सतिपट्ठान | सम्मपधान | इद्धिपाद | इन्द्रिय | बल | बोज्झङ्ग | अट्ठङ्गिक मग्ग

स्मृतिप्रस्थान
परिचय
भगवान ने चार स्मृतिप्रस्थान (सतिपट्ठान) की साधना को “एक-तरफ़ा मार्ग” (एकायनो मग्गो) बताया है—सत्वों की विशुद्धि के लिए, शोक और विलाप को लाँघने के लिए, शारीरिक दर्द और मानसिक व्यथा को विलुप्त करने के लिए, सही मार्ग पर चलने के लिए, और अंततः निर्वाण के साक्षात्कार के लिए।
तो चलिए, सबसे पहले यह समझते हैं कि ध्यान का यह मूल आधार ‘सति’ या ‘स्मृति’ वास्तव में क्या है?
आजकल लोग ‘सति’ का अर्थ तरह-तरह से निकालते हैं। कुछ लोग इसे एक “निष्क्रिय जागरूकता” समझ लेते हैं—अर्थात जो कुछ भी हो रहा है, उसे बस होने दो, कोई प्रतिक्रिया मत दो, केवल एक मूक दर्शक बने रहो। लेकिन बुद्ध ने सति को निष्क्रियता से नहीं, बल्कि सक्रियता से जोड़ा है, और जागरूकता को स्मरणशीलता के साथ।
भगवान की दी गयी उपमा बड़ी सरल और लाजवाब है—
जैसे किसी राजसी गढ़ पर भीतरी प्रजा की रक्षा के लिए, और बाहरी शक्तियों को दूर रखने के लिए एक चतुर, समर्थ और होशियार द्वारपाल होता है, जो संदेहास्पद लोगों को बाहर रखता है, और परिचित भले लोगों को भीतर प्रवेश देता है। उसी तरह, कोई स्मृतिमान होता है, याददाश्त में बहुत तेज़! पूर्वकाल में किया गया कर्म, पूर्वकाल में कहा गया वचन भी स्मरण रखता है, और अनुस्मरण कर पाता है।
और, तब वह लोक के प्रति लालसा और नाराज़ी हटाकर—
- काया को काया देखते हुए रहता है
- वेदना को वेदना देखते हुए रहता है
- चित्त को चित्त देखते हुए रहता है
- धम्म को धम्म देखते हुए रहता है
—तत्पर, सचेत और स्मृतिमान।
तब, ऐसी द्वारपाल-रूपी स्मृति स्थापित कर, कोई अकुशल का त्याग करता है, और कुशलता को बढ़ाता है, पाप का त्याग करता है, और निष्पापता को बढ़ाता है। और, स्वयं का परिशुद्धतापूर्वक ख्याल रखता है। इस तरह, कोई स्मृतिसंपन्न रहता है।
— अंगुत्तरनिकाय ७:६३
इस उपमा से स्पष्ट है कि सति किसी मॉल के उस गार्ड जैसी नहीं है, जो किसी पुतले की तरह चुपचाप खड़े रहकर लोगों को आते-जाते देखता है और बिना किसी उद्देश्य के मुस्कुराता है। इसके बजाय, यह सति उस चतुर और सक्षम सैनिक की तरह है, जो देश की सीमा-द्वार पर तैनात होता है। वह जानता है कि उसकी एक भी चूक देश को संकट में डाल सकती है। इसलिए वह अत्यधिक चौकस रहता है, आने-जाने वालों की गहरी तलाशी लेता है, और यह सुनिश्चित करता है कि केवल विश्वसनीय (कुशल) लोग ही भीतर प्रवेश करें, जबकि आतंकवादी (अकुशल प्रवृत्तियों) को वह बाहर ही रोक देता है।
सति के दो पंख: ‘सचेत’ और ‘आतापी’
ठीक उसी तरह, सति की साधना करता हुआ साधक बहुत ही सचेत, तत्पर और “याददाश्त में तेज़” बना रहता है। लेकिन सचेत (“सम्पजञ्ञ”) होने का वास्तविक अर्थ क्या है? भगवान एक अन्य सुत्त में निर्देश देते हैं—
कोई साधक ‘सचेत’ कैसे होता है?
