✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
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— कुशल कैसे बढ़ाएँ —
सतिपट्ठान | सम्मपधान | इद्धिपाद | इन्द्रिय | बल | बोज्झङ्ग | अट्ठङ्गिक मग्ग

कुशल भावना

लेखक: भिक्खु कश्यप
| ४ मिनट
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भगवान ने कहा—

कुशल (स्वभाव) को बढ़ाओ! कुशल को बढ़ाया जा सकता है। यदि कुशल को बढ़ाया नहीं जा सकता, तो मैं तुमसे यह न कहता—‘कुशल को बढ़ाओ!’ परंतु क्योंकि कुशल को बढ़ाया जा सकता है, इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ—‘कुशल को बढ़ाओ!’

यदि कुशल को बढ़ाना अहितकर या कष्टदायक होता, तो मैं तुमसे यह न कहता—‘कुशल को बढ़ाओ!’ परंतु क्योंकि कुशल को बढ़ाना हितकर और सुखदायक है, इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ—‘कुशल को बढ़ाओ!’

— अङ्गुत्तरनिकाय २:१९

लेकिन मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर ये ‘कुशल स्वभाव’ वास्तव में हैं क्या? क्या ये केवल कुछ अच्छे नैतिक विचार हैं, या कोई दार्शनिक कल्पना? भगवान बुद्ध ने इसे किसी अस्पष्टता में नहीं छोड़ा, बल्कि एक सटीक और अचूक ‘व्यावहारिक-नक्शे’ के रूप में हमारे सामने रख दिया —

यदि आप मेरे बारे में सोचते हैं कि ‘भगवान कृपालु और हितैषी हैं। और, वे कृपा कर हमें धर्म बताते हैं।’ तब मैंने प्रत्यक्ष-ज्ञान से जो धर्म बताए हैं, जैसे—

उन्हें तुम सभी को मिल-जुलकर एकत्र होकर, बिना विवाद किए सीखना चाहिए। ताकि यह ब्रह्मचर्य (दूर-दराज) यात्रा के योग्य और चिरस्थायी बना रहे — जो बहुजनों के हित के लिए, बहुजनों के सुख के लिए, इस दुनिया पर उपकार करते हुए, देव और मानव के कल्याण, हित, और सुख के लिए होगा।

मज्झिमनिकाय १०३, दीघनिकाय २९

भगवान बुद्ध ने अपने ४५ वर्षों के सुदीर्घ चारिक जीवन में जो कुछ भी सिखाया, उसका सबसे अमूल्य अर्क, उस पूरे महासागर का सबसे गहरा निचोड़ ये ३७ धर्म हैं। पालि में इन्हें ‘बोधिपक्खिय धम्म’ कहा गया है—अर्थात वे गुण जो सीधे ‘बोधि’ (जागृति या बुद्धत्व) के पक्ष में खड़े हैं।

बुद्ध की अंतिम वसीयत

कल्पना कीजिए उस दृश्य की—भगवान का महापरिनिर्वाण अत्यंत समीप है। वे वैशाली के महावन में सभी भिक्षुओं को अंतिम बार एकत्रित करते हैं। वे किसी व्यक्ति विशेष को अपना उत्तराधिकारी नहीं बनाते; बल्कि अपने जीवन-भर की तपस्या से खोजे गए इन ३७ धर्मों को सामने रखते हुए घोषणा करते हैं कि—यही मेरा सच्चा स्वरूप हैं, मेरे बाद यही तुम्हारे शास्ता (गुरु) हैं।

यह कोई रटने वाली सूची या तोते की तरह दोहराए जाने वाले सिद्धांत नहीं हैं। यह एक सक्रिय साधना है। यह भवसागर के अथाह दुखों से पार जाने के लिए भगवान द्वारा छोड़ी गई अंतिम और एकमात्र ‘सर्वाइवल किट’ है।

इन ३७ धर्मों को “बोधि के पंख” भी कहा जाता है। जैसे एक पक्षी अपने पंखों के बिना अनंत आकाश में उड़ान नहीं भर सकता, ठीक वैसे ही, कोई भी साधक अपने भीतर इन ३७ गुणों को विकसित किए बिना निर्वाण की ऊँचाइयों को नहीं छू सकता।

यह कोई साधारण सूची नहीं, बल्कि मुक्ति की ओर ले जाने वाला एक संपूर्ण मनोवैज्ञानिक टूलबॉक्स है—जहाँ सतिपट्ठान आपकी आँखें खोलकर यात्रा का पहला कदम रखवाता है; सम्मपधान आपके भीतर कभी न थकने वाली ऊर्जा का संचार करता है; और इद्धिपाद आपके संकल्प को अदम्य वेग देता है। राह के तूफानों में आप डगमगाएं नहीं, इसलिए इन्द्रिय आपके आंतरिक संतुलन को साधते हैं और बल आपको चट्टान जैसी अडिग शक्ति देते हैं। जब चित्त निर्मल होने लगता है, तो बोज्झङ्ग आपके भीतर ‘जागृति’ का परम प्रकाश भर देते हैं; और अंततः आर्य अष्टांगिक मार्ग वह राजपथ बन जाता है, जो आपको सीधे निर्वाण के द्वार तक पहुँचा देता है।

भगवान ने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा था कि जब तक ये ३७ शिक्षाएँ साधकों के चित्त में जीवित रहेंगी, जब तक इनका निरंतर अभ्यास होता रहेगा—तब तक यह पृथ्वी ‘अरहंतों’ से खाली नहीं होगी। बुद्ध का शासन तब तक अस्त नहीं होगा।

तो आइए, सैद्धांतिक उलझनों और बौद्धिक बहसों से बाहर निकलें। बोधि के इन पंखों को अपने भीतर धारण कर, मुक्ति की दिशा में अपनी पहली व्यावहारिक उड़ान भरें:


पहला पंख - स्मृतिप्रस्थान