✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
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— अकुशल का त्याग —
कामेच्छा | दुर्भावना | सुस्ती-तंद्रा | बेचैनी-पश्चाताप | उलझन

तृतीय नीवरण

सुस्ती-तंद्रा

— चेतना का धीमा विष —

लेखक: भिक्खु कश्यप
| १४ मिनट
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कामेच्छा और दुर्भावना जहाँ चित्त में आग लगाते हैं, वहीं सुस्ती और तंद्रा (“थिनमिद्ध”) वीर्य को बुझाकर चित्त को सुला देते हैं।

संसार में अधिकतर लोग स्मृतिहीन और असजग जीवन जीते हैं। उनके दिनचर्या में बस कुछ ही क्षण ऐसे होते हैं जब वे पूरी सजगता के साथ उपस्थित होते हैं। बाकी समय वे अचेतन आदतों, स्वचालित प्रतिक्रियाओं और ख्याली पुलाव के वश में होकर जीते हैं। चित्त की यह निरंतर बेहोशी हमारे भीतर ‘अंधे कोने’ पैदा कर देती है।

इन अवबोध-अंध कोनों में हमारी वे सारी दबी हुई वृत्तियाँ छिप जाती हैं, जिनका हम सामना नहीं करना चाहते। ये चित्त में काले धब्बों जैसे होते हैं, जो एक प्रकार का चैतसिक कोहरा पैदा करते हैं। यही कोहरा चित्त की समग्रता और तीक्ष्णता को भंग कर देता है। और यहीं से सुस्ती, तंद्रा, आलस्य, अकारण थकावट, दिन में स्वप्न देखना, और खोये-खोये से रहने की प्रवृत्तियाँ जन्म लेती हैं।

सुस्ती कोई साधारण नींद नहीं है; यह यथार्थ से भागने का चित्त का एक रक्षातंत्र है। जब चित्त वर्तमान क्षण की चुनौतियों या नीरसता का सामना नहीं कर पाता, तो वह खुद को ‘शट डाउन’ करने लगता है। व्यक्ति को लगता है कि उसे शारीरिक विश्राम चाहिए, लेकिन असल में उसका चित्त सत्य से आँखें चुरा रहा होता है।

कभी-कभी बाह्य वातावरण भी इस कोहरे को घना कर देता है—जैसे जब आकाश में घने बादल छा जाते हैं, या पेट भारी भोजन से भरा होता है, तब एक प्रकार का शारीरिक दबाव उत्पन्न होता है। उस दबाव में चित्त की ऊर्जा ऊपर उठ नहीं पाती, और अधिकांश लोग तंद्रा के उस मीठे और खतरनाक दलदल में डूब जाते हैं। यह दलदल इतना शिथिल कर देता है कि भीतर वीर्य (आध्यात्मिक ऊर्जा) का कोई संचार ही नहीं हो पाता।

अंध क्षेत्रों का निराकरण

ऐसे में यह अनिवार्य हो जाता है कि हम सजग होकर इन अंध क्षेत्रों को पहचानें और उन्हें चित्त से मिटाने का ठोस प्रयास करें। जब सचेतता (“सम्पजञ्ञ”) की रोशनी में ये धब्बे छंटते हैं, तो चित्त के बिखरे और सुन्न पड़े हिस्से फिर से आपस में जुड़कर एकरूप होने लगते हैं। स्मृति और सचेतता के प्रकाश में चित्त पुनः प्रकाशित और जीवंत हो उठता है।

इस अवस्था को पाने के लिए कभी-कभी हमें स्वयं के प्रति थोड़ी सख्ती भी दिखानी होती है—एक कोमल लेकिन अडिग दृढ़ता। पूर्ण समर्पण के साथ, हमें स्मृतिमान और तत्पर (“आतापी”) बनकर इन अंध क्षेत्रों को हटाने की निरंतर साधना करनी चाहिए। ध्यान की गहराई में उतरकर ही इनके निराकरण की वास्तविक प्रक्रिया सक्रिय होती है।

