असुभ सञ्ञा | आहारे पटिकुलसञ्ञा | पटिकुल मनसिकार | नवसिवथिक | मरणसञ्ञा | आदीनव सञ्ञा | सब्बलोके अनभिरतिसञ्ञा | धातु मनसिकार | सब्बसङखारेसु अनिच्चानुसञ्ञा | अनत्त सञ्ञा

‘दुनिया’ का यथार्थ
आम तौर पर दुनिया (“लोक”) का अर्थ ‘समाज’, ‘संसार’, ‘पृथ्वी’, या ‘ब्रह्मांड’ माना जाता है। इसलिए जब ‘संसार से विरक्ति’ की बात सुनी जाती है, तो लगता है कि घर-परिवार छोड़कर किसी गुफा में भाग जाना ही साधना है। लेकिन बुद्ध का धम्म अवचेतन चित्त की सूक्ष्म गहराइयों से जुड़ा हुआ मनोविज्ञान भी है।
भगवान के अनुसार आर्य अध्यात्म में दुनिया बाहरी जगह के बजाय छह इंद्रियों (आँख, कान, नाक, जीभ, काया और मन) पर हो रहे संपर्कों का लगातार ‘टूटकर बिखरना’ (“लुज्जती’ति लोके”) है। आप जिस दुनिया को जीतकर उसे मुट्ठी में भिंचना चाहते हैं, वह दरअसल टूट-टूटकर बिखरती हुई रेत मात्र है, जो उँगलियों के बीच से फिसलती निकल जाती है।
आम लोग इसी टूट-टूटकर बिखरती हुई दुनिया में कोई मजबूत आधार या आश्रय ढूँढने की कोशिश में जीवन बिता देते हैं। वे पद, प्रतिष्ठा, धन-संपत्ति और रिश्ते जोड़ते हैं ताकि जीवन में स्थायित्व आ सके। इस भ्रम को रट्ठपाल भंते अपने एक हल्के-से प्रहार से तोड़कर चकनाचूर कर देते हैं।
वे कहते हैं कि “यह लोक पर्याप्त नहीं है! अतृप्त रखता है! तृष्णा का नौकर है!” एक आम आदमी सोशल मीडिया पर ‘लाइक्स’ ढूँढने से लेकर, महँगे फोन और गाड़ियाँ खरीदने और भविष्य के लिए बैंक-बैलेंस जोड़ने तक—केवल एक ‘नौकर’ (दास) की तरह तृष्णा के आदेशों का पालन कर रहा होता है। उसे लगता है कि अगली उपलब्धि उसे तृप्त कर देगी, लेकिन यह दुनिया बनी ही इस तरह है कि यह आपको कभी संतुष्ट नहीं कर सकती।
‘सब्बलोके अनभिरति संज्ञा’ (संपूर्ण लोक के प्रति नीरसता) इसी अंधी दौड़ के सम्मोहन को चीरने वाला एक औज़ार है। यह संज्ञा चित्त को दिखाती है कि चाहे यह मनुष्य लोक हो या कोई अत्यंत सुखद ‘ब्रह्मलोक’—जहाँ भी इंद्रियाँ हैं, वहाँ केवल बिखराव और अंततः असंतुष्टि ही आती है।
अभ्यास कैसे करें?
- आकर्षण का विखंडन: जब भी आपका चित्त किसी सांसारिक चकाचौंध (जैसे किसी नई कार, महँगे फोन, पदोन्नति, या किसी आकर्षक व्यक्ति) की ओर खिंचने लगे, तो तुरंत उस पर प्रहार करें—“यह भी तो टूटकर बिखरने वाला है। इसका आश्रय लेना खतरनाक है। छूटने लगेगा तब क्या करूँगा?”
- इंद्रिय-संपर्क पर प्रहार: जब भी आँख किसी सुंदर दृश्य में उलझे या कान किसी की प्रशंसा सुनकर फूलने लगें, तो देखें कि वह ‘प्रशंसा के शब्द’, वह ‘कान’, और उससे उपजा ‘सुख’—तीनों उसी क्षण टूट-टूटकर बिखरते हैं। और वह व्यय होने के बाद फिर उसको पुनः महसूस करने की इच्छा दुःख देती हैं। क्यों न मैं उस राग को विराग कर दूँ?
सफलता का पैमाना
इस साधना का उद्देश्य दुनिया से नफरत करना, समाज का तिरस्कार करना या घोर अवसाद में चले जाना नहीं है। इसका उद्देश्य टूटे दिल से यह गाना निकलना नहीं है:
ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनिया।
ये इंसान के दुश्मन समाजों की दुनिया।
ये दौलत के भूखे रिवाजों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?
हर एक जिस्म घायल, हर एक रूह प्यासी।
निगाहों में उलझन, दिलों में उदासी।
ये दुनिया है, या आलम-ए-बदहवासी?
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?
यहां एक खिलौना है इंसान की हस्ती।
ये बस्ती है मुर्दा परस्तों की बस्ती।
यहां पर तो जीवन से है मौत सस्ती।
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?
जवानी भटकती है बदकार 1 बनकर।
जवां जिस्म सजते हैं बाजार बनकर।
यहाँ प्यार होता है व्यापार बनकर।
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?
यह दुनिया जहां आदमी कुछ नहीं है,
वफा कुछ नहीं, दोस्ती कुछ नहीं है।
जहां प्यार की कद्र ही कुछ नहीं है।
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?
जला दो, इसे फूँक डालो ये दुनिया!
मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया!
तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनिया!
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है?—साहिर लुधियान्वी
गीतकार
(फिल्म प्यासा - १९५७)
जी, नहीं! बुद्ध का धम्म साहिर लुधियान्वी के द्वारा लिखे इस गीत की तरह नहीं है। बुद्ध के शब्द टूटे और आहत दिल से निकले शब्द नहीं है, बल्कि परमशांति और परमसुख में डूबे विमुक्त चित्त की गहरी प्रज्ञा से उपजे हैं। और इस साधना की सफलता तब मानी जाती है जब सांसारिक चकाचौंध के प्रति आपके चित्त का खिंचाव पूरी तरह खत्म हो जाए।
जब यह यथार्थ स्पष्ट हो जाता है, तो किसी करोड़पति की संपत्ति, किसी सत्ताधारी का रुतबा, या स्वर्ग का प्रलोभन भी आपके चित्त को ललचा नहीं पाता। जैसे आग के पास लाया गया मुर्गे का पंख सिकुड़कर पीछे हट जाता है, वैसे ही आपका चित्त संसार के प्रलोभनों से सिकुड़कर अपने भीतर सिमट जाता है। चित्त पूरी तरह से ‘अनासक्त’, उपेक्षक और मुक्त होकर उस पूर्ण आज़ादी में स्थित हो जाता है, जहाँ दुनिया का कोई भी प्रलोभन उसे दोबारा अपना ‘दास’ नहीं बना सकता।
बदकार: बुरा काम करने वाला दुष्ट या पापी। ↩︎
लोक की आर्य परिभाषा
किसी ने भगवान से पूछा:
“भंते, लोग ‘लोक… लोक…’ (दुनिया) कहते हैं। यह शब्द ‘लोक’ कहाँ लागू होता है?”
भगवान ने उत्तर दिया:
(“लुज्जती’ति लोके”) “जो टूट-टूटकर बिखरता है, उसे ही ‘लोक’ कहते हैं!
क्या टूट-टूटकर बिखरता है?
- आँख टूटकर बिखरती है। रूप टूटकर बिखरते हैं। आँख का विज्ञान टूटकर बिखरता है। आँख का संपर्क टूटकर बिखरता है। आँख के संपर्क से जैसी भी अनुभूति उत्पन्न हो—सुख, दर्द या नसुख-नदर्द—वह भी टूटकर बिखरती है।
- कान टूटकर बिखरते है। आवाज़े टूटकर बिखरती हैं। कान का विज्ञान टूटकर बिखरता है। कान का संपर्क टूटकर बिखरता है। कान के संपर्क से जैसी भी अनुभूति उत्पन्न हो—सुख, दर्द या नसुख-नदर्द—वह भी टूटकर बिखरती है।
- नाक टूटकर बिखरती है। गंध टूटकर बिखरती हैं। नाक का विज्ञान टूटकर बिखरता है। नाक का संपर्क टूटकर बिखरता है। नाक के संपर्क से जैसी भी अनुभूति उत्पन्न हो—सुख, दर्द या नसुख-नदर्द—वह भी टूटकर बिखरती है।
- जीभ टूटकर बिखरती है। स्वाद टूटकर बिखरते हैं। जीभ का विज्ञान टूटकर बिखरता है। जीभ का संपर्क टूटकर बिखरता है। जीभ के संपर्क से जैसी भी अनुभूति उत्पन्न हो—सुख, दर्द या नसुख-नदर्द—वह भी टूटकर बिखरती है।
- काया टूटकर बिखरती है। संस्पर्श टूटकर बिखरते हैं। काया का विज्ञान टूटकर बिखरता है। काया का संपर्क टूटकर बिखरता है। काया के संपर्क से जैसी भी अनुभूति उत्पन्न हो—सुख, दर्द या नसुख-नदर्द—वह भी टूटकर बिखरती है।
- मन टूटकर बिखरता है। स्वभाव टूटकर बिखरते हैं। मन का विज्ञान टूटकर बिखरता है। मन का संपर्क टूटकर बिखरता है। मन के संपर्क से जैसी भी अनुभूति उत्पन्न हो—सुख, दर्द या नसुख-नदर्द—वह भी टूटकर बिखरती है।
इस तरह, जो टूट-टूटकर बिखरता है, उसे ही ‘लोक’ कहते हैं।
—संयुक्तनिकाय ३५:८२
सब्बलोके अनभिरतिसञ्ञी
सभी लोक के प्रति निरस नज़रिया क्या है?
यदि साधक को किसी लोक (=कामलोक, ब्रह्मलोक) के प्रति आसक्ति हो, या उसके चित्त का स्थिराव, टिकाव, या झुकाव होता हो—तब उसे त्यागकर, वह अनासक्त रहता है।
यह सभी लोक के प्रति निरस नज़रिया कहलाता है।
सभी लोक के प्रति निरस नज़रिए की साधना करना, उसे विकसित करना—महाफलदायी, महालाभकारी होता है। वह अमृत में डुबोता है, अमृत में पहुँचाता है।
जब कोई सभी लोक के प्रति निरस नज़रिए में लीन रहे, तब सांसारिक चकाचौंध से उसका चित्त दूर सिकुड़ता है, विपरीत झुकता है, पीछे हटता है, खिंचा नहीं चला जाता; बल्कि तटस्थता या घिन-भाव में स्थित हो जाता है।
सफलता का पैमाना
जैसे, मुर्ग़े का पँख या स्नायु के टुकड़े को आग में डाल दिया जाए, तो वह दूर सिकुड़ता है, विपरीत झुकता है, पीछे हटता है, खिंचा नहीं चला जाता। उसी तरह, जब कोई सभी लोक के प्रति निरस नज़रिए में लीन रहे, तब सांसारिक चकाचौंध से उसका चित्त दूर सिकुड़ता है, विपरीत झुकता है, पीछे हटता है, खिंचा नहीं चला जाता; बल्कि तटस्थता या घिन-भाव में स्थित हो जाता है।
किंतु, यदि कोई ‘सभी लोकविश्व के प्रति निरस नज़रिए’ में लीन रहने पर भी, सांसारिक चकाचौंध से आकर्षित होता हो, या उसमें घिन-भाव उपस्थित न होता हो—तब उसे समझ लेना चाहिए कि ‘मैं सभी लोक के प्रति निरस नज़रिए को सही तरह से विकसित नहीं कर पाया हूँ। क्योंकि मुझ में क्रमानुसार बदलाव नहीं आया। मैंने इस साधना का फल नहीं पाया!’
इस तरह, वह सचेत हो जाए।
और, यदि कोई ‘सभी लोक के प्रति निरस नज़रिए’ में लीन रहे, और ‘सांसारिक चकाचौंध’ से उसका चित्त दूर सिकुड़ता है, विपरीत झुकता है, पीछे हटता है, खिंचा नहीं चला जाता; बल्कि तटस्थता या घिन-भाव में स्थित हो जाता है—तब उसे समझ लेना चाहिए कि ‘मैंने ‘सभी लोक के प्रति निरस नज़रिया’ विकसित कर लिया। क्योंकि मुझमें क्रमानुसार बदलाव आ गया। मैंने इस साधना का फल पा लिया!’
इस तरह, वह सचेत हो जाए।
सभी लोक के प्रति निरस नज़रिए की साधना करना, उसे विकसित करना—महाफलदायी, महालाभकारी होता है। वह अमृत में डुबोता है, अमृत में पहुँचाता है!”
—अंगुत्तरनिकाय १०:६० + ७:४६
उपनीयति लोको, अद्धुवो!
यह लोक बह जाता है!
बचता नहीं!
अताणो लोको, अनभिस्सरो!
यह लोक आश्रय नहीं देता!
बिना मालिक का है!
अस्सको लोको, सब्बं पहाय गमनीयं!
इस लोक में अपना कुछ नहीं!
सब छोड़कर जाना पड़ता है!
उनो लोको, अतित्तो, तण्हा दासो!
यह लोक पर्याप्त नहीं है!
अतृप्त रखता है!
तृष्णा का नौकर है!