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प्रतिकूल चिंतन
सटीक आरोपण
अशुभ और आहार-प्रतिकूल भावना में वे पुरानी संज्ञाएँ टूटती हैं, जो शरीर और भोजन के प्रति ‘राग’ पैदा करती थीं। लेकिन एक साधारण चित्त दिन-रात केवल राग का ही शिकार नहीं होता, वह ‘द्वेष’ (दुर्भावना, घृणा या क्रोध) की आग में भी जलता रहता है।
आम इंसान का चित्त एक गुलाम की तरह होता है। जब उसके सामने कोई मनचाही चीज़ आती है, तो वह स्वभावतः ‘राग’ से भर जाता है। और जब कोई अनचाही, गंदी या अप्रिय परिस्थिति आती है, तो वह ‘पटिघ’ (प्रतिरोध, घर्षण) से सुलग उठता है। यह सुत्त साधक को इसी स्वचालित गुलामी से आज़ाद कर ‘संज्ञाओं का मास्टर’ बनाता है। भगवान यहाँ साधक के हाथ में चित्त का नियंत्रण सौंप रहे हैं।
विपरीत देखने की कला
यह साधना संज्ञाओं को अपनी इच्छा के अनुसार बदलने की एक उपयोगी कला है:
- राग का शमन: जब परिस्थितियाँ सुंदर और आकर्षक (घिनरहित) हों, और चित्त में कामराग या लोभ उपजने लगे, तो उस सम्मोहन को तोड़ने के लिए तुरंत उस परिस्थिति पर ‘अशुभ’ या ‘अनित्य’ (घिनौने पक्ष) की संज्ञा आरोपित कर देना।
- द्वेष का शमन: जब परिस्थिति अत्यंत अप्रिय, गंदी या क्रोध दिलाने वाली (घिनौनी) हो, और चित्त द्वेष से जलने लगे, तो उस अग्नि को बुझाने के लिए तुरंत ‘मेत्ता’, ‘करुणा’, या ‘धातुओं’ (घिनरहित पक्ष) की संज्ञा आरोपित कर देना।
अभ्यास कैसे करें?
दैनिक जीवन में इस सुत्त का अभ्यास पल-पल की तत्परता माँगता है:
- आकर्षण का विखंडन: मोबाइल स्क्रीन पर या रास्ते में कोई अत्यंत कामुक और आकर्षक शरीर देखकर जब राग भड़कने लगे, तो तुरंत अपनी दृष्टि का गियर बदलें। उस चिकनी त्वचा के नीचे बहते रक्त, मवाद और हड्डियों (घिनौने पक्ष) को देखें। वासना का ज्वर वहीं ठंडा पड़ जाएगा।
- प्रतिरोध का विखंडन: जब किसी व्यक्ति का कटु व्यवहार आपको चुभे, या कोई अत्यंत गंदी जगह देखकर घिन आए, तो तुरंत करुणा या धातुओं (घिनरहित पक्ष) का चश्मा पहन लें। देखें कि वह व्यक्ति भी अविद्या और अपने विकारों का मारा हुआ एक रोगी ही है, या वह गंदगी भी केवल पृथ्वी और जल धातु का ही एक रूप है। भीतर का प्रतिरोध और द्वेष तुरंत वाष्पित हो जाएगा।
सफलता का पैमाना
इस साधना का उद्देश्य संसार से भागना या संवेदनहीन होकर पत्थर बन जाना नहीं है। सफलता तब मानी जाती है जब संसार का कोई भी दृश्य, शब्द या परिस्थिति आपके भीतर राग या द्वेष को पैदा करने में असमर्थ हो जाए। आप आकर्षण या प्रतिकूलता के बीच खड़े होकर भी पूरी तरह से सचेत, स्मृतिमान और उपेक्षक रह सकें।
मूल साधना
- अच्छा होगा, यदि साधक ‘घिनौनी परिस्थिति’ में रहकर भी, सही समय पर घिनरहित पक्ष को देखते हुए विहार करें।
- अच्छा होगा, यदि साधक ‘घिनरहित परिस्थिति’ में रहकर भी, सही समय पर घिनौने पक्ष को देखते हुए विहार करें।
- अच्छा होगा, यदि साधक, ‘घिनौनी और घिनरहित’, दोनों ही परिस्थितियों में रहकर भी, सही समय पर—
- मात्र ‘घिनौने पक्ष’ को देखते हुए विहार करें,
- मात्र ‘घिनरहित पक्ष’ को देखते हुए विहार करें,
- या दोनों हटाकर, सचेत, स्मृतिमान और उपेक्षक होकर विहार करें।
ऐसा क्यों करें?
- ‘कहीं मुझे द्वेष जगाने वाली परिस्थिति में द्वेष न जाग जाए’—इस ध्येय से साधक को घिनौनी परिस्थिति में रहकर भी, सही समय पर ‘घिनरहित पक्ष’ को देखते हुए विहार करना चाहिए।
- ‘कहीं मुझे राग जगाने वाली परिस्थिति में राग न जाग जाए’—इस ध्येय से साधक को घिनरहित परिस्थिति में रहकर भी, सही समय पर ‘घिनौने पक्ष’ को देखते हुए विहार करना चाहिए।
- ‘कहीं मुझे द्वेष जगाने वाली परिस्थिति में द्वेष न जाग जाए, और राग जगाने वाली परिस्थिति में राग न जाग जाए’—इस ध्येय से साधक को, घिनौनी और घिनरहित, दोनों की परिस्थितियों में रहकर भी, सही समय पर मात्र ‘घिनरहित पक्ष’ को देखते हुए विहार करना चाहिए।
- ‘कहीं मुझे राग जगाने वाली परिस्थिति में राग न जाग जाए, और द्वेष जगाने वाली परिस्थिति में द्वेष न जाग जाए’—इस ध्येय से साधक को, घिनौनी व घिनरहित, दोनों की परिस्थिति में रहकर भी, सही समय पर मात्र ‘घिनौना पक्ष’ को देखते हुए विहार करना चाहिए।
- ‘कहीं मुझे राग जगाने वाली परिस्थिति में रहकर, किसी भी आलंबन में थोड़ी-सा भी राग न जाग जाए,
- और द्वेष जगाने वाली परिस्थिति में रहकर, किसी भी आलंबन में, थोड़ा-सा भी द्वेष न जाग जाए,
- और मोह जगाने वाली परिस्थिति में रहकर, किसी भी आलंबन में, थोड़ा-सा भी मोह न जाग जाए’
—इस ध्येय से साधक को, घिनौनी और घिनरहित, दोनों की परिस्थितियों में रहकर भी, सही समय पर दोनों को हटाकर, ‘सचेत, स्मृतिमान और उपेक्षक’ होकर विहार करना चाहिए।
—अंगुत्तरनिकाय ५:१४४
उदाहरण
मार दूसी द्वारा वश किए जाने पर ब्राह्मण गृहस्थों ने भिक्षुसंघ को क्रोध-आक्रोश दिखाते हुए खूब गाली-गलौच और अपमान-परेशान किया।
तब भगवान ककुसन्ध ने भिक्षुसंघ से कहा, “भिक्षुओं! पापी मार दूसी ने ब्राह्मण गृहस्थों का मन वश में किया है, ताकि (आपका चित्त विचलित होने पर) उसे आप का आना-जाना पता चलें। इसलिए भिक्षुओं, निर्बैर निर्द्वेष रहकर, विस्तृत विराट असीम मेत्ता चित्त… करुण चित्त… मुदिता चित्त… उपेक्षा चित्त को तमाम दिशाओं में फैलाकर, संपूर्ण ब्रह्मांड में परिपूर्णतः व्याप्त करें।”
…
तब मार दूसी द्वारा वश किए जाने पर भिन्न ब्राह्मण गृहस्थों ने श्रद्धा से भावविभोर होकर भिक्षुसंघ का खूब आदर-सम्मान वंदन-पूजन किया।
तब भगवान ककुसन्ध ने भिक्षुसंघ से कहा, “भिक्षुओं! पापी मार दूसी ने पुनः ब्राह्मण गृहस्थों का मन वश में किया है, ताकि (चित्त विचलित होने पर) उसे आप का आना-जाना पता चलें। इसलिए भिक्षुओं, अब काया के प्रति अशुभ संज्ञा स्थापित करें, आहार के प्रति विपरीत संज्ञा स्थापित करें, सभी लोक के प्रति निरस संज्ञा स्थापित करें, सभी संस्कारों के प्रति अनित्य संज्ञा स्थापित करें, तथा मरण संज्ञा स्थापित करें।”