सतिपट्ठान | सम्मपधान | इद्धिपाद | इन्द्रिय | बल | बोज्झङ्ग | अट्ठङ्गिक मग्ग

चार ऋद्धिपद
परिचय
‘इद्धि’—जिसे कभी “ऋद्धि”, कभी “शक्ति”, तो कभी “सिद्धि” या “सफलता” कहा गया है—बौद्ध साधना का एक ऐसा गहन शब्द है, जिसका कोई एक अर्थ उसकी सभी परतों को नहीं समेट सकता। आम तौर पर लोग इसे केवल चमत्कारों से जोड़कर देखते हैं, लेकिन भगवान बुद्ध के धर्म में इसका अर्थ कहीं अधिक गहरा और मनोवैज्ञानिक है।
‘इद्धिपाद’ के सन्दर्भ में, इसका अर्थ मुख्य रूप से समाधि से उत्पन्न होने वाली उन अलौकिक ऋद्धियों से है जो एकाग्र चित्त का स्वाभाविक परिणाम होती हैं। इन ऋद्धियों में—
- मनोमय-ऋद्धि (अपनी कई काया बनाना),
- दिव्यश्रोत (दूर की आवाज़ें सुनना),
- परचित्त ज्ञान (दूसरों का मन पढ़ना),
- पूर्व-जन्मों की स्मृति,
- दिव्यचक्षु (सत्वों की गति देखना) शामिल हैं।
किन्तु बुद्ध के मार्ग में इन सभी के ऊपर एक अंतिम शक्ति रखी गई है—
- ‘आस्रव-क्षय’ (चित्त के सभी विकारों और मलों का क्षय)।
केवल यह आस्रव-क्षय ही एकमात्र ऋद्धि ‘लोकुत्तर’ मानी गई है, जो बोधि के मार्ग के लिए अपरिहार्य है। शेष सभी शक्तियाँ “लौकिक” हैं; वे मार्ग में सहायक तो हो सकती हैं, पर यदि उन्हें बिना ‘प्रज्ञा’ और विवेक के अपनाया जाए, तो वे साधक के भीतर लोभ, द्वेष और मोह का भी भयंकर विस्तार कर सकती हैं।
इतिहास साक्षी है कि कुछ अरहंतों ने भी, जिन्होंने इन शक्तियों के दीर्घकालिक परिणामों का चिंतन नहीं किया, अनुचित परिस्थितियों में इनका प्रदर्शन कर दिया। यही कारण था कि भगवान बुद्ध ने अपने भिक्षु संघ को जनता के समक्ष ऋद्धियाँ दिखाने का सख्त निषेध किया। बुद्ध ने स्पष्ट किया कि किसी भी प्रकार की चमत्कारिक शक्ति की तुलना में वह ‘धम्म’ कहीं अधिक अद्भुत और श्रेष्ठ है, जो अभ्यास करने पर सत्वों को निश्चित रूप से दुखों से मुक्त कर देता है।
फिर भी, यह एक यथार्थ है कि ध्यान की गहराइयों में उतरने वाले कई साधकों को ये शक्तियाँ स्वाभाविक रूप से प्राप्त हो जाती हैं। ऐसे में उन्हें एक स्पष्ट मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है कि इन शक्तियों का उपयोग कैसे करें, ताकि ये साधना के मार्ग में बाधा या अहंकार का कारण न बनें, बल्कि मुक्ति में सहायक हों।
इसी महान उद्देश्य से ऋद्धिपद की विधि दी गई है। यह विधि सिखाती है कि कैसे इन शक्तियों के उदय होने पर भी, साधक उन्हें ‘सतिपट्ठान’ की प्रक्रिया में समाहित कर ले, जिससे अंततः उसका चित्त चमत्कारों में न उलझकर सीधे ‘आस्रवों के विनाश’ की ओर ही अग्रसर हो।
