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विचिकिच्छा - उलझन और उसका त्याग मुख्य > लेख 3. लेख पटिपदागंभीर विश्लेषण नीवरणश्रद्धा

—अकुशल का त्याग—
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पंचम नीवरण

उलझन

— बोधहीनता और मानसिक गुलामी —

लेखक: भिक्खु कश्यप
| ९ मिनट
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उलझन, भ्रम या शंका—जिन्हें पालि में “विचिकिच्छा” कहा गया है—स्वस्थ जिज्ञासा का नाम नहीं है। यह एक ऐसा मानसिक कुहासा है, जो अक्सर अनुचित संगति और विकृत विचारों के परिणामस्वरूप चित्त को लकवाग्रस्त कर देता है। यह तब उत्पन्न होती है जब सोच किसी एकपक्षीय दृष्टिकोण से ग्रस्त हो जाए, और चित्त की दिशा पूरी तरह खो जाए।

उलझन बाहरी जानकारी की कमी से नहीं, बल्कि भीतर की अस्पष्टता से जन्म लेती है। यदि चित्त ठोस सिद्धान्त, स्पष्ट नीति और विवेक से अनुप्राणित न हो, तो वह बाहरी प्रभावों के अनुसार लगातार ढलता जाता है। यह कोई साधारण मानसिक दुर्बलता नहीं है; यह एक ‘आत्मबोधहीनता’ की स्थिति है। यहाँ चित्त स्वयं में कोई आधार नहीं पाता, और लगातार “अन्य” के अनुसार परिभाषित होता रहता है—कभी समाज के अनुसार, कभी परंपरा के अनुसार, तो कभी किसी प्रभावशाली व्यक्ति के अनुसार।

कुछ चित्त स्वभावतः दृढ़ नहीं होते। जैसे पानी जिस पात्र में पड़े, उसी का आकार ले लेता है, वैसे ही ऐसा चित्त भी परिस्थितियों के अनुसार रूप बदलता रहता है। उसे न स्वयं पर विश्वास होता है, न दूसरों पर, और न ही किसी सिद्धान्त पर। जब उसे कोई ठोस जीवनशैली या अभ्यास का आधार नहीं मिलता, तो वह हर बात पर संदेह करने लगता है।

बुद्ध कहते हैं—जैसी संगति, वैसा चित्त। अनुचित संगति (पापमित्र) से चित्त केवल दूषित ही नहीं होता, बल्कि पराधीन हो जाता है। व्यक्ति निर्णय लेने में स्वतंत्र नहीं रहता। वह अपनी बुद्धि पर भरोसा खो देता है और दूसरों के निर्देश पर आँखें मूंदकर चलने लगता है। यह स्थिति ‘मानसिक गुलामी’ की तरह होती है, जहाँ सरल और स्वाभाविक समझ भी संशयास्पद लगने लगती है। अंधविश्वास का जन्म ठीक यहीं से होता है।

ऐसे व्यक्ति को केवल बौद्धिक जानकारी नहीं, बल्कि दीर्घकालिक मार्गदर्शन चाहिए। उसे सत्पुरुष की संगति की आवश्यकता होती है—जो उसके संदेहों का समाधान करते हुए, उसे एक संयमित और कुशल जीवनपथ का अभ्यास करा सके।

उलझन का मनोविज्ञान: आहार और अनाहार

यह भ्रांति केवल दुर्बल चित्त की ही बपौती नहीं है। यदि एक मजबूत चित्त भी अनुचित दिशा में लग जाए, तो वह भी इस भ्रम के जाल में फँस सकता है। इसे भगवान ने ‘अयोनिसो मनसिकार’ कहा है।

उलझन का आहार और अनाहार

अनुत्पन्न उलझन को उत्पन्न करने, और उत्पन्न हुई उलझन को बढ़ाकर अत्याधिक करने का आहार क्या है?

