
हम एक बेहद परेशान और उथल-पुथल से भरे दौर से गुज़र रहे हैं। हमारे समाज में जो कुछ भी अच्छा और अनमोल था—जैसे इंसानियत, न्याय, मोहब्बत, हिम्मत, देखभाल और हमदर्दी—वह सब आज बुरी तरह बिखर चुका है। कभी-कभी तो यह उम्मीद भी धुंधली पड़ने लगती है कि क्या हम इस टूटे हुए समाज को फिर से जोड़ पाएंगे?
अपने चारों तरफ़ नज़र उठाइए। एक निहत्था इंसान भीड़ के हत्थों चढ़ जाता है, वह घंटों अपनी जान की भीख मांगते हुए तड़पता रहता है, और हम सब आँखें फेरकर आगे बढ़ जाते हैं। जो युवा जोड़े धर्म और जाति की बेड़ियों को तोड़ने का हौसला दिखाते हैं, उन्हें समाज और यहाँ तक कि उनके अपने ही परिवार के लोग ‘खानदान की इज़्ज़त’ के नाम पर मौत के घाट उतार देते हैं। एक बेबस लड़की का सामूहिक बलात्कार होता है, एक मासूम स्कूली बच्चे को उसका मास्टर पीट-पीटकर मार डालता है, और एक दूल्हे को सिर्फ़ इसलिए घोड़ी से उतारकर जान से मार दिया जाता है क्योंकि उसने अपनी जाति की कथित सीमाओं को लांघने का ‘दुस्साहस’ किया था।
हमारी इस ज़मीन पर अब यह मान लिया गया है कि अगर किसी मुस्लिम पहचान वाले व्यक्ति के बुनियादी अधिकार छीने जा रहे हों, उसके घर पर बुल्डोजर चलाया जा रहा हो, उसकी इबादत को गुनाह ठहराया जा रहा हो या उसकी नागरिकता को कुचला जा रहा हो, तो चुपचाप आँखें मूंद लो। या फिर जब किसी लक्षित समुदाय के लोगों को बंदूक की नोंक पर सीमाओं के पार धकेला जा रहा हो या नावों से गहरे समंदर में फेंक दिया जा रहा हो, तब भी खामोश रहो।
यह स्थिति सिर्फ़ भारत की नहीं है, ज़रा दुनिया पर भी नज़र डालिए। आज एक अकेले इंसान (एलोन मस्क) की दौलत एक लाख करोड़ डॉलर (एक ट्रिलियन डॉलर) तक पहुँच चुकी है। दुनिया के सबसे शक्तिशाली मुल्क गाज़ा में मासूम बच्चों, राहत कर्मियों, डॉक्टरों और पत्रकारों के बेरहम कत्लेआम को या तो चुपचाप देख रहे हैं या खुलकर उसका साथ दे रहे हैं। दुनिया का सबसे रसूखदार नेता (डोनाल्ड ट्रम्प) बड़ी बेरुखी से गाज़ा के उन लोगों को वहाँ से खदेड़ने की बात करता है जो हज़ारों सालों से उस ज़मीन पर रह रहे हैं, ताकि उनकी तबाह हो चुकी मातृभूमि के मलबे पर एक आलीशान और रईसाना सैरगाह (Riviera) बनाई जा सके।
हर रोज़ नफ़रत, खौफ़ और असमानता की नई और उदास करने वाली कहानियाँ सामने आती हैं, जो साफ़ इशारा करती हैं कि यह महज़ एक राजनीतिक संकट नहीं, बल्कि पूरी मानवीय सभ्यता का एक गहरा नैतिक संकट है।
हमें इस सच का गवाह बनना होगा, अपने समाज की सोई हुई अंतरात्मा को झकझोरना होगा और इस अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठानी होगी। हमें नफ़रत की इस हिंसा और सरकारी नाइंसाफ़ी के खिलाफ हर मोर्चे पर लड़ना होगा—अदालतों में भी, सड़कों पर भी, और लोगों के दिलों व दिमागों में भी।
साहस और इंसानियत
लेकिन इस काले दौर में भी निराश होना कोई रास्ता नहीं है। उम्मीद बनाए रखना हमारा सामाजिक कर्तव्य है। इसलिए, हमें यह भी समझना होगा कि सिर्फ़ विरोध करना काफी नहीं है।
