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Freedom from Fear

भय से मुक्ति

— असली निडरता का रास्ता —

लेखक: थानिस्सरो भिक्खु
| १८ मिनट



एक बार इंसानी समाज का अध्ययन करने वाले एक वैज्ञानिक ने अलास्का के एक कबीलाई ओझा से उनके कबीले की मान्यताओं के बारे में पूछा। काफी देर तक वैज्ञानिक के तरह-तरह के सवालों को झेलने के बाद, उस ओझा ने तंग आकर आखिरकार कहा: “देखो भाई! हम लोग किसी बात पर विश्वास नहीं करते। हम डरते हैं।”

जब मैंने पहली बार ये शब्द सुने, तब से ये मेरे दिमाग में घर कर गए हैं। और जब भी मैं यह बात अपने दोस्तों से साझा करता हूँ, तो उनके जो जवाब मिलते हैं, वे भी कम दिलचस्प नहीं होते। कुछ दोस्तों का कहना है कि उस ओझा ने अनजाने में ही सही, आदिम धर्म और सभ्य धर्म के बीच की महीन लकीर को पकड़ लिया है: आदिम धर्म बचकाने डर पर टिका होता है; जबकि सभ्य धर्म प्यार, भरोसे और आनंद पर।

वहीं दूसरी तरफ, कुछ दोस्तों का मानना है कि उस ओझा ने सभ्य धर्म के पाखंड और दिखावे की धज्जियाँ उड़ा दीं और उस असली स्रोत की तरफ इशारा किया जहाँ से किसी भी गंभीर धार्मिक जीवन की शुरुआत होती है।

अगर हम इन दोनों जवाबों की गहराई में छिपी मान्यताओं को टटोलें, तो पाएंगे कि पहला नज़रिया डर को हमारी सबसे बड़ी कमज़ोरी मानता है। उनका सोचना है कि अगर हम बस डर पर काबू पा लें, तो हम ताकतवर बन जाएंगे।

दूसरा नज़रिया यह मानता है कि बुढ़ापे, बीमारी और मौत जैसी लाचारियों के सामने डरना ही सबसे ईमानदार मानवीय प्रतिक्रिया है—एक ऐसी लाचारी, जिसे सिर्फ नज़रिया बदलकर दूर नहीं किया जा सकता। अगर हम अपने इस असली डर से मुँह चुराएंगे, तो हम खुद को उन असली खतरों से बचाने के लिए कभी तैयार नहीं कर पाएंगे जो हमारे सामने खड़े हैं।

तो फिर सवाल यह है कि डर को लेकर कौन सा रवैया बचकाना है और कौन सा समझदारी भरा? क्या दोनों ही बातों में थोड़ा-थोड़ा सच है? अगर हाँ, तो इन दोनों सच्चाइयों को सबसे सही तरीके से कैसे मिलाया जाए? इन सवालों को अगर हम थोड़े अलग ढंग से पूछें, तो जवाब पाना आसान हो जाएगा:

डर हमारे लिए किस हद तक काम की चीज़ है? और किस हद तक नुकसानदेह? क्या उस साधना में भी डर की कोई भूमिका है जो हमें हमेशा के लिए निडर बना देती है?

डर का विज्ञान

इस मामले में बौद्ध धर्म का जवाब थोड़ा घुमावदार है। ऐसा इसलिए है क्योंकि बौद्ध परंपरा की जड़ें जितनी सभ्य समाज में हैं, उतनी ही घने जंगलों के एकांत में भी हैं। साथ ही, डर अपने आप में एक बड़ी उलझी हुई भावना है।

ज़रा सोचिए, रात के अंधेरे में जंगल के भीतर एक हिरण अचानक शिकारी की गाड़ी की हेडलाइट की रोशनी में आ जाता है। वह घबरा जाता है। गुस्सा हो जाता है। उसे खतरे का अहसास होता है और यह भी कि वह उस खतरे के आगे कितना कमज़ोर है। वह वहाँ से भाग जाना चाहता है।

डर के किसी भी रूप में ये पाँच बातें हमेशा कम या ज़्यादा मात्रा में मौजूद होती हैं: घबराहट, चिढ़, खतरे का अहसास, अपनी कमज़ोरी का पता होना, और वहाँ से बच निकलने की चाह।

इनमें से ‘घबराहट’ और ‘चिढ़’ ऐसी बातें हैं जो इंसान को गलत रास्ते (अकुशल मार्ग) पर ले जाती हैं। अगर उस हिरण के पास शिकारी से बचने के कई रास्ते हों भी, तो अपनी घबराहट और गुस्से के कारण वह उन्हें देख नहीं पाएगा। इंसानों के साथ भी यही होता है। जब हम खुद को खतरे के सामने कमज़ोर पाते हैं, तो घबराहट और गुस्से में आकर ही हम गलतियाँ और पाप कर बैठते हैं।

लेकिन इसके उलट एक और बड़ी अचरज भरी बात है। कई बार हम पाप या गलतियाँ डर की वजह से नहीं, बल्कि बेफिक्री की वजह से करते हैं—जब हम आने वाले असली खतरों से आँखें मूँद लेते हैं। जब हमें लगता है कि हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता, तो हम दूसरों के साथ बड़ी बेरहमी से पेश आते हैं। इसलिए, डर के आखिरी के तीन हिस्से—अपनी कमज़ोरी को पहचानना, खतरे को भांपना और उससे बचने का रास्ता ढूंढना—बेफिक्री से होने वाले पापों से बचने के लिए बहुत ज़रूरी हैं।

अगर इन तीनों बातों में से घबराहट और गुस्से को निकाल दिया जाए, तो जो बचता है उसे धम्म में ‘अप्पमाद’ (लापरवाह न होना) कहते हैं। यह एक ऐसा उत्तम गुण है कि बुद्ध ने महापरिनिब्बान से पहले अपने आखिरी शब्द इसी के लिए कहे थे। ज़िंदगी के खतरे असली हैं। हमारी कमज़ोरियाँ भी हकीकत हैं।

अगर हम उन्हें साफ-साफ नहीं देखेंगे, उन्हें गंभीरता से नहीं लेंगे और उनसे उबरने का रास्ता नहीं ढूंढेंगे, तो हम उन वजहों को कभी ख़त्म नहीं कर पाएंगे जो हमें डराती हैं। ठीक उसी हिरण की तरह: अगर वह शिकारी की हेडलाइट की रोशनी को देखकर भी बेफिक्र रहा, तो उसका शिकारी की गाड़ी के ऊपर लदकर जाना तय है।

मोह का हमला

इसलिए, मन को डर से सचमुच आज़ाद करने के लिए हम सिर्फ यह नाटक नहीं कर सकते कि डरने की कोई बात ही नहीं है। हमें डर की उस बुनियादी वजह को ख़त्म करना होगा जो असली खतरों के सामने हमारे मन को कमज़ोर बना देती है।

बुद्ध के तरीके की खूबसूरती इसी बात में है कि उन्होंने उस ‘घबराहट’—या जिसे बौद्ध भाषा में ‘मोह’ (भ्रम) कहते हैं—को पकड़ लिया जो डर को अकुशल (गलत) बना देती है। डर चाहे कितना भी उलझा हुआ क्यों न हो, ‘मोह’ ही वह इकलौती वजह है जो मन की सबसे बड़ी कमज़ोरी भी है और उसका सबसे बड़ा खतरा भी।

बुद्ध इस मोह पर दो तरफ से हमला करते हैं:

  1. वे हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि कैसे यह मोह हमारे डर को एक गलत और हिंसक मोड़ दे देता है, और
  2. वे हमारे भीतर ऐसी मानसिक ताकतें जगाते हैं जो उस मोह को जड़ से काट देती हैं जो मन को लाचार बनाता है।

इस तरह हम न केवल डर के उस बुरे रूप से बच जाते हैं, बल्कि आखिरकार मन को एक ऐसे मुकाम पर ले आते हैं जहाँ उसे फिर कभी डरने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।

जब हम यह देखते हैं कि कैसे मोह हमारे डर में ज़हर घोलकर हमसे गलत काम करवाता है, तो समझ आता है कि यह दो तरीकों से काम करता है।

  • पहला तरीका:

    यह हमें खतरों को गलत समझने पर मजबूर करता है। जहाँ खतरा नहीं है, वहाँ हमें खतरा दिखने लगता है; और जहाँ असली खतरा है, वहाँ हम बेफिक्र हो जाते हैं। अगर हम किसी ऐसी चीज़ के डर में जिएंगे जो असल में है ही नहीं, तो हम अपनी पूरी ऊर्जा और समय बेकार की सुरक्षा दीवारें खड़ी करने में बर्बाद कर देंगे और असली खतरों से हमारा ध्यान हट जाएगा।

    दूसरी तरफ, अगर हम बुढ़ापे, बीमारी और मौत के असली खतरों को अपने दिमाग से निकाल दें, तो हम अपने कर्मों में लापरवाह हो जाते हैं। हम उन चीज़ों से चिपक जाते हैं—जैसे हमारा शरीर, हमारे अपने लोग, हमारा धन-दौलत या हमारी धारणाएँ—जो आखिरकार हमें बुढ़ापे, बीमारी और जुदाई के दुखों के आगे अकेला छोड़ देती हैं। हम अपनी तृष्णा (वासनाओं) को मन पर हावी होने देते हैं, यहाँ तक कि इस घमंड में पाप करने लगते हैं कि हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता और इन कर्मों का फल हमें कभी नहीं भुगतना पड़ेगा।

    हम अपने आसपास मंडरा रहे असली खतरों के प्रति जितने बेफिक्र रहते हैं, जब वे अचानक हमारे सामने आते हैं, तो हम उतने ही गहरे सदमे और घबराहट में डूब जाते हैं। यहीं से मोह का दूसरा तरीका शुरू होता है।

  • दूसरा तरीका:

    हम खतरों से बचने के लिए ऐसे रास्ते चुनते हैं जो पुराने खतरों को ख़त्म करने के बजाय नए खतरे पैदा कर देते हैं। हम सुरक्षा के लिए बहुत सारा धन इकट्ठा करते हैं, लेकिन वही धन दूसरों के मन में हमारे प्रति ईर्ष्या पैदा करता है। हम खतरनाक लोगों से बचने के लिए बड़ी-बड़ी दीवारें चुनते हैं, लेकिन वे दीवारें ही हमारा जेलखाना बन जाती हैं। हम हथियार जमा करते हैं, लेकिन वे हथियार आसानी से हमारे ही खिलाफ इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

    डर का सबसे घटिया रूप तब दिखता है जब अपनी जान या माल को खतरे में देखकर हमें लगता है कि हम दूसरों की जान और माल को तबाह करके खुद को सुरक्षित और ताकतवर बना सकते हैं। डर के पीछे छिपा मोह हमारी मति मार देता है। अगर कोई दूसरा ऐसा करे, तो हम तुरंत कह देंगे कि वह गलत कर रहा है। लेकिन जब बात हमारे खुद के ऊपर आती है, तो हमारे पैमाने बदल जाते हैं, हमारा नज़रिया ऐसा टेढ़ा हो जाता है कि जब तक वह गलत काम हम खुद कर रहे हैं, हमें वह सही लगने लगता है।

यह इंसानी स्वभाव की सबसे डरावनी कमज़ोरी है: कि जब वक्त बुरा आता है, तो हम खुद पर भी भरोसा नहीं कर पाते कि हम सही राह पर टिके रहेंगे या नहीं। अगर सही-गलत के नियम हमारे लिए सिर्फ तभी मायने रखते हैं जब वे हमारी सहूलियत के हिसाब से हों, तो असल में उनका कोई मोल नहीं है।

मन की पाँच ताकतें

ज़िंदगी का जो हिस्सा सबसे ज़्यादा खतरनाक और असुरक्षित लगता है, अच्छी बात यह है कि साधना के ज़रिए हम उसी हिस्से में सबसे बड़ा बदलाव ला सकते हैं और उस पर काबू पा सकते हैं। माना कि जन्म लेने के बाद बुढ़ापा, बीमारी और मौत को टाला नहीं जा सकता, लेकिन ‘मोह’ को टाला जा सकता है। इसे पैदा होने से रोका जा सकता है। अगर हम सोच-विचार और चिंतन से इसके खतरों के प्रति सजग हो जाएं, तो हमारे भीतर इससे उबरने की प्रेरणा जगेगी।

लेकिन सिर्फ ऊपर-ऊपर के सोच-विचार से मोह का यह साम्राज्य नहीं ढहता। यह बिल्कुल किसी क्रांति की तरह है: आप चाहे जितना सोच लें, जब तक आप अपनी फौज लेकर मैदान में नहीं उतरते, तब तक आपको सत्ता पर काबिज ताकतों की चालों और उनकी ताकत का असली अंदाज़ा नहीं होता। और जब आपकी अपनी फौज अपनी रणनीतियाँ और ताकत बढ़ा लेती है, तभी वह जीत पाती है।

मोह के साथ भी यही है: जब आप अपने मन की ताकतों को मज़बूत करेंगे, तभी आप उस मोह के पार देख पाएंगे जो डर को शह देता है। यही ताकतें आपको एक दिन ऐसी जगह पहुँचा देंगी जहाँ आपके लिए कोई खतरा बचेगा ही नहीं।

बौद्ध सूत्रों में मन की इन ताकतों को ‘पंच बल’ कहा गया है:

  1. श्रद्धा,
  2. वीर्य (यानी पुरुषार्थ या ऊर्जा),
  3. स्मृति,
  4. समाधि (यानि कुशल चित्त की एकाग्रता),
  5. प्रज्ञा (यानी विवेक या अन्तर्ज्ञान)।

इन पांचों को जगाने में अप्रमाद का बहुत बड़ा हाथ है, क्योंकि यही सजगता हर एक ताकत को उस खास मोह से लड़ने के काबिल बनाती है जो मन को डर के आगे लाचार करता है। इसका मतलब यह है कि ये ताकतें कोई अंधी या पाशविक ताकतें नहीं हैं। इनमें से हर एक के भीतर समझदारी और विवेक का अंश है, जो सूची में आगे बढ़ने के साथ-साथ और तीखा होता जाता है।

श्रद्धा का बूमरँग नियम

इन पांचों ताकतों में से ‘श्रद्धा’ को सबसे विस्तार से समझने की ज़रूरत है। ऐसा इसलिए क्योंकि बौद्ध मार्ग में इस शब्द को सबसे ज़्यादा गलत समझा गया है, और इसी के पास सबसे ज़्यादा मोहात्मक धारणाओं को काटने का ज़िम्मा है।

यहाँ श्रद्धा का मतलब किसी अंधविश्वास से नहीं है, बल्कि ‘कर्म के नियम’ पर पक्के भरोसे से है—इस बात पर अडिग विश्वास कि हमारे जीवन का सुख और दुःख इस बात पर निर्भर करता है कि हमारे कर्मों के पीछे की नीयत (चेतना) कैसी है। यह श्रद्धा हमारे भीतर के इस भ्रम को तोड़ती है कि “मुसीबत के समय नैतिक सिद्धांतों पर टिके रहना बेवकूफी है।” यह श्रद्धा इस भ्रम पर तीन तरीकों से वार करती है:

  • पहला तरीका:

    यह कर्म के ‘बूमरँग’ (या हवा के रुख के खिलाफ थूकने वाले) नियम पर ज़ोर देती है। अगर आपकी नीयत में खोट या दूसरों को नुकसान पहुँचाने का भाव है, तो परिस्थिति चाहे जो हो, वह नुकसान लौटकर आपके पास ही आएगा। भले ही हत्या, चोरी या झूठ बोलने जैसे गलत कामों से थोड़े समय का फायदा मिल जाए, लेकिन आगे चलकर जो लंबा नुकसान उठाना पड़ेगा, उसके आगे यह फायदा कुछ भी नहीं है।

    इसके उलट, यही नियम आपको भलाई के रास्ते पर वीर बना देता है। जब आपको पूरा भरोसा होता है कि आपके अच्छे कर्मों का फल लौटकर आपके पास ही आएगा—चाहे बीच में मौत ही क्यों न आ जाए—तो आप अपने और दूसरों के दीर्घकालिक कल्याण के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने को तैयार हो जाते हैं।

    आप इस जनम में उसका फल देख पाएं या न देख पाएं, आपको पता होता है कि आपकी की गई भलाई कभी ज़ाया नहीं जाती। इस तरह आपके भीतर वह हिम्मत पैदा होती है जिससे आप कुशल और सदाचारी कर्मों का ऐसा खजाना जमा कर लेते हैं, जो खतरों और डर के खिलाफ आपकी सबसे पहली और मज़बूत ढाल बनता है।

  • दूसरा तरीका:

    श्रद्धा आपके मन की स्थिति को हर चीज़ से ऊपर रखती है, क्योंकि मन ही आपकी नीयत को तय करता है। यह इस डर को काटती है कि “अगर मैं अपने सिद्धांतों पर अड़ा रहा, तो लोग मेरा फायदा उठाएंगे या मुझे नुकसान पहुँचाएंगे।” यह डर दरअसल इस अज्ञान पर टिका है कि यह ‘ज़िंदगी’ ही हमारी सबसे कीमती चीज़ है। अगर ऐसा होता, तो यह बड़ी ही दुखी करने वाली पूँजी होती, क्योंकि इसका अंत तो बुढ़ापे, बीमारी और मौत में ही होना है।

    श्रद्धा की नज़र में यह ज़िंदगी सिर्फ इसलिए कीमती है क्योंकि इसके ज़रिए मन को साधा जा सकता है; और सधे हुए मन को मौत भी कोई नुकसान नहीं पहुँचा सकती। ज़िंदगी की असली कीमत इससे आंकी जाती है कि हमारे कर्मों के पीछे की नीयत कितनी पवित्र है। जैसा कि बुद्ध ने धम्मपद में कहा है:

    बिना सदाचार और ध्यान के
    सौ साल जीने से कहीं बेहतर है,
    सदाचारी और ध्यान में लीन इंसान का
    एक दिन का जीवन।

    —धम्मपद ११०

  • तीसरा तरीका:

    श्रद्धा इस बात पर अडिग रहती है कि ईमानदारी और सदाचार की ज़रूरत हर हाल में है, इसके लिए कोई शर्त नहीं हो सकती। भले ही दूसरे लोग अपनी सबसे कीमती चीज़—यानी अपना चरित्र और ईमानदारी—कचरे में फेंक दें, लेकिन यह हमारे लिए अपनी ईमानदारी खोने का बहाना नहीं हो सकता। कर्म का नियम कोई ट्रैफ़िक पुलिस का नियम नहीं है जो सिर्फ कुछ खास घंटों या दिनों के लिए लागू होता हो। यह ब्रह्मांड का वह कानून है जो चौबीसों घंटे और हर जन्म में काम करता है।

कुछ लोगों का तर्क है कि चूँकि बुद्ध ने ‘शर्तों के नियम’ (प्रतीत्यसमुत्पाद) को माना है, इसलिए हमारे सिद्धांतों को भी परिस्थितियों के हिसाब से बदल जाना चाहिए। यह इस नियम की बहुत बड़ी गलतफहमी है। सापेक्षता (Relativity) का मतलब यह नहीं होता कि दुनिया में सब कुछ ही सापेक्ष है। उसने विज्ञान में द्रव्यमान और समय को—जिन्हें पहले स्थाई माना जाता था—बदलकर एक दूसरा ही अचूक नियम दे दिया: प्रकाश की गति। समय बदल सकता है, लेकिन प्रकाश की गति हमेशा एक जैसी रहती है।

ठीक इसी तरह, बुद्ध के नियम का मतलब यह है कि बदलाव के भीतर भी कुछ ढर्रे कभी नहीं बदलते—और ऐसा ही एक ढर्रा यह है कि लालच और मोह से पैदा हुई गलत नीयत हमेशा दुःख की तरफ ही ले जाएगी।

अगर हम अपनी पसंद-नापसंद या विचारों के बजाय इस अटल ढर्रे को स्वीकार करना सीख लें, तो हम खतरों से निपटने में और ज़्यादा समझदार हो जाते हैं। तब हम डर में कोई हड़बड़ी भरा गलत कदम उठाने के बजाय, लीक से हटकर ऐसा रास्ता ढूंढते हैं जिससे किसी का भी नुकसान न हो। इससे हमारे कर्मों में एक ठहराव और सुंदरता आ जाती है।

साथ ही, बुद्ध ने यह नियम सिर्फ इसलिए नहीं सिखाया कि हम बदलावों के आगे घुटने टेक दें। उन्होंने यह इसलिए सिखाया ताकि हम इन ढर्रों को समझकर उस मुकाम तक पहुँच सकें जो हर शर्त और बदलाव के पार है (असंस्कृत)। अगर हमें उस परम सुरक्षा तक पहुँचना है, तो हमारा सदाचार भी बिना किसी शर्त का होना चाहिए।

वह सुरक्षा का उपहार सिर्फ हमारे साथ अच्छा व्यवहार करने वालों के लिए नहीं, बल्कि बिना किसी भेदभाव के हर एक जीव के लिए होना चाहिए। सूत्रों में कहा गया है कि जब आप किसी को भी नुकसान न पहुँचाने का अटल संकल्प लेते हैं, तो आप अनंत जीवों को निर्भयता का दान देते हैं—और बदले में उस असीम निडरता का एक हिस्सा आपको भी मिल जाता है।

साधना का तालमेल

इस तरह की श्रद्धा और ईमानदारी हमसे बहुत कुछ मांगती है। जब तक हमें उस परम आनंद का पहला स्वाद नहीं मिल जाता, तब तक हमारा भरोसा आसानी से डगमगा सकता है। इसीलिए श्रद्धा के साथ मन की बाकी ताकतों का होना ज़रूरी है।

बीच की तीन ताकतें—वीर्य, स्मृति, और समाधि—एक साथ मिलकर काम करती हैं।

  • ‘वीर्य’ (सम्यक व्यायाम) इस भ्रम को तोड़ता है कि हम अपने डर के आगे बेबस हैं और डर आने पर हमें उसके आगे घुटने टेकने ही पड़ेंगे। यह हमें छोटी-छोटी अकुशल आदतों को छोड़कर अच्छी आदतें अपनाने का अभ्यास कराता है, ताकि जब कोई बड़ा डर सामने आए, तो ये अच्छी आदतें हमारे मददगार बन सकें।

  • ‘सम्यक स्मृति’ इस काम में दो तरह से मदद करता है:

    1. यह हमें याद दिलाता रहता है कि डर के आगे घुटने टेकने के क्या खतरे हैं, और
    2. यह हमारा ध्यान डर की वजह से हटकर, खुद उस डर की भावना पर टिका देता है। हम डर को एक मानसिक घटना की तरह बाहर से देख पाते हैं, न कि उसमें बहकर खुद डरे चले जाते हैं।
  • ‘सम्यक समाधि’ मन को एक ऐसा शांत और सुखद केंद्र दे देती है जहाँ खड़े होकर हमें आने-जाने वाले डरों के साथ खुद को जोड़ने की ज़रूरत नहीं पड़ती। फिर भीतर या बाहर के खतरे मन को उतने डरावने नहीं लगते।

लेकिन इतना होने पर भी, मन तब तक पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो सकता जब तक वह इन खतरों के आने-जाने की असल वजह को ही न उखाड़ फेंके। इसीलिए पहली चार ताकतों को पूरी तरह सुरक्षित करने के लिए पांचवीं ताकत—‘प्रज्ञा’ (अन्तर्ज्ञान)—की ज़रूरत होती है। प्रज्ञा ही देख पाती है कि यह सारा आना-जाना आखिरकार हमारे ‘मैं’ और ‘मेरा’ के भाव में छिपा है।

प्रज्ञा यह साफ देख लेती है कि ‘मैं’ और ‘मेरा’ जैसी कोई चीज़ पहले से हमारे अनुभवों में फिट नहीं है; यह तो हमारी रोज़-रोज़ की आदत है जिसके ज़रिए हम बार-बार अपनी एक पहचान गढ़ते हैं और खुद को उन चीज़ों से बांध लेते हैं जिनका बूढ़ा होना, बीमार पड़ना और मरना तय है।

इसके अलावा, प्रज्ञा हमारे भीतर के उन गद्दारों और कमज़ोरियों (तृष्णा और मोह) को भी बेनकाब कर देती है जो हमें ‘मैं’ और ‘मेरा’ बनाने पर मजबूर करते हैं। वह समझ जाती है कि मोह का यही स्तर बुढ़ापे, बीमारी और मौत को डरावना बनाता है। अगर हम खुद को उन चीज़ों से जोड़ना ही बंद कर दें जो बूढ़ी होती हैं और मरती हैं, तो उनका बदलना हमारे मन को कभी डरा नहीं पाएगा। जब मन को कोई खतरा ही नहीं रहेगा, तो उसके पास कोई भी गलत काम करने की कोई वजह ही नहीं बचेगी।

जब प्रज्ञा का यह स्तर परिपक्व हो जाता है और मुक्ति का फल देता है, तो हमारी सबसे बड़ी असुरक्षा—यानी खुद पर भरोसा न कर पाने की लाचारी—हमेशा के लिए ख़त्म हो जाती है। ‘मैं’ और ‘मेरा’ के बंधनों से आज़ाद होकर हम पाते हैं कि डर के सारे हिस्से गायब हो चुके हैं। न कोई घबराहट बचती है, न कोई गुस्सा; मन खतरे के आगे कमज़ोर नहीं रहता, और इसलिए ऐसी कोई जगह नहीं बचती जहाँ हमें भागकर छिपना पड़े।

परम आनंद की निडरता

यहीं पर उस अलास्का के ओझा की बात का असली जवाब मिलता है। हम इसलिए डरते हैं क्योंकि हम ‘हम’ (एक ठोस पहचान) पर विश्वास करते हैं। और हम ‘हम’ पर विश्वास इसलिए करते हैं क्योंकि हमारे डर में मोह छुपा है।

लेकिन विरोधाभास देखिए, अगर हम खुद से इतना प्यार करें कि गलत कर्मों से मिलने वाले दुखों से डरें (सजग रहें) और इससे बाहर निकलने के रास्ते पर विश्वास करना सीख लें, तो हम उन ताकतों को जगा लेंगे जो हमारी तृष्णा, मोह और बंधनों को काट देंगी। इस तरह यह पूरा ताना-बाना ही बिखर जाएगा—वह ‘हम’ का भाव, वह डर, वे मान्यताएँ और वे बंधन सब विलीन हो जाएंगे। इसके बाद जो आज़ादी बचती है, वही दुनिया की इकलौती सच्ची सुरक्षा है।

यह उपदेश शायद उन लोगों को थोड़ा रूखा या कड़वा लग सकता है जो एक असंभव चीज़ चाहते हैं: यानी अपने बंधनों को बनाए रखते हुए सुरक्षा पाना। लेकिन एक असंभव सुरक्षा की उम्मीद को छोड़कर, आप एक ऐसे सुख को पा लेते हैं जो पूरी तरह स्वतंत्र है और किसी भी शर्त से आज़ाद है। जब आप यह सौदा कर लेते हैं, तो आप जान जाते हैं कि इसके लिए चुकाई गई कीमत इसके फल के आगे कुछ भी नहीं है।

जैसा कि बुद्ध के एक शिष्य (जो पहले राजा थे) ने एक बार कहा था:

पहले जब मैं गृहस्थ था और राजा के सुख भोगता था, तो मेरे महल के भीतर और बाहर, शहर के भीतर और बाहर, यहाँ तक कि पूरे देश में पहरेदार तैनात रहते थे। पर इतनी सुरक्षा के बाद भी मैं हमेशा डर में जीता था—घबराया हुआ, शंकित और सहमा हुआ।

लेकिन अब, जब मैं जंगल में अकेला किसी पेड़ के नीचे या किसी सूने मकान में जाता हूँ, तो मैं बिना किसी डर के, शांत, आश्वस्त और निडर होकर रहता हूँ। मेरा मन किसी जंगली हिरण की तरह आज़ाद और तृप्त रहता है।

यही सोचकर मेरे मुँह से बार-बार ये शब्द निकलते हैं—‘अहो सुखं! अहो सुखं!’ (क्या आनंद है! क्या आनंद है!)

उसका यह हिरण शिकारी की हेडलाइट की रोशनी में फंसा हुआ हिरण नहीं है। यह जंगल में घूम रहा एक ऐसा हिरण है जो पूरी तरह सुरक्षित है और जहाँ भी जाता है, मौज में रहता है।

और जो चीज़ उसे महज़ एक हिरण से ऊपर उठाती है, वह यह है कि बंधनों से आज़ाद होने के कारण उसके होश को ‘बिना सतह वाली चेतना’ (विञ्ञाणं अनिदस्सनं) कहा गया है। रोशनी उसके आर-पार निकल जाती है। शिकारी उसे निशाना नहीं बना सकता, क्योंकि वह उसे दिखाई ही नहीं देता। 1


  1. विञ्ञाणं अनिदस्सनं“अनिदस्सनं” को संयुत्तनिकाय ४३ में ‘निर्वाण’ का पर्यायवाचक शब्द बताया गया है। यह संभवतः संयुत्तनिकाय १२:६४ में उल्लेख हुई प्रकाश की किरण से संबंधित है, जो किसी भी सतह पर जाकर ठहरती नहीं है, टकराती नहीं है, या स्थापित नहीं होती। यह उस विज्ञान (मानव चेतना) का प्रतीक है, जो कहीं भी “आहार” नहीं लेता। मज्झिमनिकाय ४९ में कहा गया है कि इस विज्ञान अनिदर्शन को “सब की संपूर्णता से भी अनुभव नहीं किया जा सकता।” वहाँ “सब” का अर्थ है छह भीतरी और छह बाहरी इंद्रिय आयाम। (संयुत्तनिकाय ३५:२३ देखें।) ↩︎

लेखक: थानिस्सरो भिक्खु

थानिस्सरो भिक्खु

पूज्य गुरुजी थानिस्सरो भिक्खु

आप एक प्रतिष्ठित थेरवादी भिक्षु और ध्यानसाधना के आचार्य हैं, जिन्हें स्नेहपूर्वक “अजान जेफ़” के नाम से भी जाना जाता है। आप अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया स्थित “मेत्ता अरण्य विहार” (Metta Forest Monastery) में निवास करते हैं, जहाँ आपने गहन ध्यान साधना, धर्म-विनय के अनुशासित पालन, और प्राचीन पाली सूत्रों के अध्ययन व शिक्षण को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाया है।

धर्म और विनय पर आपकी गहरी पकड़ और तर्कसम्मत व्याख्यानों से दुनियाभर के भिक्षु और साधक प्रेरित हुए हैं। आपने सुत्तपिटक और विनयपिटक के अधिकांश सूत्रों का अंग्रेज़ी में सरल व सटीक अनुवाद किया है, जिससे पाली बौद्ध सूत्रों की मौलिकता और गहराई जनसामान्य तक सहज रूप से पहुँच सके। आपके ध्यान और बौद्ध दर्शन पर दिए गए प्रवचन आधुनिक जीवन में भी अत्यंत प्रासंगिक हैं, जिससे असंख्य साधकों को आध्यात्मिक दिशा मिली है।

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