सतिपट्ठान | सम्मपधान | इद्धिपाद | इन्द्रिय | बल | बोज्झङ्ग | अट्ठङ्गिक मग्ग

सात बोध्यङ्ग
परिचय
बोध्यङ्ग—अर्थात ‘संबोधि’ या ‘जागृति’ के सात आवश्यक अंग। ये वे सात परम मानसिक गुण हैं, जो जब एक साथ पूर्ण रूप से विकसित हो जाते हैं, तो साधक के चित्त के सभी अज्ञान रुपी जालों को काटकर उसे सीधे अंतिम विमुक्ति (निर्वाण) के द्वार पर खड़ा कर देते हैं।
इन सात अंगों का सतिपट्ठान की साधना से अत्यंत गहरा और अटूट संबंध है। प्राचीन पालि सूत्रों में इस बोधि-प्रक्रिया को दो अत्यंत वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोणों से समझाया गया है: पहली ‘सर्पिल’ (क्रमिक) साधना, और दूसरी ‘समग्र’ (संपूर्ण) साधना।
१. सर्पिल साधना
सर्पिल या घुमावदार क्रमिक प्रक्रिया में ये सातों अंग सतिपट्ठान की ज़मीन पर एक-के-बाद-एक उगते हैं। यह एक चरण-दर-चरण ऊपर उठती हुई विकासशील शृंखला है:
- स्मृति: साधना की शुरुआत इसी से होती है। सतिपट्ठान का अभ्यास करते हुए चित्त का पूरी तरह वर्तमान में तत्पर और जागरूक हो जाना ही पहला बोध्यङ्ग है।
- धम्मविचय: जब स्मृति स्थिर होती है, तो भीतर एक गहरी प्रज्ञा और जिज्ञासा जगती है। साधक अपने मन में उठने वाले स्वभावों का विश्लेषण करता है—यह जानना कि कौन-सी मानसिक वृत्ति कुशल (हितकारी) है और कौन-सी अकुशल।
- वीर्य: विवेकपूर्ण जाँच से जब सही मार्ग समझ आ जाता है, तब साधक अकुशल को त्यागने और कुशल को बढ़ाने के लिए एक अथक प्रयास (वीर्य) करता है।
- प्रीति: इस सही वीर्य और अकुशलताओं के हटने से चित्त में एक अत्यंत आनंदपूर्ण उत्साह और आध्यात्मिक उमंग (निरामिष प्रीति) का जन्म होता है।
- प्रश्रब्धि: प्रीति का वह तीव्र रोमांच जब भीतर ही भीतर गहराने लगता है, तो चित्त और काया में एक परम शीतल शांति छा जाती है।
- समाधि: इस गहरी शांति से मन पूरी तरह एकाग्र, अचूक और स्थिर हो जाता है।
- उपेक्षा: और अंततः, इस चरम एकाग्रता से एक निष्पक्ष और परम संतुलित मनःस्थिति जन्म लेती है।
यहाँ ‘उपेक्षा’ का अर्थ कोई निष्क्रियता या संवेदनहीनता नहीं है; यह चित्त का वह ‘अभेद्य समत्व’ है जो सुख और दुःख, दोनों को समान दृष्टि से देखता है और किसी भी अनुभूति से विचलित नहीं होता। यह उसी पूर्ण समत्व के समान है जो चतुर्थ ध्यान में उपजता है, और यही आगे बढ़कर असंस्कृत अवस्था के द्वार खोलता है।
२. समग्र साधना
दूसरी ओर, समग्र दृष्टिकोण यह मानता है कि चारों स्मृतिप्रस्थानों (काया, वेदना, चित्त, धम्म) में से यदि कोई भी एक साधना पूरी गहराई और सटीकता के साथ की जाए, तो वह अपने-आप शेष सभी संबोध्यंगों को विकसित करने लगती है। एक संबोध्यङ्ग की साधना से सातों संबोध्यङ्ग स्वतः जाग्रत होते हैं।
इसका अर्थ है कि सातों संबोध्यङ्ग अपने भीतर एक-दूसरे के बीज लिए होते हैं। यह हमें बताता है कि साधना का कोई भी सही प्रवेश द्वार अधूरा नहीं है; उसमें संबोधि की समग्र संपूर्णता छिपी है।
