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पाँच इंद्रिय
परिचय
पाँच इंद्रिय हैं—
- श्रद्धा इंद्रिय
- वीर्य इंद्रिय
- स्मृति इंद्रिय
- समाधि इंद्रिय
- प्रज्ञा इंद्रिय
बौद्ध परंपरा और सामान्य बोलचाल में ‘इंद्रिय’ शब्द का प्रयोग अक्सर हमारी पाँच शारीरिक ज्ञानेंद्रियों (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) के लिए होता है। लेकिन यहाँ जिन ‘पाँच इन्द्रियों’ की चर्चा भगवान बुद्ध कर रहे हैं, वे विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक महाशक्तियाँ हैं, जिन्हें संबोधि की प्राप्ति के लिए चित्त के भीतर जान-बूझकर विकसित किया जाता है।
इन्हें “इन्द्रिय” क्यों कहा गया? पालि और संस्कृत में “इन्द्रिय” शब्द “इन्द्र” (तैंतीस देवों के अधिपति या राजा) से जुड़ा है। इसका सीधा अर्थ है—प्रभुता, सत्ता, नियंत्रण और शासन। जब ये पाँच आध्यात्मिक गुण हमारे भीतर जागृत होते हैं, तो ये हमारे मन पर राज करने वाले अकुशल विकारों (नीवरणों) को उखाड़ फेंकते हैं और चित्त पर अपना ‘आधिपत्य’ स्थापित कर लेते हैं।
कुछ सुत्तों में भगवान ने स्पष्ट किया है कि ३७ बोधिपक्खिय धम्म के सभी तत्व किसी न किसी रूप में इन्हीं पाँच इंद्रियों में समाहित हो जाते हैं। विशेषकर ‘श्रद्धा’, जो अन्य समूहों (जैसे सतिपट्ठान या संबोध्यंग) में उतनी प्रत्यक्ष रूप से नहीं दिखती, वह यहाँ इस पूरे साधना-भवन की नींव बनकर उभरती है।
आध्यात्मिक मांसपेशियाँ
इन पाँच इन्द्रियों के कार्य को समझने के लिए एक कमज़ोर व्यक्ति का रूपक बड़ा सटीक बैठता है। कल्पना करें कि किसी व्यक्ति की मांसपेशियाँ अत्यधिक दुर्बल हैं—वह भारी वस्तुएँ नहीं उठा सकता, थोड़ा चलने पर ही हाँफ जाता है, और उसमें आत्मबल की भारी कमी है। लेकिन जब वह एक संकल्प के साथ नियमित व्यायाम और पौष्टिक आहार लेना शुरू करता है, तो वही कमज़ोर मांसपेशियाँ क्रमशः सशक्त और सुडौल होने लगती हैं। शरीर में शक्ति, संतुलन और आत्मविश्वास लौट आता है, और वह पहाड़ जैसी बाधाओं को भी पार करने में समर्थ हो जाता है।
ठीक इसी प्रकार, अज्ञान (अविद्या) में डूबे एक आम इंसान का चित्त चंचल, अस्थिर और दुर्बल होता है। लेकिन जब वह आर्य-मार्ग पर कदम रखता है, तो निरंतर अभ्यास (व्यायाम) से उसकी ये पाँच इन्द्रियाँ—श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञा—धीरे-धीरे बलवती होती हैं। ये चित्त को भीतर से ‘सुडौल’ और अभेद्य बनाकर साधक के अंदर एक स्थायी आध्यात्मिक सामर्थ्य भर देती हैं। यही सामर्थ्य उसे आर्य-पुरस्कारों की ओर ले जाता है—जहाँ अंतर्ज्ञान (प्रज्ञा) के आलोक में अविद्या का नाश होता है, और दुःख का वास्तविक अंत शुरू होता है।
श्रद्धा - ‘सक्रिय आत्मविश्वास’