- उसे वेदनाओं (अनुभूतियों) का उत्पन्न होना, स्थित होना, और व्यय होना पता चलता है।
- उसे विचारों (“वितक्क”) का उत्पन्न होना, स्थित होना, और व्यय होना पता चलता है।
- उसे संज्ञाओं (नजरियों) का उत्पन्न होना, स्थित होना, और व्यय होना पता चलता है।
—इस तरह, कोई साधक सचेत होता है।
— संयुत्तनिकाय ४७:३५
इस प्रकार, सचेत होने का अर्थ है—अपनी अनुभूतियों, विचारों और नजरियों को तीन चरणों में जानना: उनका उत्पन्न होना, कुछ समय तक टिके रहना, और फिर लुप्त हो जाना। इन ‘उदय-ठहराव-व्यय’ की निरंतर सजगता ही साधक को ‘अनित्य, दुःख और अनात्म’ के प्रत्यक्ष दर्शन तक ले जाती है।
साथ ही, सति का आतापी से जुड़ा रहना अनिवार्य है। “आतापी” का अर्थ, दरअसल, आर्य अष्टांगिक मार्ग के ‘सम्यक प्रयास’ से संबंधित है। यह वह भावना है जो बिना थके सद्गुणों के संरक्षण और अवगुणों की रोकथाम में लगी रहती है—
और, कोई आतापी (=तत्पर, चुस्त, मुस्तैद, वीर्यवान, परिश्रमी) कैसे होता है? कोई सोचता है—
- ‘यदि अनुत्पन्न पाप, अकुशल स्वभाव उत्पन्न होंगे, तो अनर्थ होगा’
- ‘यदि उत्पन्न पाप, अकुशल स्वभाव त्यागे न गए, तो अनर्थ होगा’
- ‘यदि अनुत्पन्न कुशल स्वभाव उत्पन्न न हुए, तो अनर्थ होगा’
- ‘यदि उत्पन्न कुशल स्वभाव खत्म हुए, तो अनर्थ होगा’
—और तब, वह तत्परता जगाता है। इस तरह कोई “आतापी” होता है।
— संयुत्तनिकाय १६:२
कल्पना करें कि भीतर कोई पाप या अकुशल विकार उत्पन्न हो रहा है। क्या उसे यूँ ही होने देना चाहिए? भगवान के अनुसार, बिलकुल नहीं! हमें स्मृति की साधना दिशाहीन रूप से नहीं करनी है। हमारा एक निर्धारित लक्ष्य है, जो हमें उस सीमा तक ले जाएगा जहाँ सभी दुःख हमेशा के लिए छूट जाते हैं।
उदय बनाम समुदय: कारण को पकड़ना
इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हमें यह समझना होता है कि भीतर विकार पनप कैसे रहे हैं। पाली के शब्दों में “उदय” और “समुदय” में एक बहुत ही महत्वपूर्ण अंतर है।
‘उदय’ का अर्थ है, किसी बात का केवल प्रकट होना। जबकि ‘समुदय’ का अर्थ है, किसी बात का “किसी अन्य के प्रभाव या कारण से” प्रकट होना। कोई भी स्वभाव अपने आप यूँ ही “उदय” नहीं होता; उसका किसी कारण से “समुदय” होता है।
मसलन, किसी नीवरण (रुकावट) के जागने से ठीक पहले क्या हुआ था? किस इंद्रिय पर क्या घटना घटी? अनुभूति क्या हुई? मन में क्या विचार आया? और अंततः, वह नीवरण कैसे उत्पन्न हुआ? यह सूक्ष्म समझ हमें धर्म के गहरे सिद्धान्त इदप्पच्चयता (कारण-कार्य भाव) और पटिच्च-समुप्पाद (प्रतीत्यसमुत्पाद) की ओर ले जाती है:
- जब यह है, तब वह है।
- इसके उत्पन्न होने से, वह उत्पन्न होने लगता है।
- जब यह नहीं है, तब वह भी नहीं है।
- इसके अन्त होने से, उसका भी अन्त होने लगता है।
— अंगुत्तरनिकाय १०:९२ : वेर सुत्त
इसलिए, सतिपट्ठान की साधना में हमें अलग-अलग स्वभावों के प्रति अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाने होते हैं। नीवरण (विकार) की पुनः उत्पत्ति को रोकना है, जबकि संबोधि-अंगों (जागृति के तत्वों) को विकसित कर परिपक्व करना है। यह सब बहुत सक्रियता के साथ करना है।
सतिपट्ठान के तीन चरण
इस पूरी प्रक्रिया में सतिपट्ठान की साधना तीन स्पष्ट चरणों से होकर गुजरती है (जिनका उल्लेख आगे आने वाले प्रत्येक पर्व के अंत में किया गया है):
- (१) अवलोकन: लोक के प्रति लालसा या नाराज़ी हटाते हुए, “भीतरी और बाहरी” बातों पर गौर करना।
- (२) कारण-कार्य दर्शन: “समुदय और व्यय स्वभाव” देखकर, ‘इदप्पच्चयता’ का पता लगाना।
- (३) अतम्मयता (अनाश्रित होना): जब पहले दो चरण पूरे हो जाते हैं और हम किसी स्वभाव की पूरी प्रकृति जान लेते हैं, तब एक अवस्था आती है जहाँ स्मृति पूरी उपेक्षा (तटस्थता) के साथ स्थापित हो जाती है—कि “यह मात्र एक स्वभाव है”। उसमें “मैं” या “मेरा” का कोई भाव नहीं होता। साधक दुनिया (पाँच स्कंधों) का आधार छोड़कर अनाश्रित हो जाता है। इसी अवस्था में टिके रहने पर अंततः चित्त विमुक्त हो जाता है।
मूल सतिपट्ठान
सतिपट्ठान के इतने गहरे विज्ञान को ध्यान-आसन पर कैसे उतारा जाए?
