
जम्बूद्वीप, जिसे आज भारत कहते हैं, हमेशा से ही आत्मा और परमात्मा की दार्शनिक मान्यताओं में उलझता रहा है। यहाँ अनेक श्रमण-ब्राह्मण परंपराओं में सदियों से यह द्वंद्व चलता रहा है कि ‘क्या आत्मा है?’, ‘क्या आत्मा नहीं है?’ इत्यादि।
लेकिन भगवान ने इसे अव्याकृत धम्म (ऐसे प्रश्न जिनका उत्तर देना व्यर्थ है) की श्रेणी में रखा। जब भी इस पर प्रश्न पूछा जाता, तो वे मौन रहते या इसे निरर्थक बताते। क्योंकि ‘आत्मा है’ (“अत्थि मे अत्ता”) कहने पर शाश्वतवाद की दृष्टि उत्पन्न होती है, जबकि ‘आत्मा नहीं है’ (“नत्थि मे अत्ता”) कहने पर उच्छेदवाद की दृष्टि पुष्ट होती है। ये दोनों ही दृष्टियाँ मिथ्या हैं, और ये अंततः इस संसार के भंवर में फंसाए रखती हैं।
इन दोनों अतियों के परे, भगवान ने मध्यम मार्ग की खोज की। यह वह मार्ग है, जो इन मिथ्या-दृष्टियों और उनकी अनचाही गतियों से पूरी तरह मुक्त है। और वह है— प्रतीत्य समुत्पाद! यही धम्म का हृदय है। इसी सिद्धांत के यथार्थ बोध से आत्मा, परमात्मा, और उच्छेद के भंवर से बाहर निकला जाता है।
यह शब्द दो पदों से बना है: ‘पटिच्च’ (आधारित होकर/प्रत्यय से) + ‘समुप्पाद’ (एक साथ उत्पन्न होना)। इसका अर्थ है— “इस संसार में कुछ भी स्वतंत्र या स्वयंभू नहीं है; सब कुछ कारणों और प्रत्ययों के सहारे ही उत्पन्न होता है।” इससे ‘आत्मा है या नहीं’ का प्रश्न ही निरर्थक और मुक्ति के मार्ग में अनावश्यक साबित हो जाता है।
बुद्ध ने देखा कि जिसे ‘जीवन’ या ‘सत्व’ कहा जाता है, वह केवल कारणों और परिणामों की एक बहती हुई धारा (प्रक्रिया) मात्र है। जब विशेष कारण मिलते हैं, तो घटना घटने लगती है; जब कारण निरुद्ध होते हैं, तो घटना मिटने लगती है।
बुद्ध ने इसे इदप्पच्चयता के रूप में इस प्रकार परिभाषित किया है:
इमस्मिं सति इदं होति
(जब यह है, तब वह है।)
इमस्स’उप्पादा इदं उप्पज्जति
(इसके उत्पन्न होने से वह उत्पन्न होता है।)
इमस्मिं असति इदं न होति
(जब यह नहीं है, तब वह भी नहीं है।)
इमस्स निरोधा इदं निरुज्झति
(इसके रुकने से वह भी रुक जाता है।)
यह सिद्धांत स्पष्ट करता है कि अस्तित्व किसी सीधी रेखा में चलने वाली घटना नहीं है। यह हेतु और फल का एक अत्यंत जटिल ताना-बाना है। अस्तित्व कोई स्थिर इकाई नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया है, जो निरंतर स्वयं को ‘पका’ रही है और ‘खा’ रही है (कारणों का फल में और फल का नए कारणों में बदलना)।
इसे समझना इतना सरल नहीं है। इसकी कुछ कड़ियाँ सतह पर स्पष्ट रूप से उभरती हैं, किन्तु अधिकांश कड़ियाँ अत्यंत सूक्ष्म और अदृश्य होती हैं। इसलिए इस प्रक्रिया को पहले सैद्धांतिक रूप से समझना पड़ता है, फिर प्रायोगिक साधना से गुजरते हुए, अंततः इसके यथाभूत स्वरूप को जानकर और देखकर ही इसके भेदन तक पहुँचा जा सकता है।
एक समय आयुष्मान आनन्द को लगा कि उन्होंने पटिच्चसमुप्पाद को गहराई से जान लिया है। तब भगवान ने उन्हें चेताते हुए कहा:
ऐसा मत कहो, आनन्द। ऐसा मत कहो। गहरा है यह प्रतीत्य समुत्पाद! बहुत गहरा दिखता है! इसी धम्म का बोध न करने से, भेदन न करने से, यह जनता ‘उलझे सूत’ जैसी है, ‘धागे के गठीले गोले’ जैसी है, ‘कँटीली झाड़ी’ जैसी है, और दयनीय-लोक, दुर्गति और यातनालोक के दुष्चक्र से परे नहीं जा पाती!