चार अजेय आधार
इद्धिपाद के इन चार आधारों को सुत्त-पिटक में दो रूपों में समझाया गया है: एक संक्षिप्त और एक विस्तृत। संक्षिप्त सूत्र कहता है:
चार ऋद्धिपद हैं।
कोई साधक—
- “छन्द” (चाह) और परिश्रम से रचित समाधि से संपन्न ऋद्धिबल को विकसित करता है,
- वीर्य और परिश्रम से रचित समाधि से संपन्न ऋद्धिबल को विकसित करता है,
- चित्त और परिश्रम से रचित समाधि से संपन्न ऋद्धिबल को विकसित करता है,
- विवेक (“वीमंस”) और परिश्रम से रचित समाधि से संपन्न ऋद्धिबल को विकसित करता है।
ये चारों तत्व अलग-अलग भी साधे जाते हैं, और एक-दूसरे के पूरक बनकर भी कार्य करते हैं।
- छन्द उस लक्ष्य को पाने की एक तीव्र और पवित्र इच्छा है।
- वीर्य उस लक्ष्य की ओर निरंतर बढ़ने की सक्रिय शक्ति और अविचल प्रयत्न है।
- जब कोई लक्ष्य मन में गहराई से स्थापित हो जाता है, तो उस पर टिके रहने के लिए चित्त को उत्पन्न और स्थिर किया जाता है।
- और समय-समय पर साधना के मार्ग में आगे बढ़ने, अपनी दिशा सुधारने और उचित उपाय खोजने के लिए विवेक (सूक्ष्म निरीक्षण) का प्रयोग किया जाता है।
यदि इन्हें आपस में जुड़े हुए रूप में देखें, तो ‘छन्द’ वह आरम्भिक प्रेरणा है—साधना करने की गहरी तड़प। जब यह चाह दृढ़ होती है, तो वह स्वाभाविक रूप से ‘वीर्य’ को जन्म देती है। यह वीर्य कोई क्षणिक उत्साह नहीं है, बल्कि वह निरंतर प्रयत्न है जो साधक के मन को आलस्य और प्रमाद की खाई में गिरने से बचाए रखता है। इसी निरंतर प्रयत्न से ‘चित्त’ क्रमशः शुद्ध, एकाग्र और स्थिर होने लगता है। और समाधि में पूर्णतः स्थित यही चित्त, ‘विवेक’ के द्वारा वह सूक्ष्म निरीक्षण क्षमता प्राप्त करता है, जिससे वस्तुओं और प्रपंचों का यथार्थ स्वरूप प्रत्यक्ष होने लगता है।
सूत्रों के अनुसार, ये तीनों गुण—छन्द, वीर्य और चित्त—सभी समाधि-अवस्थाओं में एक साथ मौजूद होते हैं। लेकिन जिस गुण की प्रबलता अधिक होती है, समाधि उसी के नाम से जानी जाती है (जैसे यदि छन्द प्रधान हो, तो वह ‘छन्द पर आधारित समाधि’ कहलाती है)।
इसके अतिरिक्त, सूत्र स्पष्ट करता है कि इन चारों आधारों के भीतर तीन मुख्य तत्व एक साथ काम करते हैं:
- १. वह मानसिक गुण (छन्द, वीर्य, चित्त या विवेक),
- २. परिश्रम की रचना (“पधान सङ्खार” अर्थात चार सम्यक प्रयास), और
- ३. समाधि।
बिना सम्यक प्रयास और समाधि के ये गुण ‘ऋद्धिपद’ नहीं बन सकते।
छन्द और विवेक का मनोविज्ञान
अक्सर यह प्रश्न उठता है कि ‘छन्द’ तो दुःख का कारण है, फिर उसे साधना का आधार कैसे बनाया जा सकता है?