समझने की बात यह है कि सर्पिल और समग्र—ये दोनों तरीके परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। सर्पिल तरीका हमें मार्ग का ‘क्रम’ दिखाता है, जबकि समग्र तरीका यह आश्वस्त करता है कि हर सही क्षण में ‘पूर्णता’ का बीज है। दोनों ही ‘कारण-कार्य भाव’ (प्रतीत्यसमुत्पाद) के सिद्धांत से गूँथे हुए हैं, जहाँ एक गुण दूसरे का आधार बनता है और उसे सशक्त करता है।
लौकिक और लोकुत्तर
प्राचीन पालि सूत्रों के सैकड़ों वर्षों बाद लिखे गए कुछ अभिधम्म ग्रंथों में यह माना गया कि बोध्यङ्ग केवल ‘लोकुत्तर’ स्तर पर, यानी पूर्ण जागृति के क्षण में ही सक्रिय होते हैं। लेकिन भगवान बुद्ध के मूल सूत्र स्पष्ट दर्शाते हैं कि ये बोध्यङ्ग सामान्य ‘लौकिक’ ध्यान साधना में भी सक्रिय और अत्यंत उपयोगी होते हैं।
जब हम सामान्य ध्यान में इन बोध्यंगों को ‘आहार’ (पोषण) देते हैं, तो चित्त के विघ्नकारी क्लेश (नीवरण) भूखे मर जाते हैं। इतना ही नहीं, ये सात संबोध्यङ्ग चारों ‘ब्रह्मविहारों’ (मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा) को विकसित करने में अत्यंत सहायक होते हैं, जो अंततः साधक को ‘चेतो-विमुक्ति’ की ओर ले जाते हैं।
इससे सिद्ध होता है कि बोध्यङ्ग केवल मंज़िल (निर्वाण) नहीं हैं, बल्कि वे उस मंज़िल तक पहुँचने के लिए रखी जाने वाली वह मज़बूत नींव भी हैं, जिस पर प्रज्ञा की भव्य इमारत खड़ी होती है।
योनिसो मनसिकार
पाँच इंद्रियों और सात संबोध्यंगों में एक बहुत ही सूक्ष्म और रोचक अंतर है। जहाँ पाँच इंद्रियाँ ‘अप्पमाद’ (लापरवाह न होने के संवेग) से जन्म लेती हैं, वहीं सात संबोध्यङ्ग की जड़ ‘योनिसो मनसिकार’ में होती है।
योनिसो मनसिकार का अर्थ है—‘उचित चिंतन’ या ‘बुद्धिमत्तापूर्ण ध्यान’। यह सही जगह ध्यान देने, सही तरीके से सोचने और सही प्रश्न उठाने की वह अद्भुत कला है, जो ‘सम्यक-दृष्टि’ को जन्म देती है। यह एक ऐसा मानसिक चश्मा है जो हमें आत्म-विकास में सहायक विचारों और भटकाने वाले विचारों के बीच का अंतर साफ-साफ दिखा देता है।
भगवान बुद्ध ने स्पष्ट कहा है कि हमें उन विचारों और सवालों को तुरंत छोड़ देना चाहिए जो हमारे भीतर ‘आस्रवों’ (काम-भोग, भव, दृष्टि और अविद्या के मलों) को बढ़ाते हैं। हमें केवल ऐसे प्रश्नों पर ध्यान देना चाहिए जो हमें हमारे अनुभवों का यथार्थ चित्र दिखाएं। ऐसे उपयोगी प्रश्न मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं:
- परिभाषा वाले प्रश्न: “यह दुःख वास्तव में क्या है?” या “आसक्ति क्या है?”
- वर्गीकरण वाले प्रश्न: किसी अनुभव को उचित श्रेणी में रखना, जैसे— “मेरे भीतर उठ रही यह भावना किस अकुशल वृत्ति से जुड़ी है?”
- कारण-कार्य वाले प्रश्न: “इस अमुक विचार के उठने से मेरे चित्त पर क्या प्रभाव पड़ रहा है?”
इनमें एक और सर्वोच्च श्रेणी है: प्रश्न पूछने की शैली। हमारी हर सोच और हर सवाल को केवल एक ही कसौटी पर परखा जाना चाहिए— “क्या यह सोच मुझे दुःख के अंत की ओर ले जा रही है, या नहीं?”