जैसे ही साधक ध्यान की गहराई में प्रवेश करता है, शरीर में ऊर्जा का उखड़ा हुआ प्रवाह स्वतः संतुलित होने लगता है। इसके साथ ही शरीर और चित्त की संवेदनशीलता लौट आती है, और चारों स्मृतिप्रस्थान की साधना स्वाभाविक रूप से प्रकट होने लगती है। इसी साधना के बल पर चित्त उस तंद्रा के दलदल से ऊँचा उठकर जीवन के गहन आर्य सत्यों का बोध कर पाता है।

सुस्ती-तंद्रा का मनोविज्ञान

सुस्ती अचानक नहीं सुला देती; यह भी एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जो हमारे ही द्वारा दिए गए भोजन से पलती है।

आहार (ईंधन और खुराक)

सुस्ती का मुख्य आहार क्या है?

भगवान बताते हैं—बोरियत (अरति), आलस्य, बार-बार जम्हाई लेना, भारी भोजन के बाद का भारीपन, और मानसिक शिथिलता। जब हम इन स्थितियों के प्रति समर्पण कर देते हैं और शरीर के इस भारीपन को ‘जरूरत’ मान लेते हैं, तो हम तंद्रा के नीवरण को उसका पसंदीदा भोजन परोस रहे होते हैं।

अयोनिसो मनसिकार (अनुचित चिंतन)

इस नीवरण को भड़काने वाला हाथ है—‘अनुचित चिंतन’।

जब हल्की सी थकान महसूस होती है, तो मन तुरंत बहाने गढ़ने लगता है—“आज मैंने बहुत काम किया है, मुझे आराम का हक़ है… अभी मौसम बहुत ठंडा है, थोड़ी देर लेट जाना चाहिए।” यह आत्म-दया और बहानों का चिंतन ही उस छोटे से आलस्य को एक गहरी तंद्रा में बदल देता है।

योनिसो मनसिकार (उचित चिंतन)

यह सुस्ती के कोहरे को चीरने वाली तेज़ धूप है। ‘उचित चिंतन’ का अर्थ है, शरीर की वास्तविक आवश्यकता और मन की चालबाज़ी के बीच का अंतर देखना। जब आप समझ जाते हैं कि यह भारीपन शारीरिक नहीं, बल्कि एक ‘चैतसिक अवस्था’ मात्र है, तो आप उस कोहरे से खुद को अलग कर लेते हैं।

अनाहार (भूखा मारना)

सुस्ती के इस दलदल को सुखाने का अचूक अस्त्र है—ऊर्जा का संचार (वीर्यारम्भ)। जब हम ‘उचित चिंतन’ के द्वारा भीतर प्रयास, उद्यमशीलता और कार्य करने के संकल्प को जगाते हैं, तो सुस्ती को उसकी खुराक (बहाने और शिथिलता) मिलनी बंद हो जाती है। संकल्प की आंच में तंद्रा का कोहरा भाप बनकर उड़ने लगता है।

सुस्ती का आहार और अनाहार

अनुत्पन्न सुस्ती और तंद्रा को उत्पन्न करने, और उत्पन्न हुई सुस्ती और तंद्रा को बढ़ाकर अत्याधिक करने का आहार क्या है?

बोरियत, थकान, उबासियाँ, भोजन के पश्चात तंद्रा, और मानस में आलस्य होता है—उस पर अनुचित चिंतन (“अयोनिसो मनसिकार”) करना आहार बनता है अनुत्पन्न सुस्ती-तंद्रा उत्पन्न होने और उत्पन्न हुई सुस्ती-तंद्रा बढ़कर अत्याधिक होने का।

किन्तु, ऊर्जा का संचार, प्रयास, और उद्यमशीलता का सामर्थ्य होता है—उस पर उचित चिंतन (“योनिसो मनसिकार”) करना अनाहार (भूखा रखना) है अनुत्पन्न सुस्ती-तंद्रा उत्पन्न होने और उत्पन्न हुई सुस्ती-तंद्रा बढ़कर अत्याधिक होने को।