यहाँ भगवान बुद्ध ने मनोविज्ञान की एक अत्यंत सूक्ष्म परत खोली है। ध्यान दें कि यदि छन्द “भव” (अस्तित्व बनाने या सांसारिक भोग) के पक्ष में है, तो वह निश्चित रूप से दुःख लाएगी। परन्तु जब वही छन्द भव-चक्र से पार जाने या मुक्ति के पक्ष में होती है, तब वह दुःख का कारण नहीं, बल्कि निर्वाण की ओर ले जाने वाला सबसे शक्तिशाली साधन बन जाती है। यहाँ तक कि यदि इस पवित्र छन्द के कारण साधक के भीतर ‘असंतोष या व्याकुलता’ भी उत्पन्न हो (कि ‘मैं अभी तक मुक्त क्यों नहीं हुआ’), तब भी वह छन्द ‘कुशल’ ही है—क्योंकि वह आग साधक को रुकने नहीं देगी और निरंतर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेगी।
इसी प्रकार, ‘विवेक’ हर समाधि में हमेशा सक्रिय रूप से उपस्थित नहीं होता। पर जब यह सोच-विचार (“वितक्क-विचार”) के स्वरूप में कार्यरत होता है, तब यह प्रथम-ध्यान में मौजूद होता है। यह सम्यक-समाधि के पूर्ण विकास के लिए अनिवार्य है और अंततः यही वह बोध है जो चित्त को संबोधि की ओर ले जाता है।
संतुलन का मार्ग
विस्तृत सूत्र में यह बहुत ही गहराई से समझाया गया है कि साधक को इन गुणों का संतुलन कैसे करना है:
कोई साधक छन्द… वीर्य… चित्त… विवेक और परिश्रम से रचित समाधि से संपन्न ऋद्धिबल को विकसित करता है, सोचते हुए, ‘मेरा यह गुण न बहुत मन्द हो, न बहुत तीव्र; न भीतर सिमटा हो, न बाहर बिखरा हो’।
बुद्ध समझाते हैं कि दोष इन गुणों में नहीं, बल्कि इनके ‘अकुशल’ प्रयोग में है। यदि ये गुण अनुपस्थित हों, तो साधना लक्ष्यहीन हो जाती है; और यदि ये बेलगाम हों, तो चित्त को विखंडित कर देते हैं।
यदि ‘छन्द’ को केवल साधना के परिणामों की ओर लगाया जाए, तो वह चित्त में व्याकुलता और विघ्न पैदा करती है। पर यदि उसी छन्द को कारणों की रचना, जैसे स्मृति, समाधि और प्रज्ञा को पुष्ट करने पर केंद्रित किया जाए, तो वही छन्द साधना को शत-प्रतिशत सफल बनाती है। इसलिए इन्हें कुशलतापूर्वक संतुलित करना चाहिए, ताकि ये चित्त को पूरी तरह वर्तमान क्षण में केन्द्रित कर सकें।
यह भी समझना आवश्यक है कि ये चारों गुण लक्ष्य के विरुद्ध नहीं हैं, बल्कि उस तक पहुँचने के लिए आवश्यक ‘मार्ग’ हैं। परन्तु जब अंतिम लक्ष्य (निर्वाण) प्राप्त हो जाता है, तो ये गुण अपने आप उसी तरह छूट जाते हैं, जैसे नदी पार करने के बाद नाव छूट जाती है। भगवान का मार्ग एक पथ है, वह स्वयं लक्ष्य नहीं। जैसे किसी स्थान की ओर जाने वाला मार्ग उस स्थान को उत्पन्न नहीं करता, वैसे ही ये गुण लक्ष्य को उत्पन्न नहीं करते, केवल उसकी ओर ले जाते हैं।
बुद्ध का अंतिम लक्ष्य एक ‘असंस्कृत’ अवस्था है—निर्वाण—जिसे किसी संस्कृत, रचित या निर्मित चीज़ से पैदा नहीं किया जा सकता। परन्तु वहाँ तक पहुँचने का जो मार्ग है, वह रचित होता है, और इसी मार्ग के निर्माण में इन गुणों का संतुलित प्रयोग नितांत आवश्यक है।
अमृत में प्रवेश
विस्तृत सूत्र का अंतिम अंश साधना के चरमोत्कर्ष को दर्शाता है, जहाँ साधक इन गुणों का उपयोग कर चित्त को उच्चतम और असीम जागरूकता की ओर ले जाता है:
तब वह अपने आगे और पीछे इस नजरिए से देखता है कि—
- जैसा आगे हो, वही पीछे हो, और जैसा पीछे हो, वैसा ही आगे हो…
- जैसा ऊपर हो, वैसा ही नीचे हो, और जैसा नीचे हो, वैसा ही ऊपर हो…