बुद्ध का मौन
जब हम उन सवालों में उलझते हैं जिनका कोई स्पष्ट और अनुभवजन्य आधार नहीं होता—जैसे “क्या मैं हूँ या नहीं?”, “क्या मेरी कोई आत्मा है या नहीं?”—तब मन केवल भ्रम और संशय के जालों में फँसता है। जब एक बार किसी ने बुद्ध से सीधा सवाल पूछा कि “क्या आत्मा है?”, तो बुद्ध चुप रहे। उनका यह मौन स्पष्ट रूप से यह दर्शाता था कि यह प्रश्न ही गलत दिशा में जा रहा है, क्योंकि यह ‘दृष्टि-आस्रव’ को पोषित करता है।
इसके विपरीत, सही सवाल चार आर्य सत्यों पर आधारित होते हैं:
- क्या इस वर्तमान दुःख के पीछे मेरी ही कोई पकड़ या आसक्ति है?
- उस आसक्ति के पीछे कौन-सी सूक्ष्म तृष्णा काम कर रही है?
- क्या उस तृष्णा को इसी क्षण छोड़ा जा सकता है?
- उसे छोड़ने के लिए मुझे अभी अपने चित्त में क्या विकसित करना होगा?
इन सवालों के सही उत्तर हमें दार्शनिक बहसों में नहीं उलझाते, बल्कि सीधे बंधनों से मुक्त करते हैं। यही ‘योनिसो मनसिकार’ का असली कार्य है।
मैं और मेरा
ध्यान साधना की शुरुआत में, मन में उठने वाले नीवरणों (रुकावटों) को पहचानना होता है। उदाहरण के लिए, जब क्रोध आए, तो उचित चिंतन यह नहीं पूछता कि “मैं किससे नाराज़ हूँ?” या “उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?” बल्कि वह पूछता है, “अभी इस चित्त में क्या घट रहा है?”
हालाँकि बौद्ध दर्शन परम रूप से ‘अनात्म’ की बात करता है, फिर भी ध्यान के शुरुआती स्तर पर ‘मैं’ और ‘मेरा’ जैसे शब्दों का उपयोग एक साधन के रूप में किया जा सकता है। क्यों? क्योंकि हमारा अज्ञानी मन अभी भी ‘मैं और दूसरे’ की भाषा में सोचता है। शुरुआत में इस ‘मैं’ का उपयोग केवल इसलिए किया जाता है ताकि ध्यान बाहरी संसार (उस व्यक्ति या घटना) से हटकर पूरी तरह ‘भीतर’ की ओर मुड़ जाए।
परंतु जैसे-जैसे संबोध्यङ्ग पुष्ट होते हैं, यह दृष्टिकोण पक्का होने लगता है। साधक अनुभवों को केवल ‘अनुभव’ के रूप में देखने लगता है। शुरुआत का वह अहंभाव कि “मैं ध्यान कर रहा हूँ” या “मेरा मन कितना शांत है”, धीरे-धीरे विलीन होने लगता है। अब साधक केवल यथार्थ को देखता है— “यह एक स्वभाव है… यह मात्र उत्पन्न हो रहा है।” यही वह साक्षी-भाव है जहाँ से ‘मैं’ छूट जाता है और चित्त ‘शून्यता’ की परम दहलीज़ पर कदम रखता है।
संतुलन साधना - पोषण और उपेक्षा
ध्यान में आगे बढ़ने के लिए यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि कौन-से गुण कब अधिक सक्रिय हैं और कब उन्हें थामना है। यह संतुलन दो तरह से साधा जाता है: बोध्यंगों को पोषण देना, और नीवरणों को भूखा रखना।
ध्यान दें कि संबोध्यंगों में कुछ गुण सक्रियता लाते हैं और कुछ गुण निष्क्रियता (शांति)।
- जब चित्त सुस्त और आलसी हो: तब उसे शांत करने वाले गुणों की नहीं, बल्कि जगाने वाले गुणों की आवश्यकता होती है। उस समय वीर्य, धम्मविचय और प्रीति जैसे सक्रिय गुणों को उभारना चाहिए।