बुद्ध के उपदेश जैसे-जैसे सदियों का सफर तय करते गए, बाद के काल में भिक्षुओं ने धर्म को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से कई सुत्तों को एक एनसाइक्लोपीडिया का रूप दे दिया। आज जो ‘सतिपट्ठान सुत्त’ (मज्झिमनिकाय १०) या ‘महासतिपट्ठान सुत्त’ (दीघनिकाय २२) हमें उपलब्ध हैं, वे इसके बेहतरीन उदाहरण हैं। समय के साथ, ध्यान के लगभग सभी महत्वपूर्ण सिद्धांतों को एक ही जगह संकलित कर दिया गया।
यह ज्ञान-संरक्षण के लिए तो बहुत अद्भुत हुआ, लेकिन ध्यान-आसन पर बैठे किसी नए साधक के लिए इतनी सारी सैद्धांतिक जानकारी एक बौद्धिक बोझ बन सकती है। ध्यान के क्षणों में हमें सिद्धांतों को रटना नहीं है, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव करना है।
आधुनिक तुलनात्मक अध्ययनों (EBT) से यह स्पष्ट होता है कि भगवान का मूल सतिपट्ठान निर्देश बहुत ही संक्षिप्त, सीधा और तत्काल अनुभव करने योग्य था। इसलिए, इस लेख में हमने स्मृतिप्रस्थान के उसी मूल और संक्षिप्त रूप को प्रस्तुत किया है, ताकि नए साधक बिना किसी बौद्धिक उलझन के सीधे साधना में उतर सकें।
हमने कुछ साधनाओं को यहाँ क्यों नहीं रखा?
सुत्त-पिटक से परिचित लोग सोच सकते हैं कि इस सूची में ‘आनापानसति’ (श्वास-ध्यान) या ‘नवसिवथिका’ (श्मशान-साधना) क्यों नहीं है? या धम्मानुपस्सना में ‘पाँच स्कंध’, ‘छह आयतन’ और ‘चार आर्य सत्य’ कहाँ गए?
ये सभी साधनाएँ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन मूल रूप से इनके लिए भगवान ने अलग से स्वतंत्र और विस्तृत सुत्त दिए हैं। बाद के काल में इन्हें सतिपट्ठान में जोड़ दिया गया था। यदि कोई श्वास-साधना या काया की नश्वरता को गहराई से साधना चाहता है, तो उसके लिए आनापानसति सुत्त और कायगतासति सुत्त उपलब्ध हैं। इसी तरह, विस्तृत बौद्धिक और दार्शनिक ज्ञान के लिए मूल महासतिपट्ठान सुत्त का अध्ययन किया जा सकता है।
यहाँ हमारा उद्देश्य केवल उन व्यावहारिक और सीधी साधनाओं को सामने रखना है, जिन्हें कोई भी आम व्यक्ति अपने कमरे में बैठकर तुरंत शुरू कर सके।
साधना का प्राकृतिक प्रवाह
यह चुनी हुई मूल साधना साधक को बड़ी ही सहजता से स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाती है:
- १. कायानुपस्सना: हम शुरुआत सबसे स्थूल चीज़ से करते हैं—अपनी काया। हम अपनी उठने-बैठने की मुद्राओं (इरियापथ) को देखते हैं, फिर त्वचा के भीतर मौजूद अंगों (३२ अशुभ) की वास्तविकता को जानते हैं, और अंततः यह समझते हैं कि यह शरीर और कुछ नहीं, बस प्रकृति के चार तत्व (धातु) हैं।
- २. वेदनानुपस्सना: काया के शांत होने पर, हम उस पर उठने वाली सुख, दुःख या तटस्थ अनुभूतियों (वेदनाओं) को सीधे महसूस करते हैं।
- ३. चित्तानुपस्सना: अनुभूतियों के प्रति हमारा चित्त कैसे रंग बदलता है—क्या वह राग, द्वेष या मोह से भर गया है, या शांत और विमुक्त है? हम बस चित्त की इस अवस्था को बिना किसी फैसले के देखते हैं।
- ४. धम्मानुपस्सना: यह सबसे सूक्ष्म और सक्रिय चरण है। यहाँ हमारी वह “चतुर द्वारपाल” जैसी स्मृति पूरी तरह काम पर लग जाती है। हम अपने चित्त में उठने वाली पाँच रुकावटों (नीवरण) को पहचान कर उन्हें दूर करते हैं, और जागरण के सात अंगों (संबोध्यंग) को अपने भीतर सींचकर उन्हें परिपक्व करते हैं।
आइये, अब भगवान के ही शब्दों में जानें कि चारों स्मृतिप्रस्थान की प्रत्यक्ष साधना कैसे की जाती है:
स्मृतिप्रस्थान भावना
(कायानुपस्सना)

➤ इरियापथ
“कोई साधक काया को काया देखते हुए कैसे रहता है?
