कामेच्छा | दुर्भावना | सुस्ती-तंद्रा | बेचैनी-पश्चाताप | उलझन

कामुकता में लिप्त होना, भीतरी भूख मिटाने का एक सस्ता उपाय है।
मानव चेतना में समय-समय पर एक प्रकार का दुःख, निराशा और रिक्तता भरने लगती है। हृदय भीतर से सूखा, नीरस और बेजान महसूस करता है। ऐसे क्षणों में भीतर कोई पुकार उठती है—एक सुखद अनुभूति की, जो उस शुष्कता को भिगो सके, उस जीवंतता को लौटा सके। यह पुकार, यह भूख बहुत वास्तविक है।
जैसे एक भूखा व्यक्ति तड़पकर रास्ते में कोई भी सस्ता और तत्काल फास्ट-फूड निगल लेता है, जबकि एक सजग व्यक्ति संयम से घर में बनाए जा रहे सात्विक भोजन की प्रतीक्षा करता है। उसी तरह, इस आंतरिक भूख को क्षणिक इंद्रिय-भोगों से मिटाया जा सकता है, या फिर ध्यान और एकाग्रता जैसे सात्विक साधनों से भी शान्त किया जा सकता है। चूँकि ध्यान साधना में धीरज और संकल्प लगता है, अधिकतर लोग कामुकता का आसान विकल्प चुन लेते हैं।
कामुकता हमें तत्काल सुख का भ्रम देती है। वह उस सूखेपन को कुछ पल के लिए भिगो तो देती है, लेकिन हम भूल जाते हैं कि यह कोई समाधान नहीं—यह महज़ एक आत्मविस्मृति है। नशा उतरते ही वह सूखापन और अधिक तीव्र होकर लौटता है।
जो व्यक्ति जितना कामुकता में डूबता है, उसकी संवेदनाएँ उतनी ही मरती जाती हैं। उसका चित्त सूक्ष्म से गिरकर इतना स्थूल हो जाता है कि एक समय बाद उसे साधारण जीवन नीरस और बेजान लगने लगता है। तब और मज़ा निचोड़ने के लिए वह घिनौने कर्मों और नशे की दलदल में उतर जाता है।
काम-वासना एक अभिशाप है। यह एक हल्की आदत बनती है, फिर लत, और अंततः एक ऐसा अंधा कारागार जहाँ व्यक्ति अपना नियंत्रण पूरी तरह खो बैठता है। उसकी प्रेरणा, प्रवृत्ति, विवेक—सब वासना की धुंध में दम तोड़ देते हैं। इस अंधेरे में किए गए कर्म वह किसी से बाँट नहीं सकता, और एकांत में खुद से आँखें नहीं मिला पाता। वे कृत्य, वे स्मृतियाँ—ज़िंदगी भर प्रेत की तरह पीछा करती हैं, भीतर ही भीतर धिक्कारती हैं।
धीरे-धीरे व्यक्ति अपनी ही नज़रों में गिरने लगता है। जब आत्म-सम्मान बिखरता है, तो आत्म-विश्वास भी मर जाता है। जिसे खुद पर ही भरोसा नहीं रहा, वह दूसरों पर भला क्या विश्वास करेगा? कामुक विचार उठते ही वह गुलाम जैसा महसूस करते हुए असहाय हो जाता है। उसे पता होता है कि यह पतन उसकी अपनी रज़ामंदी से हो रहा है, यह तत्काल सुख उसे दुखों में धकेल देगा—फिर भी वह खुद को रोक नहीं पाता। यह निरंतर हार धीरे-धीरे ‘आत्मघृणा’ में बदल जाती है। और जो खुद से नफरत करता है, वह समय के साथ दूसरों के प्रति आक्रोश और ज़हर से भर जाता है।
वास्तव में, आकर्षण और नफरत—दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जिस ऊर्जा से कामुक उत्तेजना उठती है, उसी के कुंठित होने पर क्रोध, द्वेष और घृणा जन्म लेते हैं। इसीलिए जब कोई इसे ज़बरदस्ती दबाने या कुचलने की कोशिश करता है, तो यह भीतर ही भीतर विद्रोह कर उठती है।
लेकिन जो धैर्यवान व्यक्ति प्रज्ञा की आँख से इस ऊर्जा को आर-पार देखता है—जो आकर्षण के मूल स्रोत को देख पाता है, प्रलोभन की क्षणभंगुरता को पहचानता है, और यह जान लेता है कि उससे कहीं अधिक स्थायी, शांत और गहन सुख उपलब्ध है—वही इस ज़ंजीर को तोड़ सकता है।
भगवान बुद्ध ने इस छलावे को तीन हिस्सों में बेनकाब किया है:
- अस्साद (प्रलोभन): वह क्षणिक सुख जो हमें लुभाता है।
- आदीनव (दुष्परिणाम): उस सुख के पीछे छिपा हुआ खौफनाक दुःख और पतन।
- निस्सरण (निकास): इस दलदल से हमेशा के लिए बाहर निकलने का मार्ग।
आइए, इस बंधन को तोड़ने के उपाय स्वयं भगवान के मुख से सुनें।
एक समय भगवान शाक्यों के साथ कपिलवस्तु में बरगद-विहार में रह रहे थे।
तब (चचेरा भाई) महानाम शाक्य भगवान के पास गया, और अभिवादन कर एक-ओर बैठ गया। एक-ओर बैठकर महानाम शाक्य ने भगवान से कहा—
“भन्ते, मैं भगवान के द्वारा दीर्घकाल तक सिखाएँ धम्म को इस तरह जानता हूँ कि
- ‘लोभ चित्त का दूषण होता है,
- द्वेष चित्त का दूषण होता है,
- भ्रम (“मोह”) चित्त का दूषण होता है।’
इस तरह, मैं यह सब समझता हूँ! तब भी, कभी-कभी मेरे चित्त में लोभ स्वभाव, द्वेष स्वभाव, या भ्रम स्वभाव घुस कर बैठ जाता है।
तब, मैं सोचता हूँ कि ‘आख़िर कौन-सा धम्म अब तक मेरे भीतर से छूटा नहीं, जिसकी वजह से कभी-कभी मेरे चित्त में ‘लोभ, द्वेष और भ्रम’ घुसकर बैठ जाता है?”