इस जटिल प्रक्रिया को बुद्ध ने द्वादश निदान (बारह कड़ियों) के माध्यम से समझाया है।
द्वादश निदान: दुख का निर्माण
| कड़ी (निदान) | प्रक्रिया में इसकी भूमिका |
|---|---|
| १. अविज्जा / अविद्या (सत्य का अज्ञान) | वह अंधकार या भ्रांति जहाँ अनुभव का यथार्थ नहीं दिखता। |
| २. सङ्खार (कायिक, वाचिक और मानसिक रचनाएँ) | अंधकार में तीर चलाना; तनाव या प्रतिक्रियाएं गढ़ना। |
| ३. विञ्ञाण (चेतना / जानने का भाव) | रचे गए संस्कारों के धक्के से किसी विषय पर टिकने वाली चेतना। |
| ४. नाम-रूप (मानसिक और भौतिक अस्तित्व) | वह मानसिक-भौतिक धरातल जिस पर विञ्ञाण टिकता है। |
| ५. सळायतन (छह इंद्रिय द्वार) | अनुभव ग्रहण करने के छह शून्य द्वार (आँख, कान आदि)। |
| ६. फस्स (संपर्क / मिलन) | द्वार, बाह्य विषय और चेतना का एक सीध में मिलना। |
| ७. वेदना (अनुभूति) | संपर्क से उठने वाली सुखद, दुःखद या तटस्थ अनुभूति। |
| ८. तण्हा (प्यास / तृष्णा) | वेदना के प्रति उठने वाली अंधी लालसा या भागने की छटपटाहट। |
| ९. उपादान (आसक्ति / पकड़ / ईंधन) | तृष्णा का तीव्र होना और अस्तित्व की अग्नि में ईंधन डालना। |
| १०. भव (होना / अस्तित्व बनना) | ईंधन से एक नई मानसिक या भौतिक अवस्था (लोक) का निर्मित होना। |
| ११. जाति (जन्म) | उस निर्मित अवस्था (भव) के साथ तादात्म्य (मैं हूँ) स्थापित कर लेना। |
| १२. जरामरण (बुढ़ापा, मृत्यु, शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा) | बनी हुई पहचान का टूटना, जिससे शोक और दुःख पैदा होते हैं। |

ये बारह कड़ियाँ एक पहिए (चक्र) के समान हैं, जो अविद्या (अज्ञानता) की धुरी पर निरंतर घूम रही हैं। याद रहे कि इसे किसी ‘कर्ता’ या ‘आत्मा’ के रूप में नहीं देखना है जो इस पहिए को घुमा रहा है; बल्कि इसे केवल एक प्रक्रिया के रूप में देखना है, कि कैसे एक कड़ी दूसरी कड़ी के लिए ‘प्रत्यय’ (आधार) का कार्य करती है।
१. अविद्या — मूल भ्रम
यह चक्र की प्रथम अवस्था है, लेकिन इसे ब्रह्मांड की ‘शुरुआत’ (“पूर्वान्त”) या कोई ‘प्रथम कारण’ नहीं समझना चाहिए। यह केवल वह ‘पृष्ठभूमि’ या अंधकार है, जिसमें अस्तित्व का यह नाटक चल पड़ता है।
यहाँ यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि अविद्या “किसे” या “मुझे” होती है—ऐसा प्रश्न ही भ्रामक है। जैसे ही किसी ‘कर्ता’ की खोज की जाती है, मिथ्यादृष्टि (सक्कायदिट्ठि) उपजती है और मुक्ति का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। अविद्या कोई वस्तु या गुण नहीं है जो किसी व्यक्ति के भीतर रखी हो; यह मात्र दृष्टि का एक दोष है, एक ऐसा अंधकार है जहाँ प्रक्रियाएँ अपने यथार्थ रूप में नहीं देखी जातीं।
मूल बुद्ध वचनों के अनुसार, अविद्या मात्र जानकारी का अभाव नहीं है; यह एक ‘सक्रिय विपरीत दृष्टि’ है। सैद्धांतिक तौर पर यह चार आर्य सत्यों को न जानना है—अर्थात्, जब अनुभव उत्पन्न हो रहा हो, तब यह न देख पाना कि इस पूरी प्रक्रिया में केवल अनित्य ‘दुःख’ (तनाव) उत्पन्न हो रहा है, यह दुःख किन्हीं कारणों से उत्पन्न हो रहा है, और इसका निरोध संभव है।
अविद्या के इसी अंधकार में, जब अनुभव की धारा बहती है, तो उन विशुद्ध प्रक्रियाओं और घटनाओं को भूलवश ‘मैं’, ‘मेरा’ या ‘मेरी आत्मा’ मान लिया जाता है।
२. संस्कार — सक्रिय निर्माण
पालि शब्द ‘सङ्खार’ का शाब्दिक अर्थ है “उपलब्ध सामग्री को एक साथ मिलाकर कुछ नया रचना या गढ़ना”।
अविद्या के प्रत्यय से ही संस्कार उत्पन्न होते हैं। प्रतीत्य समुत्पाद की यह अत्यंत सूक्ष्म कड़ी है। बाद की अट्ठकथाओं ने इसे अक्सर केवल ‘अतीत जन्मों के कर्म’ तक सीमित कर दिया। परंतु प्रारंभिक सुत्तों (जैसे चूळवेदल्ल सुत्त) में संस्कार एक अत्यंत जीवंत और तात्कालिक प्रक्रिया है।
चूँकि आधार ही अविद्या (अज्ञान) का है, इसलिए इस अंधकार में जो भी रचनाएँ गढ़ी जाती हैं, वे दोषपूर्ण होती हैं। वे यथार्थ पर नहीं, बल्कि सुख की प्यास या दुःख से भागने की छटपटाहट पर आधारित होती हैं। जहाँ अविद्या है, वहाँ अनुभव को तीन स्तरों पर स्वचालित रूप से गढ़ा जाने लगता है:
- काय-संस्कार (शारीरिक रचना): श्वास-प्रश्वास। श्वास की गति शरीर की अवस्था को गढ़ती है।
- वची-संस्कार (वाचिक रचना): वितर्क और विचार। मन के भीतर जो सूक्ष्म मूल्यांकन या ‘चर्चा’ होती है, वह वाणी और आगे की प्रतिक्रियाओं को गढ़ती है।
- चित्त-संस्कार (मानसिक रचना): संज्ञा (पहचान) और वेदना (अनुभूति)। किसी विषय को कैसे पहचाना जाता है और उसके प्रति कैसी अनुभूति उठती है, यह चित्त की अवस्था का निर्माण कर देती है।
| संस्कार का प्रकार | मुख्य घटक | प्रक्रिया में भूमिका |
|---|---|---|
| काय-संस्कार (शारीरिक रचना) | श्वास-प्रश्वास | श्वास की गति शरीर की अवस्था को गढ़ती है। |
| वची-संस्कार (वाचिक रचना) | वितर्क और विचार | मन के भीतर जो सूक्ष्म मूल्यांकन या ‘चर्चा’ होती है, वह वाणी और आगे की प्रतिक्रियाओं को गढ़ती है। |
| चित्त-संस्कार (मानसिक रचना) | संज्ञा (पहचान) और वेदना (अनुभूति) | किसी विषय को कैसे पहचाना जाता है और उसके प्रति कैसी अनुभूति उठती है, यह चित्त की अवस्था का निर्माण कर देती है। |
उदाहरण से समझें
इन दोनों कड़ियों का संबंध कैसे काम करता है, इसे एक सूक्ष्म दैनिक घटना से समझा जा सकता है। मान लीजिए, श्रोत्र-आयाम (कान) पर एक तीक्ष्ण ध्वनि (किसी की निंदा या अपशब्द) आकर टकराती है।
सामान्य दृष्टि: “उसने मुझे गाली दी, मुझे बुरा लगा, और मैं क्रोधित हो गया।” (यहाँ हर जगह एक ‘कर्ता’ और ‘भोक्ता’ खड़ा कर दिया गया है, जो दुःख का कारण है।)
प्रतीत्य समुत्पाद (प्रक्रियात्मक) दृष्टि:
- संपर्क: कान और ध्वनि का मिलन हुआ, जिससे श्रवण-विज्ञान (सुनने की चेतना) उत्पन्न हुई। यह केवल एक प्राकृतिक घटना है; यहाँ तक कोई दुःख नहीं है।
- अविद्या का प्रवेश: इसी क्षण, क्योंकि सति और प्रज्ञा मौजूद नहीं हैं, अविद्या सक्रिय होती है। यह बोध नहीं रहता कि यह ध्वनि केवल वायु का एक अनित्य कंपन है। इसके बजाय, एक भ्रांति उठती है— “यह शब्द ‘मेरे’ लिए है, और यह अपमानजनक है।”
- संस्कारों का अभिसंस्करण: अविद्या के इसी प्रत्यय (आधार) से तुरंत अभिसंस्करण शुरू हो जाता है:
- श्वास की गति स्वतः तेज हो जाती है और शरीर में तनाव आ जाता है (काय-संस्कार)।
- मन के भीतर ही भीतर बचाव या प्रतिकार के तर्क-वितर्क चलने लगते हैं (वची-संस्कार)।
- उस ध्वनि को ‘शत्रुतापूर्ण’ (संज्ञा) मानकर एक गहरी अप्रिय अनुभूति (वेदना) उत्पन्न कर ली जाती है (चित्त-संस्कार)।
इस पूरे घटनाक्रम में किसी “क्रोधित होने वाले व्यक्ति” का होना या न होना कोई मायने नहीं रखता; यह प्रश्न ही अप्रासंगिक है। केवल अविद्या की उपस्थिति मात्र से, स्वचालित रूप से तनावपूर्ण रचनाएँ (संस्कार) गढ़ी जाने लगती हैं। यही संस्कार वह ‘ईंधन’ या धक्का बनते हैं, जो अगली कड़ी—विज्ञान—को उभरने और किसी नए विषय पर प्रतिष्ठित होने के लिए विवश कर देते हैं।
३. विज्ञान — चेतना का प्रवाह
संस्कारों के इसी धक्के या गति के प्रत्यय से विज्ञान की उत्पत्ति होती है। यहाँ विज्ञान का अर्थ कोई आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान नहीं, बल्कि ‘चेतना’ या ‘जानने की प्रक्रिया’ है।
इसे किसी स्थिर ‘आत्मा’ या शाश्वत तत्त्व के रूप में नहीं देखना चाहिए, जो एक शरीर से दूसरे शरीर में यात्रा करता है। बल्कि, यह एक प्रकाश-पुंज या बीज के समान है, जो संस्कारों द्वारा उत्पन्न गति के अनुसार किसी विषय पर जाकर टिक जाता है। जब संस्कार सक्रिय होते हैं, तो वे विज्ञान को एक दिशा प्रदान करते हैं। जहाँ संस्कारों का झुकाव होता है, विज्ञान वहीं जाकर प्रतिष्ठित हो जाता है।
उदाहरण के लिए, यदि अविद्या के कारण क्रोध के संस्कार प्रबल हो रहे हैं, तो विज्ञान स्वतः ही उस द्वेषपूर्ण विषय पर केंद्रित हो जाएगा। यह विज्ञान एक निरंतर बहती हुई धारा है, जो विषय के संपर्क में आते ही उत्पन्न होती है और विषय के हटते ही निरुद्ध हो जाती है।
४. नाम-रूप — अस्तित्व का आधार
विज्ञान एकाकी रूप से कार्य नहीं कर सकता; उसे ठहरने, पनपने और अनुभव को आगे बढ़ाने के लिए एक धरातल की आवश्यकता होती है। वह धरातल नाम-रूप है।
- रूप: चार महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु) और उनसे निर्मित यह भौतिक काया।
- नाम: वे मानसिक घटक, जो विज्ञान को सक्रिय रूप से किसी विषय के साथ जोड़ते हैं। इनमें प्रमुख हैं— वेदना (अनुभूति), संज्ञा (पहचान), चेतना (इरादा), संपर्क, और मनसिकार (ध्यान देना)।
विज्ञान इसी नाम-रूप के आधार पर उतरकर संसार का अनुभव कर पाता है।
विज्ञान और नाम-रूप का संबंध (लूप)
बुद्ध ने सुत्तों (जैसे महानिदान सुत्त) में स्पष्ट किया है कि इस बिंदु पर आकर प्रतीत्य समुत्पाद की शृंखला एक सीधी रेखा में नहीं चलती, बल्कि विज्ञान और नाम-रूप एक-दूसरे पर आश्रित होकर एक जटिल ग्रंथि बना लेते हैं।

भगवान ने इसे दो सरकंडों (“नळकलपी”) की सटीक उपमा से समझाया है। कल्पना करें कि दो सरकंडे (बांस की डंडियां) एक-दूसरे के सहारे खड़े हैं। एक सरकंडा ‘विज्ञान’ है और दूसरा ‘नाम-रूप’। यदि एक को हटा दिया जाए, तो दूसरा स्वतः गिर जाएगा।
विज्ञान के अवतरण के बिना नाम-रूप (जैसे मातृ-गर्भ में भ्रूण या वर्तमान क्षण में अनुभव का ढांचा) विकसित नहीं हो सकता। और नाम-रूप रूपी आधार के बिना विज्ञान को टिकने के लिए कोई स्थान नहीं मिलेगा।
यहीं पर अस्तित्व का सबसे सघन भ्रम पैदा होता है। विज्ञान एक बीज के समान है और नाम-रूप एक खेत के समान। अविद्या के कारण गढ़े गए संस्कार इस विज्ञान रूपी बीज को बार-बार नाम-रूप के खेत में रोपित करते रहते हैं, जिससे यह प्रक्रिया स्वयं को ही पुष्ट करती रहती है।
५. सळायतन — छह आयाम या द्वार
नाम-रूप के पुष्ट होने पर छह इंद्रिय आयाम विकसित होते हैं, जिनके माध्यम से अनुभव की धारा प्रवाहित होती है—आँख, कान, नाक, जीभ, काया और मन।
बुद्ध इन्हें ‘शून्य गाँव’ की उपमा देते हैं। ये द्वार अपने आप में खाली और तटस्थ हैं, लेकिन इन्हीं झरोखों से बाह्य संसार भीतर प्रवेश करता है और भीतर का संसार बाहर झांकता है। ये केवल एक जैविक और मानसिक तंत्र हैं, जो बाह्य जगत (दृश्य, शब्द, गंध आदि) और आंतरिक जगत (विचारों) को ग्रहण करने के लिए निर्मित हुए हैं।
६. फस्स (संपर्क) — मिलन
छह आयामों के प्रत्यय से फस्स घटित होता है। इसे सामान्य भाषा में केवल भौतिक ‘छूना’ या ‘टकराव’ नहीं समझना चाहिए। प्रतीत्य समुत्पाद के अनुसार, फस्स एक अत्यंत विशिष्ट घटना है जो तीन चीज़ों के एक साथ मिलने पर ही घटित होती है।
सूत्रों में फस्स को तीन घटकों का ‘मिलन’ या ‘संपर्क’ बताया गया है: १. आंतरिक आयाम: (जैसे— चक्षु) २. बाह्य विषय: (जैसे— कोई दृश्य या रूप) ३. विज्ञान: (जैसे— चक्षु-विज्ञान / देखने की चेतना)
जब ये तीनों एक सीध में आते हैं, तभी अनुभव की पहली ‘चिंगारी’ उठती है। यदि आँख खुली हो, सामने दृश्य हो, परंतु विज्ञान (चेतना) वहाँ न हो (जैसे व्यक्ति गहरी सोच में डूबा हो), तो ‘संपर्क’ घटित नहीं होता। इस पूरी घटना में ‘मैं देख रहा हूँ’ जैसी धारणा प्रबल होती है। लेकिन उसे पुनः कर्ता या भोक्ता के रूप में देखने से मिथ्यादृष्टि उपजती है। यहाँ केवल इसकी प्रक्रिया को ही देखना चाहिए कि कारण (छह आयाम) और प्रत्यय (बाह्य विषय और विज्ञान) के मिलने से ‘संपर्क’ की घटना निष्पन्न हो रही है।
७. वेदना — अनुभव का स्वाद
संपर्क रूपी चिंगारी के उत्पन्न होते ही, तत्काल वेदना उठ खड़ी होती है। वेदना का अर्थ कोई गहरी पीड़ा नहीं, बल्कि अनुभव का ‘स्वाद’ या ‘स्वर’ है। संपर्क के अनुसार यह तीन प्रकार की होती है:
- सुखद वेदना (अनुकूल अनुभूति)
- दुःखद वेदना (प्रतिकूल अनुभूति)
- अदुःखद-असुखद वेदना (तटस्थ या उपेक्षा की अनुभूति)
वेदना केवल पूर्व-संस्कारों और वर्तमान संपर्क का एक प्राकृतिक ‘विपाक’ (परिणाम) है। वेदना का उठना अपरिहार्य है; एक अर्हत या स्वयं बुद्ध के शरीर में भी स्पर्श होने पर वेदना उत्पन्न होती है।
अविद्या के प्रभाव में, इस विशुद्ध जैविक-मानसिक तरंग को “मुझे दर्द हो रहा है” या “मुझे आनंद आ रहा है” के रूप में ग्रहण कर लिया जाता है। जबकि यथार्थ में कोई ‘भोक्ता’ नहीं है, केवल ‘अनुभूति’ नामक एक धम्म उत्पन्न हो रहा है, जो अपने स्वभाव से अनित्य है।
८. तृष्णा — अंधी प्रतिक्रिया और खिंचाव
वेदना से आगे की कड़ी सबसे अधिक विचारणीय है, क्योंकि यहीं पर दुःख के नए चक्र का सबसे प्रबल निर्माण होता है। वेदना के प्रत्यय से तृष्णा (प्यास या खिंचाव) उत्पन्न होती है।
किंतु यहाँ एक अत्यंत सूक्ष्म अंतराल है। वेदना स्वतः ही तृष्णा में नहीं बदलती। जब वेदना के उठने पर अविद्या (अंधकार) पूर्ववत बनी रहती है, तभी एक स्वचालित, अंधी प्रतिक्रिया जन्म लेती है:
- सुखद वेदना उठने पर उसे कसकर पकड़ने, बनाए रखने और और अधिक पाने की तीव्र प्यास उठती है (काम-तृष्णा)।
- दुःखद वेदना उठने पर उससे दूर भागने, उसे नष्ट करने या उससे बचने की हिंसक छटपटाहट उठती है (विभव-तृष्णा)।
- अस्तित्व बनाए रखने की सूक्ष्म चाह (भव-तृष्णा)।
तृष्णा एक ‘दर्जी’ के समान है, जो इस पूरी प्रक्रिया को भविष्य के दुखों के साथ सील देती है। यह वर्तमान क्षण की वेदना में हमेशा एक ‘कमी’ महसूस करती है और उसे भरने के लिए भविष्य की ओर भागती है।
प्रक्रियात्मक दृष्टि से पूर्ण चित्र:
चक्षु, रूप और विज्ञान के मिलन से ‘संपर्क’ हुआ। संपर्क से ‘सुखद वेदना’ उठी। क्योंकि अविद्या मौजूद थी, इसलिए उस सुखद वेदना को भोक्ता रूप से ‘मेरा सुख’ मान लिया गया। उस सुख को पुनः प्राप्त करने और बनाए रखने के लिए जो अंधी छटपटाहट उत्पन्न हुई, वही ‘तृष्णा’ है।
अब तक के चक्र में, अविद्या से गढ़े गए ‘संस्कारों’ ने विज्ञान को जन्म दिया था, और अब यह चेतना विषयों से टकराकर (संपर्क) अनुभूतियाँ (वेदना) उत्पन्न कर रही है। इन अनुभूतियों के प्रति पैदा हुई ‘तृष्णा’ अब एक ऐसा ईंधन तैयार करेगी, जो अस्तित्व को आगे धकेल देगा।
९. उपादान — आसक्ति, ईंधन और आहार
पालि में ‘उपादान’ का मूल और शाब्दिक अर्थ है— ‘ईंधन’ या वह आहार जो अग्नि को जलाए रखता है।
जाहिर है, जब किसी को प्यास लगती है, तो उसे प्यास बुझाने के लिए पानी पर निर्भर होना पड़ता है। उसी तरह, तृष्णा के प्रबल होने पर उपादान होता है।
अग्नि को जलते रहने के लिए जैसे निरंतर ईंधन की आवश्यकता होती है, वैसे ही अस्तित्व की इस चलायमान प्रक्रिया को बनाए रखने के लिए उपादान चाहिए। अविद्या के अंधकार में, यह प्रक्रिया स्वतः ही चार प्रकार के ईंधनों को ग्रहण करती है:
- काम-उपादान: इंद्रिय सुखों की पकड़।
- दृष्टि-उपादान: विचारधाराओं और मान्यताओं की पकड़।
- शीलव्रत-उपादान: नियमों और कर्मकांडों की पकड़।
- अत्तवाद-उपादान: ‘मैं हूँ’ या ‘आत्मा’ की मान्यता का ईंधन।
यह ग्रहण करने (पकड़ने) की प्रक्रिया सचेत या अचेत दोनों अवस्थाओं में हो सकती है। लेकिन तृष्णा की तीव्रता ही अस्तित्व की अग्नि में ईंधन डालने का अचूक कार्य करती है।
१०. भव — अस्तित्व का निर्माण
‘भव’ का अर्थ है— ‘होना’ या अस्तित्व में आना।
उपादान के प्रत्यय (ईंधन) से भव का निर्माण होता है। भव का अर्थ है ‘होना’ या अस्तित्व का एक नया ढांचा तैयार होना। इसे एक सक्रिय प्रक्रिया के रूप में देखना चाहिए।
जैसे नींद में जाने पर मन अनजाने में एक ‘स्वप्न-लोक’ रच लेता है, ठीक वैसे ही उपादान के ईंधन से एक नई मानसिक या भौतिक अवस्था (भव) गढ़ी जाती है। इसे सुत्तों में दो रूपों में समझाया गया है—
- कम्म-भव (कर्म-भव): अर्थात् वह सक्रिय प्रक्रिया जो नए ढांचे का निर्माण कर रही है।
- उपपत्ति-भव: वह अवस्था जो परिणाम स्वरूप उभर कर सामने आती है।
अस्तित्व बनाने या बनाए रखने की प्रक्रिया तीन स्तरों पर घटित होती है:
- काम-भव: इन्द्रिय कामसुखों के स्तर पर जीने की प्रवृत्ति, जो कामलोक के जीवनों की ओर ले जाती है (मानव लोक और ऊपर के छह स्वर्ग)।
- रूप-भव: सूक्ष्म रूप-अवस्था में स्थिर सुख या ध्यान की अवस्था, जो ब्रह्मलोक जैसे ऊँचे लोकों की ओर ले जाती है।
- अरूप-भव: निराकार अवस्था, जहाँ कोई रूप नहीं होता, केवल चित्त की अवस्थाएँ होती हैं (जैसे—असीम आकाश, असीम विज्ञान आदि)।
भव का सरल मूल है: “मैं यह हूँ”, या “मैं यह बनना चाहता हूँ” की धारणा। यही धारणा चित्त को बांधती है—और हर “भव” अगली “जाति” (जन्म) बन जाती है। जब इस “भव-तृष्णा” का क्षय हो जाए, तब चित्त किसी बनने की ओर नहीं जाता—और वहीं संसार रुक जाता है।
“संसार” बाहर की गति है—जन्म, मृत्यु, और पुनर्जन्म का चक्र। जबकि “भव” भीतर की गति है—चित्त की प्रवृत्ति जो उस चक्र को चलाती है।
११. जाति — प्रादुर्भाव
भव के प्रत्यय से जाति (जन्म) घटित होती है। प्रतीत्य समुत्पाद के इस सूक्ष्म स्तर पर, ‘जाति’ को केवल माता के गर्भ से जन्म लेने तक सीमित नहीं समझना चाहिए।
जाति का वास्तविक अर्थ है— उस रचे हुए ‘भव’ (अस्तित्व के ढांचे) के साथ पूरी तरह से एकाकार हो जाना या तादात्म्य स्थापित कर लेना। जब अविद्या के कारण उस नई निर्मित अवस्था को “यह मैं हूँ”, “यह मेरा है”, या “यह मेरी आत्मा है” के रूप में ग्रहण कर लिया जाता है, तब उस विशेष लोक या अवस्था में ‘जन्म’ (जाति) हो जाता है। एक सीमित पहचान का प्रादुर्भाव हो गया।
दैनिक जीवन का उदाहरण: भव और जाति
भव और जाति केवल मृत्यु के बाद ही नहीं, बल्कि हर पल घट रहे हैं। इसे दैनिक जीवन में ‘सो कर स्वप्न देखने’ या ‘चिंता करने’ से समझें:
- भव: मान लीजिए आप भविष्य की किसी चिंता में डूब जाते हैं। मन तुरंत वर्तमान से कटकर एक नया ‘चिंता का लोक’ रच लेता है। यह ‘भव’ है—अस्तित्व का एक नया ढांचा तैयार होना।
- जाति: जैसे ही आप यह भूल जाते हैं कि आप वर्तमान में कुर्सी पर बैठे हैं, और उस चिंता के पात्र बन जाते हैं—यह मान लेते हैं कि “यह मैं ही हूँ जो संकट में है”—तो आपका उस ‘चिंता के लोक’ में जन्म (जाति) हो जाता है।
कर्म वह शक्ति है जो हमें किसी विशेष भव (लोक) की ओर खींचती है:
- यदि मन में काम-राग के संस्कार भारी हैं, तो चेतना काम-भव (इन्द्रिय प्रधान लोक) की ओर झुकेगी।
- यदि मन में एकाग्रता और मैत्री है, तो चेतना रूप-भव (ब्रह्म-भव) की ओर उठेगी।
- यदि मन केवल शून्य आकाश या चेतना पर टिका है, तो वह अरूप-भव की ओर जाएगा।
ये लोक केवल बाहर भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि चित्त की अवस्थाएँ भी हैं।
१२. जरामरण — बुढ़ापा और मौत
जो भी निर्मित हुआ है (संस्कार से लेकर भव तक), और जिसका प्रादुर्भाव (जाति) हुआ है, उसका स्वभाव ही है— क्षय होना और बिखरना। इस विघटन की अपरिहार्य प्रक्रिया ही जरामरण है।
चूँकि अविद्या के कारण उस अनित्य ढांचे और पहचान को ‘मैं’ या ‘मेरा’ मान लिया गया था, इसलिए उसके बिखरने पर स्वतः ही शोक, विलाप (रोना-पीटना), दर्द, व्यथा (दौर्मनस्य, मानसिक संताप) और निराशा उत्पन्न होते हैं।
इस प्रकार, केवल ‘अविद्या’ रूपी अंधकार से शुरू हुई यह कर्ता-रहित प्रक्रिया, दुःखों के एक विशाल पहाड़ के रूप में खड़ी हो जाती है।
एवमेतस्स केवलस्स दुक्खक्खन्धस्स समुदयो होति।
इस प्रकार इस संपूर्ण दुःख-स्कंध का समुदय होता है।

प्रतीत्य समुत्पाद केवल दुःख के निर्माण का सिद्धांत नहीं है; यह मुक्ति का साक्षात् विज्ञान भी है। ‘इदप्पच्चयता’ का अंतिम सूत्र उद्घोष करता है: “इसके निरोध से, उसका निरोध हो जाता है” (इमस्स निरोधा इदं निरुज्झति)।
चूँकि यह संपूर्ण ढांचा प्रत्ययों पर टिका है, अतः किसी एक महत्वपूर्ण कड़ी पर प्रत्यय के निरुद्ध होते ही यह पूरा चक्र ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है। मूल बुद्ध वचन के आधार पर इस चक्र को भेदने के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
१. विज्ञान और नाम-रूप
सुत्तों का गहराई से अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि भगवान बुद्ध ने चक्र को भेदने के लिए सबसे अधिक बल विज्ञान और नाम-रूप के परस्पर आश्रित लूप (अन्योन्याश्रय संबंध) को तोड़ने पर दिया है।
दीघ निकाय के प्रसिद्ध महानिदान सुत्त और नगरसुत्त (संयुक्तनिकाय १२.६५) जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण उपदेशों में, बुद्ध अविद्या या संस्कारों तक पीछे नहीं जाते। वे विज्ञान और नाम-रूप के इसी जंजाल को अस्तित्व का केंद्र बताते हैं। अविद्या के कारण गढ़े जा रहे संस्कार ही ‘विज्ञान’ रूपी बीज को ‘नाम-रूप’ रूपी खेत में रोपने का कार्य करते हैं।
भेदने की प्रक्रिया:
भगवान के अनुसार, जब साधक प्रज्ञा के बल पर रूप, वेदना, संज्ञा या संस्कारों में कोई आश्रय नहीं खोजता, तो विज्ञान ‘अप्रतिष्ठित’ हो जाता है। बुद्ध इसे एक अत्यंत सुंदर उपमा से समझाते हैं: “जैसे यदि पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण या नीचे कोई दीवार, वृक्ष या जल न हो, तो सूर्य की किरण कहाँ जाकर टिकेगी? कहीं नहीं।”
ठीक इसी प्रकार, जब विज्ञान को चिपकने के लिए कोई आधार नहीं मिलता, तो वह बीज अंकुरित नहीं हो पाता। विज्ञान के इस आधारहीन और शांत हो जाने को सुत्तों में ‘विज्ञान उपसम’ कहा गया है। जैसे ही विज्ञान अप्रतिष्ठित होता है, नाम-रूप का निरोध हो जाता है, और संपूर्ण चक्र यहीं से बिखर जाता है।
जैसा कि पहले ‘नाम-रूप’ के संदर्भ में बताया गया था, बुद्ध इसे दो सरकंडों की उपमा देते हैं। यदि विज्ञान रूपी एक सरकंडे को आसक्ति-रहित होकर हटा दिया जाए, तो नाम-रूप रूपी दूसरा सरकंडा स्वतः ही गिर जाएगा।
१२ बनाम ९ कड़ियाँ
चूँकि महानिदान सुत्त सहित कई सुत्तों में भगवान बुद्ध ने प्रतीत्य समुत्पाद की व्याख्या केवल ‘विज्ञान और नाम-रूप’ तक ही की है (इसमें अविद्या और संस्कार की कड़ियाँ नहीं हैं), इसलिए कई बौद्ध अध्येताओं का यह स्पष्ट मानना है कि मूल प्रतीत्य समुत्पाद आवश्यक रूप से ‘१२ कड़ियों’ का ही कोई जड़ ढांचा नहीं था। सुत्तों में इसके ९, १० या उससे कम कड़ियों वाले रूप भी प्रचुरता से मिलते हैं। कड़ियाँ ९ हों या १२, यह सिद्धांत मूलतः एक ही सत्य को उद्घाटित करता है कि अस्तित्व एक परस्पर निर्भर प्रक्रिया मात्र है।
२. वेदना और तृष्णा का अंतराल
इस संदर्भ में आधुनिक युग की लोकप्रिय ध्यान और विपश्यना परंपराओं का उल्लेख करना भी प्रासंगिक है। आधुनिक ध्यान-पद्धतियों में वेदना (या संवेदना) और तृष्णा के बीच के अंतराल को चक्र तोड़ने का सबसे प्रमुख और व्यावहारिक स्थान माना जाता है।
यद्यपि प्रारंभिक सुत्तों में भगवान बुद्ध या उनके प्रमुख श्रावकों ने ‘केवल इसी कड़ी’ को भेदने के बिंदु के रूप में विशेष रूप से या एकाकी रूप से रेखांकित नहीं किया है, फिर भी प्रायोगिक धरातल पर यह एक सुलभ रणभूमि सिद्ध हो सकती है।
भेदने की प्रक्रिया:
अतीत के प्रत्ययों और वर्तमान के संपर्क से ‘वेदना’ का उठना एक प्राकृतिक विपाक है, जिसे रोका नहीं जा सकता। किंतु, वेदना से तृष्णा का उत्पन्न होना स्वचालित नहीं है; यह अविद्या की उपस्थिति में ही होता है। जब स्मृति और सचेतता के प्रकाश में यह स्पष्ट देख लिया जाता है कि सुखद या दुःखद वेदना केवल ‘उत्पन्न और नष्ट होने वाले अनित्य धर्म’ हैं, तो उनके प्रति अंधी तृष्णा (राग या द्वेष) उत्पन्न नहीं होती। तृष्णा के न उठने से उपादान (ईंधन) नहीं बनता, और चक्र आगे नहीं बढ़ पाता।
३. अविद्या और संस्कारों का निरोध
यह चक्र का सबसे सूक्ष्म और अंतिम उच्छेद है। संस्कार (रचनाएँ) अविद्या रूपी अंधकार के कारण ही गढ़े जाते हैं।
भेदने की प्रक्रिया:
बुद्ध इसे गृहकारक (घर बनाने वाले) की उपमा देते हैं। अविद्या वह आर्किटेक्ट (वास्तुकार) है जो नक्शा बनाता है, और संस्कार वे ईंटें हैं जिनसे भव (घर) खड़ा होता है। जब तक अविद्या है, संस्कार बनते रहेंगे। संस्कार विज्ञान को धक्का देंगे, विज्ञान नाम-रूप में उतरेगा, और दुख का पूरा वृक्ष खड़ा हो जाएगा।
यहाँ चक्र को तोड़ने का उपाय है ‘अविद्या का अशेष विराग निरोध’।
जब प्रज्ञा के पूर्ण आलोक में साधक देखता है कि सभी संस्कार अनित्य हैं, दुख हैं और अनात्म हैं, तो अविद्या का पर्दा फट जाता है। चित्त यह भली-भांति जान लेता है कि अब ‘गढ़ने’ या ‘रचने’ के लिए कुछ भी शेष नहीं है।
इसी क्षण ‘संस्कार-निरोध’ (सब्बसंखारसमथो) फलित होता है। कोई नया कर्म या गति नहीं बनती।
- अविद्या के निरोध से संस्कारों का निरोध।
- संस्कारों के निरोध से विज्ञान का निरोध।
- विज्ञान के निरोध से नाम-रूप का निरोध।
- और इसी क्रम में जरामरण और शोक का पूर्ण अंत हो जाता है।
अंतिम अवस्था: अतम्मयता (विमुक्ति)
इस संपूर्ण चक्र के टूट जाने पर जो विशुद्ध अवस्था शेष रहती है, उसे ईबीटी में एक अत्यंत सूक्ष्म और पारिभाषिक शब्द से इंगित किया गया है— अतम्मयता।
अतम्मयता (अ-तन्मयता) का अर्थ है— “उससे तन्मय न होना” या “उससे निर्मित न होना”। अर्थात, उस अवस्था में डूबना नहीं, उसमें अपनी पहचान न गढ़ना, और उससे गढ़ा न जाना। जैसे कोई व्यक्ति पूरे होश में काम करता है—काम में रहता है, पर उसमें खोता नहीं; या जैसे कोई तैराक सिर पानी के ऊपर रखकर तैरता है।
जब प्रज्ञा से यह साक्षात् हो जाता है कि यह पूरी कड़ियों की प्रक्रिया केवल एक भ्रमजाल और माया है, तो चित्त इससे पूरी तरह विरक्त (निब्बिदा) हो जाता है। जब साधक गहराई से देखता है कि:
- संस्कार केवल बुलबुले हैं,
- विज्ञान केवल माया (मरिची) है,
- नाम-रूप केवल तत्वों का खेल है…
…तो वह विज्ञान के किसी भी खेल में हिस्सा नहीं लेता। वह न तो ‘अस्तित्व’ की चाह रखता है (भव-तण्हा), और न ही अस्तित्व के ‘विनाश’ की चाह रखता है (विभव-तण्हा)।
इस अवस्था में, प्रक्रियाएं चल रही होती हैं—आँख देखती है, कान सुनते हैं, वेदना भी उठती है—किंतु चित्त उनमें कोई ‘भव’ या ‘मैं-पन’ नहीं रचता। वह चित्त ‘अनिदस्सन’ (निराकार/अदृश्य) हो जाता है।
“जैसे पका हुआ फल पेड़ की डाल से स्वयं गिर पड़ता है,” वैसे ही उसका चित्त भवचक्र से टूटकर गिर जाता है। यहाँ न तो अविद्या है जो संस्कार रचे, और न ही तृष्णा है जो विज्ञान को नाम-रूप से चिपकाए। यह शांति है। यह निर्वाण है।
प्रतीत्य समुत्पाद का यही वह यथार्थ बोध है, जो आत्मा के होने या न होने के प्रश्न को पूरी तरह दरकिनार करता है। यह अस्तित्व को केवल कारण और परिणाम की शृंखलाओं के नजरिए से देखता है, जहाँ वे उत्पन्न होती हैं और निरुद्ध हो जाती हैं। जब यह शृंखला अविद्या से प्रज्ञा की ओर मुड़ जाती है— जहाँ अस्तित्व को जलाने वाला ईंधन समाप्त हो जाता है, और भंवर सदा के लिए शांत हो जाता है— यही बुद्ध का असली संदेश है।
एवमेतस्स केवलस्स दुक्खक्खन्धस्स निरोधो होति।
इस प्रकार इस संपूर्ण दुःख-स्कंध का निरोध होता है।
उपसंहार: मुक्ति का आश्वासन
प्रतीत्य समुत्पाद का यह बारह कड़ियों वाला चक्र पहली नज़र में अत्यंत डरावना, जटिल और ‘फंसाने वाला’ लग सकता है। लेकिन भगवान बुद्ध ने इसे हमें डराने के लिए नहीं, बल्कि यह आशा का आश्वासन देने के लिए देशित किया है कि: “यदि यह चक्र निर्मित हुआ है, तो इसे ध्वस्त भी किया जा सकता है।”
हमें एक साथ इन बारह कड़ियों से युद्ध नहीं करना है; यह असंभव है। हमें केवल वर्तमान क्षण में लौटकर किसी एक संधि को भेदना है। चाहे वह ध्यान में बैठे हुए नाम-रूप से विज्ञान को हटाना हो, या दैनिक जीवन में उठने वाली किसी वेदना (अनुभूति) के प्रति केवल सति (होश) बनाए रखना हो। जो साधक सजगता के साथ केवल एक कड़ी को साध लेता है, वह अंततः दुःखों के इस पूरे पहाड़ को ढहा देता है। मुक्ति कोई दूर का स्थान नहीं है; वह इसी चक्र के टूटने की अवस्था का नाम है।