बौद्ध धर्म की ‘श्रद्धा’ किसी अदृश्य शक्ति या ईश्वर की कृपा पर आधारित कोई अंधविश्वास या केवल भावनात्मक लगाव नहीं है। जहाँ अन्य परंपराएँ मुक्ति को ऊपर से मिलने वाला ‘वरदान’ मानती हैं, वहीं बुद्ध के मार्ग में मुक्ति की सम्पूर्ण जिम्मेदारी स्वयं साधक की होती है।
यह बौद्ध-श्रद्धा तीन अत्यंत तार्किक और मजबूत आधारों पर टिकती है:
- बुद्ध और उनके आर्य-शिष्यों की बोधि और उनकी क्षमता पर अटल विश्वास।
- उनके द्वारा बताए गए ‘धर्म’ (मार्ग) की सत्यता और उसके कार्य-कारण नियमों पर अडिग आस्था।
- इस सत्य को केवल ‘मानने’ के बजाय, उसे अपने जीवन में उतारने की प्रामाणिक इच्छा।
इस श्रद्धा का केंद्रबिंदु यह बोध है कि भगवान बुद्ध ने स्वयं कर्म और प्रज्ञा के नियमों को अपनाकर संसार के चक्र को तोड़ा है; अतः मैं भी इसी मार्ग पर चलकर अपने कुसंस्कारों का रूपांतरण कर सकता हूँ। यह श्रद्धा एक ‘सजीव और क्रियाशील आत्मविश्वास’ है, जो साधक को भीतर से झकझोर कर साधना के आसन पर ला बिठाती है।
एक चक्रीय शृंखला
ये पाँचों इन्द्रियाँ अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई एक गतिशील शृंखला की तरह काम करती हैं:
- श्रद्धा से भीतर एक अदम्य वीर्य उत्पन्न होती है।
- वह वीर्य चित्त की सतर्कता और स्मृति को सुदृढ़ करती है।
- जब स्मृति स्थिर और निरंतर हो जाती है, तब वह चार ध्यानों वाली समाधि को जन्म देती है।
- और जब चित्त समाधि की गहराई में पूर्णतः निर्मल हो जाता है, तब वहाँ से परम प्रज्ञा प्रकट होती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह कोई सीधी रेखा नहीं है, बल्कि एक ऊपर की ओर उठता हुआ चक्र है। जब प्रज्ञा पूर्ण रूप से विकसित होकर साधक को सत्य का प्रत्यक्ष बोध (उदय-व्यय का ज्ञान) कराती है, तो चित्त गहन विराग में डूब जाता है और सांसारिक तृष्णाओं को तोड़ देता है। इसी क्षण साधक प्रथम आर्य-फल—‘श्रोतापत्ति’—को प्राप्त करता है।
जैसे ही यह पहली सफलता मिलती है, साधक की ‘श्रद्धा’ सौ गुना अधिक प्रचंड और अटल हो जाती है! यह प्रचंड श्रद्धा फिर से दुगनी ‘वीर्य’ को जन्म देती है, जो और भी गहरी ‘स्मृति’, अचूक ‘समाधि’ और उच्चतर ‘प्रज्ञा’ की ओर ले जाती है। यह चक्र ऐसे ही घूमता और सशक्त होता जाता है—तब तक, जब तक साधक सभी आर्य फलों को पार कर ‘अरहत्त्व’ के परम शिखर तक न पहुँच जाए।
अप्पमाद
इस पूरे अभ्यास को निरंतर चलायमान रखने वाला मुख्य प्रेरक तत्व है—अप्पमाद (अप्रमाद या लापरवाह न होना)। अप्पमाद कोई साधारण सावधानी नहीं है। यह एक संवेगात्मक सजगता है। यह भीतर से उठा वह कंपन है जो जानता है कि जन्म-मरण के इस असीम संसार में कितना भयानक अंधकार, संकट और दुःख छिपा है।
अप्पमाद यह जानता है कि एक क्षण की लापरवाही, स्मृति की एक चूक साधक को वापस उसी दुःख के गर्त में धकेल सकती है। इसलिए, अप्पमाद वह मुख्य कुंजी है जो आस्रवों के बीच भी चित्त की रक्षा करती है और साधक को साधना में निष्ठा, ऊर्जस्विता और अटूट निरंतरता प्रदान करती है।
