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नशा
साधारण लोग अपना पूरा जीवन किसी न किसी नशे में काट देते हैं—जवानी के नशे में, चंगाई के नशे में, या फिर जीवन के नशे में। वे वर्षों आगे की योजनाएँ बनाते हैं, संपत्तियाँ जोड़ते हैं, और अपनी साधना या आत्म-सुधार को “रिटायरमेंट” या “कल” के लिए टालते रहते हैं। मृत्यु को वे अस्पतालों के बंद कमरों में छिपा देते हैं ताकि उनके सांसारिक भोगों में कोई बाधा न आए।
मरण-संज्ञा (मौत का स्मरण) कोई निराशावादी सोच या मृत्यु का खौफ पैदा करने का अभ्यास नहीं है। यह असल में बुद्ध द्वारा दी गई एक चेतावनी है। यह हमारे ‘प्रमाद’ (लापरवाही) को चीरकर हमें वर्तमान क्षण की रुद्र सच्चाई के सामने ला खड़ा करती है—कि हमारी साँस किसी भी क्षण अंतिम हो सकती है।
सिर पर लगी आग
कल्पना करें कि आपके सिर या बालों में आग लग गई है। उस क्षण आप क्या करेंगे? क्या आप अपना मोबाइल चेक करेंगे? क्या आप उबासी लेकर लेट जाएँगे? या भविष्य की किसी रूमानी कल्पना में खोए रहेंगे? शायद नहीं! शायद, आप अपने पैरों पर कूदकर नाचते-से हुए उस आग को बुझाने का प्रयास करेंगे।
भगवान इसी उपमा का उपयोग करते हैं। वे कहते हैं कि जब तक हमारे भीतर ‘अकुशल धम्म’ बचे हुए हैं, तब तक हमारे सिर पर आग लगी हुई है। यदि इसी अवस्था में मृत्यु आ गई, तो दुर्गति होने की आशंका गहराती है। मरण-संज्ञा हमें इस ‘आग’ का एहसास कराती है ताकि हम अपनी साधना को ‘कल’ पर टालना बंद करें और आज, अभी, इसी क्षण अपनी पूरी ऊर्जा (वीर्य) से विकारों को उखाड़ फेंकें।
अभ्यास कैसे करें?
दैनिक जीवन में इस साधना का अभ्यास समय-सीमा को सिकोड़ देने का विज्ञान है:
- दिनचर्या: सुबह उठते ही और रात को सोने से पहले स्वयं से यह कठोर प्रश्न पूछें— “यदि आज किसी कारण से मेरी मृत्यु हो जाए, तो क्या मेरे भीतर कोई ऐसा द्वेष, लालच या विकार बचा है जो मुझे दुर्गति की ओर ले जाएगा?” यदि उत्तर ‘हाँ’ है, तो तुरंत उस विकार को त्यागने के लिए जुट जाएँ।
- श्वास की समय-सीमा: साधना में अपनी समय-सीमा को महीनों या दिनों से घटाकर ‘एक साँस’ पर ले आएँ। यह न सोचें कि “मैं कल दिन भर अच्छे से साधना करूँगा।” बल्कि यह सोचें—“यदि मैं अभी इसी समय केवल इस भीतर आती साँस को लेने से लेकर बाहर छोड़ने तक ही जीवित बचूँ, तो क्या मैं इस एक साँस को पूरी स्मृति और विराग के साथ जी सकता हूँ?”
सफलता का पैमाना
इस साधना का उद्देश्य भी जीवन से नफरत करना या अवसाद में गिरना नहीं है। सफलता तब मानी जाती है जब आपके भीतर से ‘जीवन के प्रति आवेग’ कम होने लगे।
जब मृत्यु का यथार्थ स्पष्ट हो जाता है, तो सांसारिक महत्वाकांक्षाओं, पद-प्रतिष्ठा और व्यर्थ के विवादों के प्रति आपका चित्त वैसे ही पीछे सिकुड़ने लगता है, जैसे आग के पास लाया गया मुर्गे का पंख। चित्त संसार के आकर्षणों से पूरी तरह तटस्थ (उपेक्षक) होकर एक असीम, सचेत और सुरक्षित शांति में स्थित हो जाता है।
मूल सूत्र
भगवान कहते हैं —
“मौत के स्मरण की साधना करना, उसे विकसित करना—महाफलदायी, महालाभकारी होता है। वह अमृत में डुबोता है, अमृत में पहुँचाता है।
कैसे कोई साधक मौत के स्मरण की साधना करता है?
रात के समय
जब दिन अस्त होकर, रात्रि का आगमन हो, तो साधक इस तरह चिंतन करता है—‘मेरी मौत कई कारणों से हो सकती है। मुझे साँप डंस सकता है; बिच्छू डंक मार सकता है; गोजर काट सकती है। उस तरह मेरी मौत हो जाए तो बाधा होगी। मैं लड़खड़ाकर गिर सकता हूँ; खाया-पचाया तकलीफ़ दे सकता है; पित्त कुपित हो सकता है; कफ कुपित हो सकता है; वात कुपित हो सकता है। उस तरह मेरी मौत हो जाए तो बाधा होगी।’
तब साधक सोचता है—‘क्या कोई ऐसा पाप, अकुशल स्वभाव है, जो अब तक मुझ से छूटा न हो, जिससे आज रात यदि मेरी मौत हो जाए तो मेरी दुर्गति होगी?’
यदि उसे पता चले कि ऐसा कोई पाप, अकुशल स्वभाव है, जो उससे अब तक छूटा नहीं है—तब साधक उसे छोड़ने के लिए अत्याधिक चाह, प्रयास, उत्साह, ज़िद, लगन, स्मरणशीलता, और सचेतता उत्पन्न करता है।
जैसे, किसी आदमी की पगड़ी या सिर में आग लग जाए, तो वह किस तरह अत्याधिक चाह, प्रयास, उत्साह, ज़िद, लगन, स्मरणशीलता, और सचेतता उत्पन्न कर उस आग को बुझायेगा?
उसी तरह, साधक अपना पाप, अकुशल स्वभाव छोड़ने के लिए अत्याधिक चाह, प्रयास, उत्साह, ज़िद, लगन, स्मरणशीलता, और सचेतता उत्पन्न करता है।
और, यदि उसे पता चले कि उसमें कोई पाप, अकुशल स्वभाव नहीं है, जो उसकी दुर्गति करेगा—तब उस कारण से वह प्रसन्नता और प्रफुल्लता में रहें, तथा दिन-रात कुशल स्वभाव में साधनारत रहें।
दिन के समय
और, जब रात्रि अस्त होकर दिन का आगमन हो, तो साधक इस तरह चिंतन करता है—‘मेरी मौत कई कारणों से हो सकती है। मुझे साँप डंस सकता है; बिच्छू डंक मार सकता है; गोजर काट सकती है। उस तरह मेरी मौत हो जाए तो बाधा होगी। मैं लड़खड़ाकर गिर सकता हूँ; खाया-पचाया तकलीफ़ दे सकता है; पित्त कुपित हो सकता है; कफ कुपित हो सकता है; वात कुपित हो सकता है। उस तरह मेरी मौत हो जाए तो बाधा होगी।’
तब साधक सोचता है—‘क्या कोई ऐसा पाप, अकुशल स्वभाव है, जो अब तक मुझ से छूटा न हो, जिससे आज दिन में यदि मेरी मौत हो जाए तो मेरी दुर्गति होगी?’
यदि उसे पता चले कि ऐसा कोई पाप, अकुशल स्वभाव है, जो उससे अब तक छूटा नहीं है—तब साधक उसे छोड़ने के लिए अत्याधिक चाह, प्रयास, उत्साह, ज़िद, लगन, स्मरणशीलता, और सचेतता उत्पन्न करता है।
जैसे, किसी आदमी की पगड़ी या सिर में आग लग जाए, तो वह किस तरह अत्याधिक चाह, प्रयास, उत्साह, ज़िद, लगन, स्मरणशीलता, और सचेतता उत्पन्न कर उस आग को बुझायेगा?
