✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
दुक्खा पटिपदा - संज्ञा का खेल! मुख्य > लेख 3. लेख पटिपदामार्गदर्शिका संज्ञा

— दुक्खा पटिपदा —
असुभ सञ्ञा | आहारे पटिकुलसञ्ञा | पटिकुल मनसिकार | नवसिवथिक | मरणसञ्ञा | आदीनव सञ्ञा | सब्बलोके अनभिरतिसञ्ञा | धातु मनसिकार | सब्बसङखारेसु अनिच्चानुसञ्ञा | अनत्त सञ्ञा

दुक्खा पटिपदा

संज्ञा का खेल

लेखक: भिक्खु कश्यप
| १४ मिनट
▶️ नीचे ऑडियो चलाकर पढ़ें।
0:00 0:00

आज के कई साधकों में एक आम गलतफहमी है कि बस आँख बंद करके साँस पर ध्यान (आनापानस्मृति) टिकाने से ही सारे विकार स्वतः नष्ट हो जाएँगे।

लेकिन, जब चित्त कामराग, द्वेष या गहरे अहंकार से ग्रस्त हो, तो केवल साँस देखने से काम नहीं चलता। विकार या तो ध्यान लगने ही नहीं देते, या भीतर ही भीतर दबकर छिपे रहते हैं। ऐसे साधकों के लिए ‘दुक्खा पटिपदा’ (कठोर मार्ग) का विधान है। महाराहुलोवाद सुत्त में इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण मिलता है।

राहुल का प्रसंग

एक बार बुद्ध ने अपने पुत्र राहुल के भीतर बुद्ध के प्रति आसक्ति देखी। तब उन्होंने राहुल को अनात्म संज्ञा की साधना करने का निर्देश दिया। लेकिन राहुल के उपाध्याय सारिपुत्त भंते ने उसे सामान्य रूप से ‘आनापानस्मृति’ करने की सलाह दे दी।

उलझन में पड़े राहुल जब वापस भगवान के पास गए और आनापानस्मृति का सही तरीका पूछा, तो बुद्ध ने उन्हें सीधे साँस पर ध्यान लगाने की विधि नहीं बताई! बल्कि, उन्होंने राहुल के चित्त की ज़मीन तैयार करने के लिए उन्हें १६ प्रकार की ‘कुशल संज्ञाओं’ का एक कड़ा और विस्तृत अभ्यास थमा दिया:

(१-५) पाँच धातुओं का भेदन: भगवान ने राहुल को शरीर के भीतर की कठोरता को पृथ्वी धातु, तरल पदार्थों को जल धातु, गर्मी को अग्नि धातु, वायु को वायु धातु, और खाली स्थानों को आकाश धातु के रूप में देखने को कहा। (“उसे यथास्वरूप सम्यक प्रज्ञा से देखना है कि यह—‘मेरी नहीं, मेरा आत्म नहीं, मैं यह नहीं!’”)

(६-१०) पाँच धातुओं के समतुल्य भावना: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के अनुरूप साधना करो। जैसे इन पर अशुद्ध (गू, मूत्र) कुछ भी फेंका जाए, तो ये घृणित नहीं होते। उसी तरह साधना करने पर, मनचाहे और अनचाहे संपर्क चित्त पर छाप नहीं छोड़ेंगे।

(११-१४) चार ब्रह्मविहार: मेत्ता विकसित करो, जिससे दुर्भावना (“ब्यापाद”) छूटेगी। करुणा विकसित करो, जिससे हिंसक वृत्ति (“विहेसा”) छूटेगी। मुदिता विकसित करो, जिससे अप्रसन्नता (“अरति”) छूटेगी। उपेक्षा विकसित करो, जिससे प्रतिरोध (“पटिघ”) छूटेगा।

(१५-१६) अशुभ और अनित्य संज्ञा: अशुभ भावना विकसित करो, जिससे राग छूटेगा। अनित्य संज्ञा विकसित करो, जिससे ‘मैं हूँ’ का अहंभाव (“अस्मिमान”) छूटेगा।