वीणा के तार
इन इन्द्रियों को विकसित करते समय ‘संतुलन’ अत्यंत आवश्यक है, विशेषकर ‘वीर्य’ और ‘समाधि’ के बीच। इसे एक वीणा के तार के प्रसिद्ध दृष्टांत से समझा जाता है: यदि वीणा के तार बहुत अधिक कस दिए जाएँ, तो वे टूट जाते हैं (बेचैनी); और यदि बहुत ढीले छोड़ दिए जाएँ, तो संगीत नहीं बजता (सुस्ती)।
जैसे एक कुशल संगीतकार पहले वीणा के मुख्य तार को ‘सम’ (संतुलित) करता है और फिर अन्य तारों को उसी सुर में मिलाता है; उसी प्रकार, साधक को अपने प्रयास को न तो अधिक कठोर रखना है और न ही शिथिल। जब वीर्य समत्व में आती है, तभी स्मृति, समाधि और प्रज्ञा उसी उत्तम लय में ढलकर सतिपट्ठान जैसे आलंबनों को भेदने में पूर्णतः समर्थ होती हैं।
बेड़े को छोड़ना
जब यह चक्र अपने अंतिम चरण में पहुँचता है और ‘प्रज्ञा’ पूर्ण परिपक्व हो जाती है, तब बौद्ध दर्शन की सबसे गूढ़ और चौंकाने वाली सच्चाई सामने आती है—हमें अपनी प्रज्ञा से भी पार जाना होता है।
अंतिम मुक्ति केवल इन कुशल गुणों (इन्द्रियों) के विकास से नहीं मिलती, बल्कि अंततः उन्हें ‘छोड़ने’ की क्षमता से मिलती है। प्रज्ञा वह प्रकाश है जो चित्त को अज्ञान के अँधेरे से निकालता है, लेकिन अंतिम बंधन तभी टूटता है जब चित्त किसी भी दृष्टि, किसी भी धारणा, या यहाँ तक कि अपनी ‘प्रज्ञा’ को भी पकड़ कर बैठना छोड़ देता है।
‘ब्रह्मजाल सुत्त’ में बुद्ध का यह अत्यंत सूक्ष्म दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। भगवान बुद्ध सभी दृष्टियों और दर्शनों को उनके उत्पन्न होने और उनके प्रभाव (उदय-व्यय) के आधार पर देखते हैं, वे केवल विषयवस्तु पर नहीं टिकते। वे सब कुछ जानते हैं, पर किसी चीज़ में आसक्त नहीं होते। यही वह निर्विकल्प शून्यता की स्थिति है।
इन पाँच इन्द्रियों का अंतिम उद्देश्य यही ‘अमृत’ प्राप्त कराना है। ये पाँच इन्द्रियाँ नदी पार कराने वाली एक मज़बूत नाव की तरह हैं; ये साधना के परम उपकरण हैं, स्वयं लक्ष्य नहीं। इन्हें अत्यंत कुशलता से विकसित करना अनिवार्य है, किंतु प्रज्ञावान साधक यह जानता है कि जब दूसरा किनारा आ जाएगा, तो इस नाव को कंधे पर लादकर नहीं घूमना है, बल्कि इसे भी हमेशा के लिए पीछे छोड़ देना है।
इंद्रिय भावना
“ये पाँच इंद्रियाँ हैं। कौन-से पाँच?
- श्रद्धा इंद्रिय
- वीर्य इंद्रिय
- स्मृति इंद्रिय
- समाधि इंद्रिय
- प्रज्ञा इंद्रिय
➤ यह श्रद्धा इंद्रिय कहाँ देखी जाती है?
—श्रद्धा इंद्रिय श्रोतापन्न के चार अंगों में देखी जाती है।
➤ यह वीर्य इंद्रिय कहाँ देखी जाती है?
—वीर्य इंद्रिय चार सम्यक परिश्रम में देखी जाती है।
➤ यह स्मृति इंद्रिय कहाँ देखी जाती है?
—स्मृति इंद्रिय चार स्मृतिप्रस्थान में देखी जाती है।
➤ यह समाधि इंद्रिय कहाँ देखी जाती है?
—समाधि इंद्रिय चार ध्यान में देखी जाती है।
➤ यह प्रज्ञा इंद्रिय कहाँ देखी जाती है?