(भगवान ने उत्तर दिया)
“महानाम! वे (लोभ, द्वेष और भ्रम) ही हैं, जो तुम्हारे भीतर से छूटे नहीं, जिसकी वजह से कभी-कभी तुम्हारे चित्त में लोभ स्वभाव, द्वेष स्वभाव, या भ्रम स्वभाव घुस कर बैठ जाता है। क्योंकि यदि वे तुम्हारे भीतर से छूटे चुके होते, तो तुम आज गृहस्थी-जीवन न जीते और कामभोग न करते।
चूँकि, वे ही तुम्हारे भीतर से छूटे नहीं हैं, इसलिए आज तुम गृहस्थी-जीवन जीते हो और कामभोग भी करते हो।
काम अस्साद
और, काम का प्रलोभन क्या हैं?
ये पाँच कामगुण होते हैं—
- आँख से दिखायी देते रूप, जो अच्छे, सुंदर, मनपसंद, आकर्षक, कामुक, ललचाते हो।
- कान से सुनायी देती आवाज़े, जो अच्छी, मोहक, मनपसंद, आकर्षक, कामुक, ललचाती हो।
- नाक से सुँघाई देती गन्ध, जो अच्छी, मोहक, मनपसंद, आकर्षक, कामुक, ललचाती हो।
- जीभ से पता चलते स्वाद, जो अच्छे, मोहक, मनपसंद, आकर्षक, कामुक, ललचाते हो।
- काया से पता चलते संस्पर्श, जो अच्छे, मोहक, मनपसंद, आकर्षक, कामुक, ललचाते हो।
अब, जो भी सुख और सौमनस्य इन पाँच कामगुण के आधार पर उत्पन्न होती है, वही काम का प्रलोभन है।
काम आदीनव
और, काम का दुष्परिणाम क्या है?
- ऐसा होता है कि कोई कुलपुत्र कोई कार्य कर के जीविका कमाता है—चाहे खेती, व्यवसाय, पशुपालन, तीरंदाजी, सरकारी कामकाज, अथवा कोई शिल्पकारी हो। उसे जीविका कमाते समय—
- ठंडी लगती है, गर्मी लगती है, मक्खियाँ, मच्छर, पवन, धूप, बिच्छु, साँप आदि के संस्पर्श से परेशान होता है। भूख-प्यास से मरता हुआ, वह अपनी जीविका कमाता है।
—यह दुष्परिणाम, यह दुःखों की गठरी, जो इस जीवन में दिखती है, उसका कारण काम है, उसका स्त्रोत काम है, वह काम के परिणामस्वरूप है, जिसकी वजह केवल काम है।
- अब, यदि कोई कुलपुत्र अपनी मेहनत से, कार्यशीलता से, प्रयास से, बाहों के बल से, पसीना बहाकर भोगसंपदा प्राप्त न कर पाए—
- तो वह अफ़सोस करता है, ढ़ीला पड़ता है, विलाप करता है, छाती पीटता है, बावला हो जाता है, “हाय! मेरी सारी मेहनत पानी में गई! सारा परिश्रम व्यर्थ गया!”
—यह दुष्परिणाम, यह दुःखों की गठरी, जो इस जीवन में दिखती है, उसका कारण भी काम है, उसका स्त्रोत भी काम है, वह काम के परिणामस्वरूप ही है, जिसकी वजह केवल काम है।
- अब, यदि कोई कुलपुत्र अपनी मेहनत से, कार्यशीलता से, प्रयास से, बाहों के बल से, पसीना बहाकर भोगसंपदा प्राप्त करें—
- तब उसकी रक्षा करते हुए, उसे पीड़ा और व्यथा होती है, “कही मेरी इस भोगसंपदा को सरकार या चोर न लूट लें, या आग न जला दे, या बाढ़ न बहा दे, या निकम्मा वारिस न बर्बाद कर दे!”
—यह दुष्परिणाम, यह दुःखों की गठरी, जो इस जीवन में दिखती है, उसका कारण भी काम है, उसका स्त्रोत भी काम है, वह काम के परिणामस्वरूप ही है, जिसकी वजह केवल काम है।
- अब, यदि कोई कुलपुत्र अपनी भोगसंपदा की रक्षा करते हुए देखता है कि उसकी भोगसंपदा को सरकार या चोर लूट लेती है, या आग जला देती है, या बाढ़ बहा देती है, या निकम्मा वारिस बर्बाद कर देता है,
- तो वह अफ़सोस करता है, ढ़ीला पड़ता है, विलाप करता है, छाती पीटता है, बावला हो जाता है, “हाय! जो मेरा था, अब नहीं रहा!’