- जब चित्त बेचैन और व्याकुल हो: तब उसे और अधिक वीर्य नहीं, बल्कि शीतलता चाहिए। उस समय प्रश्रब्धि, समाधि और उपेक्षा जैसे शांत गुणों का अभ्यास करना चाहिए।
- स्मृति: यह एकमात्र ऐसा गुण है जो हर परिस्थिति में हितकारी है। स्मृति ही वह मुख्य निर्देशक है जो यह तय करती है कि अभी चित्त को किस औषधि की आवश्यकता है।
इसी संतुलन में, ‘धम्मविचय’ एक ऐसा अद्भुत संबोध्यङ्ग है जो सीधे ‘संशय’ (विचिकिच्छा) रूपी सबसे बड़ी बाधा को सुखा देता है। जब साधक यह प्रत्यक्ष देखने लगता है कि कौन-सी वृत्तियाँ उसे भटका रही हैं और कौन-सी स्थिर कर रही हैं, तो उसका सारा संशय स्वतः ही भस्म हो जाता है।
परम लक्ष्य
भगवान बुद्ध कहते हैं कि सातों संबोध्यंगों की साधना का आदर्श तरीका यह है कि उन्हें “निर्लिप्तता के सहारे, विराग के सहारे, निरोध के सहारे किया जाए, जो अंततः पूर्ण त्याग की ओर ले जाए।”
ये चार अवस्थाएँ लौकिक और लोकुत्तर, दोनों ही स्तरों पर काम करती हैं। लौकिक स्तर पर, ये ध्यान (समाधि) में आने वाले विघ्नों और अकुशल धर्मों को क्रमशः त्यागने में काम आती हैं। और जब यह अभ्यास ‘योनिसो मनसिकार’ की परम गहराई तक पहुँचता है, जहाँ सूक्ष्म से सूक्ष्म राग भी नज़र आने लगते हैं, तब यह पूर्ण वैराग्य को जन्म देता है।
अंततः, लोकुत्तर स्तर पर यही संबोध्यङ्ग चित्त को सभी ‘रचनाओं’ से मुक्त कर ‘असंस्कृत’ वास्तविकता में प्रवेश करा देते हैं—एक ऐसी परम शून्यता, जहाँ कुछ भी पकड़ने की, या कुछ भी होने की कोई आवश्यकता शेष नहीं रह जाती।
संबोध्यङ्ग भावना
एक समय भगवान साकेत के अञ्जनवन मृगदाय में विहार कर रहे थे। तब कुण्डलिय परिव्राजक भगवान के पास गया, और जाकर भगवान से हालचाल पूछा। मैत्रीपूर्ण वार्तालाप कर वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठकर कुण्डलिय परिव्राजक ने भगवान से कहा:
“श्रीमान गोतम, मैं आश्रमों में निश्रय लेता हूँ और सभाओं में जाता हूँ। यह मेरी आदत है कि मैं प्रातःभोज समाप्त करने पर एक आश्रम से दूसरे आश्रम, एक उद्यान से दूसरा उद्यान घूमते रहता हूँ। वहाँ मुझे कोई-कोई ऐसे श्रमण-ब्राह्मण दिखते हैं जो केवल इसीलिए बात करते हैं कि वे दूसरों की धारणाओं में खोट ढूँढ सकें और विवाद जीत सकें। किन्तु श्रीमान गोतम क्या लाभकारी बात देखकर विहार करते हैं?”
“कुण्डलिय, तथागत ‘विद्या और विमुक्ति फल’ की लाभकारी बात देखकर विहार करते हैं।”
“किन्तु, श्रीमान गोतम, कौन-से धर्मों की साधना कर, उन्हें विकसित करने पर विद्या और विमुक्ति परिपूर्ण होती है?”
“कुण्डलिय, सात संबोध्यङ्गों की साधना कर, उन्हें विकसित करने पर विद्या और विमुक्ति परिपूर्ण होती है।”
“किन्तु, श्रीमान गोतम, कौन-से धर्मों की साधना कर, उन्हें विकसित करने पर सात संबोध्यङ्ग परिपूर्ण होते हैं?”
“कुण्डलिय, चार स्मृतिप्रस्थान की साधना कर, उन्हें विकसित करने पर सात संबोध्यङ्ग परिपूर्ण होते हैं।”
“किन्तु, श्रीमान गोतम, कौन-से धर्मों की साधना कर, उन्हें विकसित करने पर चार स्मृतिप्रस्थान परिपूर्ण होते हैं?”
“कुण्डलिय, तीन तरह (काया, वचन, मन) से सदाचार की साधना कर, उन्हें विकसित करने पर चार स्मृतिप्रस्थान परिपूर्ण होते हैं।”
“किन्तु, श्रीमान गोतम, कौन-से धर्मों की साधना कर, उन्हें विकसित करने पर तीन तरह से सदाचार परिपूर्ण होता है?”
“कुण्डलिय, इंद्रिय संवर की साधना कर, उन्हें विकसित करने पर तीन तरह से सदाचार परिपूर्ण होता है। और, कुण्डलिय, कोई इंद्रिय संवर की साधना कर, उन्हें विकसित कैसे करता है, जिससे तीन तरह से सदाचार परिपूर्ण होते हैं?
ऐसा होता है, कुण्डलिय, कि कोई भिक्षु—
- आँखों से अनुकूल रूप देखकर न उसके पीछे पड़ता है, न उसमें मजा लेता है, न ही कोई राग जगाता है। उसकी काया स्थिर होती है, और उसका चित्त भीतर से स्थिर होता है, सुसंगठित होता है, सुविमुक्त होता है। किन्तु, वह आँखों से प्रतिकूल रूप देखकर भी न तिलमिलाता है, न उसका चित्त अस्थिर होता है, न उसका मन खिन्न होता है, न उसका मानस दुर्भावना से भरता है। (तब भी) उसकी काया स्थिर होती है, और उसका चित्त भीतर से स्थिर होता है, सुसंगठित होता है, सुविमुक्त होता है।
- कान से अनुकूल ध्वनि सुनकर…
- नाक से अनुकूल गंध सूँघकर…
- जीभ से अनुकूल स्वाद चखकर…
- काया से अनुकूल संस्पर्श महसूस कर…
- मन से अनुकूल स्वभाव जानकर न उसके पीछे पड़ता है, न उसमें मजा लेता है, न ही कोई राग जगाता है। उसकी काया स्थिर होती है, और उसका चित्त भीतर से स्थिर होता है, सुसंगठित होता है, सुविमुक्त होता है। किन्तु, वह मन से प्रतिकूल स्वभाव जानकर भी न तिलमिलाता है, न उसका चित्त अस्थिर होता है, न उसका मन खिन्न होता है, न उसका मानस दुर्भावना से भरता है। (तब भी) उसकी काया स्थिर होती है, और उसका चित्त भीतर से स्थिर होता है, सुसंगठित होता है, सुविमुक्त होता है।
इस तरह आँखों से अनुकूल या प्रतिकूल रूप देखने पर भी भिक्षु की काया स्थिर होती है, और उसका चित्त भीतर से स्थिर होता है, सुसंगठित होता है, सुविमुक्त होता है। इस तरह, इंद्रिय संवर की साधना कर, उन्हें विकसित करने से तीन तरह से सदाचार परिपूर्ण होते हैं।
फिर, कुण्डलिय, तीन तरह से सदाचार की साधना कर, उन्हें विकसित करने पर चार स्मृतिप्रस्थान कैसे परिपूर्ण होते हैं?
ऐसा होता है, कुण्डलिय, कि कोई भिक्षु लोक के प्रति लालसा और नाराज़ी हटाकर—
- काया को काया देखते हुए रहता है
- वेदना को वेदना देखते हुए रहता है
- चित्त को चित्त देखते हुए रहता है
- धम्म को धम्म देखते हुए रहता है
— तत्पर, सचेत और स्मृतिमान। इस तरह, कुण्डलिय, चार स्मृतिप्रस्थान की साधना कर, उन्हें विकसित करने पर सात संबोध्यङ्ग परिपूर्ण होते हैं।
फिर, कुण्डलिय, सात संबोध्यङ्गों की साधना कर, उन्हें विकसित करने पर विद्या और विमुक्ति कैसे परिपूर्ण होती है?”
ऐसा होता है, कुण्डलिय, कि कोई भिक्षु—
- स्मृति संबोध्यङ्ग की साधना निर्लिप्तता के सहारे, विराग के सहारे, निरोध के सहारे करता है, जो त्याग परिणामी हो।
- धम्मविचय संबोध्यङ्ग की साधना…
- वीर्य संबोध्यङ्ग की साधना…
- प्रीति संबोध्यङ्ग की साधना…
- प्रश्रब्धि संबोध्यङ्ग की साधना…
- समाधि संबोध्यङ्ग की साधना…
- उपेक्षा संबोध्यङ्ग की साधना निर्लिप्तता के सहारे, विराग के सहारे, निरोध के सहारे करता है, जो त्याग परिणामी हो।
इस तरह, कुण्डलिय, सात संबोध्यङ्गों की साधना कर, उन्हें विकसित करने पर विद्या और विमुक्ति परिपूर्ण होती है।"
ऐसा कहे जाने पर कुण्डलिय परिव्राजक कह पड़ा, “अतिउत्तम, गुरु गौतम! अतिउत्तम, गुरु गौतम! जैसे कोई पलटे को सीधा करे, छिपे को खोल दे, भटके को मार्ग दिखाए, या अँधेरे में दीप जलाकर दिखाए, ताकि तेज आँखों वाला स्पष्ट देख पाए—उसी तरह भगवान ने धर्म को अनेक तरह से स्पष्ट कर दिया।
मैं बुद्ध की शरण जाता हूँ! धर्म की और संघ की भी! भगवान मुझे आज से लेकर प्राण रहने तक शरणागत उपासक धारण करें!"
— संयुत्तनिकाय ४६:६ : कुण्डलिय सुत्त “मैं ऐसा कोई एक धम्म (स्वभाव) नहीं देखता हूँ जिसके कारण अनुत्पन्न संबोध्यङ्ग उत्पन्न नहीं होते हैं, और उत्पन्न हुए संबोध्यङ्ग विकसित होकर परिपूर्ण नहीं होते हैं, जैसे अनुचित चिंतन (“अयोनिसो मनसिकार”)। जब किसी का चिंतन अनुचित हो (या ध्यान सही जगह नहीं हो), तब अनुत्पन्न संबोध्यङ्ग उत्पन्न नहीं होते हैं, और उत्पन्न हुए संबोध्यङ्ग विकसित होकर परिपूर्ण नहीं होते हैं। मैं ऐसा कोई एक धम्म नहीं देखता हूँ जिसके कारण अनुत्पन्न संबोध्यङ्ग उत्पन्न होने लगते हैं, और उत्पन्न हुए संबोध्यङ्ग विकसित होकर परिपूर्ण होने लगते हैं, जैसे उचित चिंतन (“योनिसो मनसिकार”)। जब किसी का चिंतन उचित हो (या ध्यान सही जगह हो), तब अनुत्पन्न संबोध्यङ्ग उत्पन्न होने लगते हैं, और उत्पन्न हुए संबोध्यङ्ग विकसित होकर परिपूर्ण होने लगते हैं।” — अंगुत्तरनिकाय १:७५-७६ (🔔 इस सुत्त को आम पाठकों के लिए सुलभ बनाने के लिए, इसे सरल और स्पष्ट रूपरेखा में प्रस्तुत किया जा रहा है।) — संयुत्तनिकाय ४६:५१ : आहार सुत्त (१) “ऐसा होता है कि कोई भिक्षु लोक के प्रति लालसा और नाराज़ी हटाकर—काया को काया देखते हुए… वेदना को वेदना देखते हुए… चित्त को चित्त देखते हुए… धम्म को धम्म देखते हुए रहता है—तत्पर सचेत व स्मरणशील। उस अवसर पर उसकी स्मृति स्थिर होती है, बिना भ्रंश हुए। जब उसकी स्मृति स्थिर होती है, बिना भ्रंश हुए, तब स्मृति संबोध्यङ्ग जागृत होता है। वह उसकी साधना करता है, और उसे विकसित कर परिपूर्ण करता है। (२) इस तरह स्मृतिमान होकर वह स्वभाव की जाँच-पड़ताल करता है, उनका विश्लेषण करता है, और प्रज्ञा से उन्हें समझता है। जब वह इस तरह स्मृतिमान होकर स्वभाव की जाँच-पड़ताल करें, विश्लेषण करें, अन्तर्ज्ञान से उसे समझे, तब धम्मविचय संबोध्यङ्ग जागृत होता है। वह उसकी साधना करता है, और उसे विकसित कर परिपूर्ण करता है। (३) जो स्वभाव की जाँच-पड़ताल करें, विश्लेषण करें, अन्तर्ज्ञान से उसे समझे, उसमें वीर्य का संचार होता है। जब उसमें वीर्य का संचार हो, तब वीर्य संबोध्यङ्ग जागृत होता है। वह उसकी साधना करता है, और उसे विकसित कर परिपूर्ण करता है। (४) जिस किसी की वीर्य जागृत होती हो, उसे निरामिष (आध्यात्मिक) प्रीति उत्पन्न होती है। जब वीर्य जागृत होने से निरामिष प्रीति उत्पन्न हो, तब प्रीति संबोध्यङ्ग जागृत होती है। वह उसकी साधना करता है, और उसे विकसित कर परिपूर्ण करता है। (५) जो प्रीति से भर उठे, उसकी काया शान्त होने लगती है, और उसका चित्त शान्त होने लगता है। जब प्रीति से भर उठे भिक्षु की काया और चित्त शान्त हो, तब प्रश्रब्धि संबोध्यङ्ग जागृत होता है। वह उसकी साधना करता है, और उसे विकसित कर परिपूर्ण करता है। (६) जो राहत से हो, जिसकी काया शान्त हो, उसका चित्त समाहित होने लगता है। जब राहत से होकर, काया शान्त होकर चित्त समाहित होने लगे, तब समाधि संबोध्यङ्ग जागृत होती है। वह उसकी साधना करता है, और उसे विकसित कर परिपूर्ण करता है। (७) वह ऐसे समाहित चित्त का उपेक्षापूर्वक निरीक्षण करता है। जब वह ऐसे समाहित चित्त का निरीक्षण उपेक्षापूर्वक करें, तब उपेक्षा संबोध्यङ्ग जागृत होती है। वह उसकी साधना करता है, और उसे विकसित कर परिपूर्ण करता है। जब इस तरह चार स्मृतिप्रस्थान की साधना की जाए, उन्हें विकसित किया जाए, तब सात संबोध्यङ्ग परिपूर्णता की ओर जाते हैं। और जब सात संबोध्यङ्ग की साधना की जाए, उन्हें विकसित किया जाए, तब विद्या और विमुक्ति परिपूर्णता की ओर जाते हैं। कैसे? ऐसा होता है कि कोई भिक्षु स्मृति संबोध्यङ्ग की साधना निर्लिप्तता के सहारे, विराग के सहारे, निरोध के सहारे करता है, जो त्याग परिणामी हो। वह धम्मविचय संबोध्यङ्ग… वीर्य संबोध्यङ्ग… प्रीति संबोध्यङ्ग… प्रश्रब्धि संबोध्यङ्ग… समाधि संबोध्यङ्ग… उपेक्षा संबोध्यङ्ग की साधना निर्लिप्तता के सहारे, विराग के सहारे, निरोध के सहारे करता है, जो त्याग परिणामी हो। — इस तरह सात संबोध्यङ्ग की साधना की जाए, उन्हें विकसित किया जाए, तब विद्या और विमुक्ति परिपूर्णता की ओर जाते हैं।” — संयुत्तनिकाय ५४:२ ➤ “जब चित्त सुस्त हो, तब “प्रश्रब्धि, समाधि, और उपेक्षा” संबोध्यङ्गो की साधना करने का गलत समय होता है। क्यों? —क्योंकि कोई सुस्त चित्त उन (निष्क्रिय बनाते) स्वभावों से मुश्किल से ही उठेगा। जैसे कोई पुरुष हो, जिसे किसी नन्ही-सी अग्नि को प्रज्वलित कर बड़ा करना हो—किंतु वह उस पर गीली घास, गीला गोबर, गीली लकड़ियां डाल देता है, उसे जल से सींच देता है, और उस पर धूल डाल कर बुझा देता है। तब क्या नन्ही-सी अग्नि प्रज्वलित होकर बड़ी होगी?” “नहीं, भन्ते।” “उसी तरह, जब चित्त सुस्त हो, तब “प्रश्रब्धि, समाधि और उपेक्षा” संबोध्यङ्गो की साधना करने का गलत समय होता है। क्यों? क्योंकि कोई सुस्त चित्त उन (निष्क्रिय बनाते) स्वभावों से मुश्किल से ही उठेगा। उस समय, “धम्मविचय, वीर्य, और प्रीति” संबोध्यङ्ग की साधना करने का सही समय होता है। क्यों? —क्योंकि कोई सुस्त चित्त उन (सक्रियता लाते) स्वभावों से आसानी से उठेगा। जैसे कोई पुरुष हो, जिसे किसी नन्ही-सी अग्नि को प्रज्वलित कर बड़ा करना हो—वह उस पर सूखी घास, सूखा गोबर, सूखी लकड़ियां डालता है, उस पर मुँह से फूंक मारता है, धूल डाल कर बुझा नहीं देता। तब क्या नन्ही-सी अग्नि प्रज्वलित होकर बड़ी होगी?” “हाँ, भन्ते।” “उसी तरह, जब चित्त सुस्त हो, उस समय “धम्मविचय, वीर्य और प्रीति” संबोध्यङ्ग की साधना करने का सही समय होता है। क्योंकि सुस्त चित्त उन (सक्रियता लाते) स्वभावों से आसानी से उठेगा।” ➤ “जब चित्त बेचैन हो, तब “धम्मविचय, वीर्य, और प्रीति” संबोध्यङ्ग की साधना करने का गलत समय होता है। क्यों? —क्योंकि कोई बेचैन चित्त उन (सक्रियता लाते) स्वभावों से मुश्किल से ही शांत होगा। जैसे कोई पुरुष हो, जिसे बड़ी धधकती अग्नि को बुझाना हो—किंतु वह उस पर सूखी घास, सूखा गोबर, सूखी लकड़ियां डाल देता है, उसे मुँह से फूंक मारता है, लेकिन धूल डाल कर बुझा नहीं देता। तब, क्या वह बड़ी धधकती अग्नि बुझ पायेगी?” “नहीं, भन्ते।” “उसी तरह, जब चित्त बेचैन हो, तब “धम्मविचय, वीर्य और प्रीति” संबोध्यङ्ग की साधना करने का गलत समय होता है। क्यों? क्योंकि कोई बेचैन चित्त उन (सक्रियता लाते) स्वभावों से मुश्किल से ही शांत होगा। उस समय, “प्रश्रब्धि, समाधि, और उपेक्षा संबोध्यङ्ग की साधना करने का सही समय होता है। क्यों? —क्योंकि कोई बेचैन चित्त उन (निष्क्रिय बनाते) स्वभावों से आसानी से शांत होगा। जैसे कोई पुरुष हो, जिसे बड़ी धधकती अग्नि को बुझाना हो—वह उस पर गीली घास, गीला गोबर, गीली लकड़ियां डाल देता है, उसे जल से सींच देता है, और उस पर धूल डाल कर बुझा देता है। तब क्या वह बड़ी धधकती अग्नि बुझ पायेगी?” “हाँ, भन्ते।” “उसी तरह, जब चित्त बेचैन हो, उस समय “प्रश्रब्धि, समाधि, और उपेक्षा” संबोध्यङ्ग की साधना करने का सही समय होता है। क्योंकि कोई बेचैन चित्त उन (निष्क्रिय बनाते) स्वभावों से आसानी से शांत होगा। ➤ और स्मृति संबोध्यङ्ग, मैं कहता हूँ, प्रत्येक अवसर पर लाभदायक ही होता है।” — संयुत्तनिकाय ४६:५३ — धम्मपद ८९ : पण्डितवग्गयोनिसो मनसिकार
पोषण और उपेक्षा
स्मृति
धम्मविचय
वीर्य
प्रीति
प्रश्रब्धि
समाधि
उपेक्षा
संबोध्यङ्ग का समग्र विकास
संबोध्यङ्ग में संतुलन
सुविकसित करे चित्त को।
परित्याग कर आसक्तियों का,
रत रहे जो अनासक्ति में,
ज्योतिमान हो और क्षिणास्रव,
परिनिर्वृत हो इस लोक में।”