- जैसी रात हो, वैसा ही दिन हो, और जैसा दिन हो, वैसी ही रात हो।
इस तरह, वह खुले और बिना-बाधित मानस के सहारे, उज्ज्वल चित्त को विकसित करता है।
यह स्मृति और समाधि की वह परम अवस्था है जो समय और स्थान की सभी सीमाओं से मुक्त हो चुकी है। यही वह अत्यंत निर्मल और उज्ज्वल चित्तवस्था है जिसमें से अलौकिक शक्तियाँ स्वतः उत्पन्न होने लगती हैं।
लेकिन भगवान बुद्ध यहाँ रुकने की सलाह नहीं देते। वे कहते हैं कि साधक को इन सिद्धियों के पार जाना चाहिए। जैसे कि ‘सतिपट्ठान’ के दूसरे चरण में होता है—जहाँ चित्त हर स्वभाव की ‘सहउत्पत्ति और व्यय’ को देखता है, उनकी नश्वर सीमाओं को पहचानता है और उनके भी पार निकल जाता है।
पूर्ण सिद्धि और मुक्ति के लिए साधक को उस अंतिम सूक्ष्म अहंकार को भी छोड़ना होता है कि “मैं इस शक्ति का स्वामी हूँ” या “मेरा चित्त कितना एकाग्र है”। इसके बजाय, चित्त को अमृत की ओर प्रवृत्त किया जाता है। इसका अर्थ है—“जो है, बस वही देखना”—बिना किसी नई कल्पना, प्रतिक्रिया या संकल्पना के। यही सतिपट्ठान का तीसरा चरण है: अतम्मयता में प्रवेश, जहाँ सब कुछ छूट जाता है और केवल यह शुद्ध बोध शेष रहता है कि— “एतं अस्ति…” (यह बस है)।
जब यह कुशल ‘विवेक’ पूर्णता को प्राप्त होता है, तब ‘सिद्धि’ पूर्ण रूप से आत्मसात हो जाती है। चित्त सभी प्रकार के संस्कारों से परे जाकर बोधि के परम किनारे पर खड़ा हो जाता है।
निष्कर्ष: कई आधुनिक लेखों और व्याख्याओं में अक्सर ‘इद्धिपाद’ की अवहेलना कर दी गई है, क्योंकि इनका सीधा संबंध अलौकिक शक्तियों और चमत्कारों से जोड़ दिया गया। परन्तु मूल बुद्ध वचन (EBT) में, इन्हें बहुत ही व्यापक रूप से सफलता, सिद्धि और पूर्णता के साधन के रूप में देखा गया है—चाहे वह कोई सांसारिक कार्य हो या धर्म की सर्वोच्च साधना।
किसी भी कार्य में—यदि शत-प्रतिशत सफलता चाहिए—तो अपने छन्द, वीर्य, चित्त और विवेक को सम्यक-प्रयास और समाधि की भट्टी में तपाकर संतुलित करना ही होगा। यही इद्धिपाद की वास्तविक सार्थकता और अचूक विज्ञान है।
ऋद्धिपद भावना
आयुष्मान आनन्द ने भगवान से कहा, “भंते, ऋद्धि क्या है? ऋद्धिपद क्या है? ऋद्धिपद की साधना क्या है? और ऋद्धिपद का साधनामार्ग क्या है?”
भगवान ने आयुष्मान आनन्द से कहा:
“ऋद्धि क्या है?
(१) विविध ऋद्धियाँ
ऐसा होता है, आनन्द, कि कोई भिक्षु विविध प्रकार की ऋद्धियों को वश करता है—
- वह एक होकर अनेक बनता है, अनेक होकर एक बनता है।
- प्रकट होता है, विलुप्त होता है।
- दीवार, परकोटे और पर्वतों से बिना टकराए आर-पार चला जाता है, मानो आकाश में हो।
- ज़मीन पर गोते लगाता है, मानो जल में हो।
- जल-सतह पर बिना डूबे चलता है, मानो ज़मीन पर हो।
- पालथी मारकर आकाश में उड़ता है, मानो पक्षी हो।
- महातेजस्वी सूर्य और चाँद को भी अपने हाथ से छूता और मलता है।
- अपनी काया से ब्रह्मलोक तक को वश कर लेता है।
(२) दिव्य श्रोत
वह अपने विशुद्ध हो चुके अलौकिक दिव्यश्रोत-धातु से दोनों तरह की आवाज़ें सुनता है—चाहे दिव्य हो या मनुष्यों की हो, दूर की हो या पास की हो।
(३) परचित्त ज्ञान
वह अपना मानस फैलाकर पराए सत्वों का, अन्य लोगों का मानस जान लेता है।