—यह दुष्परिणाम, यह दुःखों की गठरी, जो इस जीवन में दिखती है, उसका कारण भी काम है, उसका स्त्रोत भी काम है, वह काम के परिणामस्वरूप ही है, जिसकी वजह केवल काम है।
- और, काम के कारण, काम के स्त्रोत से, काम के परिणामस्वरूप, जिसकी वजह केवल काम ही है कि—
- राजा राजा से लड़ता है, क्षत्रिय क्षत्रिय से लड़ता है, ब्राह्मण ब्राह्मण से लड़ता है, (वैश्य) गृहस्थ गृहस्थ से लड़ता है,
- माँ पुत्र से लड़ती है, पुत्र माँ से लड़ता है, बाप पुत्र से लड़ता है, पुत्र बाप से लड़ता है, भाई भाई से लड़ता है, भाई बहन से लड़ता है, बहन भाई से लड़ती है, बहन बहन से लड़ती है, और मित्र मित्र से लड़ता है।
- और, तब वे लड़ते, झगड़ते, विवाद करते हुए एक-दूसरे पर हाथ उठाते हैं, पत्थर उठाते हैं, डंडा, छुरी या शस्त्र से हमला करते हैं।
- और तब, इस कलह में मौते होती है, या मौत जैसी पीड़ा होती है।
—यह दुष्परिणाम, यह दुःखों की गठरी, जो इस जीवन में दिखती है, उसका कारण भी काम है, उसका स्त्रोत भी काम है, वह काम के परिणामस्वरूप ही है, जिसकी वजह केवल काम है।
- और, काम के कारण, काम के स्त्रोत से, काम के परिणामस्वरूप, जिसकी वजह केवल काम ही है कि लोग हाथों में ढ़ाल और तलवार पकड़े, धनुष में तीर चढ़ाकर, दोनों-ओर से व्यूहसंस्कृत युद्ध में आक्रमण करते हुए दौड़ पड़ते हैं।
- और वहाँ तीर व भालें उड़ते हैं, तलवारें चमकती हैं, तीर और भाले बींधते हुए लोगों को घायल करते हैं, तलवारों से सिर काटे जाते हैं।
- और तब, इस युद्ध में मौते होती है, या मौत जैसी पीड़ा होती है।
—यह दुष्परिणाम, यह दुःखों की गठरी, जो इस जीवन में दिखती है, उसका कारण भी काम है, उसका स्त्रोत भी काम है, वह काम के परिणामस्वरूप ही है, जिसकी वजह केवल काम है।
- और, काम के कारण, काम के स्त्रोत से, काम के परिणामस्वरूप, जिसकी वजह केवल काम ही है कि लोग हाथों में ढ़ाल और तलवार पकड़े, धनुष में तीर चढ़ाकर, ऊँचे फ़िसलनभरे किल्लों पर आक्रमण करते हुए दौड़ पड़ते हैं।
- और वहाँ तीर व भालें उड़ते हैं, तलवारें चमकती हैं, तीर और भाले बींधते हुए लोगों को घायल करते हैं,
- ऊपर से उबलता हुआ गर्म ग़ोबर गिराया जाता है, भारी चट्टान गिराकर कुचला जाता है, तलवारों से सिर काटे जाते हैं।
- और तब, इस युद्ध में मौते होती है, या मौत जैसी पीड़ा होती है।
—यह दुष्परिणाम, यह दुःखों की गठरी, जो इस जीवन में दिखती है, उसका कारण भी काम है, उसका स्त्रोत भी काम है, वह काम के परिणामस्वरूप ही है, जिसकी वजह केवल काम है।
और, काम के कारण, काम के स्त्रोत से, काम के परिणामस्वरूप, जिसकी वजह केवल काम ही है कि लोग खिड़कियाँ तोड़कर चोरी करते हैं, लूटते हैं, डाका डालते हैं, मार्ग पर घात लगाते हैं, व्यभिचार करते हैं।
और, जब उन्हें गिरफ्तार किया जाता है तो सरकार उन्हें दंडस्वरूप तरह-तरह से यातनाएँ देती है, जैसे—
- चाबुक़ से पीटती है, कोड़े लगाती है, मुग्दर, बेंत या डंडे से पीटती है।
- हाथ काट देती है, पैर काट देती है, हाथ और पैर दोनों काट देती है।
- कान काट देती है, नाक काट देती है, कान और नाक दोनों काट देती है।
- खोपड़ी निकालकर गर्म लोहा डाल देती है।
- सिर की चमड़ी उतार कर खोपड़ी को कंकड़ों से रगड़ती है।
- चिमटे से मुँह खुलवा कर भीतर अँगारें या दीपक जला देती है।
- शरीर पर तेलबत्ती लपेट कर आग लगा देती है।
- हाथ पर तेलबत्ती लपेट कर आग लगा देती है।
- गले से कलाई तक की चमड़ी खींचकर उतार देती है।
- गले से कुल्हे तक की चमड़ी भी खींचकर उतार देती है।
- कोहनियों और घुटनों में खूँटा ठोक कर जमीन पर लिटा देती है।
- दोनों-ओर से नुक़िले काँटे घुसेड़ कर चमड़ी, माँस और नसें नचोट लेती है।
- सारे शरीर की चमड़ी को सिक्के-सिक्के भर छिलवा देती है।
- शरीर को पीट-पीटकर उस पर कंघी फेरती है, एक-करवट लिटाकर कानों में खूँटा गाड़ देती है।
- चमड़ी को बिना हानि पहुँचाये भीतर हड्डी पीस देती है।
- उबलता हुआ तेल डालती है।
- कुत्तों द्वारा नोच-नोचकर उनका भोजन बना देती है।
- खूँटी घुसाकर सूली पर लटका देती है।
- और तलवार से सिर काट देती है।
- और तब, इसमें मौते होती है, या मौत जैसी पीड़ा होती है।
—यह दुष्परिणाम, यह दुःखों की गठरी, जो इस जीवन में दिखती है, उसका कारण भी काम है, उसका स्त्रोत भी काम है, वह काम के परिणामस्वरूप ही है, जिसकी वजह केवल काम है।
- और आगे, काम के कारण, काम के स्त्रोत से, काम के परिणामस्वरूप, जिसकी वजह केवल काम ही है कि लोग काया से दुराचार करते हैं, वाणी से दुराचार करते हैं, मन से दुराचार करते हैं।
- और दुराचार में लिप्त होकर मरणोपरांत पतन होकर यातनालोक नर्क में उपजते हैं।
—यह दुष्परिणाम, यह दुःखों की गठरी, जो अगले जीवन में दिखती है, उसका कारण भी काम है, उसका स्त्रोत भी काम है, वह काम के परिणामस्वरूप ही है, जिसकी वजह केवल काम है।
काम निस्सरण
और, काम से बाहर निकलने का मार्ग क्या है?
