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— दुक्खा पटिपदा —
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दुक्खा पटिपदा

नवसिवथिक

— नौ प्रकार के श्मशान —

लेखक: भिक्खु कश्यप
| ६ मिनट
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अंतिम दर्पण

लोग अपना पूरा जीवन शरीर को सजाने, सँवारने और इसे हमेशा युवा बनाए रखने के संघर्ष में बिता देते हैं। शरीर के प्रति ‘अस्मिमान’ (मैं हूँ का भाव) इतना गहरा होता है कि लोग इसकी अंतिम नियति को हमेशा झुठलाते रहते हैं। ‘नवसिवथिक’ (श्मशान की ९ अवस्थाएँ) वह ‘अंतिम दर्पण’ है जो इस शारीरिक आसक्ति को तोड़कर यथार्थ को सामने ला खड़ा करता है।

झकझोरने की चिकित्सा

इस साधना में भगवान साधक को वैचारिक रूप से श्मशान के बीचों-बीच लाकर खड़ा कर देते हैं। उनका सुत्त शरीर के विघटन की ९ अवस्थाओं का क्रूर वर्णन करता है—सड़ती हुई लाश से लेकर हड्डियों के सफ़ेद चूर्ण तक। यह क्रूरता अनायास नहीं है। शरीर और सांसारिक जीवन के प्रति हमारी आसक्ति इतनी ठोस है कि जब तक चित्त को इस सड़ती हुई सच्चाई से न टकराया जाए, तब तक संसार का सम्मोहन नहीं टूटता। यह काया से चिपकाव को काटने के सबसे शक्तिशाली औजारों में से एक है।

अभ्यास कैसे करें?

आधुनिक जीवन बदल चुका है। आज हमारे आस-पास खुले श्मशान नहीं हैं जहाँ लाशें सड़ती हों, लेकिन इस साधना का असली रणक्षेत्र हमारा अपना चित्त है:

  • तुलना: आईने के सामने खड़े होकर अपनी त्वचा और रूप को निहारते समय, या किसी की मृत्यु का समाचार सुनते समय, तुरंत अपनी काया की तुलना उस नीली पड़ी लाश या श्मशान की हड्डियों से करें। भीतर एक ही तीर चलाएँ—“मेरी काया भी इसी स्वभाव की है। आगे यही होना है। इसे टाला नहीं जा सकता।”
  • गृहस्थ-संकल्पों का विखंडन: जब मन भविष्य की भव्य योजनाओं (मकान, पद, पैसा, रिश्ते) की अंतहीन उधेड़बुन में फँसने लगे, तो तुरंत उस श्मशान के ‘सफ़ेद चूर्ण’ (९वीं अवस्था) का स्मरण करें। देखें कि आपके सभी तनाव, भविष्य की चिंताएँ और महत्वाकांक्षाएँ अंततः उसी धूल में मिलने वाली हैं।

सफलता का पैमाना

इस साधना का उद्देश्य घोर निराशा या अवसाद पैदा करना नहीं है। भगवान सफलता का पैमाना बताते हैं कि इस यथार्थ को देखने से आपके भीतर चल रही सांसारिक दौड़ और महत्वाकांक्षाओं का भारी बोझ गिरने लगता है। और जब सांसारिक व्यग्रता गिरने लगती है, तो चित्त विराग से भरने लगता है। मृत्यु की इस कठोर वास्तविकता के बीच खड़ा होकर साधक का चित्त धीमे-धीमे स्थिर, एकाग्र और समाहित होने लगता है।

मूल साधना

  1. कोई भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—एक दिन पुरानी, दो दिन पुरानी, तीन दिन पुरानी—फूल चुकी, नीली पड़ चुकी, पीब रिसती हुई।

    तब वह उसे अपनी काया से तुलना करता है—‘मेरी काया भी इसी स्वभाव की है। आगे यही होना है। यह टाला नहीं जा सकता।’

    जब वह इस प्रकार अप्रमत्त, तत्पर और दृढ़निश्चयी होकर विहार करता है, तब गृहस्थ-जीवन की जो यादें और संकल्प हो, वे छूट जाते हैं। उनके छूटने पर, वह चित्त को भीतर से स्थिर करता है, स्थापित करता है, एकाग्र करता है, समाहित करता है।

  2. आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—कौवों द्वारा नोची जाती, चीलों द्वारा नोची जाती, गिद्धों द्वारा नोची जाती, बगुलों द्वारा नोची जाती, कुत्तों द्वारा चबाई जाती, बाघ द्वारा चबाई जाती, तेंदुए द्वारा चबाई जाती, सियार द्वारा चबाई जाती, अथवा विविध जंतुओं द्वारा खायी जाती।

    तब वह उसे अपनी काया से तुलना करता है—‘मेरी काया भी इसी स्वभाव की है। आगे यही होना है। यह टाला नहीं जा सकता।’

    जब वह इस प्रकार अप्रमत्त, तत्पर और दृढ़निश्चयी होकर विहार करता है, तब गृहस्थ-जीवन की जो यादें और संकल्प हो, वे छूट जाते हैं। उनके छूटने पर, वह चित्त को भीतर से स्थिर करता है, स्थापित करता है, एकाग्र करता है, समाहित करता है।

  3. आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—माँस से युक्त, रक्त से सनी, नसों से बँधी, हड्डी-कंकालवाली…

  4. आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—माँस के बिना, रक्त से सनी, नसों से बँधी, हड्डी-कंकालवाली…

  5. आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—माँस के बिना, रक्त के बिना, नसों से बँधी, हड्डी-कंकालवाली…

  6. आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—माँस के बिना, रक्त के बिना, नसों से बिना बँधी, हड्डियाँ जहाँ-वहाँ बिखरी हुई—कही हाथ की हड्डी; कही पैर की; कही टखने की हड्डी; कही जाँघ की; कही कुल्हे की हड्डी; कही कमर की; कही पसली; कही पीठ की हड्डी; कही कंधे की हड्डी; कही गर्दन की; कही ठोड़ी की हड्डी; कही दाँत; कही खोपड़ी।

    तब वह उसे अपनी काया से तुलना करता है—‘मेरी काया भी इसी स्वभाव की है। आगे यही होना है। यह टाला नहीं जा सकता।’

    जब वह इस प्रकार अप्रमत्त, तत्पर और दृढ़निश्चयी होकर विहार करता है, तब गृहस्थ-जीवन की जो यादें और संकल्प हो, वे छूट जाते हैं। उनके छूटने पर, वह चित्त को भीतर से स्थिर करता है, स्थापित करता है, एकाग्र करता है, समाहित करता है।

  7. आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—हड्डियाँ शंख जैसे सफ़ेद हो चुकी…

  8. आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—वर्षोंपश्चात, जब हड्डियों का ढ़ेर लगा हो…

  9. आगे, भिक्षुओं, वह भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—जब हड्डियाँ सड़कर चूर्ण बन चुकी हो।

    तब वह उसे अपनी काया से तुलना करता है—‘मेरी काया भी इसी स्वभाव की है। आगे यही होना है। यह टाला नहीं जा सकता।’

    जब वह इस प्रकार अप्रमत्त, तत्पर और दृढ़निश्चयी होकर विहार करता है, तब गृहस्थ-जीवन की जो यादें और संकल्प हो, वे छूट जाते हैं। उनके छूटने पर, वह चित्त को भीतर से स्थिर करता है, स्थापित करता है, एकाग्र करता है, समाहित करता है।

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