उसी तरह, साधक अपना पाप, अकुशल स्वभाव छोड़ने के लिए अत्याधिक चाह, प्रयास, उत्साह, ज़िद, लगन, स्मरणशीलता, और सचेतता उत्पन्न करता है।
और, यदि उसे पता चले कि उसमें कोई पाप, अकुशल स्वभाव नहीं है, जो उसकी दुर्गति करेगा—तब उस कारण से वह प्रसन्नता और प्रफुल्लता में रहें, तथा दिन-रात कुशल स्वभाव में साधनारत रहें।
—यह ‘मौत का स्मरण’ कहलाता है।”
इस तरह मौत के स्मरण की साधना करना, उसे विकसित करना—महाफलदायी, महालाभकारी होता है। वह अमृत में डुबोता है, अमृत में पहुँचाता है।
जब कोई मौत के स्मरण में लीन रहे, तब जीवन के प्रति आवेग से उसका चित्त दूर सिकुड़ता है, विपरीत झुकता है, पीछे हटता है, खिंचा नहीं चला जाता; बल्कि तटस्थता या घिन-भाव में स्थित हो जाता है।
जैसे, मुर्ग़े का पँख या स्नायु के टुकड़े को आग में डाल दिया जाए, तो वह दूर सिकुड़ता है, विपरीत झुकता है, पीछे हटता है, खिंचा नहीं चला जाता। उसी तरह, जब कोई मौत के स्मरण में लीन रहे, तब जीवन के प्रति आवेग से उसका चित्त दूर सिकुड़ता है, विपरीत झुकता है, पीछे हटता है, खिंचा नहीं चला जाता; बल्कि तटस्थता या घिन-भाव में स्थित हो जाता है।
किंतु, यदि कोई मौत के स्मरण में लीन रहने पर भी कोई जीवन के प्रति आवेग से आकर्षित होता हो, या घिन-भाव उपस्थित न हो—तब उसे समझ लेना चाहिए कि ‘मैं अनित्य नज़रिए को सही तरह से विकसित नहीं कर पाया हूँ। क्योंकि मुझ में क्रमानुसार बदलाव नहीं आया। मैंने इस साधना का फल नहीं पाया!’
इस तरह, वह सचेत हो जाए।
और, यदि कोई मौत के स्मरण में लीन रहे, और जीवन के प्रति आवेग से उसका चित्त दूर सिकुड़ता है, विपरीत झुकता है, पीछे हटता है, खिंचा नहीं चला जाता; बल्कि तटस्थता या घिन-भाव में स्थित हो जाता है—तब उसे समझ लेना चाहिए कि ‘मैंने मौत का स्मरण’ विकसित कर लिया। क्योंकि मुझमें क्रमानुसार बदलाव आ गया। मैंने इस साधना का फल पा लिया!’
इस तरह, वह सचेत हो जाए।
मौत के स्मरण की साधना करना, उसे विकसित करना—महाफलदायी, महालाभकारी होता है। वह अमृत में डुबोता है, अमृत में पहुँचाता है!"
—अंगुत्तरनिकाय १०:६० + ७:४६ — धम्मपद ४१ भिक्षुओं, ऐसे साधक प्रमादी (लापरवाह) कहलाए जाते हैं, और वे आस्रवमुक्ति के लिए ‘मौत के स्मरण’ की साधना धीमे करते हैं—जो ‘मौत के स्मरण’ की साधना यह सोचते हुए करते हैं— —ऐसे साधक ‘प्रमादी’ कहलाए जाते हैं, और वे आस्रवमुक्ति के लिए ‘मौत के स्मरण’ की साधना धीमे करते हैं। परंतु, जो साधक ‘मौत के स्मरण’ की साधना यह सोचते हुए करते हैं— — ऐसे साधक ‘अप्रमादी’ (=सतर्क) कहलाए जाते हैं, और वे आस्रवमुक्ति के लिए ‘मौत के स्मरण’ की साधना तीव्रता से करते है। इसलिए, तुम्हें सीखना चाहिए—‘हम अप्रमादी रहेंगे! और हम आस्रव-मुक्ति के लिए ‘मौत के स्मरण’ की साधना तीव्रता से करेंगे!’" —अंगुत्तरनिकाय ६:१९
ज़मीन पर पड़ी मिलेगी,
— चेतनाहीन —
जैसे लकड़ी का अनुपयोगी टुकड़ा।
सभी जीवों की मौत होगी!
यही निश्चित है!
जीवन नहीं!