काम के प्रति छन्द और राग को हटा देना, उसे त्याग देना—यही काम से बाहर निकलने का मार्ग है।
अब, कोई श्रमण या ब्राह्मण—जो ‘काम-प्रलोभन’ को प्रलोभन न समझता हो, ‘काम-दुष्परिणाम’ को दुष्परिणाम न समझता हो, ‘काम-निकास’ को निकास न समझता हो—वह स्वयं कामुकता को समझ पाएगा या दूसरों को समझा पाएगा—यह असंभव है!
किन्तु, जो श्रमण या ब्राह्मण—‘काम-प्रलोभन’ को प्रलोभन समझता हो, ‘काम-दुष्परिणाम’ को दुष्परिणाम समझता हो, ‘काम-निकास’ को निकास समझता हो—वह स्वयं कामुकता को समझ पाएगा या दूसरों को समझा पाएगा—यह संभव है!
मार का चारा
कामुकता अनित्य है, तुच्छ है, झूठी है, धोखाधड़ी है। यह माया (=छल) से बना, मूर्खों का आलाप है।
वर्तमान जीवन की कामुकता हो, या अगले जीवन की कामुकता; वर्तमान जीवन की कामुक संज्ञा हो, या अगले जीवन की कामुक संज्ञा—दोनों मार के प्रभुत्व, मार की सत्ता, मार का डाला चारा, मार का परिसर (“गोचर”) है।
इसी पापकारी अकुशल मानस से लालसा, दुर्भावना और कलह उत्पन्न होती है। वह किसी आर्यश्रावक के धम्म सीखने में अवरोध लाते हैं।
तब, कोई आर्यश्रावक इस प्रकार चिंतन करता है—‘क्यों न मैं दृढ़-संकल्प से इस लोक को हराकर, विस्तृत और विराट मानस के साथ विहार करूँ? क्योंकि… तब जो पापकारी अकुशल मानस से लालसा, दुर्भावना और कलह होती है, वह नहीं होगी। उन्हें त्यागने पर मेरा चित्त असीम और अपरिमित होकर सुविकसित हो जाएगा।’
तब इस प्रकार साधना करते हुए, इसे विकसित कर विहार करते हुए, उस आयाम में उनका चित्त आश्वस्त होता है। आश्वस्त होने पर, वे अविचलता को प्राप्त करते हैं, अथवा प्रज्ञा से मुक्त होते हैं।
अपने संकल्प के प्रति राग
ही पुरुष की कामुकता है।
न कि दुनिया में पाए जानेवाली
चित्र-विचित्र कामुकताएँ।
अपने संकल्प के प्रति राग
ही पुरुष की कामुकता है।
दुनिया की चित्र-विचित्रता जैसी हो,
वैसी ही पड़ी रहती है।
ज्ञानी उनके प्रति मात्र अपने
छन्द को खत्म कर देता है।— अंगुत्तरनिकाय ६:६३
इसी बात को ज़फ़र इक़बाल कुछ इस तरह कहते हैं:
हुस्न उस का उसी मक़ाम पे है
ये मुसाफ़िर सफ़र नहीं करता।
कामेच्छा पर सर्जिकल स्ट्राइक
अनुत्पन्न कामेच्छा को उत्पन्न करने, और उत्पन्न हुई कामेच्छा को बढ़ाकर अत्याधिक करने का आहार क्या है?
काया का आकर्षक पहलू होता है—उस पर अनुचित चिंतन (“अयोनिसो मनसिकार” =अनुचित तरह से ध्यान देना) आहार बनता है अनुत्पन्न कामेच्छा उत्पन्न होने और उत्पन्न हुई कामेच्छा बढ़कर अत्याधिक होने का।
किन्तु, काया का अनाकर्षक पहलू (“असुभ निमित्त”) होता है—उस पर उचित चिंतन (“योनिसो मनसिकार”) भूखा रखना (“अनाहार” या उपवास करवाना) होता है अनुत्पन्न कामेच्छा उत्पन्न होने और उत्पन्न हुई कामेच्छा बढ़कर अत्याधिक होने का।
— संयुत्तनिकाय ४६:५१ : आहार सुत्त
कामेच्छा का मनोविज्ञान
भगवान बुद्ध वासना को किसी ‘रहस्यमयी बुरी ताकत’ की तरह नहीं देखते, बल्कि एक सीधी वैज्ञानिक प्रक्रिया की तरह देखते हैं। जैसा कि हमने अंगुत्तरनिकाय (६:६३) में पढ़ा कि कामुकता बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि हमारे भीतर के ‘संकल्प’ और ‘राग’ में है।
जैसे आग बिना ईंधन के नहीं जल सकती, वैसे ही वासना बिना ‘आहार’ के ज़िंदा नहीं रह सकती।
आहार (ईंधन और खुराक)
वासना कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है; यह एक परजीवी पेरेसाईट है जो आपके ही भीतर पलती है। इसका आहार (भोजन) क्या है?