ऐसी बातें होती हैं जो उलझन के पनपने का आधार बनती हैं—उन पर अनुचित चिंतन (“अयोनिसो मनसिकार”) करना आहार बनता है अनुत्पन्न उलझन उत्पन्न होने और उत्पन्न हुई उलझन बढ़कर अत्याधिक होने का।

किन्तु, ऐसी बातें होती है जो कुशल या अकुशल, दोषपूर्ण या निर्दोष, स्थूल या सूक्ष्म, अंधेरे पक्ष या उजले पक्ष की होती हैं—उन पर उचित चिंतन (“योनिसो मनसिकार”) करना अनाहार (भूखा रखना) है अनुत्पन्न उलझन उत्पन्न होने और उत्पन्न हुई उलझन बढ़कर अत्याधिक होने को।

—संयुत्तनिकाय ४६:५१ : आहार सुत्त

कालाम सुत्त की समझदारी

मानसिक गुलामी से बचने और अपनी प्रज्ञा (अंतर्ज्ञान) को जगाने का सबसे प्रखर उपदेश भगवान ने ‘कालाम’ लोगों को दिया था। यह उपदेश केवल अंधविश्वास से बचाव नहीं है, बल्कि सत्य की कसौटी पर स्वयं खरा उतरने का स्पष्ट आह्वान है:

एक बार भगवान केशपुत्र गाँव पहुँचे। वहाँ के कालाम लोगों ने भगवान के पास आकर अपनी उलझन प्रकट की:

“भन्ते! यहाँ केशपुत्र में कई श्रमण और ब्राह्मण आते हैं। वे अपनी धारणा का तो गुणगान करते हैं, किन्तु दूसरों की धारणा का विरोध और निंदा करते हैं। वे हमें बिलकुल उलझन और संदेह में डाल देते हैं। इनमें कौन सत्य बोलता है, और कौन झूठ?”

(भगवान ने उत्तर दिया)

“ज़रूर उलझन होगी, कालामों! संदेह का कारण हो, तभी उलझन होती है। जब ऐसा हो, तब—

  • न सुनी-सुनाई बात मानो,
  • न चली आ रही परंपरागत बात मानो,
  • न अटकलेबाजी मानो,
  • न शास्त्र-ग्रंथों की बात मानो,
  • न तर्कसंगत कारण मानो,
  • न अनुमानित कारण मानो,
  • न समतुल्य परिस्थिति की बात मानो,
  • न अपनी धारणा से मेल खाने वाली बात मानो,
  • न संभावित बात मानो,
  • और न ही श्रमण गुरु के सम्मानार्थ मानो।

बल्कि कालामों! जब तुम्हें स्वयं पता चले कि—‘यह स्वभाव अकुशल है। यह दोषपूर्ण है। यह ज्ञानियों द्वारा निंदित है। इसे मानने और इस पर चलने से अहित और दुःख होता है’—तब तुम्हें वह स्वभाव तुरंत त्याग देना चाहिए।

क्या लगता है, कालामों? जब किसी व्यक्ति के भीतर लोभ, द्वेष या भ्रम उपजता है, और वह इनके वशीभूत होकर जीवहत्या करे, चोरी करे, व्यभिचार करे, झूठ बोले, और दूसरों से भी करवाए—तो क्या वह उसके दीर्घकालीन अहित और दुःख के लिए होगा?”

“हाँ, भन्ते!”

“तो कालामों, ऐसे दोषपूर्ण स्वभाव को त्याग दो।

और इसके विपरीत, जब तुम्हें स्वयं पता चले कि—‘यह स्वभाव कुशल है, निर्दोष है, ज्ञानियों द्वारा प्रशंसित है, और इस पर चलने से हित और सुख होता है’—तब तुम्हें वह स्वभाव (निर्लोभता, निर्द्वेषता, निर्भ्रमता) धारण कर उसी में जीना चाहिए।”

—अंगुत्तरनिकाय ३:६५ : केसमुत्तिसुत्त (सार)

दृष्टियों का जंगल

कभी-कभी व्यक्ति को कुशल और अकुशल का बौद्धिक भेद समझा दिया जाता है, लेकिन यदि उसका अंतर्ज्ञान विकसित न हो, तो वह फिर से एक अलग तरह की उलझन—‘अस्तित्वगत शंकाओं’—में भटक जाता है। सब्बासव सुत्त में भगवान इस सूक्ष्म उलझन का सटीक विश्लेषण करते हैं:

कोई आम आदमी, जो आर्यधर्म से अपरिचित है, उसे पता नहीं चलता कि कौन-सी बात पर गौर करना ‘उचित’ है, और कौन-सी बात पर ‘अनुचित’।

वह आम आदमी इस तरह ‘अनुचित’ बातों (अयोनिसो मनसिकार) पर विचार करता है:

  • ‘क्या मैं अतीतकाल में था? या नहीं था?’
  • ‘मैं अतीतकाल में क्या था? कैसा था?’
  • ‘क्या मैं भविष्यकाल में रहूँगा? या नहीं रहूँगा?’
  • ‘मैं वर्तमान में क्या हूँ? कैसा हूँ? यह सत्व कहाँ से आया है और कहाँ जाएगा?’

इस प्रकार अनुचित बातों पर उलझने से, उसके भीतर छह में से कोई एक (मिथ्या) दृष्टि जन्म लेती है—

  1. ‘मेरा आत्म है।’
  2. ‘मेरा आत्म नहीं है।’
  3. ‘मैं आत्म से आत्म को महसूस करता हूँ।’
  4. ‘मैं आत्म से अनात्म को महसूस करता हूँ।’
  5. ‘मैं अनात्म से आत्म को महसूस करता हूँ।’
  6. या यह कि ‘मेरा यह जो आत्म है, वह नित्य, ध्रुव और शाश्वत है। वह कभी नहीं बदलेगा।’

भिक्षुओं! इन्हें कहते हैं—‘दृष्टियों का झुरमुट! दृष्टियों का जंगल! दृष्टियों का रेगिस्तान! दृष्टियों की विकृति और दृष्टियों का बंधन!’ इस तरह दृष्टिबंधन में बँधा व्यक्ति कभी दुःखों से छूट नहीं पाता।

किन्तु, जो आर्यश्रावक सत्पुरुषों के धर्म से परिचित है, वह ‘उचित बातों’ (योनिसो मनसिकार) पर ही गौर करता है। वह सोचता है—

  • ‘यह दुःख है।’
  • ‘यह दुःख की उत्पत्ति है।’
  • ‘यह दुःख का निरोध है।’
  • ‘यह दुःख निरोध का मार्ग है।’

इस तरह केवल ‘उचित बात’ (चार आर्य सत्यों) पर गौर करने से उसके तीन संयोजन (बंधन) टूट जाते हैं:

  1. स्व-धारणा (सक्कायदिट्ठि)
  2. अनिश्चितता / उलझन (विचिकिच्छा)
  3. कर्मकाण्ड और व्रत में अटकना। (सीलब्बतपरामासो)

—मज्झिमनिकाय २: सब्बासव सुत्त (सार)

इन तीन सूक्ष्म बेड़ियों के टूटते ही साधक श्रोतापन्न बन जाता है। वह उस परम धर्म-धारा में प्रविष्ट हो जाता है, जहाँ पहुँचने के बाद जन्म-जन्मांतर के लिए उसके भीतर से भगवान, धम्म और संघ के प्रति ‘उलझन’ (विचिकिच्छा) हमेशा-हमेशा के लिए जड़ से खत्म हो जाती है। अब वह कभी भी पथभ्रष्ट होकर दुर्गति में नहीं गिर सकता।

श्रद्धा और प्रत्यक्ष अनुभव

पारंपरिक तौर पर उलझन का सीधा और अचूक इलाज श्रद्धा को माना गया है। लेकिन याद रखें, बुद्ध के धम्म में श्रद्धा का अर्थ कोई ‘अंधी आस्था’ नहीं है। यह ‘ज्ञान और प्रत्यक्ष अनुभव पर आधारित आत्मविश्वास’ है, जिसे सत्यापित आस्था (“अवेच्चप्पसाद”) कहते हैं। उलझन के अंधेरे को काटने के लिए भीतर इस ‘सम्यक-श्रद्धा’ का दीप जलाना ही पड़ता है, और यह दीप केवल अभ्यास से प्रज्वलित होता है।

बुद्ध का धम्म ‘एहिपस्सिको’ (आओ और स्वयं देखो/आजमाने योग्य) है। शंका और उलझन कभी भी केवल सोच-विचार या दार्शनिक बहसों से खत्म नहीं होती। जब तक हम किनारे पर खड़े रहेंगे, पानी की गहराई को लेकर मन में शंका बनी ही रहेगी। ध्यान की एक भी गहरी, सफल और सार्थक बैठक, जन्मों-जन्मों के बौद्धिक संदेहों को एक झटके में धो सकती है। ‘विचार’ शंका पैदा करते हैं, लेकिन ‘प्रत्यक्ष अनुभव’ शंका का असली कातिल है।

एक प्राथमिक अभ्यास और परम मुक्ति

इस तरह, जब चित्त योनिसो मनसिकार—अर्थात सही चिंतन करने या उचित जगह पर ध्यान केन्द्रित करने—में स्थिर होता है, केवल तभी वह उलझन से मुक्त होकर स्थायी सुख की ओर अग्रसर होता है। यह अभ्यास केवल एक बौद्धिक कसरत नहीं है, बल्कि एक गहन चित्त-प्रवृत्ति है, जिसे ध्यान और निरंतर अवलोकन से विकसित किया जाता है।

दीर्घकालिक परिणामों का आंकलन करें: उलझन से बचने का एक प्राथमिक अभ्यास यह है कि कभी भी तात्कालिक अनुभूति को अपना मापदंड न बनाएँ। हमेशा ‘दीर्घकालिक परिणामों’ का विचार करें।

उदाहरण के लिए, शरीर की अस्थिरता या कुरूपता (अशुभ) पर ध्यान करना आरंभ में पीड़ादायक लग सकता है। किन्तु यही पीड़ा भविष्य में एक गहरी प्रज्ञा और वासना-मुक्ति को जन्म देती है। इसके विपरीत, भोगप्रधान विषयों पर सोचना तत्काल बहुत सुखद लगता है, लेकिन दीर्घकाल में वे घोर दुखदायी सिद्ध होते हैं।

चित्त की परम मुक्ति केवल शंकाओं के समाधान या उलझन से बाहर आने में नहीं है; बल्कि यह सभी बाहरी विश्वास-ढाँचों, जड़ दृष्टिकोणों और आत्म-विस्मृति से पूरी तरह मुक्त हो जाने में है। जब चित्त “मैं हूँ” के इस भ्रमित आधार से भी परे चला जाता है—तब वह न कुछ रचता है, न कुछ पकड़ता है, और न ही किसी चीज़ की आकांक्षा करता है।

भगवान बुद्ध ने इसी परम शांत अवस्था को “अनुपादिसेस परिनिब्बान” कहा है—एक ऐसी निर्विकल्प मुक्ति, जहाँ चित्त किसी भी वैचारिक आधार को पकड़े बिना, हमेशा-हमेशा के लिए असीम शून्यता और शांति में स्थित हो जाता है।

आगे क्या पढ़ें?

क्या हमें श्रद्धा से तुरंत मान लेना चाहिए? भगवान यहाँ उपमा देकर हमें सावधानी बरतने की सलाह देते हैं।

चूळहत्थिपदोपम सुत्त

यही सूत्र वह पहला उपदेश था, जो सम्राट अशोक के पुत्र, अरहंत भिक्षु महिन्द ने श्रीलंका के राजा देवानंपियतिस्स को दिया था। इस उपदेश के ही कारण राजा का धम्मांतरण हुआ और श्रीलंका में बौद्ध धम्म का प्रचार प्रारंभ हुआ। और शायद, इसी प्रभावशाली सूत्र के अपने योगदान के कारण, आज भी धम्म हमारे लिए संरक्षित है।