—संयुत्तनिकाय ४६:५१ : आहार सुत्त

भगवान का टूलकिट

सुस्ती कितनी आम हो सकती है, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बोधि प्राप्त करने से ठीक पहले, स्वयं महामोग्गलान भंते जैसे उद्यमी और महान साधक भी इसका शिकार हो गए थे। तब भगवान ने उन्हें केवल दार्शनिक ज्ञान नहीं दिया, बल्कि नींद से लड़ने का एक क्रमिक और व्यावहारिक ‘टूलकिट’ प्रदान किया।

एक समय भगवान भग्गों के साथ भेसकला मृगवन में मगरमच्छ-अड्डे के समीप विहार कर रहे थे। उस समय (बोधि प्राप्त करने के पूर्व) भन्ते महामोग्गलान मगध के कल्लवलपुत्र गाँव के समीप (शायद ध्यानमुद्रा में) बैठकर ऊँघ रहे थे।

तब भगवान ने अपने मनुष्योत्तर विशुद्ध दिव्यचक्षु से महामोग्गलान भन्ते को ऊँघते हुए देखा।

तब, जैसे कोई बलवान पुरुष अपनी समेटी हुई बाह को पसार दे, या पसारी हुई बाह को समेट ले, उसी तरह, भगवान मृगवन से गायब होकर महामोग्गलान भन्ते के ठीक सामने प्रकट हुए, और बिछे आसन पर बैठ गए। उन्होंने बैठकर महामोग्गलान भन्ते से पूछा:

“क्या तुम ऊँघ रहे थे, मोग्गलान?”

“हाँ, भन्ते।”

तब भगवान ने कहा, “ठीक है, मोग्गलान—

  1. (सोच बदलो:) जब तुम्हें तंद्रा आने लगे, तब उस (सुलाने वाली) संज्ञा पर ध्यान मत दो, उस संज्ञा के पीछे मत पड़ो। संभव है ऐसा (सोच बदल) कर तुम तंद्रा हटा पाओगे।
  2. (मन को सक्रिय करो:) किंतु यदि ऐसा कर के भी तंद्रा न हटा पाए, तब अपने मानस में सुना हुआ, याद किया हुआ कोई धर्म-विषय ले आओ, और उस पर पुनर्विचार करने लगो, मन में चिंतन-मनन करने लगो। संभव है ऐसा (मन को सक्रिय) कर तुम तंद्रा हटा पाओगे।
  3. (वाणी का उपयोग करो:) किंतु यदि ऐसा कर के भी तंद्रा न हटा पाए, तब सुने हुए, याद किए हुए धर्म का विस्तारपूर्वक पठन करो। संभव है ऐसा (वाणी का उपयोग) कर तुम तंद्रा हटा पाओगे।
  4. (शरीर को झकझोरो:) किंतु यदि ऐसा कर के भी तंद्रा न हटा पाए, तब अपने दोनों कान खींचो और शरीर को हाथों से रगड़ने लगो। संभव है ऐसा (शरीर को सक्रिय) कर तुम तंद्रा हटा पाओगे।
  5. (दूर तक देखों:) किंतु यदि ऐसा कर के भी तंद्रा न हटा पाए, तब अपने आसन से उठो, आँखे जल से धोकर सभी दिशाओं में देखो, ऊपर तारे-नक्षत्रों को देखो। संभव है ऐसा (रिफ्रेश हो) कर तुम तंद्रा हटा पाओगे।
  6. (प्रकाश का ध्यान:) किंतु यदि ऐसा कर के भी तंद्रा न हटा पाए, तब उजाले को देखने लगो। ‘उजला दिन है’—इस संज्ञा का अधिष्ठान लो—रात में दिन जैसा रहना, और दिन में रात जैसा रहना। इस तरह खुला, बिना रुकावट वाले मानस के साथ चित्त को उजालेदार बनाने का अभ्यास करो। संभव है ऐसा (संज्ञा पलटा) कर तुम तंद्रा हटा पाओगे।
  7. (चक्रमण): किंतु यदि ऐसा कर के भी तंद्रा न हटा पाए, तब आगे-पीछे (निश्चित दूरी) पहचान कर, चक्रमण करो। इंद्रिय भीतर की ओर रहें, मानस बाहर न भटकें! संभव है ऐसा (गतिविधि) कर तुम तंद्रा हटा पाओगे।
  8. (संकल्प शयन:) किंतु यदि ऐसा कर के भी तंद्रा न हटा पाए, तब दायी करवट लेटते हुए सिंहशय्या धारण करो—पैर के ऊपर पैर रख, स्मरणशील और सचेत होकर, उठने पर ध्यान लगाओं। और, जैसे ही जागो, तुरंत उठ जाओ, (सोचते हुए) ‘मैं नींद के सुख में, लेटने के सुख में, या तंद्रा के सुख में लिप्त नहीं होऊँगा!’