- उसे रागपूर्ण चित्त पता चलता है कि ‘रागपूर्ण चित्त है।’
- वीतराग चित्त पता चलता है कि ‘वीतराग चित्त है।’
- (उसी तरह) द्वेषपूर्ण चित्त… या द्वेषविहीन चित्त…
- मोहपूर्ण चित्त… मोहविहीन चित्त…
- संकुचित चित्त… बिखरा चित्त…
- बढ़ा हुआ चित्त… न बढ़ा चित्त…
- बेहतर चित्त… सर्वोत्तर चित्त…
- समाहित चित्त… असमाहित चित्त…
- विमुक्त चित्त… अविमुक्त चित्त भी पता चलता है कि ‘अविमुक्त चित्त है।’
(४) पूर्वजन्मों की स्मृति
वह अपने विविध प्रकार के पूर्वजन्म अनुस्मरण करता है—जैसे एक जन्म, दो जन्म, तीन जन्म, चार, पाँच, दस जन्म, बीस, तीस, चालीस, पचास जन्म, सौ जन्म, हज़ार जन्म, लाख जन्म, कई कल्पों का लोक-संवर्त (=ब्रह्मांडिय सिकुड़न), कई कल्पों का लोक-विवर्त (=ब्रह्मांडिय विस्तार), कई कल्पों का संवर्त-विवर्त—‘वहाँ मेरा ऐसा नाम था, ऐसा गोत्र था, ऐसा दिखता था। ऐसा भोज था, ऐसा सुख-दुःख महसूस हुआ, ऐसा जीवन अंत हुआ। उस लोक से च्युत होकर मैं वहाँ उत्पन्न हुआ। वहाँ मेरा वैसा नाम था, वैसा गोत्र था, वैसा दिखता था। वैसा भोज था, वैसा सुख-दुःख महसूस हुआ, वैसे जीवन अंत हुआ। उस लोक से च्युत होकर मैं यहाँ उत्पन्न हुआ।’ इस तरह वह अपने विविध प्रकार के पूर्वजन्म शैली एवं विवरण के साथ स्मरण करता है।
(५) दिव्यचक्षु से अन्य सत्वों की गति ज्ञान
वह अपने विशुद्ध हुए अलौकिक दिव्यचक्षु से अन्य सत्वों की मौत और पुनर्जन्म होते हुए देखता है। और उसे पता चलता है कि कर्मानुसार ही वे कैसे हीन अथवा उच्च हैं, सुंदर अथवा कुरूप हैं, सद्गति होते अथवा दुर्गति होते हैं।
कैसे ये सत्व—काया दुराचार में संपन्न, वाणी दुराचार में संपन्न, एवं मन दुराचार में संपन्न, जिन्होंने आर्यजनों का अनादर किया, मिथ्यादृष्टि धारण की, और मिथ्यादृष्टि के प्रभाव में दुष्कृत्य किए—वे मरणोपरांत काया छूटने पर दुर्गति होकर यातनालोक नर्क में उपजे।’
किन्तु कैसे ये सत्व—काया सदाचार में संपन्न, वाणी सदाचार में संपन्न, एवं मन सदाचार में संपन्न, जिन्होंने आर्यजनों का अनादर नहीं किया, सम्यकदृष्टि धारण की, और सम्यकदृष्टि के प्रभाव में सुकृत्य किए—वे मरणोपरांत सद्गति होकर स्वर्ग में उपजे।
इस तरह विशुद्ध हुए अलौकिक दिव्यचक्षु से उसे अन्य सत्वों की मौत और पुनर्जन्म होते हुए दिखता है। और उसे पता चलता है कि कर्मानुसार ही वे कैसे हीन अथवा उच्च हैं, सुंदर अथवा कुरूप हैं, सद्गति होते अथवा दुर्गति होते हैं।
(६) आस्रव-क्षय ज्ञान
वह आस्रवों के क्षय होने से अनास्रव होकर, इसी जीवन में चेतोविमुक्ति और प्रज्ञाविमुक्ति प्राप्त कर, (अर्हत्व) प्रत्यक्ष-ज्ञान का साक्षात्कार करता है।
—ये ऋद्धियाँ हैं।
और, ऋद्धिपद क्या है?
जो मार्ग, जो साधना ऋद्धि पाने की ओर बढ़ती है, उसे वश करने की ओर बढ़ती है, वही ऋद्धिपद है।
और, ऋद्धिपद की साधना क्या है?
ऐसा होता है कि कोई साधक—
- छन्द और परिश्रम से रचित समाधि से संपन्न ऋद्धिबल को विकसित करता है,
- वीर्य और परिश्रम से रचित समाधि से संपन्न ऋद्धिबल को विकसित करता है,
- चित्त और परिश्रम से रचित समाधि से संपन्न ऋद्धिबल को विकसित करता है,
- विवेक और परिश्रम से रचित समाधि से संपन्न ऋद्धिबल को विकसित करता है।
—यह ऋद्धिपद की साधना हैं।
और, ऋद्धिपद की साधना मार्ग क्या हैं?