- उसे चलते हुए पता चलता है कि ‘चल रहा हूँ।’
- खड़े हुए पता चलता है कि ‘खड़ा हूँ।’
- बैठे हुए पता चलता है कि ‘बैठा हूँ।’
- लेटे हुए पता चलता है कि ‘लेटा हूँ।’
- जिस-जिस तरह उसकी काया अवस्था लेती है, उस-उस तरह उसे पता चलता है।
(पहला चरण - अवलोकन): वह अपनी भीतरी काया को काया देखते हुए रहता है; या बाहरी काया को काया देखते हुए रहता है; या फिर भीतरी और बाहरी—दोनों ही स्तरों पर काया को काया देखते हुए रहता है।
(दूसरा चरण - कारण-कार्य): इसके बाद, वह काया का उत्पत्ति-स्वभाव देखते हुए रहता है; या काया का व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है; या फिर काया के उत्पत्ति और व्यय—दोनों स्वभावों को एक साथ देखते हुए रहता है।
(तीसरा चरण - अतम्मयता): अंततः, उसकी स्मृति केवल इतनी ही स्थापित रह जाती है कि—‘यह मात्र काया है।’ और, जब तक यह ज्ञान, यह याद बनी रहती है, वह पूरी तरह अनाश्रित होकर रहता है; दुनिया का कोई आधार नहीं लेता।
➤ पटिकूलमनसिकार

फिर, वह अपनी काया को पैर तल से ऊपर, माथे के केश से नीचे, त्वचा से ढ़की हुई, नाना प्रकार की गंदगियों से भरी हुई मनन करता है—
मेरी इस काया में है:
केश, लोम, नाखून, दाँत, त्वचा
माँस, नसें, हड्डी, हड्डीमज्जा, तिल्ली
हृदय, कलेजा, झिल्ली, गुर्दा, फेफड़ा
आँत, छोटी-आँत, उदर, टट्टी, मस्तिष्क
पित्त, कफ, पीब, रक्त, पसीना, चर्बी
आँसू, तेल, थूक, बलगम, जोड़ो में तरल, एवं मूत्र।
जैसे, किसी खुली बोरी में चावल, गेहूँ, मूँग, राजमा, तिल, कनकी आदि नाना-प्रकार का अनाज भरा हो। तब, कोई अच्छी आँखोंवाला पुरुष उसे नीचे उड़ेलकर पता करें—‘यह चावल है, यह गेहूँ है, यह मूँग है, यह राजमा है, यह तिल है, यह कनकी है।’
उसी तरह, वह अपनी काया को पैर तल से ऊपर, माथे के केश से नीचे, त्वचा से ढ़की हुई, नाना प्रकार की गंदगियों से भरी हुई मनन करता है।
(पहला चरण - अवलोकन): वह अपनी भीतरी काया को काया देखते हुए रहता है; या बाहरी काया को काया देखते हुए रहता है; या फिर भीतरी और बाहरी—दोनों ही स्तरों पर काया को काया देखते हुए रहता है।
(दूसरा चरण - कारण-कार्य): इसके बाद, वह काया का उत्पत्ति-स्वभाव देखते हुए रहता है; या काया का व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है; या फिर काया के उत्पत्ति और व्यय—दोनों स्वभावों को एक साथ देखते हुए रहता है।
(तीसरा चरण - अतम्मयता): अंततः, उसकी स्मृति केवल इतनी ही स्थापित रह जाती है कि—‘यह मात्र काया है।’ और, जब तक यह ज्ञान, यह याद बनी रहती है, वह पूरी तरह अनाश्रित होकर रहता है; दुनिया का कोई आधार नहीं लेता।
➤ धातुमनसिकार

फिर, वह इस काया को, चाहे जिस अवस्था, जिस परिस्थिति में हो, धातु के अनुसार मनन करता है—‘इस काया में—
- पृथ्वीधातु है;
- जलधातु है;
- अग्निधातु है;
- वायुधातु है।’
जैसे, कोई कसाई गाय को काटकर उसे चौराहे पर अलग-अलग ढ़ेर बनाकर बैठता है। उसी तरह, वह इस काया को, चाहे जिस अवस्था, जिस परिस्थिति में हो, धातु के अनुसार मनन करता है—‘इस काया में पृथ्वीधातु है; जलधातु है; अग्निधातु है; वायुधातु है।’
(पहला चरण - अवलोकन): वह अपनी भीतरी काया को काया देखते हुए रहता है; या बाहरी काया को काया देखते हुए रहता है; या फिर भीतरी और बाहरी—दोनों ही स्तरों पर काया को काया देखते हुए रहता है।
(दूसरा चरण - कारण-कार्य): इसके बाद, वह काया का उत्पत्ति-स्वभाव देखते हुए रहता है; या काया का व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है; या फिर काया के उत्पत्ति और व्यय—दोनों स्वभावों को एक साथ देखते हुए रहता है।
(तीसरा चरण - अतम्मयता): अंततः, उसकी स्मृति केवल इतनी ही स्थापित रह जाती है कि—‘यह मात्र काया है।’ और, जब तक यह ज्ञान, यह याद बनी रहती है, वह पूरी तरह अनाश्रित होकर रहता है; दुनिया का कोई आधार नहीं लेता।
(वेदनानुपस्सना)

और, आगे कैसे कोई वेदना को वेदना देखते हुए रहता है? यहाँ उसे—
- सुख महसूस करते हुए पता चलता है कि ‘मैं सुख महसूस कर रहा हूँ’
- दर्द महसूस करते हुए पता चलता है कि ‘मैं दर्द महसूस कर रहा हूँ’
- न सुख न दर्द महसूस करते हुए पता चलता है कि ‘मैं न सुख न दर्द महसूस कर रहा हूँ’
(सामिस/निरामिस में बांटना) 1
- भौतिक (“सामिस”) सुख महसूस करते हुए पता चलता है कि ‘मैं भौतिक सुख महसूस कर रहा हूँ’
- आध्यात्मिक (“निरामिस”) सुख महसूस करते हुए पता चलता है कि ‘मैं आध्यात्मिक सुख महसूस कर रहा हूँ’
- भौतिक दर्द महसूस करते हुए पता चलता है कि ‘मैं भौतिक दर्द महसूस कर रहा हूँ’
- आध्यात्मिक दर्द महसूस करते हुए पता चलता है कि ‘मैं आध्यात्मिक दर्द महसूस कर रहा हूँ’
- भौतिक न सुख न दर्द महसूस करते हुए पता चलता है कि ‘मैं भौतिक न सुख न दर्द महसूस कर रहा हूँ’
- आध्यात्मिक न सुख न दर्द महसूस करते हुए पता चलता है कि ‘मैं आध्यात्मिक न सुख न दर्द महसूस कर रहा हूँ!’