—इस तरह, मोग्गलान, तुम्हें सीखना चाहिए।

—अंगुत्तरनिकाय ७:६१ (संक्षिप्त)

बहानेबाजी

  1. ऐसा होता है, मित्रों, किसी भिक्षु को कोई काम करना होता है। उसे लगता है, ‘मुझे यह काम करना है। किंतु यह काम करने पर मेरा शरीर थक जाएगा। क्यों न मैं थोड़ा लेट जाऊँ?’

    तब वह लेट जाता है, वीर्य नहीं जगाता—अब तक न पायी अवस्था को पाने के लिए, न पहुँची अवस्था तक पहुँचने के लिए, न साक्षात्कार हुई अवस्था के साक्षात्कार के लिए। यह आलस का पहला बहाना है।

  2. आगे, ऐसा होता है कि कोई भिक्षु काम कर लेता है। उसे लगता है, ‘मैंने यह काम किया। किंतु यह काम करने से मेरा शरीर थक गया। क्यों न मैं थोड़ा लेट जाऊँ?’ तब वह लेट जाता है, वीर्य नहीं जगाता…

  3. आगे, ऐसा होता है कि किसी भिक्षु को यात्रा करनी होती है। उसे लगता है, ‘मुझे यह यात्रा करनी है। किंतु यात्रा करने पर मेरा शरीर थक जाएगा। क्यों न मैं थोड़ा लेट जाऊँ?’ तब वह लेट जाता है, वीर्य नहीं जगाता…

  4. आगे, ऐसा होता है कि कोई भिक्षु यात्रा कर लेता है। उसे लगता है, ‘मैंने यह यात्रा किया। किंतु यात्रा करने से मेरा शरीर थक गया। क्यों न मैं थोड़ा लेट जाऊँ?’ तब वह लेट जाता है, वीर्य नहीं जगाता…

  5. आगे, ऐसा होता है कि कोई भिक्षु गाँव या नगर में भिक्षाटन करने जाता है, तो उसे अपेक्षाकृत मात्रा से कम भोजन मिलता है। उसे लगता है, ‘आज मुझे अपेक्षाकृत मात्रा से कम भोजन मिला। मेरा शरीर थक हुआ है, काम करने के योग्य नहीं। क्यों न मैं थोड़ा लेट जाऊँ?’ तब वह लेट जाता है, वीर्य नहीं जगाता…

  6. आगे, ऐसा होता है कि कोई भिक्षु गाँव या नगर में भिक्षाटन करने जाता है, तो उसे अपेक्षाकृत मात्रा में भोजन मिलता है। उसे लगता है, ‘आज मुझे अपेक्षाकृत मात्रा में भोजन मिला। मेरा शरीर भारी है, काम करने के योग्य नहीं, जैसे दाने से (बोरे के जैसा पेट) भर गया हो। क्यों न मैं थोड़ा लेट जाऊँ?’ तब वह लेट जाता है, वीर्य नहीं जगाता…

  7. आगे, ऐसा होता है कि किसी भिक्षु को कोई हल्की बीमारी होती है। उसे लगता है, ‘मुझे हल्की बीमारी हो गई। लेटने की ज़रूरत है। क्यों न मैं थोड़ा लेट जाऊँ?’ तब वह लेट जाता है, वीर्य नहीं जगाता…

  8. आगे, ऐसा होता है कि किसी भिक्षु को बीमारी से उबर कर अधिक समय नहीं होता। उसे लगता है, ‘मुझे बीमारी से उबर कर अधिक समय नहीं हुआ। मेरा शरीर अभी दुर्बल है, काम करने के योग्य नहीं। क्यों न मैं थोड़ा लेट जाऊँ?’