इन १६ कुशल संज्ञाओं के अभ्यास से चित्त की सफाई करने का निर्देश देने के बाद ही भगवान ने राहुल को आनापानसति के चरण सिखाए।

आखिर भगवान ने अपने ही पुत्र को सीधे साँस देखने को क्यों नहीं कहा? क्योंकि वे जानते थे कि आसक्त चित्त को केवल आनापानस्मृति से लाभ नहीं होगा। अकुशल वृत्तियों को जड़ से उखाड़ने के लिए ‘संज्ञा’ को घिस-घिसकर बदलना पड़ता है।

तो, संज्ञा क्या है?

क्या किसी कौए को कोई भैंस खूबसूरत लग सकती है? या क्या किसी कुत्ते के भीतर किसी गाय को देखकर काम-वासना जाग सकती है?

बिल्कुल नहीं! लेकिन, क्यों नहीं?

क्योंकि उनकी ‘शुभ संज्ञा’ (सुंदरता और आकर्षण का पैमाना) उनकी अपनी ‘प्रजाति’ के अनुकूल तय होती है। प्रकृति का यह नियम है कि किसी भी जीव को अपनी ही प्रजाति के जीव आकर्षित करते हैं।

ठीक इसी तरह, हम मनुष्यों के भीतर भी जो शारीरिक आकर्षण पैदा होता है, वह केवल हमारी अपनी ‘शुभ संज्ञा’ का ही परिणाम है। इसी संज्ञा के कारण कोई हमें खूबसूरत लगता है, तो कोई बदसूरत। लेकिन वास्तविकता में, सामने केवल हाड़-मांस से बनी, भिन्न-भिन्न छटाओं की एक ‘काया’ होती है। जो उस काया को जिस ‘संज्ञा’ (नज़रिए या फ़िल्टर) से देखेगा, वह उसके लिए ठीक वैसा ही यथार्थ बनकर प्रकट होगी।

सौंदर्य या कुरुपता उस वस्तु में नहीं, बल्कि हमारे चित्त की ‘संज्ञा’ में है।

संज्ञा और दृष्टि

इस तरह चित्त की प्रक्रिया एक जंजीर की तरह काम करती है। जब हम किसी व्यक्ति या परिस्थिति को देखते हैं, तो चित्त सबसे पहले उस पर एक ‘लेबल’ या ठप्पा लगाता है—यही संज्ञा है। यह तात्कालिक होती है। लेकिन, जब हम उसी संज्ञा पर बार-बार अपना ध्यान केंद्रित करते हैं (जिसे “मनसिकार” कहते हैं), तो वह संज्ञा सघन होने लगती है। यही सघन संज्ञा अंततः एक कठोर दृष्टि (धारणा) में बदल जाती है।

इसे दो विपरीत चक्रों से समझा जा सकता है:

१. पतन का चक्र

मान लीजिए, किसी व्यक्ति में कोई खामी है। यदि हम अपना पूरा ध्यान केवल उसके बुरे पक्ष पर टिका दें (अयोनिसो मनसिकार), तो हम उस व्यक्ति पर ‘पटिघ संज्ञा’ (विरोध या खोट का ठप्पा) लगा देते हैं।

  • वेदना: इस संज्ञा के कारण, स्वभावतः चित्त संकुचित हो जाता है, और उस व्यक्ति की याद आते ही भीतर एक कड़वी अनुभूति होने लगती है।
  • वितर्क: चित्त में लगातार उसकी बुराई के ही विचार गूँजने लगते हैं।
  • परिणाम (दृष्टि): जब यह प्रक्रिया बार-बार दोहराई जाती है, तो वह तात्कालिक ‘संज्ञा’ एक पक्की नफरत भरी ‘दृष्टि’ बन जाती है। चित्त उसके प्रति संकुचित ही बने रहता है, दुर्भावना की बेड़ियों में जकड़ा रहता है, और उस व्यक्ति को अपने रास्ते से हटाने के उद्देश्य से पाप करने लगता है।

