों का भंडार किया जाता है—भीतरी प्रजा के सुख, सुविधा व आराम के लिए, और बाहरी शक्तियों को दूर रखने के लिए।

उसी तरह, कोई आर्यश्रावक स्वयं की सुख, सुविधा व आराम के लिए, और निर्वाण को जागृत करने के लिए—प्रीति से विरक्त हो जाता है, और उपेक्षा के साथ स्मृतिवान और सचेत होकर शरीर से सुख महसूस करता है। जिसे आर्यजन ‘उपेक्षक, स्मृतिमान, सुखविहारी’ कहते हैं—उस तृतीय-ध्यान में प्रवेश कर विहार करता है।

• आगे, जैसे किसी राजसी गढ़ पर बहुत (तरह के स्वादिष्ट) पेय्य का भंडार किया जाता है, जैसे घी, मक्खन, तेल, शहद, गुड़ और नमक इत्यादि—भीतरी प्रजा के सुख, सुविधा व आराम के लिए, और बाहरी शक्तियों को दूर रखने के लिए।

उसी तरह, कोई आर्यश्रावक स्वयं की सुख, सुविधा व आराम के लिए, और निर्वाण को जागृत करने के लिए—सुख और दुःख के त्याग से, तथा सौमनस्य और दौमनस्य के पहले ही मिट जाने के कारण—वह न सुख, न दुःख वाली, तथा उपेक्षा और स्मृति की शुद्धता से युक्त चतुर्थ-ध्यान में प्रवेश कर विहार करता है।

जैसे, कोई राजसी गढ़ अपने लिए इन चार तरह के आहारों को जब चाहे, बिना दिक्कत, बिना परेशानी के उपलब्ध रखता है। उसी तरह, कोई आर्यश्रावक स्वयं के लिए ऊँचे चित्त के चार ध्यान अवस्थाओं को जब चाहे, बिना दिक्कत, बिना परेशानी के उपलब्ध रखता है।

वह ऐसी आहार-रूपी समाधि लगाकर अकुशल का त्याग करता है, और कुशलता को बढ़ाता है। वह पाप का त्याग करता है, और निष्पापता को बढ़ाता है। और स्वयं का शुद्धता से ख्याल रखता है। इस तरह, वह समाधि-संपन्न होता है।

—यही उसका समाधि-बल है।


प्रज्ञा-बल क्या है?

जैसे कोई राजसी गढ़ एक ऊँची, मोटी और पक्की रक्षार्थ दीवार से घिरा होता है—भीतरी प्रजा की रक्षा के लिए, और बाहरी शक्तियों को दूर रखने के लिए। उसी तरह किसी आर्यश्रावक में आर्य और भेदक अन्तर्ज्ञान (प्रज्ञा) होता है—उदय-व्यय पता करने योग्य, दुःखों का सम्यक अंतकर्ता!

वह ऐसे दीवार-रूपी ‘प्रज्ञा’ से घिरकर अकुशल का त्याग करता है, और कुशलता को बढ़ाता है। वह पाप का त्याग करता है, और निष्पापता को बढ़ाता है। और स्वयं का शुद्धता से ख्याल रखता है। इस तरह, वह प्रज्ञा-संपन्न होता है।

—यही उसका प्रज्ञा-बल है।”

— अंगुत्तरनिकाय ७:६३ : नगरोपम सुत्त + अंगुत्तरनिकाय ५:२ : वित्थत सुत्त


किस तरह विकसित करें?

“जैसे गंगा नदी पूरब की ओर बहती है; पूरब की ओर ढलती है; पूरब की ओर ही झुकती है।

उसी तरह जब कोई साधक इन पाँच बलों को विकसित करे, बढ़ाएँ, तो वह निर्वाण की ओर बहता है, निर्वाण की ओर ढलता है, निर्वाण की ओर झुकता है।

और किस तरह कोई साधक इन पाँच बलों को विकसित करता है, बढ़ाता है?

  • ऐसा होता है कि कोई भिक्षु श्रद्धा बल की साधना निर्लिप्तता के सहारे, विराग के सहारे, निरोध के सहारे करता है, जो त्याग परिणामी हो।
  • वह वीर्य बल की साधना…
  • वह स्मृति बल की साधना…
  • वह समाधि बल की साधना…
  • वह प्रज्ञा बल की साधना निर्लिप्तता के सहारे, विराग के सहारे, निरोध के सहारे करता है, जो त्याग परिणामी हो।

इस तरह, जब कोई साधक इन पाँच बलों को विकसित करे, बढ़ाएँ, तो वह निर्वाण की ओर बहता है, निर्वाण की ओर ढलता है, निर्वाण की ओर झुकता है।”

— संयुत्तनिकाय ५० : १