—प्रज्ञा इंद्रिय चार आर्यसत्यों में देखी जाती है।”
— संयुक्तनिकाय ४८ : ८ श्रोतापति के चार अंग क्या हैं? — संयुक्तनिकाय ५५ : ५ कोई आर्यश्रावक श्रोतापन्न के कौन-से चार अंगों से संपन्न होता है? —अंगुत्तरनिकाय १०:९२ “ऐसा होता है कि किसी व्यक्ति में श्रद्धा होती है। वह तथागत की बोधि को लेकर आश्वस्त होता है—‘वाकई भगवान ही अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध है—विद्या और आचरण से संपन्न, परम लक्ष्य पा चुके, दुनिया के ज्ञाता, दमनशील पुरुषों के अनुत्तर सारथी, देवों और मनुष्यों के गुरु, बुद्ध भगवान!’ —यह उसकी श्रद्धा-इंद्रिय है। जिसे बुद्ध शिक्षा (“बुद्धसासन”) पर श्रद्धा हो, जो गहराई को भेदने के लिए जीता हो, उसे धर्मानुसार ऐसा लगता है—‘भगवान शास्ता है, मैं तो श्रावक हूँ! भगवान जानते हैं, मैं नहीं!’ जिसे शास्ता की शिक्षा में श्रद्धा हो, जो गहराई को भेदने के लिए जीता हो, उसे शास्ता की शिक्षा स्वास्थ्यवर्धन और पोषण देती है। जिस व्यक्ति को शास्ता की शिक्षा में श्रद्धा हो, जो गहराई को भेदने के लिए जीता हो, उसे धर्मानुसार ऐसा लगता है—‘मैं ख़ुशी से अपना रक्त और मांस सूखा दूँ, मात्र नसें और कंकाल ही छोड़ूँ! परंतु मैं जब तक वह न पा लूँगा, जिसे पौरुष-दृढ़ता, पौरुष-वीर्य, और पौरुष-प्रयास से पाया जाता है—तब तक अपनी वीर्य को राहत नहीं दूँगा!’ इस तरह जिस व्यक्ति को शास्ता की शिक्षा में श्रद्धा हो, जो गहराई को भेदने के लिए जीता हो, उसे दो में से एक फ़ल अपेक्षित होता है—अभी यही परम ज्ञान (=अरहन्तफ़ल), अथवा आधार शेष बचने पर अनागामिता।” — संयुक्तनिकाय ४८ : १० : इन्द्रियसंयुत्त : दूतियविभङ्ग सुत्त “ऐसा होता है कि कोई व्यक्ति वीर्य जगाकर रहता है—अकुशल स्वभाव को त्यागने के लिए, और कुशल स्वभाव को धारण करने के लिए। वह निश्चयबद्ध, दृढ़, और पराक्रमी होता है; कुशल स्वभाव के प्रति कर्तव्य से जी नहीं चुराता। और, फिर— —यह उसकी वीर्य-इंद्रिय है।” — संयुक्तनिकाय ४८ : १० : इन्द्रियसंयुत्त : दूतियविभङ्ग सुत्त “ऐसा होता है कि कोई आर्यश्रावक स्मृतिमान होता है, याददाश्त में बहुत तेज़! पूर्वकाल में किया गया कर्म, पूर्वकाल में कहा गया वचन भी स्मरण रखता है, और अनुस्मरण कर पाता है। और, तब वह लोक के प्रति लालसा और नाराज़ी हटाकर— —तत्पर, सचेत और स्मृतिमान। —इस तरह, कोई स्मृति संपन्न रहता है। यह उसकी स्मृति-इंद्रिय है।" — संयुक्तनिकाय ४८ : १० : इन्द्रियसंयुत्त : दूतियविभङ्ग सुत्त —यह उसकी समाधि-इंद्रिय है।” — संयुक्तनिकाय ४८ : १० : इन्द्रियसंयुत्त : दूतियविभङ्ग सुत्त “ऐसा होता है कि किसी साधक में आर्य और भेदक अन्तर्ज्ञान होता है—उदय-व्यय पता लगने योग्य, दुःखों का सम्यक अंतकर्ता। —यह उसकी प्रज्ञा-इंद्रिय है।” — संयुक्तनिकाय ४८ : १० : इन्द्रियसंयुत्त : दूतियविभङ्ग सुत्त भगवान ने सारिपुत्त भंते से पूछा, “सारिपुत्त, जो आर्यश्रावक तथागत से भलीभाँति प्रेरित हो, जो (शरण के लिए) केवल तथागत के पास गया हो, क्या उसे तथागत के प्रति या तथागत की शिक्षा के प्रति कोई शंका या उलझन होगी?” तब, सारिपुत्त भंते ने उत्तर दिया— “नहीं, भंते! जो आर्यश्रावक तथागत से भलीभाँति प्रेरित हो, जो केवल तथागत के पास गया हो, उसे तथागत के प्रति या तथागत की शिक्षा के प्रति कोई शंका या उलझन नहीं होगी। जिस आर्यश्रावक में श्रद्धा हो, उससे वाकई उम्मीद की जा सकती है कि वह अकुशल स्वभावों का त्याग करने के लिए और कुशल स्वभावों को आत्मसात करने के लिए अपनी जान लगा देगा। वह अपने प्रयास में निश्चयबद्ध, दृढ़ और पराक्रमी होगा, और कुशल स्वभाव के प्रति अपने कर्तव्य से जी नहीं चुराएगा। उसका जो भी वीर्य होगा, वही उसकी वीर्य-इंद्रिय है। जिस आर्यश्रावक में श्रद्धा हो, जिसकी वीर्य जग चुकी हो, उससे वाकई उम्मीद की जा सकती है कि वह स्मृतिमान हो जाएगा, याददाश्त में बहुत तेज़! वह पूर्वकाल में किया गया कर्म, कहे गए वचनों को भी स्मरण रखेगा, और उनका अनुस्मरण कर पाएगा। उसकी जो भी स्मृति होगी, वही उसकी स्मृति-इंद्रिय है। जिस आर्यश्रावक में श्रद्धा हो, जिसकी वीर्य जग चुकी हो, जिसकी स्मृति स्थापित हो चुकी हो, उससे वाकई उम्मीद की जा सकती है कि वह त्याग-आलंबन बनाकर समाधि लगाएगा, चित्त को एकाग्र करेगा। उसकी जो भी समाधि होगी, वही उसकी समाधि-इंद्रिय है। जिस आर्यश्रावक में श्रद्धा हो, जिसकी वीर्य जग चुकी हो, जिसकी स्मृति स्थापित हो चुकी हो, जिसका चित्त सम्यक रूप से समाहित हो चुका हो, उससे वाकई उम्मीद की जा सकती है कि उसे पता चले—‘जन्म-जन्मांतरण की शुरुवात सोच के परे है। संसरण की निश्चित शुरुवात पता नहीं चलती, परंतु अविद्या में डूबे, तृष्णा में फँसे सत्व जन्म-जन्मांतरण में भटक रहे हैं। उस अविद्या-रुपी ‘अँधेरे पिंड’ का बिना शेष बचे विराग होना, निरोध होना—यही शान्ति है, यही सर्वोत्कृष्ट है—सभी रचनाओं का रुकना, सभी अर्जित वस्तुओँ का परित्याग, तृष्णा का अंत, विराग, निरोध, निर्वाण!’ उसकी जो भी प्रज्ञा होगी, वही उसकी प्रज्ञा-इंद्रिय है। और इस तरह वह आश्वस्त आर्यश्रावक बार-बार प्रयास करते हुए, बार-बार स्मृति जगाते हुए, बार-बार चित्त को एकाग्र करते हुए, बार-बार प्रज्ञापूर्वक जानते हुए, अंततः पूरी तरह से आश्वस्त हो जाएगा—‘जिस धर्म को मैंने पहले सिर्फ सुना था, अब मैं उसे अपने इसी जीवन में अपनी काया से छूते हुए प्रज्ञा की जागृति से देखता हूँ!’ उसकी जो भी श्रद्धा होगी, वही उसकी श्रद्धा-इंद्रिय है। (और, फिर उसकी श्रद्धा से वीर्य, वीर्य से स्मृति, स्मृति से समाधि, समाधि से प्रज्ञा—का चक्र घूमते हुए आगे बढ़ते जाता हैं, और अगले फल मिलते रहते हैं।) — संयुक्तनिकाय ४८ : ५० : आपण सुत्त जब कोई आर्यश्रावक केवल एक स्वभाव में प्रतिष्ठित हो जाए, तब उसके पाँचों इंद्रिय विकसित होते हैं, सुप्रतिष्ठित होते हैं। कौन-सा है वह एक स्वभाव? —अप्रमाद (=लापरवाह न होना)। और, अप्रमाद क्या है? ऐसा होता है कि कोई भिक्षु आस्रव और आस्रव के साथ जन्में स्वभावों के बीच अपने चित्त की रक्षा करता है। इस तरह जब कोई भिक्षु आस्रव और आस्रव के साथ जन्में स्वभावों के बीच अपने चित्त की रक्षा करता है, तो उसकी श्रद्धा-इंद्रिय साधना की परिपूर्णता की ओर बढ़ती है… वीर्य-इंद्रिय… स्मृति-इंद्रिय… समाधि-इंद्रिय… प्रज्ञा-इंद्रिय साधना की परिपूर्णता की ओर बढ़ती है। इस तरह, जब कोई आर्यश्रावक केवल एक स्वभाव में प्रतिष्ठित हो जाए, तब उसके पाँचों इंद्रिय विकसित होते हैं, सुप्रतिष्ठित होते हैं। — संयुक्तनिकाय ४८ : ५६ : पतिट्ठित सुत्तश्रोतापति के चार अंग
श्रोतापन्न के चार अंग
श्रद्धा-इंद्रिय क्या है?
वीर्य-इंद्रिय क्या है?
स्मृति-इंद्रिय क्या है?
समाधि-इंद्रिय क्या है?
प्रज्ञा-इंद्रिय क्या है?
चक्र घूमना
एक अकेला धम्म…