बस यही, आर्य अष्टांगिक मार्ग। अर्थात, सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वचन, सम्यक कर्मांत, सम्यक जीविका, सम्यक प्रयास, सम्यक स्मृति, और सम्यक समाधि।
परिश्रम की रचना
“जब कोई साधक छन्द के आधार पर समाधि प्राप्त करता है, चित्त की एकाग्रता पाता है, तो उसे “छन्द पर आधारित समाधि” कहते हैं।
वह चाह पैदा करता है, मेहनत करता है, ज़ोर लगाता है, इरादा बनाकर जुटता है, ताकि—
- अनुत्पन्न पाप, अकुशल स्वभाव उत्पन्न न हो…
- उत्पन्न पाप, अकुशल स्वभाव छुट जाए…
- अनुत्पन्न कुशल स्वभाव उत्पन्न हो…
- उत्पन्न कुशल स्वभाव टिके रहे, आगे आए, वृद्धि हो, प्रचुरता आए, विकसित होकर परिपूर्ण हो जाए।
—इन्हें परिश्रम की रचना कहते हैं। यह छन्द है, यह छन्द पर आधारित समाधि है, यह परिश्रम की रचना है। इसे “छन्द और परिश्रम से रचित समाधि से संपन्न ऋद्धिबल” कहते हैं।
इसी तरह, जब कोई साधक वीर्य के आधार पर… चित्त के आधार पर… विवेक (“वीमंस”) के आधार पर समाधि प्राप्त करता है, चित्त की एकाग्रता पाता है, तो उसे “वीर्य… चित्त… विवेक पर आधारित समाधि” कहते हैं।
वह चाह पैदा करता है, मेहनत करता है, ज़ोर लगाता है, इरादा बनाकर जुटता है, ताकि—वह चाह पैदा करता है, मेहनत करता है, ज़ोर लगाता है, इरादा बनाकर जुटता है, ताकि—
- अनुत्पन्न पाप, अकुशल स्वभाव उत्पन्न न हो…
- उत्पन्न पाप, अकुशल स्वभाव छुट जाए…
- अनुत्पन्न कुशल स्वभाव उत्पन्न हो…
- उत्पन्न कुशल स्वभाव टिके रहे, आगे आए, वृद्धि हो, प्रचुरता आए, विकसित होकर परिपूर्ण हो जाए।
—इन्हें परिश्रम की रचना कहते हैं। यह वीर्य… चित्त… विवेक है, यह वीर्य… चित्त… विवेक पर आधारित समाधि है, यह परिश्रम की रचना है। इसे “वीर्य… चित्त… विवेक और परिश्रम से रचित समाधि से संपन्न ऋद्धिबल” कहते हैं।”
— संयुत्तनिकाय ५१:१३ : छन्दसमाधि सुत्त “जब ये चार ऋद्धिपदों की साधना की जाती हैं, उन्हें विकसित किया जाता है, तो वह महाफलदायी, महालाभकारी होता है। कैसे? कोई साधक छन्द और परिश्रम से रचित समाधि से संपन्न ऋद्धिबल को विकसित करता है, सोचते हुए, ‘मेरा यह छन्द न बहुत मन्द हो, न बहुत तीव्र; न भीतर सिमटा हो, न बाहर बिखरा हुआ।’ तब वह अपने आगे और पीछे इस नजरिए से देखता है कि— —इस तरह, वह खुले, बिना-बाधित मानस के सहारे, उज्ज्वल चित्त को विकसित करता है। (उसी तरह) वह वीर्य… चित्त… विवेक और परिश्रम से रचित समाधि से संपन्न ऋद्धिबल को विकसित करता है, सोचते हुए, ‘मेरा यह वीर्य… मेरा यह चित्त… मेरा यह विवेक न बहुत मन्द हो, न बहुत तीव्र; न भीतर सिमटा हो, न बाहर बिखरा हुआ।’ तब वह अपने आगे और पीछे इस नजरिए से देखता है कि— —इस तरह, वह खुले, बिना-बाधित मानस के सहारे, उज्ज्वल चित्त को विकसित करता है। ➤ और, छन्द… वीर्य… चित्त… और विवेक कैसे बहुत मन्द (“अतिलीन”) होता है? —जो भी छन्द… वीर्य… चित्त… और विवेक आलस्य के साथ आता है, आलस्य से जुड़ा होता है, उसे बहुत मन्द छन्द… वीर्य… चित्त… और विवेक कहते हैं। ➤ और, कैसे छन्द… वीर्य… चित्त… और विवेक बहुत तीव्र (“अतिप्पग्गहित”) होता है? —जो भी छन्द… वीर्य… चित्त… और विवेक बेचैनी के साथ आता है, बेचैनी से जुड़ा होता है, उसे बहुत तीव्र छन्द… वीर्य… चित्त… और विवेक कहते हैं। ➤ और, कैसे छन्द… वीर्य… चित्त… और विवेक भीतर सिमटा हुआ (“अज्झतं संखित्त”) होता है? —जो भी छन्द… वीर्य… चित्त… और विवेक सुस्ती और तंद्रा के साथ आता है, सुस्ती और तंद्रा से जुड़ा होता है, उसे भीतर सिमटा हुआ छन्द… वीर्य… चित्त… और विवेक कहते हैं। ➤ और, कैसे छन्द… वीर्य… चित्त… और विवेक बाहर बिखरा हुआ (“बहिद्धा विक्खित्तो”) होता है? —जो भी छन्द… वीर्य… चित्त… और विवेक पाँच कामभोग की उत्तेजना के साथ आता है, बाहर की ओर बिखर कर विलीन होता है, उसे बाहर बिखरा हुआ छन्द… वीर्य… चित्त… और विवेक कहते हैं। ➤ और, कैसे कोई अपने आगे और पीछे इस नजरिए से देखता है कि जैसा आगे हो, वही पीछे हो, और जैसा पीछे हो, वैसा ही आगे हो? —ऐसा होता है कि साधक उसके आगे और पीछे का नजरिया अच्छे से धारण करता है, अच्छे से ध्यान देता है, अच्छे से ग्रहण करता है, अच्छे से (भीतर) प्रज्ञापूर्वक उतारता है। इस तरह कोई अपने आगे और पीछे इस नजरिए से देखता है कि जैसा आगे हो, वही पीछे हो, और जैसा पीछे हो, वैसा ही आगे हो। ➤ और, कैसे कोई अपने आगे और पीछे इस नजरिए से देखता है कि जैसा ऊपर हो, वैसा ही नीचे हो, और जैसा नीचे हो, वैसा ही ऊपर हो? —ऐसा होता है कि साधक अपनी काया को पैर तल से ऊपर, माथे के केश से नीचे, त्वचा से ढ़की हुई, नाना प्रकार की गंदगियों से भरी हुई मनन करता है— —इस तरह कोई अपने ऊपर और नीचे इस नजरिए से देखता है कि जैसा ऊपर है, वैसा ही नीचे है, और जैसा नीचे है, वैसा ही ऊपर हैं। ➤ और, कैसे कोई रात को दिन के जैसे बिताता है, और दिन को रात के जैसे? —ऐसा होता है कि कोई साधक दिन के समय जिस आकृति, लक्षण और निमित्त का उपयोग कर के छन्द… वीर्य… चित्त… और विवेक और परिश्रम से रचित समाधि से संपन्न ऋद्धिबल को विकसित करता है, रात के समय भी वह उसी आकृति, लक्षण और निमित्त का उपयोग कर के छन्द… वीर्य… चित्त… और विवेक और परिश्रम से रचित समाधि से संपन्न ऋद्धिबल को विकसित करता है। वह रात के समय जिस आकृति, लक्षण और निमित्त का उपयोग कर के छन्द… वीर्य… चित्त… और विवेक और परिश्रम से रचित समाधि से संपन्न ऋद्धिबल को विकसित करता है, दिन के समय भी वह उसी आकृति, लक्षण और निमित्त का उपयोग कर के छन्द… वीर्य… चित्त… और विवेक और परिश्रम से रचित समाधि से संपन्न ऋद्धिबल को विकसित करता है। इस तरह वह रात को दिन के जैसे बिताता है, और दिन को रात के जैसे। ➤ और, कैसे कोई खुले, बिना-बाधित मानस के सहारे, उज्ज्वल चित्त को विकसित करता है? —ऐसा होता है कि कोई साधक (दिन-रात किसी भी समय) आलोक-संज्ञा (उजाले का नजरिया), दिन-संज्ञा (दिन का नजरिया) को (अपने भीतर) अच्छे से धारण करता है, अच्छे से स्थापित करता है। —इस तरह, कोई खुले, बिना-बाधित मानस के सहारे उज्ज्वल चित्त को विकसित करता है। जब कोई साधक इस तरह चार ऋद्धिपद की साधना करता है, विकसित करता है, तब— इस तरह, जब इन चार ऋद्धिपदों की साधना की जाती हैं, उन्हें विकसित किया जाता है, तो वह महाफलदायी, महालाभकारी होता है।” — संयुत्तनिकाय ५१:२० : इद्धिपाद विभङ्ग सुत्त ऐसा मैंने सुना—एक समय (शायद भगवान के परिनिर्वाण के पश्चात) आयुष्मान आनन्द कौशांबी के घोषित विहार में रह रहे थे। तब उण्णाभ ब्राह्मण आयुष्मान आनन्द के पास गया और उनसे मैत्रीपूर्ण हालचाल लिया। मैत्रीपूर्ण वार्तालाप कर वह एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठकर उसने आयुष्मान आनन्द से कहा, “आनन्द गुरुजी, श्रमण गौतम के ब्रह्मचर्य का लक्ष्य क्या है?” “श्रमण गौतम के ब्रह्मचर्य का लक्ष्य छन्द को त्यागना है।” “लेकिन क्या छन्द को त्यागने का कोई मार्ग है, कोई साधना है?” “हाँ।” “क्या है वह मार्ग, वह साधना?” “ऐसा होता है कि कोई साधक—छन्द… वीर्य… चित्त… विवेक और परिश्रम से रचित समाधि से संपन्न ऋद्धिबल को विकसित करता है। यही छन्द को त्यागने का मार्ग है, यही साधना है।” “यदि ऐसा हो, तो वह मार्ग अनन्त है, कभी समाप्त नहीं होगा। क्योंकि छन्द से छन्द को त्याग पाना असंभव है।” “अच्छा, ब्राह्मण, मैं तुम से प्रतिप्रश्न करता हूँ। जैसे तुम्हें ठीक लगे, वैसा उत्तर दें। क्या तुम्हें (यहाँ आने से) पहले छन्द नहीं पैदा हुई, ‘मैं विहार में जाऊंगा’? और जब तुम यहाँ विहार में पहुँच गए, तो क्या तुम्हारी छन्द पूरी नहीं हुई?’ “हाँ, हुई, गुरुजी।” “क्या तुम्हें (यहाँ आने से) पहले वीर्य… चित्त… विवेक नहीं पैदा हुआ, ‘मैं विहार में जाऊंगा,’? और जब तुम यहाँ विहार में पहुँच गए, तो क्या तुम्हारी वीर्य… चित्त… विवेक शांत नहीं हुआ?’ “हाँ, हुआ, गुरुजी।” “उसी तरह, जो भिक्षु अरहंत होते हैं, आस्रव खत्म करते हैं, ब्रह्मचर्य परिपूर्ण करते हैं, कर्तव्य समाप्त करते हैं, बोझ को नीचे रखते हैं, परम-ध्येय प्राप्त करते हैं, भव-बंधन को पूर्णतः तोड़ देते हैं, सम्यक-ज्ञान से विमुक्त होते हैं, उनका अरहत्व पाने के लिए जो भी छन्द… वीर्य… चित्त… विवेक होता है, अरहत्व पाने पर उनकी वह छन्द… वीर्य… चित्त… विवेक शांत हो जाता है। तो तुम्हें क्या लगता है, ब्राह्मण? क्या यह मार्ग अनन्त है, अथवा अन्तपूर्ण?” “आप सही है, आनन्द गुरुजी। यह मार्ग अन्तपूर्ण ही है, अनन्त नहीं।” — संयुत्तनिकाय ५१:१५ : उण्णाभब्राह्मण सुत्तमहाफलदायी महालाभकारी साधना
मेरी इस काया में है:
केश, लोम, नाखून, दाँत, त्वचा
माँस, नसें, हड्डी, हड्डीमज्जा, तिल्ली
हृदय, कलेजा, झिल्ली, गुर्दा, फेफड़ा
आँत, छोटी-आँत, उदर, टट्टी, मस्तिष्क
पित्त, कफ, पीब, रक्त, पसीना, चर्बी
आँसू, तेल, थूक, बलगम, जोड़ो में तरल, एवं मूत्र।छन्द से छन्द को खत्म करना