जब हम किसी काया के सिर्फ ‘आकर्षक हिस्से’ (सुभ निमित्त)—जैसे चिकनी चमड़ी, बनावट, या बाहरी सजावट—को देखते हैं, तो हम अनजाने में इस परजीवी के मुँह में भोजन डाल रहे होते हैं। आकर्षण स्वयं में वासना नहीं है, लेकिन जब हमारा मन उस आकर्षण पर टिक कर उसे चबाने लगता है, तो वासना को अपनी खुराक मिल जाती है।
अयोनिसो मनसिकार (अनुचित चिंतन)
वासना को भोजन खिलाने वाले इस अंधेरे हाथ का नाम है—‘अनुचित चिंतन’। इसका मतलब है चीज़ों को उथलेपन से देखना, उनके केवल बाहरी छिलके पर मोहित हो जाना। जब चित्त उस आकर्षक छिलके के भीतर की सच्चाई को नज़रअंदाज़ करके, केवल उसके सुखद पहलुओं की कल्पनाओं में गोते लगाने लगता है, तो यह ‘अनुचित चिंतन’ वासना की आग में घी का काम करता है। जो वासना अभी पैदा नहीं हुई थी, वह पैदा हो जाती है; और जो पैदा हो चुकी थी, वह भयंकर रूप से भड़क उठती है।
उचित चिंतन (योनिसो मनसिकार)
यह वासना की आग पर पानी नहीं, बल्कि उसकी प्राणवायु काटने की कला है। ‘योनिसो मनसिकार’ का अर्थ है चीज़ों को इस तरह देखना कि आस्रव कम होने लगे। जब आँखें किसी काया को देखती हैं, तो उचित चिंतन वहीं नहीं रुकता। वह चमड़ी के नीचे उतरता है, नश्वरता को देखता है, और काया की अनाकर्षक पहलू (अशुभ निमित्त) को नंगा कर देता है। यह सत्य को उसके सबसे क्रूर, लेकिन सबसे पवित्र रूप में देखने का साहस है।
अनाहार (भूखा मारना)
आप किसी राक्षस को कैसे मारते हैं? उससे लड़कर नहीं, बल्कि उसकी खुराक बंद करके।
जब ‘उचित चिंतन’ काया की असलियत (अशुभ निमित्त) को सामने रख देता है, तो कामेच्छा को अपना पसंदीदा भोजन (आकर्षण और कल्पनाएँ) मिलना बंद हो जाता है। राग-रंजीत चित्त छटपटाता है, वह अपनी पुरानी खुराक माँगता है, लेकिन प्रज्ञा उसे केवल और केवल यथार्थ परोसती है। वासना को इसी तरह जानबूझकर ‘भूखा रखना’ (अनाहार) पड़ता है। बिना खुराक के, यह तड़पती है, चीखती है, और अंततः एक दिन कुपोषण से अपनी मौत खुद मर जाती है।
मन का चीत्कार!
शायद यह सब सुनकर आपके भीतर एक गहरा भय पैदा हो रहा हो। मन चीख कर कह सकता है कि “यह तो कोरा सूखापन है! यह तो अति है, प्रकृति के विरुद्ध है। इस तरह खुद को हमेशा के लिए भूखा रखना तो एक भयंकर यातना है… यह मुझसे नहीं हो पाएगा।”
अगर आपका चित्त भी यही दलील दे रहा है, तो ज़रा ठहरिए। भगवान बुद्ध का मार्ग केवल आपसे कुछ छीनने या आपको तड़पाने का मार्ग नहीं, बल्कि मध्यम मार्ग है। हमने अभी आधी तस्वीर देखी है—केवल ज़हर को रोकने का पहलू।
एक भूखे चित्त को आप अनंतकाल तक केवल ‘उपवास’ के सहारे ज़िंदा नहीं रख सकते। यदि आप उससे नाली का गंदा पानी छीन रहे हैं, तो उसकी प्यास बुझाने के लिए कोई निर्मल और मीठा झरना भी तो देना होगा! यदि वासना का सड़ा-गला भोजन छीना जा रहा है, तो चित्त को तृप्त करने के लिए एक अत्यंत शुद्ध, सात्विक और अतींद्रिय आहार भी चाहिए।
और यहीं से इस यात्रा का दूसरा—और सबसे भव्य—अध्याय शुरू होता है: सुख के लिए तड़पते चित्त को ‘ध्यान-सुख’ का वह असीम आहार परोसना, जिसके सामने दुनिया भर की कामुकता धूल के समान उड़ जाती है।
जब हम कामुकता के इन खौफनाक दुष्परिणामों को देख लेते हैं, तो प्रश्न उठता है कि फिर इससे बाहर कैसे निकला जाए? वासना को दाँत भींचकर कुचलना या दबाना कोई उपाय नहीं है।
भगवान हमें बताते हैं कि इस ज़ंजीर को काटने का केवल एक ही अस्त्र है। जब किसी के जीवन में इंद्रिय-सुखों से कहीं अधिक उत्कृष्ट और बेदाग ‘ध्यान-सुख’ उतरता है—जो चित्त की मैल को धो डाले, एकाग्रता को पत्थर सा स्थिर कर दे, और प्रज्ञा को सर्वोच्च ऊँचाई पर ले जाए—केवल तब उस व्यक्ति के पास यह अवसर होता है कि वह इस निर्मल सुख को अपना आधार बनाकर कामुकता की दलदल से खुद को हमेशा के लिए बाहर खींच सके।
सारिपुत्त भंते:
मित्रों, कोई व्यक्ति होता है, जब कामुकता पर गौर करता है, तब उसका चित्त कामुकता के लिए न उछलता है, न खिलता है, न ठहरता है, न ही आज़ादी महसूस करता है।
किन्तु जब वह निष्काम (=कामुकता से संन्यास) पर गौर करता है, तब उसका चित्त निष्काम के लिए उछलता है, खिलता है, ठहरता है, आज़ादी महसूस करता है।
तब, उसका चित्त अच्छी अवस्था में है! अच्छे से विकसित है! अच्छे से उठा हुआ है! अच्छे से विमुक्त है! कामुकता में संलग्न नहीं है!
तब कामुकता के वजह से उपजने वाले जो आस्रव है—बर्बाद करने वाले, तड़पाने वाले—वह उनसे मुक्त होता है! उस वेदना को महसूस नहीं करता! इसे ही कामुकता से बच निकलना बताया जाता है।
यही वह इकलौता मार्ग है जिस पर चलकर स्वयं भगवान ने इस वासना पर विजय पाई थी। अतीत में जितने भी लोग इस खौफनाक बंधन से आज़ाद हुए, वे इसी रास्ते से गुज़रे। भविष्य में जो इस ज़ंजीर को तोड़ेंगे, वे भी इसी पर चलेंगे। और आज जो इस अंधेरी कोठरी से बाहर निकल रहे हैं, वे भी इसी राह पर हैं।
जब यह ‘ध्यान-सुख’ हमारे एक इशारे पर हाज़िर होने लगता है, तो कामेच्छा की ज़हरीली पकड़ खुद-ब-खुद ढीली पड़ने लगती है। पहले वासना के स्थूल रूप दम तोड़ते हैं, फिर सूक्ष्म, और अंततः सूक्ष्मतम इच्छाएं भी चित्त को पार कर हमेशा के लिए शांत हो जाती हैं। तब साधक के भीतर सन्नाटे और शांति का एक अथाह सागर लहराने लगता है।
और चमत्कार देखिए—जब कामुकता जड़ से उखड़ती है, तो केवल कामुकता का बंधन ही नहीं टूटता; उसके साथ-साथ पलने वाला क्रोध, द्वेष, घृणा और मानसिक विक्षोभ भी बिना आवाज़ किए लुप्त हो जाते हैं। इसके लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता। यही बुद्ध का सहज, मौन समाधान है—जहाँ वासना का गला नहीं घोंटा जाता, दमन नहीं होता, बल्कि केवल एक गहरी समझ और एक निर्मल साक्षी भाव होता है।
यही वह परम क्षण है जब साधक “अनागामी” (तीसरा आर्यफल) की अवस्था को प्राप्त करता है। वहाँ से वह फिर कभी इस काम-लोक की गंदगी में वापस नहीं लौटता। उसकी यात्रा अब केवल ऊपर की ओर होती है—पूर्णतः निर्मल, निर्विकार और शुद्धतम ब्रह्म चेतना की दिशा में।
आइए, इस ‘ध्यान-सुख’ की महिमा स्वयं भगवान के वचनों में सुनें।
‘कामुकता अल्प-संतोषी है, लेकिन बहुत दुःखदायी और बहुत निराशाजनक है, जिसके दुष्परिणाम भरपूर हैं’—इस तरह, भले ही कोई आर्यश्रावक सम्यक प्रज्ञा से यथास्वरूप अच्छे से देख ले; किन्तु फिर भी जब तक वह कामुकता के अलावा, अकुशल धम्म के अलावा, (कुशल) प्रीति और सुख, या उससे अधिक शान्ति को पा नहीं लेता—वह कामुकता पर लौट सकता है। 1
किन्तु, जब कोई आर्यश्रावक सम्यक प्रज्ञा से यथास्वरूप अच्छे से देख लेता है कि ‘कामुकता अल्प-संतोषी है, लेकिन बहुत दुःखदायी और बहुत निराशाजनक है, जिसके दुष्परिणाम भरपूर हैं’—और, वह कामुकता के अलावा, अकुशल धम्म के अलावा, प्रीति और सुख को पा लेता है, या उससे अधिक शान्ति को—तब वह कामुकता पर नहीं लौटता है।
मैं भी, जब संबोधि पूर्व केवल एक अ-जागृत बोधिसत्व था, सम्यक प्रज्ञा से यथास्वरूप अच्छे से देख लिया था कि ‘कामुकता अल्प-संतोषी है, लेकिन बहुत दुःखदायी और बहुत निराशाजनक है, जिसके दुष्परिणाम भरपूर हैं’—किन्तु जब तक कामुकता के अलावा, अकुशल धम्म के अलावा, प्रीति और सुख को पा नहीं लिया, या उससे अधिक शान्ति को—मैंने कामुकता पर न लौटने का दावा नहीं किया।
हालाँकि, जब मैंने सम्यक प्रज्ञा से यथास्वरूप अच्छे से देख लिया कि ‘कामुकता अल्प-संतोषी है, लेकिन बहुत दुःखदायी और बहुत निराशाजनक है, जिसके दुष्परिणाम भरपूर हैं’—और, कामुकता के अलावा, अकुशल धम्म के अलावा, प्रीति और सुख को पा लिया, या उससे अधिक शान्ति को— तब मैंने कामुकता पर न लौटने का दावा किया।
कामसुख बनाम ध्यानसुख
पाँच कामगुण होते हैं—
- आँख से दिखायी देते रूप, जो अच्छे, सुंदर, मनपसंद, आकर्षक, कामुक, ललचाते हो।
- कान से सुनायी देती आवाज़े, जो अच्छी, मोहक, मनपसंद, आकर्षक, कामुक, ललचाती हो।
- नाक से सुँघाई देती गन्ध, जो अच्छी, मोहक, मनपसंद, आकर्षक, कामुक, ललचाती हो।
- जीभ से पता चलते स्वाद, जो अच्छे, मोहक, मनपसंद, आकर्षक, कामुक, ललचाते हो।
- काया से पता चलते संस्पर्श, जो अच्छे, मोहक, मनपसंद, आकर्षक, कामुक, ललचाते हो।
इन पाँच कामगुणों के आधार पर जो भी सुख और सौमनस्य उत्पन्न होता है—उसे ‘कामसुख’ कहते हैं, ‘घिनौना सुख’ कहते हैं, ‘जन-साधारण सुख’ कहते हैं, ‘अनार्य सुख’ कहते हैं, जिसका सेवन नहीं करना चाहिए, साधना नहीं चाहिए, विकसित नहीं करना चाहिए ।
बल्कि, मैं कहता हूँ, ‘उस सुख से भयभीत होना चाहिए!’
कोई कहता हैं, ‘बस यही (कामुक सुख) परम सुख और सौमनस्य है, जिसकी सत्व अनुभूति करते हैं।’ किन्तु, मैं सहमत नहीं हूँ। ऐसा क्यों?
क्योंकि, इस सुख के बजाय दूसरा सुख उससे बेहतर है, उससे उत्कृष्ठ है। वह कौन सा सुख है, जो इस सुख के बजाय ज्यादा बेहतर है, ज्यादा उत्कृष्ठ है?