(पहला चरण - अवलोकन): वह अपनी भीतरी वेदना को वेदना देखते हुए रहता है; या बाहरी वेदना को वेदना देखते हुए रहता है; या फिर भीतरी और बाहरी—दोनों ही स्तरों पर वेदना को वेदना देखते हुए रहता है।
(दूसरा चरण - कारण-कार्य): इसके बाद, वह वेदना का उत्पत्ति-स्वभाव देखते हुए रहता है; या वेदना का व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है; या फिर वेदना के उत्पत्ति और व्यय—दोनों स्वभावों को एक साथ देखते हुए रहता है।
(तीसरा चरण - अतम्मयता): अंततः, उसकी स्मृति केवल इतनी ही स्थापित रह जाती है कि—‘यह मात्र वेदना है।’ और, जब तक यह ज्ञान, यह याद बनी रहती है, वह पूरी तरह अनाश्रित होकर रहता है; दुनिया का कोई आधार नहीं लेता।
(चित्तानुपस्सना)

और, आगे, कैसे कोई चित्त को चित्त देखते हुए रहता है? यहाँ उसे—
- रागपूर्ण चित्त पता चलता है कि ‘यह रागपूर्ण चित्त है’
- वीतराग चित्त पता चलता है कि ‘यह वीतराग चित्त है’
- द्वेषपूर्ण चित्त पता चलता है कि ‘यह द्वेषपूर्ण चित्त है’
- द्वेषविहीन चित्त पता चलता है कि ‘यह द्वेषविहीन चित्त है’
- मोहपूर्ण चित्त पता चलता है कि ‘यह मोहपूर्ण चित्त है’
- मोहविहीन चित्त पता चलता है कि ‘यह मोहविहीन चित्त है’
- संकुचित (“सङखित्त”) 2 चित्त पता चलता है कि ‘संकुचित चित्त है’
- बिखरा (“विक्खित्त”) चित्त पता चलता है कि ‘बिखरा चित्त है’
- बढ़ा हुआ (“महग्गत”) 3 चित्त पता चलता है कि ‘यह विस्तारित चित्त है’
- न बढ़ा (“अमहग्गत”) चित्त पता चलता है कि ‘यह अविस्तारित चित्त है’
- बेहतर (“उत्तर”) चित्त पता चलता है कि ‘यह बेहतर चित्त है’
- सर्वोत्तर (“अनुत्तर”) चित्त पता चलता है कि ‘यह सर्वोत्तर चित्त है’
- समाहित चित्त पता चलता है कि ‘यह समाहित चित्त है’
- असमाहित चित्त पता चलता है कि ‘यह असमाहित चित्त है’
- विमुक्त चित्त पता चलता है कि ‘यह विमुक्त चित्त है’
- अविमुक्त चित्त पता चलता है कि ‘यह अविमुक्त चित्त है!’
(पहला चरण - अवलोकन): वह अपने भीतरी चित्त को चित्त देखते हुए रहता है; या बाहरी चित्त को चित्त देखते हुए रहता है; या फिर भीतरी और बाहरी—दोनों ही स्तरों पर चित्त को चित्त देखते हुए रहता है।
(दूसरा चरण - कारण-कार्य): इसके बाद, वह चित्त का उत्पत्ति-स्वभाव देखते हुए रहता है; या चित्त का व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है; या फिर चित्त के उत्पत्ति और व्यय—दोनों स्वभावों को एक साथ देखते हुए रहता है।
(तीसरा चरण - अतम्मयता): अंततः, उसकी स्मृति केवल इतनी ही स्थापित रह जाती है कि—‘यह मात्र चित्त है।’ और, जब तक यह ज्ञान, यह याद बनी रहती है, वह पूरी तरह अनाश्रित होकर रहता है; दुनिया का कोई आधार नहीं लेता।
(धम्मानुपस्सना)
और, कैसे कोई स्वभाव (“धम्म” = मन में चल रही बात, वृत्ति, स्वभाव) को स्वभाव देखते हुए रहता है?
➤ नीवरण – चित्त के व्यवधानों का ज्ञान

यहाँ कोई पाँच व्यवधान (“पञ्च नीवरण”) स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है। कैसे कोई पाँच व्यवधान स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है?
१. कामेच्छा (“कामच्छन्द”)
- उसे भीतर कामेच्छा होने पर पता चलता है कि “मेरे भीतर कामेच्छा है”
- अथवा कामेच्छा न होने पर पता चलता है कि “मेरे भीतर कामेच्छा नहीं है”
- उसे पता चलता है कि कैसे अनुत्पन्न कामेच्छा की उत्पत्ति होती है
- उसे पता चलता है कि कैसे उत्पन्न कामेच्छा खत्म होती है
- और, उसे पता चलता है कि कैसे खत्म हुई कामेच्छा की दुबारा उत्पत्ति न होगी।
२. दुर्भावना (“ब्यापाद”)
- उसे भीतर दुर्भावना होने पर पता चलता है कि “मेरे भीतर दुर्भावना है”
- अथवा दुर्भावना न होने पर पता चलता है कि “मेरे भीतर दुर्भावना नहीं है”
- उसे पता चलता है कि कैसे अनुत्पन्न दुर्भावना की उत्पत्ति होती है
- उसे पता चलता है कि कैसे उत्पन्न दुर्भावना खत्म होती है
- और, उसे पता चलता है कि कैसे खत्म हुई दुर्भावना की दुबारा उत्पत्ति न होगी।
३. सुस्ती और तंद्रा (“थिनमिद्धा”)
- उसे भीतर सुस्ती और तंद्रा होने पर पता चलता है कि “मेरे भीतर सुस्ती और तंद्रा है”
- अथवा सुस्ती और तंद्रा न होने पर पता चलता है कि “मेरे भीतर सुस्ती और तंद्रा नहीं है”
- उसे पता चलता है कि कैसे अनुत्पन्न सुस्ती और तंद्रा की उत्पत्ति होती है
- उसे पता चलता है कि कैसे उत्पन्न सुस्ती और तंद्रा खत्म होती है
- और, उसे पता चलता है कि कैसे खत्म हुई सुस्ती और तंद्रा की दुबारा उत्पत्ति न होगी।
४. बेचैनी और पश्चाताप (“उद्धच्चकुकुच्च”)
- उसे भीतर बेचैनी और पश्चाताप होने पर पता चलता है कि “मेरे भीतर बेचैनी और पश्चाताप है”
- अथवा बेचैनी और पश्चाताप न होने पर पता चलता है कि “मेरे भीतर बेचैनी और पश्चाताप नहीं है”
- उसे पता चलता है कि कैसे अनुत्पन्न बेचैनी और पश्चाताप की उत्पत्ति होती है
- उसे पता चलता है कि कैसे उत्पन्न बेचैनी और पश्चाताप खत्म होती है
- और, उसे पता चलता है कि कैसे खत्म हुई बेचैनी और पश्चाताप की दुबारा उत्पत्ति न होगी।
५. उलझन (“विचिकिच्छा”)
- उसे भीतर अनिश्चितता होने पर पता चलता है कि “मेरे भीतर अनिश्चितता है”
- अथवा अनिश्चितता न होने पर पता चलता है कि “मेरे भीतर अनिश्चितता नहीं है”
- उसे पता चलता है कि कैसे अनुत्पन्न अनिश्चितता की उत्पत्ति होती है
- उसे पता चलता है कि कैसे उत्पन्न अनिश्चितता खत्म होती है
- और, उसे पता चलता है कि कैसे खत्म हुई अनिश्चितता की दुबारा उत्पत्ति न होगी।
(पहला चरण - अवलोकन): वह अपनी भीतरी स्वभाव को स्वभाव देखते हुए रहता है; या बाहरी स्वभाव को स्वभाव देखते हुए रहता है; या फिर भीतरी और बाहरी—दोनों ही स्तरों पर स्वभाव को स्वभाव देखते हुए रहता है।
(दूसरा चरण - कारण-कार्य): इसके बाद, वह स्वभाव का उत्पत्ति-स्वभाव देखते हुए रहता है; या स्वभाव का व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है; या फिर स्वभाव के उत्पत्ति और व्यय—दोनों स्वभावों को एक साथ देखते हुए रहता है।
(तीसरा चरण - अतम्मयता): अंततः, उसकी स्मृति केवल इतनी ही स्थापित रह जाती है कि—‘यह मात्र स्वभाव है।’ और, जब तक यह ज्ञान, यह याद बनी रहती है, वह पूरी तरह अनाश्रित होकर रहता है; दुनिया का कोई आधार नहीं लेता।
➤ बोज्झङग – बोधि अंगों का ज्ञान

और, आगे, कोई सात संबोधि-अंग स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है। कैसे कोई सात संबोधि-अंग स्वभावों को स्वभाव देखते हुए रहता है?
१. स्मृति
- उसे भीतर स्मृति (“सति”) संबोध्यङ्ग हो, तो उसे पता चलता है कि ‘मेरे भीतर स्मृति संबोध्यङ्ग है
- अथवा भीतर स्मृति संबोध्यङ्ग न हो, तो उसे पता चलता है कि ‘मेरे भीतर स्मृति संबोध्यङ्ग नहीं है’
- उसे पता चलता है कि अनुत्पन्न स्मृति संबोध्यङ्ग कैसे उत्पन्न होता है
- और, उसे पता चलता है कि उत्पन्न हुआ स्मृति संबोध्यङ्ग विकसित होकर परिपूर्ण कैसे होता है।
२. स्वभाव-जाँच
- उसे भीतर स्वभाव-जाँच (“धम्मविचय”) संबोध्यङ्ग हो, तो पता चलता है कि “मेरे भीतर स्वभाव-जाँच संबोध्यङ्ग है”
- अथवा भीतर स्वभाव-जाँच संबोध्यङ्ग न हो, तो उसे पता चलता है कि “मेरे भीतर स्वभाव-जाँच संबोध्यङ्ग नहीं है”
- उसे पता चलता है कि अनुत्पन्न स्वभाव-जाँच संबोध्यङ्ग कैसे उत्पन्न होता है
- और, उसे पता चलता है कि उत्पन्न हुआ स्वभाव-जाँच संबोध्यङ्ग विकसित होकर परिपूर्ण कैसे होता है।
३. वीर्य
- उसे भीतर वीर्य (“विरीय”) संबोध्यङ्ग हो, तो पता चलता है कि “मेरे भीतर वीर्य संबोध्यङ्ग है”
- अथवा भीतर वीर्य संबोध्यङ्ग न हो, तो उसे पता चलता है कि “मेरे भीतर वीर्य संबोध्यङ्ग नहीं है”
- उसे पता चलता है कि अनुत्पन्न वीर्य संबोध्यङ्ग कैसे उत्पन्न होता है
- और, उसे पता चलता है कि उत्पन्न हुआ वीर्य संबोध्यङ्ग विकसित होकर परिपूर्ण कैसे होता है।
४. प्रीति
- उसे भीतर प्रीति (“पीति”) संबोध्यङ्ग हो, तो पता चलता है कि “मेरे भीतर प्रीति संबोध्यङ्ग है”
- अथवा भीतर प्रीति संबोध्यङ्ग न हो, तो उसे पता चलता है कि “मेरे भीतर प्रीति संबोध्यङ्ग नहीं है”
- उसे पता चलता है कि अनुत्पन्न प्रीति संबोध्यङ्ग कैसे उत्पन्न होता है
- और, उसे पता चलता है कि उत्पन्न हुआ प्रीति संबोध्यङ्ग विकसित होकर परिपूर्ण कैसे होता है।
५. प्रश्रब्धि
- उसे भीतर प्रश्रब्धि (“पस्सद्धि”) संबोध्यङ्ग हो, तो पता चलता है कि “मेरे भीतर प्रश्रब्धि संबोध्यङ्ग है”
- अथवा भीतर प्रश्रब्धि संबोध्यङ्ग न हो, तो उसे पता चलता है कि “मेरे भीतर प्रश्रब्धि संबोध्यङ्ग नहीं है”
- उसे पता चलता है कि अनुत्पन्न प्रश्रब्धि संबोध्यङ्ग कैसे उत्पन्न होता है
- और, उसे पता चलता है कि उत्पन्न हुआ प्रश्रब्धि संबोध्यङ्ग विकसित होकर परिपूर्ण कैसे होता है।
६. समाधि
- उसे भीतर समाधि संबोध्यङ्ग हो, तो पता चलता है कि “मेरे भीतर समाधि संबोध्यङ्ग है”
- अथवा भीतर समाधि संबोध्यङ्ग न हो, तो उसे पता चलता है कि “मेरे भीतर समाधि संबोध्यङ्ग नहीं है”
- उसे पता चलता है कि अनुत्पन्न समाधि संबोध्यङ्ग कैसे उत्पन्न होता है
- और, उसे पता चलता है कि उत्पन्न हुआ समाधि संबोध्यङ्ग विकसित होकर परिपूर्ण कैसे होता है।
७. उपेक्षा
- उसे भीतर उपेक्षा संबोध्यङ्ग हो, तो पता चलता है कि “मेरे भीतर उपेक्षा संबोध्यङ्ग है”
- अथवा भीतर उपेक्षा संबोध्यङ्ग न हो, तो उसे पता चलता है कि “मेरे भीतर उपेक्षा संबोध्यङ्ग नहीं है”
- उसे पता चलता है कि अनुत्पन्न उपेक्षा संबोध्यङ्ग कैसे उत्पन्न होता है।
- और, उसे पता चलता है कि उत्पन्न हुआ उपेक्षा संबोध्यङ्ग विकसित होकर परिपूर्ण कैसे होता है।
(पहला चरण - अवलोकन): वह अपनी भीतरी स्वभाव को स्वभाव देखते हुए रहता है; या बाहरी स्वभाव को स्वभाव देखते हुए रहता है; या फिर भीतरी और बाहरी—दोनों ही स्तरों पर स्वभाव को स्वभाव देखते हुए रहता है।
(दूसरा चरण - कारण-कार्य): इसके बाद, वह स्वभाव का उत्पत्ति-स्वभाव देखते हुए रहता है; या स्वभाव का व्यय-स्वभाव देखते हुए रहता है; या फिर स्वभाव के उत्पत्ति और व्यय—दोनों स्वभावों को एक साथ देखते हुए रहता है।
(तीसरा चरण - अतम्मयता): अंततः, उसकी स्मृति केवल इतनी ही स्थापित रह जाती है कि—‘यह मात्र स्वभाव है।’ और, जब तक यह ज्ञान, यह याद बनी रहती है, वह पूरी तरह अनाश्रित होकर रहता है; दुनिया का कोई आधार नहीं लेता।
यह सतिपट्ठान “एक-तरफ़ा मार्ग” है—सत्वों की विशुद्धि के लिए, शोक और विलाप को लाँघने के लिए, दर्द और व्यथा को विलुप्त करने के लिए, अंतिम उपाय को पाने के लिए, निर्वाण के साक्षात्कार के लिए।”
सामिस और निरामिस वेदना: पालि शब्द ‘आमिस’ का मूल अर्थ ‘चारा’ या ‘भौतिक विषय’ होता है। सामिस (स+आमिस) का अर्थ है—वह सांसारिक सुख, दुःख या तटस्थ अनुभूति जो हमारी पाँच इंद्रियों (रूप, रस, गंध, शब्द, स्पर्श) की लालसाओं से जुड़ी हो। जैसे, कोई मनपसंद चीज़ मिलने का सुख या उसके छिन जाने का दर्द।
इसके विपरीत, निरामिस (निर्+आमिस) का अर्थ है—वह आध्यात्मिक अनुभूति जो संसार के ‘चारे’ से मुक्त हो। सलायतनविभंग सुत्त में भगवान बुद्ध ने इन्हें क्रमशः ‘गेहसित’ (गृहस्थ-आश्रित) और ‘नेक्खम्मसित’ (त्याग-आश्रित) वेदनाएँ कहा है। उदाहरण के लिए: ध्यान या समाधि से उपजने वाला अतीन्द्रिय सुख ‘निरामिस सुख’ है। वहीं, भीतर यह तड़प उठना कि “मैं अभी तक मुक्त क्यों नहीं हुआ”—यह संसार से वैराग्य के कारण उठा ‘निरामिस दुःख’ है, जो साधक के लिए अत्यंत लाभकारी और कुशल माना गया है। ↩︎
संक्षिप्त चित्त: आजकल की विपस्सना पद्धतियों में अक्सर साधकों को आनापान साधना के दौरान अपने चित्त को किसी एक छोटी-सी जगह (जैसे नासिका के अग्र भाग) पर समेटकर एकाग्र करने का निर्देश दिया जाता है; इसे ही ‘संक्षिप्त चित्त’ कहते हैं।
लेकिन प्राचीन बुद्ध-वचनों (संयुत्तनिकाय ५१.२० - विभंग सुत्त) के अनुसार, एक जगह सिकुड़ा हुआ ‘संक्षिप्त’ (“सङखित्त”) चित्त सुस्ती और तंद्रा (थिन-मिद्धा) का प्रतीक है, और इधर-उधर भटकता हुआ ‘विक्षिप्त’ (“विक्खित्त”) चित्त बेचैनी (उद्धच्च) का प्रतीक है।
उपक्किलेस सुत्त में भी भगवान ने इन दोनों स्थितियों को ध्यान की रुकावट (उपक्किलेस) माना है। ध्यान की सही साधना में इन दोनों अतियों से बाहर निकलकर, एक स्वाभाविक ‘महग्गत’ (विस्तारित) चित्त विकसित करने की प्रेरणा दी जाती है। ↩︎
महग्गत (विस्तारित) चित्त: ध्यान के अभ्यास में ‘महग्गत’ चित्त की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण है और लोगों की इसमें विशेष रुचि रही है। संयुत्तनिकाय ४२.८ के अनुसार, मेत्ता, करुणा, मुदिता और उपेक्षा की ब्रह्मविहार साधना करते हुए इसी प्रकार का ‘विस्तारित’ चित्त बनता है।
अक्सर आम व्याख्याओं में इसे ‘अप्रमाण’ या ‘असीम’ समझ लिया जाता है। हालांकि, मज्झिमनिकाय १२७ में दिव्यदृष्टि में प्रवीण आयुष्मान अनुरुद्ध भन्ते स्पष्ट करते हैं कि महग्गत चित्त वास्तव में ‘असीम’ नहीं होता। इसका विस्तार हमारी काया से बड़ा अवश्य होता है—जैसे एक वृक्ष की छाया से लेकर किसी विशाल महाद्वीप तक—किंतु फिर भी इसकी एक सीमा होती है। (जबकि ‘अप्रमाण’ चित्त पूर्णतः सीमारहित होता है)। ↩︎
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आनापानसति सुत्त
कायगतासति सुत्त