हमें इस बात का भी अहसास होना चाहिए कि हमारे आस-पास सिर्फ़ नफ़रत ही नहीं, बल्कि कुछ और कहानियाँ भी बिखरी पड़ी हैं। मज़बूत इरादों और हौसले की कहानियाँ, असीम करुणा की कहानियाँ, इंसानियत के लिए जान की बाज़ी लगा देने वाली एकजुटता की कहानियाँ, और दिल को छू लेने वाली क्षमा की कहानियाँ।
ये वे कहानियाँ हैं, जिन्हें हम अक्सर दुनिया को बताना भूल जाते हैं।
हमें इतिहासकार हॉवर्ड ज़िन की उस बात को याद रखना होगा कि इंसानी इतिहास सिर्फ़ ज़ुल्म और बेरहमी का इतिहास नहीं है। यह इंसानियत और बहादुरी का भी इतिहास है। और इस उलझे हुए इतिहास में से हम किस हिस्से को चुनते हैं, किस बात पर ज़ोर देते हैं, वही आख़िर में यह तय करेगा कि हम एक समाज के रूप में क्या बनते हैं।
इसलिए, जहाँ एक तरफ़ उस नफ़रत और अन्याय का गवाह बनना ज़रूरी है जो हमें कुचल रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ साहस और इंसानियत के इन छोटे-बड़े कदमों को पहचानना और उनका जश्न मनाना भी उतना ही ज़रूरी है।
इन्हीं कदमों को मैं ‘रेडिकल लव’ (क्रांतिकारी मोहब्बत) कहता हूँ—एक ऐसी मोहब्बत जो इतनी मज़बूत हो कि किसी सताए हुए बेबस इंसान की रक्षा के लिए मैं जेल जाने या अपनी जान दांव पर लगाने से भी पीछे न हटूँ।
अक्सर हम इन कहानियों पर ध्यान नहीं देते, हम कभी इनका जश्न नहीं मनाते।
इसी सोच के साथ हमारे मन में एक विचार आया—क्यों न देश के अलग-अलग हिस्सों में इंसानियत, हौसले और इस बेखौफ मोहब्बत का जश्न मनाया जाए? इन कहानियों को आम लोगों के बीच से ढूँढकर निकाला जाए और शायद, मोहब्बत के एक नए आंदोलन की नींव रखी जाए।
यही वह रास्ता है जो हमें उम्मीद देगा, जो समाज के ज़ख्मों को भरेगा, इसे फिर से जोड़ेगा और आगे का रास्ता रोशन करेगा।
‘रहमत’ उत्सव

मोहब्बत और बहादुरी के इस उत्सव को हमने नाम दिया—‘रहमत’, जिसका उर्दू में मतलब होता है करुणा, दया और देखभाल। इस मुहिम का बुनियादी मकसद उन लोगों को ढूँढना और समाज के सामने सम्मानित करना है जो नफ़रत की आंधी के सामने सीना तानकर खड़े हो गए। वे लोग जिन्होंने अपने काम से यह दिखाया कि आज भी इंसानियत ज़िंदा है।
ये वे आम लोग हैं जिन्होंने सांप्रदायिक, जातीय या लैंगिक हिंसा को रोकने के लिए अपनी जान जोखिम में डाली; जिन्होंने सताए गए लोगों को बचाया और उन्हें पनाह दी; जिन्होंने दूसरों की जान बचाई। ये वे लोग हैं जो भीड़ की नफ़रत, गुस्से, सरकारी प्रताड़ना या अपनी खुद की तंगहाली जैसी तमाम मुश्किलों से लड़कर उन लोगों की ढाल बने जो खतरे में थे, जो कमज़ोर थे या जो तड़प रहे थे।
सीधे शब्दों में कहें तो—वे लोग जो नफ़रत की ताकतों के आगे झुके नहीं।
हमने तय किया कि यह महज़ कोई एक कार्यक्रम नहीं होगा, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में चलने वाला एक सिलसिला होगा। हम चाहते हैं कि लोग खुद अपने आस-पास से ऐसी कहानियाँ ढूंढकर हमारे पास लाएँ, ताकि यह कारवां धीरे-धीरे बड़ा होता जाए।
शुरुआत हैदराबाद से
कहीं न कहीं से तो आगाज़ करना ही था। हैदराबाद के दोस्तों के एक बेहतरीन समूह ने देश के पहले ‘रहमत उत्सव’ की मेज़बानी करने की पेशकश की।
हमें उम्मीद थी कि यह तो बस एक शुरुआत है, आगे ऐसी हज़ारों कहानियाँ और उत्सव देखने को मिलेंगे। हुमेरा अहमद और अशहर फ़रहान ने इस उत्सव के लिए अपने उस खूबसूरत ठिकाने को चुना जिसे उन्होंने १६ साल पहले बनाया था—‘ला मकान’। उनके साथ इलाहे हिपतुल्ला, सलीमा रिज़वी, आज़म ख़ान, आसिया अहमद ख़ान और आमिर उल्लाह ख़ान जैसे दोस्त भी जुड़ गए। इन सात दोस्तों ने मिलकर हौसले और इंसानियत के इस पहले जश्न को बेहद खूबसूरत और यादगार बना दिया।
‘कारवां-ए-मोहब्बत’ की टीम के ज़िम्मे उन नायक-नायिकाओं को ढूँढने का काम था जिन्हें सम्मानित किया जाना था। इसके लिए हमारी टीम कश्मीर की वादियों से लेकर मणिपुर के हिंसाग्रस्त इलाकों तक, और उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर की बंटी हुई ज़मीन से लेकर उत्तर-पूर्वी दिल्ली के मुस्तफ़ाबाद और तटीय कर्नाटक तक पहुँची। मेरे साथियों ने कई दिनों तक इन नायकों से बात की, उन्हें समझाया कि हम क्या करना चाहते हैं और क्यों करना चाहते हैं, और फिर उन्हें हैदराबाद आने का न्योता दिया।
शुरुआत में थोड़ी हिचकिचाहट थी, थोड़ी झिझक थी, लेकिन फिर वे मान गए। टिकटें बुक हुईं और १३-१४ जून को हैदराबाद के ‘ला मकान’ में कार्यक्रम तय हो गया। उनके हैदराबाद पहुँचने के सफर में भी कई भावुक कर देने वाले अनुभव हुए। अप्रैल २०२५ में कश्मीर के पहलगाम में आतंकवादियों के हमले से पर्यटकों की जान बचाते हुए शहीद होने वाले साहसी टट्टू चालक आदिल हुसैन शाह के पिता, हैदर शाह ने अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी कश्मीर से बाहर कदम नहीं रखा था, न कभी ट्रेन या हवाई जहाज़ देखा था। मेरे साथी मोहम्मद आमिर ख़ान हर कदम पर फ़ोन के ज़रिए उनके साथ रहे, हवाई अड्डे की सुरक्षा और चेक-इन जैसी पेचीदा प्रक्रियाओं में उनका हाथ थामकर मार्गदर्शन करते रहे।
मणिपुर की कुकी शांति कार्यकर्ता नगाइनिकिम लुंकिम के लिए इम्फाल जाकर फ्लाइट पकड़ना मुमकिन नहीं था, क्योंकि वहाँ का माहौल उनके समुदाय के लिए सुरक्षित नहीं था। इसलिए, वे पहाड़ों के रास्ते १० घंटे का लंबा और जोखिम भरा सफर तय करके आइज़ोल पहुँचीं और वहाँ से हैदराबाद की फ्लाइट ली।
हैदराबाद पहुँचने पर युवा स्वयंसेवकों की एक टीम ने मेहमानों का स्वागत किया और उन्हें शहर घुमाया। हैदराबाद के दोस्तों ने बारी-बारी से उन्हें अपने घरों पर खाने पर बुलाया। रविवार के दिन, नगाइनिकिम चर्च में प्रार्थना करने गईं, इमाम रशीदी और हैदर शाह मस्जिद गए, और मोहिंदर सिंह गुरुद्वारे गए। इन कुछ दिनों में, अलग-अलग बैकग्राउंड से आए इन नायकों के बीच एक अटूट रिश्ता बन गया। जब वे बिछड़ रहे थे, तो आँखों में आँसू थे। उन्होंने आपस में जुड़े रहने के लिए एक व्हाट्सऐप ग्रुप भी बना लिया।
वे नायक, जिन्होंने नफ़रत को हरा दिया
१. हैदर शाह (कश्मीर)

‘ला मकान’ की पहली शाम की शुरुआत २८ साल के शहीद आदिल हुसैन शाह के पिता हैदर शाह से हुई।
आदिल ने पिछले अप्रैल में पहलगाम में बेगुनाह सैलानियों की जान बचाने के लिए एक आतंकवादी से लोहा लिया था, उसकी राइफल छीनने की कोशिश की थी और इसी दौरान वे शहीद हो गए थे।
उनके पिता ने सीधे और सरल शब्दों में, लेकिन बड़े गौरव और गरिमा के साथ अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि वे अपने बड़े बेटे से कितना प्यार करते थे और उसे कितना याद करते हैं, जो उनके घर का इकलौता सहारा था। लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें खुशी है कि उनके बेटे ने जो किया, वह इंसानियत के लिए किया। उनकी तहज़ीब, उनके धर्म और देशप्रेम ने उन्हें यही सिखाया था।
वे रोज़ अपने बेटे को याद करते हैं, पर उसकी शहादत पर उन्हें नाज़ है।
२. हिमांशी नरवाल

इसके बाद, ललिता रामदास ने हिमांशी नरवाल की तरफ़ से सम्मान स्वीकार किया।
हिमांशी एक ऐसी असाधारण युवा महिला हैं जिन्होंने पहलगाम में अपने हनीमून के दौरान एक आतंकवादी हमले में अपने नौसेना अधिकारी पति को खो दिया था। इस गहरे दुख के बावजूद, उन्होंने प्रेस के सामने आकर नफ़रत, हिंसा और बदले की भावना के खिलाफ एक बेहद मज़बूत और भावुक अपील की थी।
ललिता रामदास (जो भारत के पहले नौसेना प्रमुख की बेटी और १३वें नौसेना प्रमुख की पत्नी हैं) ने हिमांशी के नाम लिखा अपना एक पत्र पढ़कर सुनाया। उन्होंने लिखा, “मुझे तुम पर बहुत गर्व है। जब तुमने पहलगाम की उस भयानक घटना के बाद मुस्लिमों और कश्मीरियों को निशाना बनाए जाने के खिलाफ आवाज़ उठाई, तो तुम्हारा वह संयम और हौसला देखने लायक था। तुमने इस देश के हर संवेदनशील नागरिक की आवाज़ को ज़ुबान दी है, और हमें तुम्हारी मोहब्बत और करुणा के इस संदेश को दूर-दूर तक फैलाना होगा।”
३. इमाम रशीदी (पश्चिम बंगाल)

इसके बाद मंच पर आए इमाम रशीदी।
साल २०१८ में पश्चिम बंगाल के आसनसोल में जब सांप्रदायिक दंगे भड़के, तो दो हिंदू बच्चे मुस्लिम बहुल इलाके में फंस गए और एक मुस्लिम बच्चा हिंदू इलाके में छूट गया। बच्चों की अदला-बदली की बातचीत चल ही रही थी कि इमाम रशीदी ने दखल दिया और ज़ोर देकर कहा कि हिंदू बच्चों को बिना किसी शर्त के सुरक्षित उनके माता-पिता के पास पहुँचाया जाए। जब हिंदू बच्चे सुरक्षित लौट आए, तो लोग उस मुस्लिम बच्चे का इंतज़ार करने लगे। वह बच्चा कोई और नहीं, बल्कि खुद इमाम साहब का बेटा था।
आधी रात के आस-पास पुलिस ने इमाम साहब को खबर दी कि उनके बेटे को बेरहमी से तड़पाकर मार डाला गया है।
अगर उस वक्त इमाम साहब ने खुद पर काबू न रखा होता, तो पूरा शहर बदले की आग में जल उठता। लेकिन इमाम साहब ने अपने समाज के लोगों से हाथ जोड़कर अपील की: “मेरे बेटे की मौत मेरे लिए एक बहुत बड़ी त्रासदी है, लेकिन अगर बदले में एक भी हिंदू को नुकसान पहुँचा, तो यह उससे भी बड़ी त्रासदी होगी।”
जब मैं यह कहानी सुना रहा था, तो इमाम साहब की आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने कहा कि ५ साल में यह पहली बार था जब वे जनता के सामने इस तरह रोए थे। उन्होंने कहा, “मेरे मज़हब इस्लाम ने मुझे यही सिखाया है कि राह चाहे कितनी भी कठिन हो, हमें अमन का रास्ता नहीं छोड़ना है।”
४. नगाइनिकिम और क्षेत्रीमयुम ओनिल (मणिपुर)

इसके बाद बारी आई कुकी महिला मानवाधिकार संगठन की अध्यक्ष नगाइनिकिम की।
३ मई २०२३ को जब मणिपुर में हिंसा भड़की, तो वे अपनी बेटी के क्लिनिक पर थीं। सड़क के दूसरी तरफ़ मैतेई समुदाय के कुछ लोगों की बंदूक की दुकान थी। जब कुकी पुरुषों की एक उग्र भीड़ उस दुकान को लूटने और उन दुकानदारों को मारने के लिए बढ़ी, तो नगाइनिकिम उस भीड़ और उन दुकानदारों के बीच ढाल बनकर खड़ी हो गईं और उन्हें सुरक्षित पुलिस स्टेशन पहुँचाया।
जब वे क्लिनिक लौटीं, तो देखा कि दो मैतेई पुरुष वहाँ डरे-सहमे छिपे हुए थे। उन्होंने रात के ३ बजे अपनी स्कूटी से उन दोनों को भी सुरक्षित स्थान पर पहुँचाया। अगले दिन उन्होंने कुकी महिलाओं की एक मानव श्रृंखला बनाई ताकि मैतेई परिवारों को सुरक्षित निकाला जा सके।
नगाइनिकिम ने बताया कि इंफाल घाटी में फंसे उनके अपने कुकी रिश्तेदारों को कोई बचाने नहीं आया और वे मारे गए। इस बात का उनके दिल में एक गहरा ज़ख्म था। लेकिन हैदराबाद के इस मंच पर जब वे मैतेई शांति कार्यकर्ता क्षेत्रीमयुम ओनिल से मिलीं, जिन्होंने खुद अपनी जान पर खेलकर कई कुकी लोगों की जान बचाई थी, तो नगाइनिकिम ने रोते हुए कहा, “ओनिल से मिलकर मेरे दिल का ७० प्रतिशत ज़ख्म भर गया है।”
मणिपुर के उस नफ़रत भरे माहौल में इन दोनों का मिलना नामुमकिन था, लेकिन हैदराबाद में ऐसा लगा मानो नगाइनिकिम को ओनिल के रूप में एक खोया हुआ भाई मिल गया हो।
ओनिल ने बताया कि जब उनके अपने मैतेई समुदाय के हथियारबंद गुट सड़कों पर घूम रहे थे, तब उन्होंने कुकी-ज़ो समुदाय के बच्चों और महिलाओं को बचाकर सुरक्षित कैंपों में पहुँचाया। धमकियों के बावजूद वे आज भी मणिपुर में शांति और भाईचारे की वकालत कर रहे हैं।
५. सनी शर्मा (उत्तर प्रदेश)

सनी शर्मा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शामली ज़िले के लिसाढ़ गाँव में मोबाइल की दुकान चलाते हैं और स्थानीय खाप पंचायत के एक रसूखदार सदस्य हैं।
उन्होंने याद किया कि कैसे २०१३ के मुज़फ्फरनगर दंगों के दौरान उन्होंने अपनी दुकान पर काम करने वाले एक मुस्लिम लड़के नदीम और उसके परिवार को अपने घर में छिपाकर बचाया था।
उन्होंने अपनी मोटरसाइकिल पर बिठाकर कई लोगों को सुरक्षित ठिकानों पर पहुँचाया, जबकि हथियारों से लैस दंगाइयों की भीड़ उनका रास्ता रोकने की कोशिश कर रही थी। उनके दोस्त बबलू ने भी अपने ट्रैक्टर से लोगों को अपने पोल्ट्री फार्म पर पहुँचाया और देसी कट्टों के साथ रात भर पहरा दिया जब तक कि उन्हें सरकारी राहत शिविरों में नहीं पहुँचा दिया गया।
हैदराबाद में सनी शर्मा ने साफ़ शब्दों में कहा, “पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ३६ बिरादरियाँ रहती हैं, मुसलमान भी उन्हीं में से एक हैं। हम हमेशा से प्यार-मोहब्बत से साथ रहे हैं और किसी भी बाहरी ताकत को अपने इस भाईचारे को तोड़ने नहीं देंगे।”
६. अब्दुल बशीर का परिवार (कर्नाटक)

मंच पर अब्दुल बशीर के भाई नौशाद को सम्मानित किया गया।
साल २०१८ में मंगलौर में एक दक्षिणपंथी कार्यकर्ता की हत्या के बदले के रूप में, दंगाइयों ने अब्दुल बशीर को निशाना बनाया, जो २५ साल खाड़ी देशों में काम करने के बाद लौटे थे और एक फास्ट-फूड की दुकान चलाते थे। रात के १० बजे जब वे अपनी दुकान का शटर गिरा रहे थे, तब उन पर हमला हुआ और अस्पताल में उनकी मौत हो गई।
अस्पताल के बाहर एक गुस्सैल भीड़ इकट्ठा हो गई और शहर में दोबारा दंगा भड़कने का खतरा पैदा हो गया। कुछ लोग उनके शव के साथ जुलूस निकालना चाहते थे, लेकिन बशीर के परिवार ने साफ़ मना कर दिया। उन्होंने मीडिया के सामने कहा कि बशीर कभी नहीं चाहते कि उनकी मौत की वजह से शहर में किसी और का खून बहे। उन्होंने खामोशी से शव को घर के पास की मस्जिद में पहुँचाया और जनाज़ा छोटा रखा।
इसका असर यह हुआ कि हिंदू और ईसाई समुदाय के लोग भी भारी संख्या में उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुँचे और शहर हिंसा की आग में जलने से बच गया।
७. मोहिंदर सिंह (दिल्ली)

इस उत्सव का समापन मोहिंदर सिंह के सम्मान के साथ हुआ, जिन्होंने २०२० के दिल्ली दंगों के दौरान अपने बेटे इंद्रजीत सिंह के साथ मिलकर लगभग ७० से ८० मुस्लिम महिलाओं, बच्चों और पुरुषों की जान बचाई थी। 1
जब एक उग्र भीड़ घर के पास की जन्नती मस्जिद को तोड़ने बढ़ी, तो उन्हें पता चला कि कुछ लोग अंदर छिपे हैं। वे पिछले दरवाज़े से अंदर गए और अपनी जान जोखिम में डालकर उन लोगों को अपने घर ले आए। उनके घर की महिलाओं ने मुस्लिम पुरुषों के सिर पर पगड़ी बांध दी ताकि वे सिख लगें और दंगाइयों की नज़रों से बच सकें। जब हिंसा थोड़ी कम हुई, तो दोनों बाप-बेटे ने अपने थ्री-व्हीलर (ऑटो) से २० चक्कर लगाकर उन सभी को सुरक्षित मुस्लिम बहुल इलाके में पहुँचाया।
मोहिंदर सिंह ने कहा, “अगर आप अपने धर्म को सच्चे दिल से मानते हैं, तो आप धर्म के नाम पर किसी दूसरे इंसान पर ज़ुब्म होते हुए कभी देख ही नहीं सकते।”
‘रहमत’ का संदेश
हैदराबाद का यह ‘रहमत उत्सव’ कल्पना से भी ज़्यादा खूबसूरत और रोशन था।
हमारी मॉडरेटर राना अय्यूब और कुणाल पुरोहित ने इन दोनों शामों को बड़ी संवेदनशीलता, सम्मान और गरिमा के साथ आगे बढ़ाया। गायक अनुज गुरवारा और उनके बैंड ने साहिर लुधियानवी के उस कालजयी गीत के साथ उत्सव का समापन किया—“तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा।”
जब ये नायक मंच पर बोल रहे थे, तो हॉल में एक भी आँख ऐसी नहीं थी जो नम न हो, एक भी दिल ऐसा नहीं था जो भरा हुआ न हो। इन लोगों ने हमें यह भरोसा दिलाया कि हमारे समाज में अभी भी अच्छाई बाकी है, हम एक नागरिक के रूप में पूरी तरह टूटे नहीं हैं और हम अपनी इंसानियत को फिर से ज़िंदा कर सकते हैं।
मुझे उम्मीद है कि यह तो बस पहली ‘रहमत’ थी, आगे ऐसे कई उत्सव होंगे। नफ़रत के इस तूफ़ान के बीच अपने भीतर की दया और करुणा को बचाए रखना ही इस नफ़रत की राजनीति के खिलाफ हमारा सबसे बड़ा और मज़बूत नागरिक प्रतिरोध है। इसी रास्ते से हम अपने देश और दुनिया को वापस मोहब्बत, न्याय, बंधुता और समानता की ज़मीन पर ला सकते हैं।
आइए, मिलकर इस नई दुनिया का निर्माण करें जहाँ आपका दर्द मेरी आँखों में आँसू ला दे।
इस पर बीबीसी की रिपोर्टिंग। ↩︎
आगे क्या पढ़ें?
यदि यह लेख पसंद आया हो तो यह लेख अवश्य पढ़ें।
हर्ष मंदर का यह लेख भी अवश्य पढ़ें, जिसमें आशा की किरण जागती है।

हर्ष मंदर देश के एक जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और पूर्व प्रशासनिक अधिकारी (IAS) हैं।
साल २००२ में गुजरात दंगों के दौरान राज्य सरकार की भूमिका के विरोध में उन्होंने अपनी प्रतिष्ठित प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा दे दिया था। तब से वे लगातार हाशिए पर खड़े लोगों, बेघरों, अनाथ बच्चों और नफ़रत का शिकार हुए बेगुनाह नागरिकों के हक के लिए ज़मीनी तौर पर संघर्ष कर रहे हैं।
[expand]
वे ‘कारवां-ए-मोहब्बत’ नामक एक देशव्यापी नागरिक मुहिम का नेतृत्व करते हैं। इस मुहिम का मकसद नफ़रत की हिंसा और मॉब लिंचिंग से पीड़ित परिवारों के घर जाकर उनके ज़ख्मों पर मरहम लगाना, उनके लिए न्याय की लड़ाई लड़ना और समाज में आपसी भाईचारे (बंधुता) को दोबारा ज़िंदा करना है। उनकी वैबसाइट और यूट्यूब चैनल देखें।
इसके साथ ही वे बेघर लोगों के इलाज के लिए ‘रिकवरी शेल्टर्स’ चलाने जैसे कई मानवीय कार्यों से भी जुड़े हैं। उन्होंने ‘अमन बिरादरी’ की स्थापना की, जो एक धर्मनिरपेक्ष और सामाजिक न्याय पर आधारित अभियान है। साथ ही, ‘रेनबो फाउंडेशन इंडिया’ के माध्यम से वे लगभग 5,000 बेघर बच्चों और महिलाओं के लिए सुरक्षित आवास व स्वास्थ्य प्रयासों का नेतृत्व कर रहे हैं। वे वर्तमान में ‘सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज’, नई दिल्ली के निदेशक के रूप में कार्यरत हैं।
उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर कई महत्वपूर्ण नीतिगत भूमिकाएं निभाई हैं:
- भोजन का अधिकार अभियान: साल 2005 से 2017 तक उन्होंने भारत के सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया) के विशेष आयुक्त के रूप में देश में भुखमरी और पोषण सुधार से संबंधित मामलों की कड़ाई से निगरानी की।
- राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC): साल 2010 से 2012 के बीच वे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य रहे, जहाँ उन्होंने खाद्य सुरक्षा (Food Security), शहरी गरीबी, विकलांगों के अधिकार, बाल श्रम उन्मूलन और जातीय अल्पसंख्यक अधिकारों के कानूनों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC): उन्होंने भारत के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के विभिन्न सलाहकार और कार्य समूहों (Advisory and Working Groups) में भी अपनी सेवाएँ दी हैं, जहाँ उन्होंने विशेष रूप से बंधुआ मजदूरी (Bonded Labour) और मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर कार्य किया है।
- एक्शनएड इंडिया: 1999 से 2004 तक उन्होंने ‘ActionAid India’ के कंट्री डायरेक्टर के रूप में कमजोर समाजों के उत्थान के लिए कई अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय विकास पहलों का संचालन किया।
एक प्रखर शिक्षाविद के रूप में हर्ष मंदर ने भारत और विदेशों के अनेक विश्वविद्यालयों में गरीबी, शासन और सामाजिक न्याय पर पढ़ाया है। वे IIM (अहमदाबाद), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), सेंट स्टीफंस कॉलेज (दिल्ली), जामिया मिलिया इस्लामिया (दिल्ली) और NALSAR (हैदराबाद) जैसी शीर्ष शैक्षणिक संस्थाओं में प्रोफेसर रह चुके हैं। इसके अलावा, उन्होंने विश्वप्रसिद्ध MIT, UCLA, स्टैनफ़ोर्ड और कैम्ब्रिज जैसे अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों में भी व्याख्यान दिए हैं।
मानवाधिकारों और शांति के लिए किए गए उनके अतुलनीय प्रयासों के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाज़ा गया है:
- राजीव गांधी राष्ट्रीय सद्भावना पुरस्कार (सांप्रदायिक सौहार्द और शांति के लिए)
- M.A. Thomas राष्ट्रीय मानवाधिकार पुरस्कार (2002)
- South Asian Minority Lawyers Harmony Award (2012)
- साल 2022 में नोबेल शांति पुरस्कार (Nobel Peace Prize) के लिए प्रतिष्ठित शॉर्टलिस्ट में उनका नाम शामिल किया गया।
एक लेखक के रूप में हर्ष मंदर ने भारतीय समाज की कड़वी सच्चाइयों, अत्यधिक गरीबी, भूखमरी और सांप्रदायिक सौहार्द पर कई महत्वपूर्ण किताबें लिखी हैं। उनका पूरा जीवन और लेखन इसी एक विचार पर केंद्रित है कि नफ़रत का मुकाबला सिर्फ़ और सिर्फ़ ‘क्रांतिकारी मोहब्बत’ (Radical Love) से ही किया जा सकता है।
उनकी व्यक्तिगत वैबसाइट और X (ट्विटर) अकाउंट देखें। उनके अनेक लेखों को अँग्रेजी में स्क्रोल, द हिन्दू, हिंदुस्तान टाइम्स, द इंडियन एक्सप्रेस, द वायर में पढ़ें। इनके अलावा, हिन्दी में उनके लेख दैनिक भास्कर और दैनिक जागरण में भी छपते हैं।
[/expand]