    तब वह लेट जाता है, वीर्य नहीं जगाता—अब तक न पायी अवस्था को पाने के लिए, न पहुँची अवस्था तक पहुँचने के लिए, न साक्षात्कार हुई अवस्था के साक्षात्कार के लिए। यह आलस का आठवा बहाना है।

—अंगुत्तरनिकाय ८:९५

मन बहुत चालाक है। वह हर परिस्थिति को सुस्ती के बहाने में बदल सकता है। लेकिन भगवान कहते हैं कि यदि प्रज्ञा हो, तो उन्हीं स्थितियों को ऊर्जा जगाने के बहाने में भी बदला जा सकता है!

ऊर्जा जगाने की प्रेरणा

भगवान ने कहा, “ऊर्जा जगाने के आठ बहाने हैं।

  1. ऐसा होता है कि किसी भिक्षु को कोई काम करना होता है। उसे लगता है, ‘मुझे यह काम करना है। किंतु काम करते हुए बुद्ध निर्देश पर ध्यान देना सरल नहीं होगा। क्यों न मैं अभी ऊर्जा जगाऊँ—अब तक न पायी अवस्था को पाने के लिए, न पहुँची अवस्था तक पहुँचने के लिए, न साक्षात्कार हुई अवस्था के साक्षात्कार के लिए।’

    तब वह भिक्षु ऊर्जा जगाता है—अब तक न पायी अवस्था को पाने के लिए, न पहुँची अवस्था तक पहुँचने के लिए, न साक्षात्कार हुई अवस्था के साक्षात्कार के लिए। यह ऊर्जा जगाने का पहला बहाना है।

  2. आगे, ऐसा होता है कि कोई भिक्षु काम कर लेता है। उसे लगता है, ‘मैंने यह काम किया। किंतु काम करते हुए मैं बुद्ध निर्देश पर ध्यान नहीं दे पाया। क्यों न मैं अभी ऊर्जा जगाऊँ…

  3. आगे, ऐसा होता है कि किसी भिक्षु को यात्रा करनी होती है। उसे लगता है, ‘मुझे यह यात्रा करनी है। किंतु यात्रा करते हुए बुद्ध निर्देश पर ध्यान देना सरल नहीं होगा। क्यों न मैं अभी ऊर्जा जगाऊँ…

  4. आगे, ऐसा होता है कि कोई भिक्षु यात्रा कर लेता है। उसे लगता है, ‘मैंने यह यात्रा किया। किंतु यात्रा करते हुए मैं बुद्ध निर्देश पर ध्यान नहीं दे पाया। क्यों न मैं अभी ऊर्जा जगाऊँ…

  5. आगे, ऐसा होता है कि कोई भिक्षु गाँव या नगर में भिक्षाटन करने जाता है, तो उसे अपेक्षाकृत मात्रा से कम भोजन मिलता है। उसे लगता है, ‘आज मुझे अपेक्षाकृत मात्रा से कम भोजन मिला। मेरा शरीर हल्का है, काम करने के योग्य। क्यों न मैं अभी ऊर्जा जगाऊँ…

  6. आगे, ऐसा होता है कि कोई भिक्षु गाँव या नगर में भिक्षाटन करने जाता है, तो उसे अपेक्षाकृत मात्रा में भोजन मिलता है। उसे लगता है, ‘आज मुझे अपेक्षाकृत मात्रा में भोजन मिला। मेरा शरीर हल्का है, काम करने के योग्य। क्यों न मैं अभी ऊर्जा जगाऊँ…