चार ध्यान सुख
- कोई भिक्षु कामुकता से विलग, अकुशल-स्वभाव से विलग होकर—वितर्क और विचार सहित, विलगता से जन्मे प्रीति और सुख वाले प्रथम-ध्यान में प्रवेश कर विहार करता है। यह सुख, इस (काम) सुख के बजाय ज्यादा बेहतर है, ज्यादा उत्कृष्ठ है।
—इसे ‘निष्काम सुख’ कहते हैं, ‘विलग सुख’ कहते हैं, ‘प्रशांति सुख’ कहते हैं, ‘संबोधि सुख’ कहते हैं, जिसका सेवन करना चाहिए, साधना करनी चाहिए, विकसित करना चाहिए ।
मैं कहता हूँ, ‘उस सुख से भयभीत नहीं होना चाहिए!’ 2
तब, कोई कहता हैं, ‘बस यही (प्रथम-ध्यान सुख) परम सुख और सौमनस्य है, जिसकी सत्व अनुभूति करते हैं।’
किन्तु, उससे भी मैं सहमत नहीं हूँ। ऐसा क्यों? क्योंकि, इस भी सुख के बजाय दूसरा सुख उससे बेहतर है, उससे उत्कृष्ठ है। वह कौन सा सुख है, जो इस सुख के बजाय ज्यादा बेहतर है, ज्यादा उत्कृष्ठ है?
- आगे, कोई भिक्षु वितर्क और विचार के थमने पर, भीतर से आश्वस्त हुआ मानस एकरस होकर—बिना-वितर्क बिना-विचार के, समाधि से जन्मे प्रीति और सुख वाले द्वितीय-ध्यान में प्रवेश कर विहार करता है। यह सुख, इस (प्रथम झान) सुख के बजाय ज्यादा बेहतर है, ज्यादा उत्कृष्ठ है… इसे ‘निष्काम सुख’ कहते हैं… ‘उस सुख से भयभीत नहीं होना चाहिए!’
- आगे, कोई भिक्षु प्रीति से विरक्त हो जाता है, और उपेक्षा के साथ स्मृतिवान और सचेत होकर शरीर से सुख महसूस करता है। जिसे आर्यजन ‘उपेक्षक, स्मृतिमान, सुखविहारी’ कहते हैं—वह उस तृतीय-ध्यान में प्रवेश कर विहार करता है। यह सुख, इस (द्वितीय झान) सुख के बजाय ज्यादा बेहतर है, ज्यादा उत्कृष्ठ है… इसे ‘निष्काम सुख’ कहते हैं… ‘उस सुख से भयभीत नहीं होना चाहिए!’
- आगे, कोई भिक्षु सुख और दुःख के त्याग से, तथा सौमनस्य और दौमनस्य के पहले ही मिट जाने के कारण—वह न सुख, न दुःख वाली, तथा उपेक्षा और स्मृति की शुद्धता से युक्त चतुर्थ-ध्यान में प्रवेश कर विहार करता है। यह सुख, इस (तृतीय झान) सुख के बजाय ज्यादा बेहतर है, ज्यादा उत्कृष्ठ है… इसे ‘निष्काम सुख’ कहते हैं… ‘उस सुख से भयभीत नहीं होना चाहिए!’
चार अरूप आयाम सुख
- आगे, कोई भिक्षु रूप-संज्ञा को पूर्णतः लाँघ कर, प्रतिघात-संज्ञा के अस्त होने पर, विविध संज्ञा पर ध्यान न देकर—‘आकाश अनन्त है’ (अनुभव करते हुए) ‘अनन्त आकाश आयाम’ में प्रवेश कर विहार करता है। यह सुख, इस (चतुर्थ झान) सुख के बजाय ज्यादा बेहतर है, ज्यादा उत्कृष्ठ है… इसे ‘निष्काम सुख’ कहते हैं… ‘उस सुख से भयभीत नहीं होना चाहिए!’
- आगे, कोई भिक्षु अनन्त आकाश आयाम पूर्णतः लाँघकर, ‘विज्ञान अनन्त है’ (अनुभव करते हुए) ‘अनन्त विज्ञान आयाम’ में प्रवेश कर विहार करता है। यह सुख, इस (आकाश आयाम) सुख के बजाय ज्यादा बेहतर है, ज्यादा उत्कृष्ठ है… इसे ‘निष्काम सुख’ कहते हैं… ‘उस सुख से भयभीत नहीं होना चाहिए!’
- आगे, कोई भिक्षु अनन्त विज्ञान आयाम पूर्णतः लाँघकर, ‘कुछ नहीं है’ (अनुभव करते हुए) ‘सूने आयाम’ में प्रवेश कर विहार करता है। यह सुख, इस (विज्ञान आयाम) सुख के बजाय ज्यादा बेहतर है, ज्यादा उत्कृष्ठ है… इसे ‘निष्काम सुख’ कहते हैं… ‘उस सुख से भयभीत नहीं होना चाहिए!’
- आगे, कोई भिक्षु सुने आयाम को पूर्णतः लाँघ कर, न-संज्ञा-न-असंज्ञा आयाम में प्रवेश कर विहार करता है। यह सुख, इस (सूने आयाम) सुख के बजाय ज्यादा बेहतर है, ज्यादा उत्कृष्ठ है… इसे ‘निष्काम सुख’ कहते हैं… ‘उस सुख से भयभीत नहीं होना चाहिए!’
निरोध सुख
- आगे, कोई भिक्षु न-संज्ञा-न-असंज्ञा आयाम को पूर्णतः लाँघ कर, संज्ञा वेदना निरोध अवस्था में प्रवेश कर विहार करता है। यह सुख, इस (न-संज्ञा-न-असंज्ञा आयाम) सुख के बजाय ज्यादा बेहतर है, ज्यादा उत्कृष्ठ है।
—इसे ‘निष्काम सुख’ कहते हैं, ‘विलग सुख’ कहते हैं, ‘प्रशांति सुख’ कहते हैं, ‘संबोधि सुख’ कहते हैं, जिसका सेवन करना चाहिए, साधना करनी चाहिए, विकसित करना चाहिए ।
मैं कहता हूँ, ‘उस सुख से भयभीत नहीं होना चाहिए!’
अब, हो सकता है, कोई परधम्मी संन्यासी ऐसा कहे, ‘श्रमण गोतम ‘संज्ञा और वेदना का निरोध बताते हैं, और उसे भी ‘सुख’ बताते हैं।’ यह क्या है? ऐसा कैसे?
जब वे ऐसा कहे, तो उन परधम्मी संन्यासियों को कहना चाहिए, ‘ऐसा नहीं हैं, मित्रों, कि भगवान ‘सुख’ में केवल ‘सुखद वेदना’ को ही शामिल करते हैं। बल्कि जहाँ-जहाँ सुख उपलब्ध हो, वहाँ-वहाँ भगवान ‘सुख’ बताते हैं।’
कामेच्छा का स्थायी त्याग
इस तरह, हमने भगवान के शब्दों में धर्म सुना। जब हम पाँच कामगुणों (रूप, आवाज़, गंध, स्वाद, स्पर्श) का असली चेहरा देख लेते हैं, तो हमारा नज़रिया पूरी तरह बदल जाता है। जैसे-जैसे हम इनके क्षणिक प्रलोभन (अस्साद) को चीरकर उनके पीछे खड़े खौफनाक दुष्परिणामों (आदीनव) को देखते हैं, हमारे भीतर मोह की जगह ‘विरक्ति’ और छटपटाहट की जगह ‘प्रज्ञा’ जन्म लेने लगती है।
इस यात्रा में ‘सम्यक-समाधि’ की चार ध्यान अवस्थाएँ हमें कामुकता की दलदल से खींच निकालने का सबसे धारदार अस्त्र हैं। जब ‘ध्यान-सुख’ का निर्मल रस भीतर उतरता है, तो कामुकता का ज़हरीला रस खुद-ब-खुद बेस्वाद होकर सूख जाता है। यह वासना की जड़ पर सीधा प्रहार है।
एक प्राथमिक अभ्यास
जब अगली बार आपके भीतर कोई कामुक विचार या चित्र उठे, तो उसमें दिलचस्पी न लें। बस एक साक्षी बनकर उसका दुष्परिणाम देखें। यह जानें कि यह वासना ऊर्जा का महज़ एक बुलबुला है—अनित्य है। अभी उठा है, कुछ पलों में फूट जाएगा। अगर आप उसमें अपनी ऊर्जा निवेश नहीं करेंगे, तो वह अपनी मौत खुद मर जाएगा। चुपचाप अपनी ध्यान को अधिकांशतः छूटती हुई लंबी साँसों पर ले आएं। यह मुक्ति का नन्हा प्राथमिक कदम है।
जो साधक अपने ‘समाधि-स्कंध’ को इसी तरह साध लेता है, वह उस अवस्था को प्राप्त करता है जहाँ दो सबसे ज़हरीली संयोजन बेड़ियाँ—कामराग (कामुक दिलचस्पी) और पटिघ (द्वेषपूर्ण प्रतिरोध)—हमेशा के लिए छिन्न-भिन्न हो जाती हैं। यह वह मोड़ है जहाँ इंसान अपनी पाशविक सीमाओं को चीरकर उस चेतना में प्रवेश करता है, जहाँ न कोई आकर्षण है, न कोई छटपटाहट—केवल सन्नाटा, राहत और निर्विकल्प शांति।
अर्थात, जिसे कामुकता से मुक्ति साधनी हो, उसे ऐसे प्रीति-सुख के पीछे पड़ना होगा, जो ध्यान अवस्थाओं से प्राप्त होता है। इसका अर्थ है कि उसे “आर्य अष्टांगिक मार्ग” का परिपूर्णता से अभ्यास करना पड़ेगा, जिसका अंतिम अंग “सम्यक समाधि” है। इसलिए, अंगुत्तरनिकाय ३:७३ में महानाम कहते हैं कि वे समझ चुके हैं कि भगवान के धम्म में “ज्ञान उसी को मिलता है, जिसे समाधि प्राप्त हो। उसे नहीं, जो समाधि से विहीन हो।”
यह बात “सुक्क विपस्सना”, अर्थात सूखी विपश्यना साधना पर एक प्रश्नचिन्ह लगाती है, जिसमें ध्यान-अवस्थाओं से प्राप्त प्रीति-सुख को एक खतरा माना जाता है। साधक ध्यान-सुख से दूरी बनाता है, और उन्हें ‘अनित्य’ देखते हुए हटाते रहता है। वह डर के मारे ध्यान-अवस्थाओं में गहरे नहीं उतरता, और चित्त को “क्षणिक समाधि” में ही स्थित रखने का प्रयास करता है। ↩︎
कई शताब्दियों के पश्चात, आचार्य बुद्धघोष ने ‘विशुद्धिमग्ग’ और अट्ठकथाओं में ध्यान से उत्पन्न ‘प्रीति’ और ‘सुख’ को एक खतरे के रूप में प्रस्तुत किया। उनका बोया यह भय आज भी थेरवाद परम्परा में व्याप्त है, जहाँ साधकों को ध्यानावस्था के सुख में उलझने का भय दिखाकर डराया जाता है।
इसके विपरीत, मूल सुत्तों में भगवान बुद्ध का उपदेश सर्वथा भिन्न है। बुद्ध के अनुसार, यह इन्द्रिय-सुख नहीं, बल्कि विशुद्ध ‘नैष्कर्म्य सुख’ है। तथागत ने इस सुख से भयभीत होने का स्पष्ट निषेध किया है; बल्कि इसके सेवन, अभ्यास और निरंतर विकास पर बल दिया है। संक्षेप में, परवर्ती आचार्य जिस सुख को साधना की बाधा मानते हैं, स्वयं बुद्ध ने उसे विमुक्ति का एक सुरक्षित और अनिवार्य अंग (‘सम्यक समाधि’) बताया है। ↩︎
आगे क्या पढ़ें?
आईए, अब दूसरी रुकावट के त्याग की ओर बढ़ें—यानी उस दुर्भावना की ओर—
- जो हमारे हृदय को वश में कर उसे बंदी बना लेती है,
- और हमारे अन्तर्ज्ञान को दुर्बल कर हमें दुःखों में उलझा देती है।
इस विषय से जुड़े इस अध्याय को देखें:
