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— साधना कैसे करें —
सुखा पटिपदा | दुक्खा पटिपदा

चतु पटिपदा

साधना कैसे करें?

— अपनी प्रकृति और उचित मार्ग की पहचान —

लेखक: भिक्खु कश्यप
| ८ मिनट
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दुनिया में हर व्यक्ति के चित्त की बुनावट अलग-अलग होती है। यही कारण है कि जो ध्यान-विधि एक साधक को गहरी शांति और प्रज्ञा दोनों तक ले जाती है, वही विधि दूसरे साधक को थोड़ी शांति तो दे पाती है, लेकिन उसके भीतर प्रज्ञा का प्रकाश नहीं जगा पाती।

अक्सर साधक निराश होकर सोचते हैं—“मुझे ध्यान की गहरी अवस्थाएँ क्यों प्राप्त नहीं होतीं?” या “मेरी प्रज्ञा में प्रगति क्यों नहीं हो पा रही है?” इसका कारण उनके प्रयास या साधना की कमी नहीं, बल्कि ‘ग़लत मार्ग’ का चुनाव हो सकता है।

भगवान बुद्ध ने एक परम कुशल वैद्य की भाँति साधकों की मानसिक प्रवृत्तियों को गहराई से समझा और उनके लिए मुख्य रूप से चतु पटिपदा, या चार साधना-मार्ग बताए।

सरलता के लिए, इन्हें दो मुख्य मार्गों में बाँटा जा सकता है—

  1. सुखा पटिपदा (सहज और सुखदायक मार्ग)
  2. दुक्खा पटिपदा (कठोर और संघर्षपूर्ण मार्ग)

आपको कौन-सा मार्ग अपनाना चाहिए, यह केवल आपकी इच्छा पर निर्भर नहीं करता; बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि आपके भीतर राग, द्वेष और मोह की जड़ें कितनी गहरी हैं। आइए, इन दोनों मार्गों को गहराई से समझें।

१. सुखा पटिपदा

कुछ साधक स्वभाव से अपेक्षाकृत संवेदनशील प्रकृति के होते हैं। उनके भीतर कामुकता (राग), क्रोध (द्वेष) और भ्रांतियों (मोह) के आवेग नियंत्रण में होते हैं। उनका चित्त और शरीर पहले से ही एक स्वाभाविक लय और संतुलन में जुड़े-से होते हैं।

जब ऐसे साधक अपनी श्वास पर ध्यान लगाते हैं, तो उन्हें बहुत जल्द सूक्ष्म शारीरिक संवेदनाएँ महसूस होने लगती हैं। चित्त के तुरंत शरीर से जुड़ते ही, वह बिना किसी बड़े संघर्ष के गहरी एकाग्रता और समथ (चित्त की स्थिर निश्चलता) में प्रवेश करने लगता है। इसी निश्चलता के आधार पर, उनके भीतर स्वाभाविक रूप से गहरी प्रज्ञा और विपस्सना (अंतर्दृष्टि) उपजने लगती है। ऐसे साधकों का चित्त साधना की ओर इतना झुका होता है कि यदि वे ध्यान न करें, तो उन्हें भीतर एक प्रकार की व्याकुलता महसूस होती है।

ऐसे साधकों को सीधे श्वास (आनापान) या काया पर ध्यान केंद्रित करने में कोई विशेष कठिनाई नहीं होती। वे सहज रूप से ध्यान में बैठते हैं और समय के साथ-साथ ‘समाधि’ की उच्च अवस्थाओं में प्रवेश कर जाते हैं। समाधि की इस प्रीति और ‘ध्यान-सुख’ में डूबने के बाद, उनके बचे-खुचे विकार भी विपस्सना की उस निर्मलता में धुलकर खुद-ब-खुद क्षीण होने लगते हैं। उनके लिए मुक्ति का यह मार्ग एक सुखद यात्रा बन जाता है।

ऐसे शांत साधकों के बारे में भगवान स्पष्ट रूप से कहते हैं:

कोई व्यक्ति सामान्यतः तीव्र रागपूर्ण, तीव्र द्वेषपूर्ण, या तीव्र मोहपूर्ण स्वभाव का नहीं होता। और न ही वह निरंतर इन विकारों से उत्पन्न दर्द और परेशानी को महसूस करता है।

तब उसे चाहिए कि वह (सहजता से इन ध्यान अवस्थाओं का अभ्यास करे):

  1. कामुकता और अकुशल-स्वभाव से विलग होकर—वितर्क और विचार सहित, विलगता से जन्मे प्रीति और सुख वाले प्रथम-ध्यान में प्रवेश कर विहार करे।
  2. आगे वितर्क और विचार के थमने पर, भीतर से आश्वस्त होकर—बिना-वितर्क, बिना-विचार के, समाधि से जन्मे प्रीति और सुख वाले द्वितीय-ध्यान में प्रवेश कर विहार करे।
  3. आगे प्रीति से विरक्त होकर, उपेक्षा के साथ स्मृतिवान और सचेत होकर शरीर से सुख महसूस करते हुए—तृतीय-ध्यान में प्रवेश कर विहार करे।
  4. और अंततः, सुख-दुःख के त्याग और सौमनस्य-दौमनस्य के मिट जाने पर—उपेक्षा और स्मृति की पूर्ण शुद्धता से युक्त चतुर्थ-ध्यान में प्रवेश कर विहार करे।

—अंगुत्तरनिकाय ४:१६२ : पटिपदावग्ग : वित्थार सुत्त (संक्षिप्त)

ऐसे शांत प्रकृति वाले साधकों को ये दो साधनाएँ परिपूर्ण करनी चाहिए:
आनापान स्मृति

कायागत स्मृति

२. दुक्खा पटिपदा

दूसरी ओर, कुछ साधकों की बुनावट बिल्कुल विपरीत होती है। वे स्वभाव से उग्र होते हैं। उनके भीतर कामुकता (राग), क्रोध-आक्रोश (द्वेष), और तरह-तरह की भ्रांतियों (मोह) के तूफ़ान निरंतर उठते रहते हैं, जो अक्सर उनके चित्त को विक्षिप्त और अचेतन कर देते हैं। उनका चित्त अपेक्षाकृत चंचल और शरीर से टूटा हुआ-सा होता है और वे अपने विचारों व आवेगों के बहाव पर सहज नियंत्रण नहीं रख पाते।

ऐसे साधकों के लिए आँखें बंद करके सीधे श्वास (आनापान) पर ध्यान लगाना सार्थक नहीं हो पाता। उनका चित्त तुरंत शरीर से जुड़ नहीं पाता, जिसके फलस्वरूप समाधि और प्रज्ञा का विकास बाधित हो जाता है।

ऐसे उग्र चित्त वाले साधकों के लिए ही भगवान ने “दुक्खा पटिपदा” (कठिन साधना पथ) का विधान किया है। यहाँ ‘दुक्ख’ का अर्थ शरीर को कोड़े मारना या काँटों पर सोना (शारीरिक यातना) कतई नहीं है; बल्कि इसका अर्थ है—अपने चित्त की गहरी, सुखद और भोगपूर्ण धारणाओं (संज्ञाओं) को तोड़कर, धम्म की ‘कटु’ लगने वाली संज्ञाओं और ‘अप्रिय’ सत्यों का डटकर सामना करना। अर्थात, अपनी पुरानी अकुशल संज्ञाओं को धम्म की कुशल संज्ञाओं से प्रतिस्थापित करना।

चूँकि ऐसे साधकों का चित्त अक्सर अपनी ही दुनिया में खोया रहता है और शारीरिक संवेदनाओं से कटा रहता है, इसलिए केवल श्वास की एकाग्रता उनके उग्र विकारों को जड़ से नहीं उखाड़ पाती। उन्हें अपनी हर एक पुरानी, जकड़ी हुई संज्ञा को एक-एक करके तोड़ना और रूपांतरित करना पड़ता है। ऐसे साधकों के विषय में भगवान कहते हैं:

कोई व्यक्ति सामान्यतः तीव्र रागपूर्ण, तीव्र द्वेषपूर्ण, या तीव्र मोहपूर्ण स्वभाव का होता है। और वह जीवन में निरंतर राग, द्वेष और मोह से उत्पन्न दर्द और परेशानी को तीव्रता से महसूस करता है।

तब उसे चाहिए कि वह (इन पाँच धारणाओं का अभ्यास करे):

  1. (“असुभानुपस्सी काये विहरति”) काया का अनाकर्षक-पहलु देखते हुए विहार करें।
  2. (“आहारे पटिकूलसञ्ञी”) आहार के प्रति प्रतिकूल नजरिया रखें
  3. (“सब्बलोके अनभिरतिसञ्ञी”) सभी लोक के प्रति निरस नजरिया रखें
  4. (“सब्बसङखारेसु अनिच्चानुपस्सी”) सभी रचनाओं का अनित्य-पहलू देखते हुए विहार करें
  5. (“मरणसञ्ञा”) मौत के नजरिए में भलीभांति प्रतिष्ठित हों।

—अंगुत्तरनिकाय ४:१६२ : पटिपदावग्ग : वित्थार सुत्त

जब उग्र चित्त वाला साधक इन कठोर सत्यों और नई संज्ञाओं की भट्टी में अपने राग, द्वेष और मोह को जलाकर भस्म कर देता है, तब जाकर उसके चित्त से विकारों का वास्तविक क्षय होने लगता है। इस गहरी प्रज्ञा और विपस्सना के विकसित होने के पश्चात ही, उसका विक्षिप्त चित्त उस गहरी एकाग्रता (समथ) और शांति के योग्य बनता है, जहाँ से वह अंततः पूर्ण मुक्ति (निर्वाण) को उपलब्ध हो सके।

ऐसे उग्र प्रकृति वाले साधकों को सर्वप्रथम यह सूचीबद्ध साधना परिपूर्ण करनी चाहिए:

दुक्खा पटिपदा

महान शिष्यों का उदाहरण

यह सोचना भारी भूल होगी कि ‘सुखा पटिपदा’ श्रेष्ठ है और ‘दुक्खा पटिपदा’ निम्न। ये केवल चित्त की बुनावट के आधार पर चुने गए साधन हैं; दोनों का गंतव्य एक ही परम विमुक्ति है। इस तथ्य का सबसे सुंदर और प्रामाणिक उदाहरण भगवान बुद्ध के दो अग्र-शिष्यों और पूर्व-मित्रों के बीच हुए इस आपसी संवाद में मिलता है:

(सारिपुत्त और महामोग्गलान भन्ते की आपसी पूछताछ)

भन्ते सारिपुत्त: “मित्र मोग्गलान! साधना के इन चार मार्गों में से किस मार्ग पर चलकर आपके चित्त ने आस्रवों (विकारों) से मुक्त होकर उपादान-रहित परम विमुक्ति प्राप्त की?”

भन्ते महामोग्गलान: “मित्र सारिपुत्त! इन चारों में से मैंने ‘कठोर साधना और शीघ्र ज्ञान’ (दुक्खा पटिपदा खिप्पाभिञ्ञा) वाले मार्ग पर चलकर अपने चित्त को आस्रवों से मुक्त किया है। …और मित्र! आपने किस मार्ग पर चलकर यह विमुक्ति पाई?”

भन्ते सारिपुत्त: “मित्र मोग्गलान! मैंने ‘सुखद साधना और शीघ्र ज्ञान’ (सुखा पटिपदा खिप्पाभिञ्ञा) वाले मार्ग पर चलकर अपने चित्त को आस्रवों से पूर्णतः मुक्त किया है।”

—अंगुत्तरनिकाय ४:१६७ + ४:१६८

जब महामोग्गलान भन्ते जैसे महान और ऋद्धिमान साधक ने भी स्वयं की उग्र प्रवृत्तियों को शांत करने के लिए ‘दुक्खा पटिपदा’ (कठोर मार्ग) का ही आश्रय लिया था, तो फिर किसी भी साधक को अपनी प्रकृति के अनुसार सही मार्ग चुनने में न तो संकोच करना चाहिए और न ही हीनभावना महसूस करनी चाहिए।

शीघ्र या विलंबित सफलता

साधना-मार्ग चुनने के बाद एक और प्रश्न अक्सर उठता है—सफलता कब मिलेगी?

किसी साधक को फल शीघ्र मिलेगा (खिप्पाभिञ्ञा) या दीर्घकाल के पश्चात मिलेगा (दन्धाभिञ्ञा), यह भगवान के अनुसार उसकी किसी रहस्यमयी पारमी पर नहीं, बल्कि उसके भीतर विकसित हुई आध्यात्मिक इंद्रियों की परिपक्वता पर निर्भर करता है।

जिस साधक के भीतर ये पाँच आध्यात्मिक इंद्रियां बलवान होती हैं, उसे अपेक्षाकृत बहुत शीघ्र ही ज्ञान की प्राप्ति होती है:

  1. श्रद्धा इंद्रिय
  2. वीर्य इंद्रिय
  3. स्मृति इंद्रिय
  4. समाधि इंद्रिय
  5. प्रज्ञा इंद्रिय

—अंगुत्तरनिकाय ४:१६२-१६३ (पटिपदा वग्ग)

साधक का मार्ग चाहे सुखद हो या कठोर, अंतिम लक्ष्य इन पाँच इंद्रियों को ही पुष्ट और तीक्ष्ण बनाते हुए मुक्ति पाना है।