  7. आगे, ऐसा होता है कि किसी भिक्षु को कोई हल्की बीमारी होती है। उसे लगता है, ‘मुझे हल्की बीमारी हो गई। संभव है कि यह बीमारी गंभीर हो जाए। क्यों न मैं अभी ऊर्जा जगाऊँ…

  8. आगे, ऐसा होता है कि किसी भिक्षु को बीमारी से उबर कर अधिक समय नहीं होता। उसे लगता है, ‘मुझे बीमारी से उबर कर अधिक समय नहीं हुआ। संभव है कि बीमारी फिर लौट आए। क्यों न मैं अभी ऊर्जा जगाऊँ—अब तक न पायी अवस्था को पाने के लिए, न पहुँची अवस्था तक पहुँचने के लिए, न साक्षात्कार हुई अवस्था के साक्षात्कार के लिए।’

    तब वह भिक्षु ऊर्जा जगाता है—अब तक न पायी अवस्था को पाने के लिए, न पहुँची अवस्था तक पहुँचने के लिए, न साक्षात्कार हुई अवस्था के साक्षात्कार के लिए। यह ऊर्जा जगाने का आठवा बहाना है।

—अंगुत्तरनिकाय ८:९५

रात भर सोते रहे,
दिन में मेलमिलाप में मस्त रहे।
कब, आख़िर कब वह मुर्ख,
दुःखों का अन्त करेगा?

—थेरगाथा १:८४

एक प्राथमिक अभ्यास

निस्संदेह, शरीर एक मशीन है और इसे विश्राम की आवश्यकता होती है। थकान या गहरी नींद वेग हैं, जिन्हें नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। समस्या तब होती है जब शिथिलता हमारी आदत बन जाए, और हम ‘आराम’ के नाम पर जीवन की बहुमूल्य सजगता को खोते चले जाएँ। चित्त को बहाने गढ़ने की आदत न पड़ने दें।

जब अगली बार ध्यान करते समय या दिन के किसी भी प्रहर में अकारण सुस्ती, भारीपन या तंद्रा आपको घेरने लगे, तो तुरंत हार न मानें। उस भारीपन को अपना न समझें।

सबसे पहले अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा करें। यह महसूस करें कि ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा शरीर में सो गया है। अब कुछ देर के लिए बाहर छूटती हुई साँसों को थोड़ा गहरा और तेज़ कर दें। जैसे हवा से खाली हुआ फुटबॉल उछल नहीं सकता, वैसे ही प्राणवायु (ऊर्जा) से रहित शरीर साधना में प्रवृत्त नहीं हो पाता।

जब आप कुछ गहरी और तेज़ साँसें लेते हैं, तो शरीर के भीतर वह सोया हुआ ‘काया-संस्कार’ झकझोरा जाता है। रक्त का संचार बढ़ता है और चैतसिक कोहरा छंटने लगता है। इस अवस्था में स्वयं से दृढ़तापूर्वक कहें—“यह केवल एक मानसिक शिथिलता है। मैं इस बेहोशी में अपना जीवन व्यर्थ नहीं जाने दूँगा।”

जैसे ही आप उस भारीपन को ‘मैं थक गया हूँ’ की कहानी से हटाकर केवल एक ‘शारीरिक संवेदना’ के रूप में देखना शुरू करेंगे, और उसमें प्राणवायु भरेंगे—वह तंद्रा टूट जाएगी। शरीर पुनः सचेत और सक्रिय हो उठेगा। जब लगे कि ऊर्जा संतुलित हो गई है, तो साँस को उसके स्वाभाविक और शांत प्रवाह में छोड़ दें और अपनी सचेतता की साधना को पुनः आगे बढ़ाएँ।

आगे क्या पढ़ें?

आईए, अब चौथी रुकावट के त्याग की ओर बढ़ें—यानी उस बेचैनी और पश्चाताप की ओर—

  • जो हमारे हृदय को वश में कर उसे भटकाती है,
  • और हमारे अन्तर्ज्ञान को दुर्बल कर हमें दुःखों में उलझा देती है।
बेचैनी-पश्चाताप

उपमा: