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परिवर्तन का सच

— अनित्य का भ्रम और उसका वास्तविक परिप्रेक्ष्य —

लेखक: थानिस्सरो भिक्खु
| १८ मिनट



परिवर्तन ही बौद्ध प्रज्ञा का मुख्य केंद्र बिंदु है—यह तथ्य इतनी अच्छी तरह से जाना जाता है कि इसने आज के दौर में एक घिसा-पिटा जुमला रूप ले लिया है: “क्या बौद्ध धर्म का पूरा सार परिवर्तन को स्वीकार करना ही नहीं है?”

परंतु जो बात लोग अक्सर नहीं जानते, वह यह है कि परिवर्तन की इस सीख का अपना एक निश्चित ढांचा है; परिवर्तन न तो वह बिंदु है जहाँ से बौद्ध प्रज्ञा की शुरुआत होती है और न ही वह जहाँ इसका अंत होता है। बुद्ध की प्रज्ञा की शुरुआत एक ऐसे प्रश्न से होती है जो ‘सच्चे सुख’ की चाह के आलोक में परिवर्तन का मूल्यांकन करता है। और इसका अंत एक ऐसे परम सुख पर होता है जो समय और परिवर्तन के दायरे से पूरी तरह परे है।

जब लोग इस मूल ढांचे को भूल जाते हैं, तो वे बुद्ध के उपदेशों को अपनी सुविधानुसार एक नया संदर्भ दे देते हैं और यह मान लेते हैं कि बुद्ध भी उन्हीं के जैसे आधुनिक विचारों के दायरे में सोच रहे थे। आज के समय में बुद्ध के नाम पर दो भ्रामक संदर्भ बहुत चाव से बेचे जा रहे हैं:

  1. भोगपरक दृष्टिकोण:

    परिवर्तन का ज्ञान हमें सिखाता है कि हम अपने अनुभवों को बिना किसी मोह के गले लगाएँ—अर्थात वर्तमान क्षण में उनकी तीव्रता का पूरा आनंद लें, यह पूरी तरह जानते हुए कि जल्द ही हमें इन्हें छोड़कर आगे आने वाले अनुभवों को स्वीकार करना होगा।

  2. उत्पादनपरक दृष्टिकोण:

    परिवर्तन का नियम हमें आशा सिखाता है। चूँकि बदलाव चीज़ों के स्वभाव में ही अंतर्निहित है, इसलिए कुछ भी स्थायी या निश्चित नहीं है, यहाँ तक कि हमारी अपनी पहचान भी नहीं। परिस्थिति चाहे कितनी भी विकट क्यों न हो, सब कुछ संभव है। हम जो चाहें कर सकते हैं, जैसा संसार चाहें रच सकते हैं, और जो बनना चाहें बन सकते हैं।

इनमें से पहली व्याख्या हमें यह बुद्धिमत्ता सिखाती है कि जब आप नहीं चाहते कि आपका सुख बदले, तब भी उस तात्कालिक और व्यक्तिगत सुख का उपभोग कैसे किया जाए। दूसरी व्याख्या हमें यह सिखाती है कि जब आप अपनी पसंद का बदलाव चाहते हैं, तो उसे कैसे निर्मित किया जाए। यद्यपि ऊपर से ये दोनों बातें एक-दूसरे की पूरक लगती हैं, परंतु इनके भीतर एक गहरा व्यावहारिक अंतर्विरोध छिपा है:

  • यदि जीवन के सारे अनुभव इतने क्षणभंगुर और परिवर्तनशील हैं, तो उन्हें निर्मित करने में इतनी ऊर्जा और पुरुषार्थ लगाने का लाभ ही क्या है?
  • हम किसी सकारात्मक बदलाव की संभावना में वास्तविक आशा कैसे ढूंढ सकते हैं, यदि उस बदलाव के आने पर हम चैन से उसके सुख में ठहर भी न सकें?
  • क्या हम स्वयं को एक और नई निराशा के लिए तैयार नहीं कर रहे हैं?

या फिर यह जीवन के उन विरोधाभासों में से एक है जिससे बचा नहीं जा सकता? अनेक संस्कृतियों की प्राचीन लोक-बुद्धिमत्ता तो यही कहेगी कि हमें परिवर्तन को एक सतर्क आनंद और उदासीन समता के साथ देखना चाहिए: खुद को अपने कर्मों के परिणामों से अनासक्त करने का अभ्यास करना चाहिए, और बिना कोई प्रश्न उठाए इस बात को स्वीकार कर लेना चाहिए कि हमें अपनी पूरी सामर्थ्य से इन क्षणभंगुर सुखों को निर्मित करते रहना है—क्योंकि इसके अलावा दूसरा विकल्प केवल अकर्मण्यता और निराशा ही है। आज यह घिसी-पिटाई सांसारिक सोच भी अक्सर बुद्ध के मढ़ दी जाती है।

परंतु बुद्ध ऐसे व्यक्ति नहीं थे जो चीज़ों को बिना जाँचे-परखे स्वीकार कर लें। उनकी बुद्धिमत्ता इस बात को जानने में थी कि सुख के उत्पादन में लगाया गया पुरुषार्थ केवल तभी सार्थक है, जब परिवर्तन की इस पूरी प्रक्रिया को इतनी कुशलता से साधा जा सके कि हम एक ऐसे सुख तक पहुँच जाएँ जिस पर परिवर्तन का कोई असर ही न हो। अन्यथा, हम जीवन भर एक ‘बंधुआ मज़दूर’ की तरह रहेंगे, जो अपनी भूख मिटाने के लिए क्षणभंगुर सुखों के उत्पादन में तो लगा है, पर वे सुख अंदर से इतने खोखले और सारहीन हैं कि वे हमें कभी पूर्णता का बोध नहीं करा सकते।

एक आध्यात्मिक प्रश्न

ये सारे सत्य उस मूल प्रश्न में अंतर्निहित हैं, जो बुद्ध के अनुसार, वास्तविक प्रज्ञा की शुरुवात है:

किस तरह के कर्म मुझे दीर्घकालीन हित एवं सुख की ओर ले जाएँगे?

यह एक नितांत निजी और हृदय से निकला हुआ प्रश्न है, जो हर मानवीय कर्म के पीछे छिपी मूल प्रेरणा से संचालित है—एक ऐसा सुख पाना जो उस परिश्रम के योग्य हो जो उसे पाने में लगाया गया है। यह इस बोध से जनम लेता है कि जीवन प्रयास की मांग करता है, और यदि हम सावधान नहीं रहे, तो पूरी ज़िंदगी व्यर्थ जा सकती है।

यह प्रश्न, और इसके पीछे छिपा बोध, बुद्ध के पूरे दर्शन को एक सही परिप्रेक्ष्य देता है। यदि हम इसका सूक्ष्मता से विश्लेषण करें, तो हमें परिवर्तन के उत्पादन और उपभोग को लेकर बुद्ध के सभी क्रांतिकारी सूत्रों के बीज यहीं मिल जाते हैं।

इस प्रश्न का पहला भाग—“किस तरह के कर्म…”—पूरी तरह ‘उत्पादन’ के पहलू पर, अर्थात मनुष्य के कर्मों की सामर्थ्य पर केंद्रित है। अपने बोधि से पूर्व, बोधिसत्व ने अपना घर छोड़ा और घने जंगलों में केवल इसी सत्य की खोज के लिए निकले थे: यह देखने के लिए कि मानवीय कर्म की सीमा कहाँ तक जा सकती है, और क्या यह कर्म मनुष्य को किसी ऐसे आयाम तक ले जा सकता है जहाँ परिवर्तन की पहुँच ही न हो।

उनकी बोधि इस बात का साक्षात प्रमाण था कि ऐसा संभव है—यदि कर्म को कुशलता के उच्चतम स्तर तक परिष्कृत किया जाए।

इसी आधार पर उन्होंने सिखाया कि कर्म चार प्रकार के होते हैं, जो कुशलता के चार स्तरों के अनुकूल हैं: तीन प्रकार के कर्म वे हैं जो समय और स्थान के इस चक्रव्यूह के भीतर अच्छे, बुरे और मिले-जुले अनुभवों का उत्पादन करते हैं; और चौथा प्रकार का कर्म (आर्य अष्टांगिक मार्ग) वह है जो मनुष्य को कर्मों के जाल से ही परे ले जाता है—एक ऐसे परम सुख की ओर जो समय और स्थान की सीमाओं को लांघ जाता है, जिसके बाद किसी और सुख को निर्मित करने की कोई आवश्यकता ही शेष नहीं रह जाती।

समय और स्थान के पार

चूँकि उत्पादन और उपभोग (प्रकट करने और भोगने) की प्रक्रियाओं के लिए समय और स्थान की आवश्यकता होती है, इसलिए जो सुख समय और स्थान के पार है, वह अपने स्वभाव से ही न तो निर्मित किया जा सकता है और न ही भोगा जा सकता है। इसलिए, जब बुद्ध ने उस परम सुख को पा लिया और वे उत्पादन तथा उपभोग के इस खेल से बाहर आ गए, तब वे मुड़कर यह साफ देख पाए कि साधारण इंसानी अनुभवों में यह खेल कितनी गहराई से पैठा हुआ है और यह हमें कितना लाचार बना देता है।

उन्होंने देखा कि वर्तमान क्षण का हमारा यह अनुभव कोई बनी-बनाई ठोस चीज़ नहीं है, बल्कि यह एक निरंतर चलने वाली ‘क्रिया’ है—कुछ ऐसा जिसे हमारा मन अतीत के कर्मों से मिले कच्चे माल के सहारे पल-पल गढ़ रहा है, निर्मित (संस्कृत) कर रहा है। यहाँ तक कि हम अपनी अस्मिता, अपने ‘मैं’ के भाव को भी पल-पल स्वयं निर्मित करते हैं। और इसी निर्मित किए गए संसार में हम जहाँ कहीं भी सुख की कोई महीन झलक पाते हैं, उसे भोगने के लिए झपट पड़ते हैं—परंतु सुख को भोगने की इस अंधी भूख में, हम अक्सर दुःख को निगल जाते हैं।

जीवन के हर पल में उत्पादन और उपभोग आपस में इस तरह गुँथे हुए हैं कि हम अनुभवों को भोगते-भोगते उन्हें निर्मित करते हैं, और निर्मित करते-करते उन्हें भोगते हैं। हम आज अपने सुखों या दुखों को किस प्रकार भोग रहे हैं, यही बात इस बात को तय करती है कि हम भविष्य के लिए कैसे सुख या दुःख निर्मित कर रहे हैं—और यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि हम अपनी चेतना में कितने कुशल हैं।

बुद्ध के मूल प्रश्न के अंतिम तीन शब्द—“मुझे / दीर्घकालीन / हित और सुख”—वास्तविक सुख को नापने के तीन अचूक पैमाने हैं। हम इन पैमानों को उन अनुभवों पर लागू करते हैं जिन्हें हम भोग रहे हैं: यदि वे अनुभव ‘दीर्घकालिक’ नहीं हैं, तो वे चाहे कितने भी लुभावने क्यों न हों, वे वास्तविक सुख नहीं हैं। और यदि वे वास्तविक सुख नहीं हैं, तो उन्हें “यह मेरा है” या “यह मैं हूँ” कहने का कोई तार्किक आधार नहीं है।

त्रिलक्षण की श्रृंखला

यही सूक्ष्म समझ बुद्ध द्वारा सिखाए गए ‘त्रिलक्षण’ का आधार बनती है, जिनका उद्देश्य संसार के इस सीमित समय और स्थान वाले अनुभवों के प्रति मन में वैराग्य जगाना है।

इन तीनों में पहला लक्षण—‘अनित्य’—सबसे महत्वपूर्ण है। अनित्य हर उस चीज़ पर लागू होता है जो बदलती है, परिवर्तनशील है, जो भरोसेमंद नहीं है। यदि कोई वस्तु अनित्य है, तो शेष दो लक्षण स्वतः ही उसके पीछे चले आते हैं—वह दुःख (तनाव/कष्टप्रद) है और वह ‘अनात्म’ (मैं/मेरा नहीं) है, अर्थात वह इस योग्य ही नहीं है कि उसे ‘मैं’ या ‘मेरा’ माना जाए।

यदि आप अपने दीर्घकालिक सुख के लिए किसी सुरक्षित आधार की खोज में निकले हैं, तो किसी भी ऐसी वस्तु पर अपनी उम्मीदें टिकाना जो खुद डगमगा रही है (अनित्य है), निश्चित रूप से तनाव और कष्ट (दुःख) को ही जन्म देगा—यह किसी ऐसी टूटी हुई कुर्सी पर बैठकर आराम करने जैसा है जिसकी टांगें कभी भी टूट सकती हैं।

और जब आप यह समझ जाते हैं कि आपका ‘मैं’ का भाव भी मन द्वारा जानबूझकर गढ़ी गई एक रणनीति मात्र है, तो किसी ऐसी चीज़ के इर्द-गिर्द “यह मैं हूँ” या “यह मेरा है” का प्रपंच रचने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती जो खुद अविश्वसनीय और कष्टप्रद है। आप निश्चित ही इससे कुछ बेहतर चाहेंगे। आप उस क्षणभंगुर अनुभव को अपनी साधना का अंतिम लक्ष्य कभी नहीं बनाएंगे।

साधना का मार्ग

तो फिर उन अनुभवों का क्या किया जाए जो अविश्वसनीय और कष्टप्रद हैं? आप उन्हें पूरी तरह व्यर्थ मानकर फेंक सकते हैं, परंतु वह एक भारी बर्बादी होगी। आखिर उन्हें निर्मित करने में आपने इतनी ऊर्जा लगाई है; और सच तो यह है कि उस परम मुकाम तक पहुँचने का एकमात्र रास्ता इन्हीं साधारण अनुभवों के सही उपयोग से होकर गुज़रता है।

अतः आप इनका उपयोग लक्ष्य तक पहुँचने के ‘साधन’ के रूप में करना सीखते हैं। इस मार्ग में उनकी भूमिका इस बात से तय होती है कि उन्हें निर्मित करने में किस प्रकार का कर्म शामिल था—क्या वह ऐसा कर्म था जो मुक्ति के अनुकूल सुख देता है, या वह जो संसार में ही उलझाए रखता है। जो कर्म मुक्ति के अनुकूल सुख देते हैं, बुद्ध ने उन्हें ‘मार्ग’ की संज्ञा दी। इन कर्मों में दान, शील और भावना (साधना) का अभ्यास शामिल है।

यद्यपि ये कुशल कर्म भी त्रिलक्षण (अनित्य, दुःख और अनात्म) के दायरे में ही आते हैं, परंतु ये एक ऐसा सुख उत्पन्न करते हैं जो साधारण इंद्रिय-सुखों की तुलना में कहीं अधिक स्थिर, सुरक्षित, गहरा और आध्यात्मिक पोषण देने वाला होता है। इसलिए, यदि आपका लक्ष्य इस परिवर्तनशील संसार के भीतर ही एक बेहतर सुख पाना है, तो आपको दान, शील और साधना के आश्रय में जाना चाहिए।

और यदि आप इस परिवर्तन के चक्रव्यूह से पूरी तरह बाहर निकलकर परम सुख पाना चाहते हैं, तब भी यही कुशल कर्म आपके मन को वह स्पष्टता और प्रज्ञा देंगे जो बोधि के लिए अनिवार्य है। दोनों ही स्थितियों में, इन पर महारत हासिल करना एक आवश्यक हुनर है। ये आपके बुनियादी औज़ार हैं, जिन्हें आपको सदा तीक्ष्ण और तैयार रखना होगा।

जहाँ तक अन्य साधारण सुखों और दुखों का प्रश्न है—जैसे इंद्रियों की दौड़ या इस हाड़-मांस के शरीर और चंचल मन का होना—ये वे वस्तुएँ हैं जिन्हें आप अपने इन औज़ारों (दान, शील, साधना) से तराशते हैं। ये उस प्रज्ञा के लिए कच्चा माल हैं जो जागृति की ओर ले जाती है। जब आप इन साधारण सुख-दुखों को त्रिलक्षण के चश्मे से गहराई से देखते हैं—यह साफ-साफ पहचानते हैं कि वे कैसे अविश्वसनीय, तनावपूर्ण और पराये हैं—तो उन्हें बार-बार निर्मित करने और भोगने की आपकी अंधी भूख कम होने लगती है।

आप देख पाते हैं कि उन्हें गढ़ने की आपकी यह आत्मघाती लत पूरी तरह से राग (दिलचस्पी, अंधा लगाव), द्वेष (दुर्भावना, नफ़रत) और मोह (भ्रम, अज्ञान) से जनम लेती है। जब यह सत्य भीतर से चमकता है, तो गढ़े हुए अनुभवों और उन्हें गढ़ने की प्रक्रिया—दोनों के प्रति मन में एक गहरा वैराग्य उदित होता है। यहीं से साधक चौथे प्रकार के कर्म के मार्ग पर कदम रखता है, जो सीधा ‘अमृत पद’ (निर्वाण) की ओर ले जाता है।

मार्ग के दो निर्णायक मोड़

इस परम मार्ग में दो अत्यंत सूक्ष्म और महत्वपूर्ण मोड़ आते हैं:

पहला मोड़ (समाधि का रस)

यह मोड़ तब आता है जब इंद्रिय-सुखों और सांसारिक कष्टों के प्रति सारा राग-द्वेष शांत हो जाता है, और आपकी अंतिम आसक्ति केवल समाधि के उस गहरे प्रीति और सुख से रह जाती है। इस बिंदु पर आकर, आपको समाधि के उसी आनंद पर भी उन्हीं तीन पैमानों (त्रिलक्षण) को लागू करना होता है जिनका उपयोग आपने सांसारिक भोगों को परखने के लिए किया था।

यहाँ कठिनाई यह होती है कि आप अपनी समाधि की उस स्थिरता और सुरक्षा पर इतना अधिक भरोसा कर चुके होते हैं कि आपका मन उसकी कमियों को देखने से कतराता है। साथ ही, एक एकाग्र चित्त की अनित्यता साधारण इंद्रिय-सुखों की तुलना में अत्यंत महीन और सूक्ष्म होती है। परंतु जिस दिन आप इस मोह को छोड़कर उस सूक्ष्म हलचल को भी पकड़ लेते हैं, उसी दिन आपका चित्त उस ‘अमृत पद’ की ओर झुक जाता है।

दूसरा मोड़ (अंतिम आसक्ति)

यहीं पर दूसरा मोड़ आता है। जैसा कि मूल सूत्र बताते हैं, जब चित्त पहली बार उस अमृत पद (निर्वाण) का स्पर्श करता है, तो वह उसे भी मन का एक विषय—एक ‘धम्म’—मान बैठता है, और उसके प्रति भी भीतर ही भीतर एक गहरा राग और रस निर्मित करने लगता है। भोगने और उत्पादन करने वाले ‘मैं’ का यह अत्यंत महीन और गढ़ा हुआ भाव ही पूर्ण बोधि के मार्ग में अंतिम बाधा बन जाता है।

इस अंतिम बिंदु पर आकर त्रिलक्षण के तर्क को एक नया और क्रांतिकारी मोड़ लेना पड़ता है। त्रिलक्षण का मूल तर्क कहता था—“जो कुछ भी अनित्य है वह दुःख है; जो कुछ भी दुःख है वह अनात्म है।”

इस तर्क में यह संभावना छिपी हुई थी कि जो कुछ स्थिर या नित्य है, वह (१) पूर्ण सुख हो सकता है और (२) वह ‘मैं’ (आत्म) हो सकता है। पहली बात तो बिल्कुल सच है—जो नित्य है वही परम सुख है; निर्वाण ही अंतिम विश्रांति है। परंतु दूसरी संभावना साधना के इस मुकाम पर आत्मघाती सिद्ध होती है: यदि आप उस नित्य तत्व को भी “यह मैं हूँ” कहकर पकड़ लेंगे, तो आप अपनी अंतिम आसक्ति के कैदी बन जाएंगे। समय और स्थान के पार जाने के लिए आपको उत्पादन और उपभोग करने वाले उस ‘मैं’ के अंतिम बीज को भी विसर्जित करना होगा।

इसीलिए इस मार्ग का अंतिम और सर्वोच्च सूत्र प्रकट होता है:“सब्बे धम्मा अनत्ता” — अर्थात समस्त धम्म (तत्व)—चाहे वे गढ़े हुए संसार के हों या समय और स्थान के पार के—उनमें से कोई भी ‘मैं’ या ‘मेरा’ नहीं है।

जब यह अंतिम प्रज्ञा अमृत पद के प्रति छिपे हुए उस महीन रस और अहंकार को भी समूल नष्ट कर देती है, तब पूर्ण बोधि घटित होता है। उस परम क्षण में स्वयं ‘मार्ग’ का भी त्याग हो जाता है, और केवल वह ‘अमृत पद’ शेष रह जाता है—अब वह मन का कोई विषय या विचार नहीं है। वह बस है—समय और स्थान के ताने-बाने से बिल्कुल स्वतंत्र और अछूता।

अपने सुख के लिए कुछ भी निर्मित करने और भोगने का खेल सदा के लिए समाप्त हो जाता है, क्योंकि एक ऐसा कल्याण मिल चुका है जिस पर समय का कोई वश नहीं है। और चूँकि इस परम आनंद में मन के सारे विषय विलीन हो जाते हैं, इसलिए नित्य या अनित्य, दुःख या सुख, आत्म या अनात्म के सारे प्रश्न सदा के लिए शांत हो जाते हैं।

आधुनिक भ्रमों का खंडन

यही बौद्ध प्रज्ञा का वास्तविक संदर्भ है: एक ऐसा दृष्टिकोण जो मनुष्य के पुरुषार्थ की सामर्थ्य को भी पूरी गंभीरता से लेता है और उसकी इस बुनियादी चाह का भी सम्मान करता है कि उसका प्रयास व्यर्थ न जाए—कि परिवर्तन का यह मार्ग अंततः एक ऐसे परम सुख तक पहुँचाए जो स्वयं परिवर्तन की पहुँच से बाहर हो। यह प्रज्ञा केवल उन कौशलों को विकसित करने पर केंद्रित है जो वास्तविक सुख का सृजन करते हैं।

यह त्रिलक्षण (अनित्य, दुःख और अनात्म) का उपयोग अस्तित्व के बारे में किसी सूखी दार्शनिक बहस के लिए नहीं, बल्कि उन कौशलों को साधने की प्रेरणा और प्रगति को नापने के पैमाने के रूप में करती है। जब इसका इस प्रकार उपयोग किया जाता है, तो ये तीन लक्षण मनुष्य को एक ऐसे सुख तक ले जाते हैं जो इन तीनों लक्षणों, उत्पादन-उपभोग के खेल और इस पूरे समय और स्थान की सीमाओं से परे है।

जब हम त्रिलक्षण के इस प्रामाणिक संदर्भ को समझ जाते हैं, तो हमें उन आधुनिक व्याख्याओं में छिपे हुए आधे-अधूरे सच साफ़ दिखाई देने लगते हैं जिन्हें आज बुद्ध के नाम पर परोसा जा रहा है:

१. उत्पादन का भ्रम

यद्यपि यह सच हो सकता है कि धैर्य और निरंतरता से हम वर्तमान क्षण के कच्चे माल से कुछ भी निर्मित कर सकते हैं—यहाँ तक कि अपनी अस्मिताओं का एक पूरा इंद्रजाल खड़ा कर सकते हैं—परंतु मूल प्रश्न यह है कि क्या वह निर्मित करने योग्य भी है?

हमने क्षणभंगुर सुखों और बदलते हुए ‘मैं’ को गढ़ने की अपनी इस लत के कारण स्वयं को एक कारागार में बंद कर लिया है। जबकि हमारे पास यह संभावना मौजूद है कि हम इसी परिवर्तन के नियम का उपयोग करके इस जेल से बाहर आ सकें और समय और स्थान के पार की स्वतंत्रता को छू सकें।

अब यह हमें चुनना है कि हम उस परम स्वतंत्रता की ओर कदम बढ़ाना चाहते हैं, या फिर अपनी जेल की खिड़की से आती हुई धूप में केवल पानी के बुलबुले फुलाकर और उनके फूटने से पहले उनके बदलते हुए रंगों को देखकर ही अपना जीवन सार्थक मान लेना चाहते हैं?

२. उपभोग का भ्रम

यह प्रश्न उपभोग की बुद्धिमत्ता से भी जुड़ता है: बदलते हुए अनुभवों का पूरा लाभ उठाने का यह अर्थ कदापि नहीं है कि हम उन्हें गले लगा लें या उनकी तीव्रता को निचोड़ने का प्रयास करें। इसके विपरीत, इसका अर्थ यह है कि हम उनके द्वारा मिलने वाले सुखों और दुखों को अपने आप में कोई अंतिम लक्ष्य न मानकर, उन्हें बोधि के ‘औज़ार’ की तरह देखना सीखें।

हर पल हमें एक कच्चा माल मिलता है—कुछ अत्यंत सुंदर होता है, कुछ अत्यंत वीभत्स। उन्हें देखकर राग से भर जाना या द्वेष में आकर फेंक देना बुद्ध का मार्ग नहीं है; बुद्ध का मार्ग यह सीखना है कि हम उन्हीं अनुभवों का उपयोग करके उस चाबी को कैसे ढालें जो हमारी जेल के दरवाज़ों को खोल सके।

३. अनासक्ति का भ्रम

और जहाँ तक अपने कर्मों के परिणामों से अनासक्त होने की आधुनिक सीख का प्रश्न है: बुद्ध के संदर्भ में इस बात का अर्थ केवल तभी है जब आप अपने कर्मों के परिणामों की अत्यंत गहराई से चिंता करते हों और उस कार्य-कारण के नियम पर महारत हासिल करना चाहते हों जो वास्तविक स्वतंत्रता की ओर ले जाता है।

सरल शब्दों में कहें तो, हम किसी नासमझ बालक की तरह यह हठ नहीं करते कि हमारे सारे कर्म—चाहे वे कुशल हों या अकुशल—तुरंत ही सुखद परिणाम दें, या हम ताले में जो भी उलटी-सीधी लकड़ी फँसाएँ, उससे दरवाज़ा खुल जाए। यदि हमसे कोई भूल हुई है और उसके परिणाम कष्टप्रद रहे हैं, तो हम अपनी भूल को पूरी ईमानदारी से स्वीकार करते हैं और उसके कारणों को समझते हैं ताकि अगली बार उसे सुधार सकें। केवल तभी, जब हमारे भीतर अपने कर्मों के परिणामों को निष्पक्ष होकर देखने का धैर्य होगा, हम उन गलत चाबियों का अध्ययन करके अंततः वह सही चाबी बनाना सीख पाएंगे जो ताले को खोलती है।

अंतिम विश्रांति

इसी सम्यक दृष्टिकोण के साथ हम परिवर्तन की इस पूरी प्रक्रिया का सर्वोत्तम उपयोग उस कौशल को विकसित करने में करते हैं जो हमें अंतहीन उत्पादन और उपभोग की इस जेल से मुक्त करता है। मुक्ति के उस परम क्षण में, हम एक ऐसे वास्तविक सुख के सागर में डूब जाते हैं जो उस मूल प्रश्न की सीमाओं को भी लांघ जाता है जहाँ से हमारी यात्रा शुरू हुई थी।

अब वहाँ कुछ भी करना शेष नहीं रह जाता; ‘मेरा’ और ‘मेरा स्वत्व’ का सारा प्रपंच विसर्जित हो जाता है; और यहाँ तक कि ‘दीर्घकालिक’ शब्द—जो समय की ओर संकेत करता था—उस कालातीत सत्ता में विलीन हो जाता है।

जो सुख वहाँ शेष रहता है, वह सुख के बारे में हमारी समय और स्थान से बंधी हुई संकीर्ण कल्पनाओं से बिल्कुल परे है। मन के समस्त विषयों से पूरी तरह स्वतंत्र, वह परम तत्व निष्पाप और अपरिवर्तनीय है, असीम और शुद्ध है। जैसा कि प्राचीन सूत्र कहते हैं—वह ‘समग्रता’ और ‘सब कुछ’ (“सब्ब”) की सीमा से भी अत्यंत परे है।

और वास्तव में, बौद्ध साधना का पूरा सार यही है।

लेखक: थानिस्सरो भिक्खु

थानिस्सरो भिक्खु

पूज्य गुरुजी थानिस्सरो भिक्खु

आप एक प्रतिष्ठित थेरवादी भिक्षु और ध्यानसाधना के आचार्य हैं, जिन्हें स्नेहपूर्वक “अजान जेफ़” के नाम से भी जाना जाता है। आप अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया स्थित “मेत्ता अरण्य विहार” (Metta Forest Monastery) में निवास करते हैं, जहाँ आपने गहन ध्यान साधना, धर्म-विनय के अनुशासित पालन, और प्राचीन पाली सूत्रों के अध्ययन व शिक्षण को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाया है।

धर्म और विनय पर आपकी गहरी पकड़ और तर्कसम्मत व्याख्यानों से दुनियाभर के भिक्षु और साधक प्रेरित हुए हैं। आपने सुत्तपिटक और विनयपिटक के अधिकांश सूत्रों का अंग्रेज़ी में सरल व सटीक अनुवाद किया है, जिससे पाली बौद्ध सूत्रों की मौलिकता और गहराई जनसामान्य तक सहज रूप से पहुँच सके। आपके ध्यान और बौद्ध दर्शन पर दिए गए प्रवचन आधुनिक जीवन में भी अत्यंत प्रासंगिक हैं, जिससे असंख्य साधकों को आध्यात्मिक दिशा मिली है।

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