२. उत्थान का चक्र

लेकिन बुद्ध का मार्ग हमें सिखाता है कि संज्ञा पत्थर की लकीर नहीं है। जब कोई प्रज्ञावान साधक जान-बूझकर अपना ध्यान उस व्यक्ति की बुराई से हटाकर उसकी किसी अच्छाई पर लगाता है (योनिसो मनसिकार), तो पुरानी ‘पटिघ संज्ञा’ (संज्ञा उपादानस्कंध) टूटने लगती है।

जैसे ही यह नई और कुशल संज्ञा हावी होती है:

  • भीतर की कड़वाहट मिटने लगती है और चित्त में विस्तार और खुलापन आता है।
  • घृणा की जगह ‘मेत्ता’ (सद्भावना) जन्म लेती है।
  • यह नई ‘संज्ञा’ लगातार अभ्यास से एक ऐसी कुशल दृष्टि बन जाती है जो व्यक्ति को हर परिस्थिति में पाप से दूर रखती है।

सम्मुति सच्च बनाम परमार्थ सच्च

आज की सामान्य थेरवाद परंपरा में विपस्सना को अक्सर केवल ‘तिलक्खण’ (अनिच्च, दुक्ख, अनत्त) के चश्मे से ही समझाया जाता है। यह मान लिया गया है कि हमारी रोज़मर्रा की संज्ञाएँ केवल ‘पारंपरिक सत्य’ (सम्मुति सच्च) हैं, और परमार्थ सत्य केवल इन तीन लक्षणों को देखना है।

लेकिन यदि हम भगवान बुद्ध के मूल वचनों का अध्ययन करें, तो ‘पारंपरिक सत्य बनाम परमार्थ सत्य’ का यह कठोर विभाजन उस रूप में कहीं नहीं मिलता। भगवान ने सत्य को केवल एक ही इस रूखे सिद्धांत के रूप में देखने के बजाय, हमेशा ‘संज्ञा’ की सक्रिय और व्यावहारिक भूमिका पर ज़ोर दिया। क्योंकि संज्ञाओं को आवश्यकता और परिस्थिति देखकर एक ‘औज़ार’ की तरह बदला और इस्तेमाल किया जा सकता है।

चार प्रकार के नज़रिए

इसे एक सुत्त से समझें, जिसे आयुष्मान आनन्द सारिपुत्त भंते से पूछते हैं।

“मित्र सारिपुत्त, किस कारण, किन परिस्थितियों से कुछ सत्व इसी जीवन में परिनिर्वृत (मुक्त) नहीं होते?”

सारिपुत्त भंते उत्तर देते हैं: “मित्र आनंद! जिन सत्वों को यथार्थ रूप में यह पता नहीं चलता कि—

  • ‘यह संज्ञा (“हानभागिय”) पतन की ओर ले जाने वाला है’
  • ‘यह संज्ञा (“ठितिभागिय”) स्थिरता या ठहराव लाने वाला है’
  • ‘यह संज्ञा (“विसेसभागिय”) विशिष्टता (या प्रगति) की ओर ले जाने वाला है’
  • ‘यह संज्ञा (“निब्बेधभागिय”) सत्य को भेदने वाला है’

—वे सत्व इसी जीवन में मुक्त नहीं होते। और जो साधक इन चार प्रकार के नज़रियों को यथार्थ रूप से जान लेते हैं, वे इसी जीवन में परिनिर्वृत होते हैं।”

— अंगुत्तरनिकाय ४:१७९

यहाँ सारिपुत्त भंते बता रहे हैं कि साधक की मुक्ति इस बात पर निर्भर करती है कि उसे अपनी “संज्ञाओं के प्रभाव” का यथार्थ ज्ञान है या नहीं। सारिपुत्त भंते ने जो ये चार संज्ञाएँ बताईं, असल में ये हमारे चित्त के ‘गियर’ की तरह हैं। आइए इन्हें एक-एक कर उदाहरण से समझते हैं:

१. हानभागिय (पतन में सहायक)

मान लीजिए कोई साधक अकेला शांत बैठा है। तभी अचानक उसके मन में किसी व्यक्ति के प्रति कामुक विचार उठने लगता है। उस पर पुरानी ‘शुभ संज्ञा’ (शारीरिक आकर्षण का नज़रिया, अर्थात, संज्ञा उपादानस्कंध) हावी होने लगती है। चित्त पर एक नशा-सा छाने लगता है और वह कामराग के रंग में रँगने लगता है। थोड़ी ही देर में वह अकुशल कामुक दलदल में बुरी तरह गिर पड़ता है। यह पतन (हानभागिय) है!

२. ठितिभागिय (स्थिरता में सहायक)

अब, मान लीजिए उसने यहीं अपना होश सँभाला (स्मृति और सचेतता जगाई), और बड़ी तत्परता (आतापी) से अपनी उस ‘शुभ संज्ञा’ को ‘अशुभ संज्ञा’ में बदलने लगा। चित्त में थोड़ा संघर्ष होने पर भी, आखिरकार वह सफल होने लगा। उसकी संज्ञा बदल गयी और कामराग का रंग उतरने लगा। उसकी दुर्गति रुक गई और उसका चित्त पुनः स्थिर होने लगा (ठितिभागिय)।

३. विसेसभागिय (विशिष्टता में सहायक)

उसने स्वयं को गिरने से बचा लिया। लेकिन अभी एक बड़े दबाव और संयम के साथ उसका चित्त एक स्थिति में रुका हुआ है, और कामुकता पृष्ठभूमि में चली गई है। अब आगे, कामुकता से पूरी तरह विलग होने के लिए उसे चित्त को ऊँचा (“अधिचित्त”) उठाना पड़ेगा। यहीं ‘विसेसभागिय’ काम आता है।

वह चित्त को ऊँचा उठाने के लिए आनापानस्मृति या मेत्ता भावना करने लगता है। कुछ समय साधना करने पर वह सफल होता है, और उसका चित्त ‘प्रथम ध्यान’ अवस्था में प्रवेश करता है—जहाँ वह कामुकता और अकुशल स्वभावों से विलग हो जाता है, और उसका चित्त विलगता से जन्मे प्रीति-सुख में प्रवेश करता है। या कोई साधक इससे भी आगे बढ़कर, रूप की संज्ञा छोड़कर ‘अनंत आकाश’ की संज्ञा अपनाकर अरूप आयाम में प्रवेश कर जाता है।

४. निब्बेधभागिय (भेदन में सहायक)

और अंत में आता है ‘निब्बेधभागिय’। यह बुद्ध की शिक्षा का अंतिम कदम है। कोई कितनी भी ऊँची समाधि में क्यों न पहुँच जाए, अगर अविद्या नहीं टूटी, तो समय बीतने पर संसार में वापस लौटना ही पड़ेगा।

मान लीजिए साधक किसी ऊँची समाधि में है। चित्त एकदम निर्मल और उज्ज्वल है। अब वह इस ऊँची अवस्था में ठहरने या आगे बढ़ने के बजाय, इसी अवस्था पर ‘अनिच्च संज्ञा’ (अनित्यता), ‘विराग संज्ञा’, और ‘निरोध संज्ञा’ लगाता है। वह देखता है कि— “यह समाधि अवस्था भी कारणों से संस्कृत (बनी हुई) है। जो बना है (सङ्खत), वह टूटेगा।” जब साधक समाधि की अवस्थाओं को भी इस भेदक नज़रिए से देखता है, तो अविद्या का जाला फटने लगता है। सबसे गहरे राग (भव-राग) की जड़ उखड़ने लगती है। यही वह भेदक संज्ञा है जो सत्वों को ‘इसी जीवन में परिनिर्वृत’ (मुक्त) करा सकती है।

तो बात साफ है। संसार के सारे अनुभव सिर्फ कच्चा माल हैं। आप समय-समय पर, उन पर कौन-सी संज्ञा (नज़रिया) लगाते हैं—पतन की, ठहराव की, ऊँचाई की, या मुक्ति की—यह चुनाव पूरी तरह आपके हाथ में है। और इसी संज्ञा को बदलने की कला पर आपकी मुक्ति निर्भर करती है।

आतापी सम्पजानो सतिमा

हम यह तो समझ गए कि पतन से बचने के लिए हमें अपनी संज्ञा रूपी ‘गियर’ को बदलना है। लेकिन, बिना ‘क्लच’ दबाए गाड़ी का गियर नहीं बदला जा सकता! साधना में यह क्लच है—तत्पर, सचेत और स्मृतिमान होना।

“आतापी” का अर्थ, दरअसल, आर्य अष्टांगिक मार्ग के ‘सम्यक प्रयास’ से संबंधित है। यह वह भावना है जो बिना थके सद्गुणों के संरक्षण और अवगुणों की रोकथाम में लगी रहती है—

और, कोई आतापी (तत्पर, चुस्त, मुस्तैद, वीर्यवान, परिश्रमी) कैसे होता है? कोई सोचता है—

  • ‘यदि अनुत्पन्न पाप, अकुशल स्वभाव उत्पन्न होंगे, तो अनर्थ होगा’—और तब, वह तत्परता जगाता है। इस तरह कोई तत्पर होता है।
  • ‘यदि उत्पन्न पाप, अकुशल स्वभाव त्यागे न गए, तो अनर्थ होगा’—और तब, वह तत्परता जगाता है…
  • ‘यदि अनुत्पन्न कुशल स्वभाव उत्पन्न न हुए, तो अनर्थ होगा’—और तब, वह तत्परता जगाता है…
  • ‘यदि उत्पन्न कुशल स्वभाव खत्म हुए, तो अनर्थ होगा’—और तब, वह तत्परता जगाता है। इस तरह कोई तत्पर होता है।

— संयुत्तनिकाय १६:२

साधक के साथ सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि कामराग या क्रोध की ‘हानभागिय’ संज्ञा इतनी तेज़ी से हावी होती है कि उसे पता ही नहीं चलता कि वह गलत गियर में आ गया है। इसके लिए सचेत (“सम्पजानो”) होना अनिवार्य है।

कोई साधक ‘सचेत’ (“सम्पजानो”) कैसे होता है?

  • उसे वेदनाओं का उत्पन्न होना, स्थित होना, और व्यय होना पता चलता है।
  • उसे विचारों का उत्पन्न होना, स्थित होना, और व्यय होना पता चलता है।
  • उसे संज्ञाओं का उत्पन्न होना, स्थित होना, और व्यय होना पता चलता है।

—इस तरह, कोई साधक सचेत होता है।

—संयुत्तनिकाय ४७:३५

और स्मृति क्या है?

आजकल स्मृति को अक्सर ‘बिना जजमेंट के सब कुछ स्वीकार करने’ के रूप में सिखाया जाता है। लेकिन बुद्ध की सति निष्क्रिय नहीं है। सति का काम ‘पहचानना’ है:

जैसे किसी राजसी गढ़ पर भीतरी प्रजा की रक्षा के लिए, और बाहरी शक्तियों को दूर रखने के लिए एक चतुर, समर्थ और होशियार द्वारपाल होता है, जो संदेहास्पद लोगों को बाहर रखता है, और परिचित भले लोगों को भीतर प्रवेश देता है।

उसी तरह, कोई स्मृतिमान होता है, याददाश्त में बहुत तेज़! पूर्वकाल में किया गया कर्म, पूर्वकाल में कहा गया वचन भी स्मरण रखता है, और अनुस्मरण कर पाता है।

और, तब वह लोक के प्रति लालसा और नाराज़ी हटाकर—

  • काया को काया देखते हुए रहता है—तत्पर, सचेत और स्मृतिमान।
  • वेदना को वेदना देखते हुए रहता है—तत्पर, सचेत और स्मृतिमान।
  • चित्त को चित्त देखते हुए रहता है—तत्पर, सचेत और स्मृतिमान।
  • धम्म को धम्म देखते हुए रहता है—तत्पर, सचेत और स्मृतिमान।

तब, ऐसी द्वारपाल-रूपी स्मृति स्थापित कर, कोई अकुशल का त्याग करता है, और कुशलता को बढ़ाता है, पाप का त्याग करता है, और निष्पापता को बढ़ाता है। और, स्वयं का परिशुद्धतापूर्वक ख्याल रखता है। इस तरह, कोई स्मृतिसंपन्न रहता है।

— अंगुत्तरनिकाय ७:६३

इस उपमा से स्पष्ट है कि सति किसी मॉल के उस गार्ड जैसी नहीं है, जो बिना किसी उद्देश्य के मुस्कुराते हुए सबको आते-जाते देखता है। यह सति उस चतुर सैनिक की तरह है, जो देश की सीमा पर तैनात होता है। वह अत्यंत चौकस रहता है और सुनिश्चित करता है कि केवल कुशल विचार ही भीतर प्रवेश करें, जबकि अकुशल प्रवृत्तियों को वह बाहर ही खदेड़ देता है।

दमन बनाम प्रज्ञा

यहाँ एक भ्रांति को तोड़ना आवश्यक है। ‘संज्ञा बदलने’ का अर्थ अपनी भावनाओं को जबरदस्ती दबाना या आध्यात्मिक पाखंड करना नहीं है।

यदि आपके भीतर किसी के प्रति पटिघ संज्ञा है, तो जबरदस्ती होंठों पर मुस्कान लाकर “मैं मेत्ता कर रहा हूँ” का नाटक करना बुद्ध का मार्ग नहीं है। हमें अपनी भावनाओं को दबाना नहीं है, बल्कि उस ‘कारण’ (संज्ञा) को उखाड़ना है जो वह भावना पैदा कर रही है। जब आप सच में तत्पर होकर अपना नज़रिया घिस-घिसकर बदलते हैं (“सल्लेख”) और सचेत होकर यथार्थ को देखते हैं, तो राग या द्वेष को दबाना नहीं पड़ता, वे खुद-ब-खुद वैसे ही गिर जाते हैं जैसे हाथ से कोई जलता हुआ कोयला छूट जाता है।

संज्ञाओं का शस्त्रागार

यहाँ तक पहुँचते-पहुँचते यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है कि भगवान बुद्ध का मार्ग असल में संज्ञाओं का एक शस्त्रागार है। जिस तरह कोई कारीगर एक पेंच कसने के लिए हथौड़े का इस्तेमाल नहीं करता, बल्कि सही पेचकस चुनता है, उसी तरह साधक को भी अलग-अलग मानसिक विकारों (नीवरणों) के लिए जान-बूझकर अलग-अलग संज्ञाओं का उपयोग करना होता है।

आगे के लेखों में हम जिन विशेष साधनाओं (जैसे ‘अशुभ भावना’, ‘आहार में प्रतिकूल संज्ञा’, ‘मरण संज्ञा’ आदि) का अभ्यास करेंगे, वे इसी ‘दुक्खा पटिपदा’ का हिस्सा हैं। आम इंसान के लिए शरीर की गंदगियों या मृत्यु का विचार करना स्वाभाविक रूप से कड़वा होता है। लेकिन याद रखें, ये कड़वी संज्ञाएँ कोई निराशावादी दर्शन नहीं हैं; ये वो शक्तिशाली ‘सर्जिकल टूल्स’ हैं, जो अविद्या के सम्मोहन को चीर देते हैं।

एक बार जब हम इस ‘संज्ञा के खेल’ के नियम समझ लेते हैं, तो ये सभी अभ्यास हमें अवसाद की ओर नहीं, बल्कि निब्बिदा (मोहभंगिमा) और विमुक्ति की ओर ले जाते हैं।

प्रथम साधना: अशुभ भावना