✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
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Faith in Awakening

बोधि में श्रद्धा

— एक तार्किक और व्यावहारिक शुरुआत —

लेखक: थानिस्सरो भिक्खु
| ३० मिनट



बुद्ध ने कभी किसी पर आँख मूँदकर विश्वास करने या श्रद्धा रखने का कोई अंधा दबाव नहीं बनाया। आज के दौर में, जहाँ संसार के बहुसंख्यक और प्रभुत्वशाली धर्म बिना किसी तर्क के पूर्ण आत्मसमर्पण और अंधश्रद्धा की मांग करते हैं, वहाँ बुद्ध का यह प्रगतिशील नज़रिया बौद्ध धम्म की सबसे बड़ी खूबी बनकर उभरता है।

यह बात विशेष रूप से उन लोगों को बहुत आकर्षित करती है जो संगठित धर्मों की थोपी हुई बंदिशों से तंग आकर विज्ञान के ‘अनुभवजन्य दृष्टिकोण’ को अपना चुके हैं—यानी जिनकी मान्यता है कि जब तक किसी चीज़ को भौतिक आँकड़ों की कसौटी पर न कसा जा सके, वह भरोसे के काबिल नहीं है।

इस चश्मे से देखने वाले लोग अक्सर ‘कालाम सुत्त’ में कालामों को दी गई बुद्ध की प्रसिद्ध सलाह का गलत अर्थ निकाल लेते हैं। वे इसे एक ऐसी ‘खुली छूट’ मान लेते हैं कि जिसका जो मन करे, वही माने या न माने। जबकि बुद्ध का मूल कथन कुछ और ही संकेत करता है:

इसलिए कहता हूँ, कालामों। न सुनी-सुनाई बात मानो, न परंपरागत बात मानो, न अटकलेबाजी मानो, न शास्त्र-सूत्रों की बात मानो, न तर्कसंगत कारण मानो, न अनुमानित कारण मानो, न समतुल्य परिस्थिति में लागू होती बात मानो, न अपनी धारणा से मेल खाती बात मानो, न संभावित बात मानो, न श्रमण गुरु के सम्मानार्थ मानो।

बल्कि कालामों, जब तुम्हें स्वयं पता चले — ‘यह स्वभाव अकुशल है। यह स्वभाव दोषपूर्ण है। यह स्वभाव ज्ञानियों द्वारा निंदित है। यह स्वभाव मानने से, उस पर चलने से अहित होता है, दुःख आता है’ — तब तुम्हें वह स्वभाव त्याग देना चाहिए।

और कालामों! जब तुम्हें स्वयं पता चले — ‘यह स्वभाव कुशल है। यह स्वभाव निर्दोष है। यह स्वभाव ज्ञानियों द्वारा प्रशंसित है। यह स्वभाव मानने से, उस पर चलने से हित होता है, सुख आता है’ — तब तुम्हें वह स्वभाव धारण कर उसी में रहना चाहिए।

— अंगुत्तरनिकाय ३:६६ : केसमुत्तिसुत्त

इस उपदेश का हवाला देकर आज के कई आधुनिक विचारकों ने यहाँ तक दावा कर दिया कि बौद्ध परंपरा में ‘श्रद्धा’ के लिए कोई स्थान ही नहीं है और एक सच्चे बौद्ध का रवैया केवल संदेहवाद का होना चाहिए।

यह सच है कि बुद्ध श्रद्धा के मामलों में एक स्वस्थ संदेह और उदारता की वकालत करते हैं, लेकिन वे इसके साथ एक ‘अनिवार्य शर्त’ भी जोड़ते हैं। वह शर्त यह है: यदि आप सचमुच अपने दुखों का अंत करना चाहते हैं—तो आपको कुछ सिद्धांतों को प्रयोग के तौर पर, एक ‘कार्यकारी परिकल्पना’ की तरह स्वीकार करना ही होगा। उसके बाद ही आप उनके बताए साधना-मार्ग पर चलकर उन्हें अपनी कसौटी पर कस पाएंगे।

ध्यान देने वाली बात यह है कि कालामों को दी गई इस सलाह में एक बहुत ही महत्वपूर्ण पेंच छिपा है—बुद्ध कहते हैं कि आपको इस बात का पूरा ध्यान रखना होगा कि ज्ञानी समझदार लोग किस चीज़ की कद्र करते हैं।

यह पेंच बुद्ध की सीख को एक अद्भुत संतुलन देता है। जिस प्रकार आपको बाहर की किसी सत्ता या हुक्म पर आँख मूँदकर भरोसा नहीं करना है, ठीक उसी प्रकार आप अपने खुद के कुतर्कों और क्षणिक भावनाओं पर भी अंधविश्वास नहीं कर सकते—विशेषकर तब, जब वे आपके प्रत्यक्ष अनुभव और प्रज्ञावान महापुरुषों की बुद्धिमानी के विपरीत जा रहे हों।

शुरुआती दौर के अन्य उपदेशों से यह बात साफ होती है कि ज्ञानी लोगों को उनके वचनों और आचरण से पहचाना जा सकता है, बशर्ते उन्हें बुद्ध और उनके जागृत शिष्यों के तय पैमानों पर कसा जाए। जो महापुरुष इन पैमानों पर खरे उतरते हैं, उनके प्रति एक साधक का सही दृष्टिकोण ‘श्रद्धा’ का ही होना चाहिए:

जिस श्रावक को श्रद्धा हो, जो शास्ता के निर्देश की गहराई को भेदने के लिए जीता हो, उसे धम्मानुसार ऐसे लगता है—‘भगवान शास्ता है, मैं उनका श्रावक हूँ! भगवान जानते हैं, मैं नहीं जानता!’

कीटागिरि सुत्त

बुद्ध ने बार-बार रेखांकित किया कि किसी सद्गुरु में श्रद्धा होना ही वह पहली सीढ़ी है, जो आपको उस गुरु से सीखने और उसकी बात को ध्यान से सुनने के लिए तैयार करती है।

बुद्ध की अपनी बोधि में विश्वास रखना किसी भी ऐसे साधक के लिए एक अनिवार्य आध्यात्मिक बल है जो स्वयं बुद्धत्व पाना चाहता है। चूँकि यही श्रद्धा आपके भीतर वीर्य (ऊर्जा, पुरुषार्थ), स्मृति, समाधि और प्रज्ञा को जाग्रत करती है, इसीलिए यही श्रद्धा आपको उस ‘अमृत पद’ (निर्वाण) तक पहुँचा सकती है जहाँ मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है।

पश्चिमी व्याख्याओं के तीन भ्रम

बुद्ध के इस दृष्टिकोण में श्रद्धा और विज्ञान के बीच एक अनूठा खिंचाव दिखाई देता है। प्राच्य (एशियाई) संस्कृति के जितने भी बौद्ध साधकों को मैं जानता हूँ, उनमें से किसी को भी इस खिंचाव में कोई अंतर्विरोध या बेचैनी महसूस नहीं होती। लेकिन पश्चिमी बौद्ध—जिनका पालन-पोषण एक ऐसे समाज में हुआ है जहाँ धर्म और श्रद्धा का विज्ञान के साथ सदियों से एक हिंसक संघर्ष रहा है—उन्हें यह तालमेल बड़ा अजीब और परेशान करने वाला लगता है।

जब मेरी उनसे चर्चा होती है, तो वे अक्सर इस उलझन को उन्हीं घिसे-पिटे तरीकों से सुलझाने की कोशिश करते हैं, जिनसे इतिहास में ईसाई धर्म और विज्ञान के टकराव को सुलझाया गया था। यहाँ पश्चिमी सोच से प्रभावित तीन मुख्य दृष्टिकोण सामने आते हैं:

  1. वीर अज्ञेयवादी रूप

    इसकी जड़ें पश्चिमी संस्कृति के उस धड़े में हैं जो श्रद्धा की प्रामाणिकता को सिरे से खारिज करता है। इस सोच के अनुसार, बुद्ध विक्टोरियन काल के किसी ‘वीर अज्ञेयवादी’ (Heroic Agnostic) जैसे हैं, जिसने मन को सुदृढ़ करने के लिए हर तरह की अंधश्रद्धा को ठुकराकर केवल एक शुद्ध वैज्ञानिक मार्ग को चुना था।

    चूँकि उनका यह तरीका पूरी तरह ‘इसी वर्तमान क्षण’ पर टिका था, इसलिए भूतकाल और भविष्य के प्रश्न उनके संदेश के लिए बेमानी थे। इस विचार के लोग मानते हैं कि सूत्रों में जहाँ भी अतीत के कर्म, भविष्य के पुनर्जन्म या इंद्रियातीत परम सुख (निर्वाण) में श्रद्धा रखने की बातें आई हैं, वे सब बाद में मिलाई गई मिलावटें हैं।

  2. रोमांटिक या भावुक रूप

    इसकी जड़ें पश्चिमी संस्कृति के उस हिस्से में हैं जिसने चर्च के नियमों को तो ठुकरा दिया है, लेकिन वे ‘श्रद्धा’ को मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक उपयोगी टॉनिक मानते हैं। यह सोच बुद्ध को ‘रोमांटिक युग’ के एक ऐसे नायक के रूप में पेश करती है, जो अपने भीतर एक समग्रता का भाव जगाने के लिए श्रद्धा के केवल व्यक्तिगत मूल्य की कद्र करता है—इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उस श्रद्धा का आधार क्या है।

    दूसरे शब्दों में, आपकी श्रद्धा कहाँ टिकी है यह मायने नहीं रखता, बशर्ते वह आपको अंदरूनी सुकून दे रही हो। इस सोच में बुद्ध की बोधि पर श्रद्धा रखने का सीधा सा मतलब यह है कि आप बस यह मान लें कि उन्होंने वह रास्ता खोज लिया जो उनके काम आया, पर इसका आपकी ज़िंदगी से कोई सीधा संबंध नहीं है। अगर आपको कर्म और पुनर्जन्म की बातें सुनकर मानसिक शांति मिलती है, तो मान लीजिए; नहीं मिलती, तो छोड़ दीजिए।

  3. परिस्थितियों का पीड़ित रूप

    यह व्याख्या पहले की दोनों बातों को समेटती है, पर यहाँ बुद्ध को कोई महानायक बनाने के बजाय उन्हें अपने इतिहास और समय के चक्र में फंसा हुआ एक ‘पीड़ित’ दिखाया जाता है। यह सोचती है कि हमारी ही तरह बुद्ध भी अपने ज़माने के सीमित ज्ञान के बीच एक सार्थक जीवन ढूंढने की कोशिश कर रहे थे।

    कर्म और पुनर्जन्म को लेकर उनके जो विचार थे, वे कोई अनोखे नहीं थे, बल्कि प्राचीन भारत के उस दौर के ‘आदिम विज्ञान’ से उठाई गई आम धारणाएँ थीं। अगर वे आज ज़िंदा होते, तो वे भी अपने आदर्शों को आज के आधुनिक विज्ञान की खोजों के साथ वैसे ही मिला लेते, जैसे आज बहुत से पश्चिमी लोगों ने ईश्वर पर अपनी श्रद्धा को बचाने के लिए विज्ञान के साथ समझौता कर लिया है।

    इस तीसरी सोच के पीछे यह बुनियादी मान्यता है कि विज्ञान का संबंध सिर्फ ‘तथ्यों’ से है और धर्म का संबंध ‘मूल्यों’ से। विज्ञान ठोस आँकड़े देता है और धर्म उन आँकड़ों को एक मानवीय अर्थ प्रदान करता है। इस तरह, आज का जो भी बौद्ध विज्ञान द्वारा सिद्ध तथ्यों को स्वीकार करते हुए आगे बढ़ रहा है, वह असल में बुद्ध का ही काम आगे बढ़ा रहा है; और फिर वह परंपरा से उन कहानियों को उठाएगा जो इन वैज्ञानिक तथ्यों को एक आध्यात्मिक अर्थ दे सकें।

बुद्ध न तो पीड़ित थे, न ही अज्ञेयवादी

ये तीनों व्याख्याएँ पश्चिमी दृष्टिकोण से भले ही बहुत तार्किक और आधुनिक लगें, लेकिन इनमें से कोई भी बुद्ध के वास्तविक स्वरूप या श्रद्धा को लेकर दी गई उनकी सच्ची सीख के साथ न्याय नहीं करती। ये तीनों बातें इस मामले में तो सही हैं कि बुद्ध ने कभी अपने उपदेश दूसरों पर ज़बरदस्ती नहीं थोपे, लेकिन अपनी खुद की पश्चिमी मान्यताओं को बुद्ध पर मढ़कर ये लोग बुद्ध के उस ‘उदार दृष्टिकोण’ का अनर्थ कर देते हैं।

वे कोई अज्ञेयवादी नहीं थे; उनके पास इस बात के बहुत ठोस आधार थे कि क्यों कुछ विचारों को श्रद्धा के योग्य माना जाए और कुछ को वर्जित। और कर्म, पुनर्जन्म और निर्वाण को लेकर उनके जो उपदेश थे, वे उस ज़माने के भारत में चल रही आम धारणाओं से बिल्कुल लीक से हटकर और क्रांतिकारी थे।

वे न तो किसी कालखंड के लाचार पीड़ित थे और न ही केवल वर्तमान में जीने वाले अज्ञेयवादी। वे एक ऐसे प्रज्ञावान मार्गदर्शक थे जिन्होंने श्रद्धा और अनुभव के इस पूरे द्वंद्व को एक बहुत ही अनूठे ढंग से सुलझाया था। लेकिन उस ढंग को समझने के लिए, हमें पहले इस पश्चिमी वैचारिक युद्ध से एक कदम पीछे हटना होगा और श्रद्धा तथा अनुभव को बिल्कुल बुनियादी रूप में, अपने मन के भीतर चलने वाली एक प्रक्रिया की तरह देखना होगा।

माना कि हमें यह सोचना बहुत अच्छा लगता है कि हम अपने सारे निर्णय सिर्फ ‘ठोस तथ्यों’ को देखकर लेते हैं, पर हकीकत यह है कि हम अपने हर छोटे-बड़े फैसले में श्रद्धा और अनुभव दोनों का ही घालमेल करते हैं। यहाँ तक कि जब हम पूरी तरह सबूतों पर टिककर भी कोई निर्णय ले रहे होते हैं, तब भी समय के प्रवाह में हमारी जो स्थिति है, उसके कारण हमारी दृष्टि अधूरी रह जाती है।

जैसा कि दार्शनिक कीर्केगार्ड ने कहा था—

हम जीते तो आगे की तरफ हैं, पर समझते पीछे की तरफ हैं।

व्यापार की दुनिया का कोई भी चतुर और समझदार व्यवसायी आपको बता देगा कि भविष्य के निवेश के लिए आपको हमेशा ‘साहस और भरोसे’ (श्रद्धा) का ही सहारा लेना पड़ता है, चाहे आपके पास अतीत के कितने ही आँकड़े क्यों न हों। कई बार हमारी ज़िंदगी में ऐसे मोड़ आते हैं जहाँ हमें तुरंत कोई बड़ा निर्णय लेना होता है और हमारे पास तथ्य जुटाने का समय ही नहीं होता।

कई बार हमारे पास तथ्यों की इतनी भरमार हो जाती है—जैसे कोई डॉक्टर किसी मरीज़ की ऐसी रिपोर्टें देख रहा हो जो आपस में ही टकरा रही हों—तो उसे अपनी प्रज्ञा और अंतःप्रेरणा पर भरोसा (श्रद्धा) करना पड़ता है कि किस तथ्य पर ध्यान देना है और किसे छोड़ देना है।

द्रष्टा का सत्य बनाम संकल्प का सत्य

श्रद्धा हमारे निर्णयों में इससे भी कहीं अधिक गहरा रोल निभाती है। जैसा कि दार्शनिक विलियम जेम्स ने एक बार रेखांकित किया था कि जीवन में दो प्रकार के सत्य होते हैं:

  1. द्रष्टा का सत्य (Truths of the Observer):

    ये वे सत्य हैं जिनका सही होना हमारे कर्मों पर निर्भर नहीं करता। जैसे भौतिक दुनिया के नियम—परमाणु मिलकर अणु कैसे बनाते हैं, या तारे कैसे विखंडित होते हैं। ऐसी चीज़ों के मामले में तब तक संदेहवादी बने रहना सबसे सही है, जब तक कि कोई पक्का भौतिक सबूत सामने न आ जाए।

  2. संकल्प का सत्य (Truths of the Will):

    ये वे सत्य हैं जिनका अस्तित्व पूरी तरह इस बात पर टिका है कि हम क्या प्रयास करते हैं। इसमें कोई भी हुनर सीखना, रिश्ते निभाना, साम्राज्य खड़ा करना—यानी ऐसी हर चीज़ शामिल है जिसे साकार करने के लिए आपके अपने पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है। इस तरह के सत्यों के मामले में, जब तक आपके भीतर एक अडिग श्रद्धा नहीं होगी, वह सत्य कभी ज़मीन पर उतरेगा ही नहीं; भले ही बाहरी हालात कितने ही विपरीत क्यों न हों।

उदाहरण के लिए, यदि आप यह विश्वास ही नहीं करते कि सितार बजाना कोई कीमती हुनर है, या आपके भीतर एक अच्छा संगीतकार बनने की क्षमता है, तो आप कभी सितार बजाना सीख ही नहीं पाएंगे। सच्चे सुख की हमारी खोज में इसी ‘संकल्प के सत्य’ की सबसे बड़ी भूमिका होती है।

इंसानी इतिहास की सबसे प्रेरणादायक कहानियाँ उन्हीं लोगों की हैं जिन्होंने इस प्रकार के सत्यों को तब सच कर दिखाया जब उनके सामने भौतिक सबूतों का एक बहुत बड़ा पहाड़—जैसे जातिवाद, गरीबी, या कोई शारीरिक लाचारी—दीवार बनकर खड़ा था। ऐसे मामलों में, सत्य को स्थापित करने के लिए यह आवश्यक होता है कि आपकी श्रद्धा सामने दिख रहे तात्कालिक तथ्यों को साफ़ नकार दे।

अगर हम निर्णय लेने के इस मनोविज्ञान में और गहरे उतरें, तो हमारा सामना एक ऐसे क्षेत्र से होता है जिसके लिए दुनिया का कोई भी वैज्ञानिक प्रयोग कभी कोई भौतिक प्रमाण नहीं दे सकता:

  • “क्या हम वाकई कर्म करने के लिए स्वतंत्र हैं, या हमारे कर्म महज़ एक भ्रम हैं?”
  • “क्या हमारे सारे कार्य पहले से ही प्रकृति के नियमों या किसी बाहरी नियति से तय हैं, या हमारे पास अपनी खुद की कोई ‘मुक्त इच्छा’ है?”
  • “क्या कार्य-कारण का रिश्ता वाकई सच है या महज़ एक दिमागी कल्पना है?”

बड़े से बड़ा वैज्ञानिक प्रयोग भी कभी इन बातों का फैसला प्रयोगशाला में नहीं कर सकता। लेकिन यदि हमें अपने विचारों, शब्दों और कर्मों में पूरी ऊर्जा लगानी है, तो हमें इन पर एक स्पष्ट स्टैंड लेना ही होगा।

बौद्ध धम्म में श्रद्धा का वास्तविक अर्थ

यही वे क्षेत्र थे जहाँ बुद्ध ने अनुभव और श्रद्धा के अपने समन्वय को स्थापित किया था। भले ही पहला आर्य सत्य हमसे यह मांग करता है कि हम दुःख को तब तक गहराई से देखें जब तक उसे पूरी तरह समझ न लें, लेकिन हमें बुद्ध के इस दावे पर श्रद्धा रखनी ही होगी कि दुःख को लेकर हम जो कुछ भी देख-परख रहे हैं, वही हमारे जीवन के हर पल के निर्णयों का सबसे ज़रूरी मार्गदर्शक है।

चूँकि तीसरा आर्य सत्य—यानी दुःख का निरोध (अंत)—एक ‘संकल्प का सत्य’ है, इसलिए हमें इस बात पर श्रद्धा रखनी होगी कि यह एक प्राप्य और बेहद मूल्यवान लक्ष्य है। और चूँकि चौथा आर्य सत्य—यानी दुःख मुक्ति का अष्टांगिक मार्ग—पूरी तरह कर्म और कौशल का रास्ता है, इसलिए हमें इस बात पर श्रद्धा रखनी होगी कि हमारे कर्म वास्तविक हैं, हमारे पास चुनने की आज़ादी है, और हमारे चित्त के काम करने का एक ऐसा निश्चित नियम (कार्य-कारण भाव) है जिससे सीखकर हम इस साधना में पारंगत हो सकते हैं।

जैसा कि बुद्ध ने कहा था—यह मार्ग आपको इन सत्यों के ‘प्रत्यक्ष साक्षात्कार’ तक ले जाएगा, लेकिन आप इस सत्य को अपने भीतर तभी जान पाएंगे जब आप इस साधना में पूरी श्रद्धा लेकर आएंगे। दूसरे शब्दों में कहें तो, बौद्ध संदर्भ में ‘श्रद्धा’ का सीधा सा मतलब है—

इस बात पर अटूट विश्वास होना कि आपके अपने कर्मों में इतनी सामर्थ्य है कि वे आपको दुखों के समूल नाश तक ले जा सकते हैं।

बुद्ध ने ये उपदेश उन लोगों को दिए थे जो इस बात की खोज में थे कि सच्चा सुख कैसे पाया जाए। इसीलिए वे कभी किसी पर कोई ज़बरदस्ती नहीं करते थे: उनकी शिक्षाओं की पहली शर्त ही यह थी कि उनके श्रोता पहले से ही किसी न किसी आध्यात्मिक खोज में निकले हुए हैं। जब हम समझ जाते हैं कि बुद्ध की दृष्टि में किसी ‘खोज’ का क्या अर्थ होता है—लोग क्यों खोजते हैं और क्या ढूंढ रहे हैं—तब हम समझ पाते हैं कि एक सफल खोज के लिए श्रद्धा और अनुभव का इस्तेमाल कैसे करना चाहिए।

इस बात को समझने का सबसे अच्छा तरीका बुद्ध के उन पाँच प्रसिद्ध दृष्टांतों को देखना है जो समझाते हैं कि खोज की प्रामाणिक विधि क्या है।

खोज के पाँच दृष्टांत

१. अंगारों से भरा गड्ढा

जैसे, गृहस्थ, कोई अंगारों से भरा गड्ढा हो—पुरुष की लंबाई से भी गहरा, जिसमें अंगारे न लौ फेंकते, न धुंवा देते धधक रहे हो। और कोई पुरुष आता है, जो जीवित रहना चाहता है, मरना नहीं चाहता, सुख चाहता है, दुःख से दूर भागता है। तब दो बलवान पुरुष उसे बाहों से पकड़ कर घसीटते हुए उस अंगारों से भरे गड्ढे की ओर ले जाते हैं। तुम्हें क्या लगता है, गृहस्थ? क्या वह पुरुष काया को जैसे-तैसे नहीं छटपटाएगा?

पोतलिय सुत्त

अपने दुखों के आगे हमारा हाथ-पैर मारना बिल्कुल ऐसा ही है। हम यह दार्शनिक बहस करने नहीं बैठते कि हमारा दुःख पहले से तय है या हमारे बचने की कोई उम्मीद है भी या नहीं। हम बस पूरी ताकत से छटपटाते हैं और बाहर निकलने की कोशिश करते हैं। यह हमारी स्वाभाविक मानवीय प्रतिक्रिया है।

बुद्ध ने सिखाया कि इस छटपटाहट के दो हिस्से होते हैं: पहला, हम पूरी तरह उलझ जाते हैं कि “मेरे साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है?” (हैरान-परेशान), और दूसरा, हम इस दुःख को ख़त्म करने का कोई न कोई रास्ता ढूंढने लगते हैं (खोज)।

जब बुद्ध ने कहा कि वे सिर्फ ‘दुःख और दुःख के निरोध’ के बारे में सिखाते हैं, तो वे असल में हमारी इन्हीं दो प्रतिक्रियाओं का जवाब दे रहे थे—वे दुःख की ऐसी व्याख्या देते हैं जिससे हमारी आध्यात्मिक उलझन मिट सके, और वे मुक्ति का ऐसा मार्ग दिखाते हैं जिससे हमारी वह खोज पूरी हो सके।

उन्हें इस विचार से सख्त नफ़रत थी कि हमारा दुःख दरअसल दुःख से बचने के हमारे इसी संघर्ष के कारण है; या यह सोचना कि मुक्ति की खोज ही हमें उस शांति को देखने से रोक रही है जो पहले से वहाँ मौजूद है। ऊपर दिए गए उदाहरण के आलोक में देखें तो, इस क्षण के दुखों को पूरी तरह से ‘स्वीकार’ करके ढीले पड़ जाने का सीधा सा मतलब है—अंगारों में ज़िंदा जल जाने की आत्मघाती तैयारी कर लेना।

२. फल से लदा वृक्ष

कल्पना करो, गृहस्थ, किसी गाँव या नगर के समीप एक घना जंगल हो। वहाँ फल से लदा एक वृक्ष हो, जिसे बहुत फल उत्पन्न हुए हो, किन्तु कोई फल भूमि पर न गिरा हो।

तब एक पुरुष आता है, फल चाहते हुए, फल खोजते हुए, फल को ढूँढते हुए घूम रहा हो। वह उस घने जंगल में गहराई में प्रवेश कर उस फल से लदे वृक्ष को देखता है, जिसे बहुत फल उत्पन्न हुए हैं। तब उसे लगता है, ‘यह फल से लदा वृक्ष है, जिसे बहुत फल उत्पन्न हुए हैं, किन्तु कोई फल भूमि पर नहीं गिरा है। किन्तु मुझे वृक्ष पर चढ़ना आता है। क्यों न मैं इस वृक्ष पर चढ़ कर, चाहे जितने फल खाऊँ, और फिर थैला भरूँ?’ तब वह उस वृक्ष पर चढ़कर चाहे जितने फल खाता है, और फिर थैला भरने लगता है।

तब दूसरा पुरुष आता है, फल चाहते हुए, फल खोजते हुए, फल को ढूँढते हुए घूम रहा हो। वह उस घने जंगल में गहराई में प्रवेश कर उस फल से लदे वृक्ष को देखता है, जिसे बहुत फल उत्पन्न हुए हैं। तब उसे लगता है, ‘यह फल से लदा वृक्ष है, जिसे बहुत फल उत्पन्न हुए हैं, किन्तु कोई फल भूमि पर नहीं गिरा है। किन्तु मुझे वृक्ष पर चढ़ना नहीं आता। क्यों न मैं इस वृक्ष का मूल काट कर चाहे जितने फल खाऊँ, और फिर थैला भरूँ?’ तब वह उस वृक्ष का मूल काटने लगता है।

तुम्हें क्या लगता है, गृहस्थ? क्या वह पुरुष, जो वृक्ष पर चढ़ा हुआ है, तुरंत नीचे न उतरे, तो वृक्ष के गिरने पर उसका हाथ नहीं टूटेगा, या पैर नहीं टूटेगा, या कोई अंग-प्रत्यंग नहीं टूटेगा, और क्या उस कारणवश उसकी मौत या मौत जैसी पीड़ा हो सकती है?"

पोतलिय सुत्त

यह उदाहरण दिखाता है कि गलत स्थान पर (यानी क्षणभंगुर इंद्रिय-सुखों में) सच्चा सुख ढूंढने के क्या खतरे हैं। यदि आपका सुख किसी ऐसी चीज़ पर टिका है जिसे कोई दूसरा आपसे छीन सकता है, तो आप हर पल खतरे में हैं।

बुद्ध कहते हैं कि हम इन दुनियावी सुखों में सुख की उम्मीद इसलिए नहीं बांधते कि इन्होंने हमें कभी पूरी तरह तृप्त किया है, बल्कि इसलिए बांधते हैं क्योंकि हम कष्ट से बचने का इसके अतिरिक्त कोई दूसरा मार्ग सोच ही नहीं पाते। अगर हम खुद को इस बात पर भरोसा (श्रद्धा) करने की छूट दें कि इससे बेहतर एक और दिव्य विकल्प मौजूद है, तभी हम अपनी पुरानी तृष्णाओं को छोड़ पाएंगे और उस दूसरे विकल्प को आजमाने के लिए तैयार हो सकेंगे।

३. गाय के सींग और थन

एक मूर्ख व्यक्ति दूध की खोज में गाय के सींग को पकड़कर मरोड़ रहा है। वहीं एक दूसरा समझदार व्यक्ति दूध के लिए गाय के थन को दुह रहा है। दूध कहाँ से निकलेगा?

भूमिज सुत्त

यह दृष्टांत उन लोगों को उत्तर है जो कहते हैं कि मनुष्य का कोई भी प्रयास उसे दुखों से मुक्त नहीं कर सकता। बुद्ध कहते हैं कि हमें मुक्ति अवश्य मिल सकती है, बशर्ते हमारी विधि सही हो—बिल्कुल उस व्यक्ति की तरह जो सही स्थान पर प्रयास करके दूध निकाल लेता है।

सही विधि की शुरुआत होती है ‘सम्यक दृष्टि’ से, और यहीं पर बुद्ध की बोधि में हमारी श्रद्धा काम आती है।

बुद्ध ने एक बार कहा था कि उन्होंने अपनी बोधि के समय जो कुछ जाना, वह सब कुछ उन्होंने दूसरों को नहीं बताया। जो उन्होंने बताया वह महज़ मुट्ठी भर पत्तियों जैसा था; और जो उन्होंने जाना वह पूरे विशाल वन की पत्तियों जैसा था। फिर भी, उनकी हथेली में ली गई वे मुट्ठी भर पत्तियाँ दूसरों को बुद्धत्व तक पहुँचाने के लिए पूरी तरह पर्याप्त थीं। सम्यक दृष्टि की शुरुआत इसी बात को सीखने से होती है कि वे विशेष सूत्र क्या हैं।

इसमें सबसे बड़ा सूत्र खुद बुद्ध की बोधि का सत्य है। बुद्ध ने इसे अपने पुरुषार्थ से हासिल किया था, और उन्होंने ऐसा इसलिए नहीं किया कि वे कोई अलौकिक शक्ति थे, बल्कि इसलिए किया क्योंकि उन्होंने उन मानसिक गुणों को चरम सीमा तक पहुँचाया जिन्हें जगाने की क्षमता हम सबके भीतर बीज रूप में मौजूद है।

इसलिए, उनकी बोधि पर श्रद्धा रखने का सीधा सा मतलब है—अपनी खुद की आध्यात्मिक क्षमता पर भरोसा होना।

व्यावहारिक कसौटी

जब बुद्ध को अपनी बोधि के सत्य को सबसे संक्षिप्त रूप में समेटना होता था, तो वे कार्य-कारण के एक ऐसे नियम ( प्रतीत्यसमुत्पाद ) पर ज़ोर देते थे जो समझाता है कि कैसे हम एक ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जहाँ घटनाएँ नियमों से संचालित हैं, पर फिर भी वे घटनाएँ पूरी तरह से अतीत के वश में नहीं हैं।

यह नियम असल में दोहरा है, क्योंकि हमारी ज़िंदगी में दो तरह के कार्य-कारण नियम आपस में बुने हुए हैं:

  1. तात्कालिक कारण:

    वह कारण जो इसी वर्तमान क्षण में तुरंत परिणाम देता है—‘इसके होने से यह होता है; इसके न होने से यह नहीं होता।’ जैसे आप बिजली का बटन दबाते हैं और तुरंत प्रकाश हो जाता है।

  2. कालिक कारण:

    वह कारण जो समय बीतने पर अपना परिणाम दिखाता है—‘इसके उदित होने से यह उदित होता है; इसके रुकने से यह रुक जाता है।’ जैसे आज किया गया पुरुषार्थ भविष्य में फल देता है।

यदि इसी दोहरे नियम को हम ‘कर्म’ पर लागू करें, तो इसका अर्थ यह हुआ कि हमारे अनुभव का प्रत्येक क्षण तीन चीज़ों से मिलकर बनता है:

  1. अतीत के संकल्पों से मिलने वाले सुख और दुःख,
  2. हमारी वर्तमान की चेतना/नीयत,
  3. हमारी वर्तमान की नीयत से तुरंत मिलने वाले सुख और दुःख।

इस प्रकार हमारा यह वर्तमान क्षण पूरी तरह से अतीत की नियति से तय नहीं होता। सच तो यह है कि आज आप जो सुख या दुःख महसूस कर रहे हैं, उसे गढ़ने वाला सबसे बड़ा कारक यह है कि आप अतीत के कर्मों से मिले कच्चे माल को आज अपनी वर्तमान नीयत से कैसी शक्ल दे रहे हैं। और आपकी आज की नीयत पूरी तरह से स्वतंत्र हो सकती है।

यही वह खिड़की है जहाँ कार्य-कारण के इस चक्रव्यूह के बीच भी मनुष्य के पास ‘मुक्त इच्छा’ बची रहती है।

नियमों के भीतर छिपी यही आज़ादी मन को साधने का एक ऐसा मार्ग खोल देती है जो दुखों का हमेशा के लिए अंत कर देता है। हम दान, शील और ध्यान का अभ्यास इसलिए करते हैं ताकि अपनी नीयतों की ताकत को समझ सकें। अपनी नीयत की अंतिम सीमा को परखने के लिए, हमें उसे इतना कुशल बनाना होगा कि वर्तमान में नए इरादे गढ़ने का यह चक्र ही पूरी तरह थम जाए। जहाँ ये इरादे ठहर जाते हैं, वहीं वह अहेतुक ‘निर्वाण’ प्रकट हो जाता है।

अपने इन उपदेशों को समझाते हुए बुद्ध ने कई बार व्यावहारिक साक्ष्य भी दिए—जैसे यह दिखाना कि किसी दूसरे की तड़प देखकर आपका मन कितना दुखी होता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप उस व्यक्ति से कितने आसक्त हैं। लेकिन उन्होंने कभी इसका कोई प्रयोगशाला वाला वैज्ञानिक प्रमाण देने का दावा नहीं किया।

उन्होंने तो अपने ज़माने के ‘जैन’ संप्रदाय के विचारकों का मज़ाक उड़ाया, जो कर्म के एक बहुत ही भाग्यवादी नियम को मानते थे और दावा करते थे कि जो कोई भी बुरा कर्म करता है, उसे उसका दंड इसी वक्त, यहीं भुगतना पड़ता है। बुद्ध ने उनसे पूछा, “क्या तुमने कभी ऐसा मामला नहीं देखा जहाँ किसी व्यक्ति को राजा के शत्रु का वध करने पर, या शत्रु के घर चोरी करने पर राजा से पुरस्कार और सम्मान मिला हो?” (उत्तर था, “हाँ!”)

भले ही कर्म का यह बुनियादी नियम बड़ा सरल लगे कि अच्छी नीयत से सुख मिलेगा और बुरी से दुःख, लेकिन इसके काम करने का यह दोहरा कार्य-कारण नियम इतना जटिल है कि यदि कोई इंसान इसे सिर्फ बाहरी भौतिक सबूतों से नापने बैठेगा, तो उसका मानसिक संतुलन बिगड़ जाएगा।

इसलिए बुद्ध ने एक ‘व्यावहारिक कसौटी’ सामने रखी: यदि आप पूरे दिल से कार्य-कारण, कर्म, पुनर्जन्म और चार आर्य सत्यों पर भरोसा करते हैं, तो आपका आचरण कैसा होगा? क्या आप अपने कर्मों में ज़्यादा ज़िम्मेदार और दयालु नहीं बनेंगे?

दूसरी तरफ, यदि आप इसके किसी दूसरे विकल्प को मान लें—जैसे यह सोचना कि सब कुछ किसी अंधे भाग्य से तय है, या कोई ईश्वर बैठकर आपके सुख-दुःख की पर्चियाँ बांट रहा है—तो वे मान्यताएँ आपसे क्या करवाएँगी? क्या वे आपको अपने पुरुषार्थ से दुखों को ख़त्म करने का कोई अवसर देंगी?

और यदि आप इस बात पर कोई स्टैंड लेने से ही मना कर दें कि मानवीय कर्म क्या कर सकते हैं, तो क्या आप कभी इस बेहद कठिन साधना के रास्ते पर अंतिम मुकाम तक टिक पाएंगे?

४. सारकाष्ठ

जैसे कोई पुरुष सारकाष्ठ (मूल्यवान ठोस लकड़ी) चाहता हो, वह सारकाष्ठ को ढूँढते हुए, सारकाष्ठ की खोज में उसे एक विशाल वृक्ष खड़ा मिले। किन्तु वह उसके सार को छोड़, अंतःकाष्ठ को छोड़, टहनियों और पत्तियों को सारकाष्ठ मानकर, उसे काटकर घर ले जाता है।

सारकाष्ठ की उपमा

निर्वाण की संभावना पर पक्का भरोसा होना—जो इस मार्ग का असली सार है—वही आपको इस वृक्ष की छाल और डालियों के शुरुआती सुखों में भटकने से बचाता है: जैसे दान और शील से मिलने वाला मानसिक संतोष, या गहरी समाधि से मिलने वाला सुकून और अखंड शांति।

निर्वाण का नाता हमारे किसी भी पुराने जाने-पहचाने अनुभव से नहीं है। उसे छूने के लिए, हमें प्रपंचों से चिपके रहने की अपनी इस पुरानी आदत को छोड़ना होगा। इस बात पर भरोसा करना कि ऐसा कोई मुकाम मुमकिन है, अपने आप में विश्वास की एक बहुत बड़ी छलांग है।

बुद्ध निर्वाण को लेकर मिलने वाले सीधे और सरल विरोध को बड़े आराम से स्वीकार कर लेते थे और लोगों को उनकी पात्रता के अनुसार सीख दे देते थे। लेकिन वे उन ‘ब्रह्माओं’ के प्रति बहुत कड़े थे, जो समाधि की गहराइयों में मिलने वाले आनंद को ही निर्वाण का असली सार समझकर अहंकार में बैठ जाते थे।

ऐसे मामलों में बुद्ध अपनी पूरी तार्किक शक्ति का इस्तेमाल करके उनके उस भ्रम को चूर-चूर कर देते थे; क्योंकि वे जानते थे कि यह संकीर्ण दृष्टिकोण बोधि के द्वार हमेशा के लिए बंद कर देता है। यदि आप वृक्ष की छाल को ही उसका असली सार मान लेंगे, तो आप कभी असली लकड़ी की खोज नहीं करेंगे।

५. हाथी के पैरों के निशान

एक अनुभवी और कुशल शिकारी बड़े जंगली हाथी की तलाश में वन जाता है और उसे भूमि पर एक बहुत बड़ा पदचिह्न दिखाई देता है। लेकिन वह समझदार है, वह तुरंत इस निष्कर्ष पर नहीं कूद जाता कि यह किसी महान नर हाथी का ही पैर है। क्यों? क्योंकि वन में कुछ ऐसी बौनी हथिनियाँ भी होती हैं जिनके पैर बहुत बड़े होते हैं।

वह उस निशान के पीछे-पीछे आगे बढ़ता है और वृक्षों पर काफी ऊंचाई पर खरोंच और दाँतों के निशान देखता है, पर वह अब भी किसी निष्कर्ष पर नहीं उछलता। वह लगातार पीछा करता रहता है और आखिरकार एक वृक्ष के नीचे साक्षात एक विशाल नर हाथी को खड़ा देखता है। केवल इसी मुकाम पर पहुँचकर वह यह पक्का निष्कर्ष निकालता है कि उसने असली हाथी ढूंढ लिया है।

चूळहत्थिपदोपम सुत्त

इस उदाहरण को समझाते हुए बुद्ध ने कहा कि साधना के जितने भी शुरुआती कदम हैं—जैसे शील के नियमों पर टिकना, इंद्रियों पर संयम पाना, गहरी समाधि सिद्ध करना, यहाँ तक कि अपने पिछले जन्मों को देख लेना—ये सब महज़ बुद्ध की बोधि के पैर के निशान और खरोंचें हैं।

जब आप उनके बताए मार्ग पर चलकर खुद अपने भीतर बोधि का पहला छोटा सा स्वाद चख लेते हैं (स्रोतापन्न हो जाते हैं), केवल तभी आप प्रामाणिक रूप से जान पाते हैं कि बुद्ध की बोधि पर आपकी वह श्रद्धा बिल्कुल सही स्थान पर टिकी थी। दुःख के अंत वाले उस आयाम को छूते ही आपको समझ आ जाता है कि बुद्ध जो कुछ कह रहे थे, वह परम सत्य था।

श्रद्धा और ईमानदारी का अटूट नाता

इस दृष्टांत की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यह एक स्वस्थ श्रद्धा को एक बहुत ही ईमानदार कसौटी के साथ जोड़ता है। इस श्रद्धा पर चलने का अर्थ ही यह है कि आप इसे एक ‘कार्यकारी परिकल्पना’ की तरह लगातार टेस्ट कर रहे हैं।

आपको उन पैरों के निशानों के पीछे-पीछे चलने के लिए श्रद्धा तो चाहिए, पर साथ ही आपके भीतर इतनी सच्चाई भी होनी चाहिए कि आप साफ देख सकें कि कहाँ आपकी श्रद्धा ख़त्म होती है और कहाँ आपका प्रत्यक्ष ज्ञान शुरू होता है।

किसी ऐसे धर्म के विपरीत—जहाँ श्रद्धा का अर्थ किसी बाहरी मसीहा की सत्ता को स्वीकार कर लेना होता है और संदेह का मतलब नास्तिकता—बुद्ध की बोधि पर श्रद्धा रखना बार-बार आपका ध्यान आपके अपने कर्मों की शक्ति की ओर मोड़ता है।

इन गूढ़ प्रश्नों का उत्तर पाने का एक ही रास्ता है—अपनी नीयतों को लेकर भीतर से इतना ईमानदार हो जाना कि मन में उठने वाले बारीक से बारीक विकार को भी आप साफ पकड़ सकें। तभी आप उस अमृत पद को पक्के तौर पर जान पाएंगे जो संकल्पों के खेल से पूरी तरह मुक्त है।

लेकिन यदि आप उन चीज़ों को जानने का झूठा दावा करेंगे जिन्हें आप अभी जानते ही नहीं, तो भला आप खुद का रूपांतरण कैसे करेंगे? आपको अपनी आंतरिक ईमानदारी को उस परम सत्य के स्तर तक उठाना होगा जिसे आप प्रमाणित करने निकले हैं।

यही कारण है कि आज का यह आधुनिक विज्ञान कभी भी बोधि के इन सत्यों पर कोई अंतिम निर्णय नहीं सुना सकता; क्योंकि यह मार्ग उन आंतरिक क्षेत्रों से संबंधित है जहाँ बाहर बैठा कोई वैज्ञानिक अपने उपकरणों से कभी पहुँच ही नहीं सकता। भले ही दूसरे लोग आपके दुखों को देखकर आपके प्रति सहानुभूति जता सकते हैं, पर वह दुःख एक ऐसा नितांत निजी अनुभव है जिसे आप किसी के साथ साझा नहीं कर सकते।

वैज्ञानिक आपके मस्तिष्क की तरंगों से दर्द या इच्छा का संकेत तो पकड़ सकते हैं, पर बाहर का कोई भी मीटर यह नहीं नाप सकता कि वह दर्द अंदर से कैसा महसूस हो रहा है। और जहाँ तक उस निर्वाण का प्रश्न है, उसका तो इस भौतिक जगत की किसी वस्तु से कोई संबंध ही नहीं है।

अगर आपको असली हाथी तक पहुँचना है, तो आपको वही करना होगा जो बुद्ध के अग्रशिष्य सारिपुत्त ने किया था। वे बिना किसी काल्पनिक निष्कर्ष पर कूदे, ईमानदारी से मार्ग पर चलते रहे, जब तक कि उन्होंने अपने भीतर उस सत्य का साक्षात्कार नहीं कर लिया। और उसके बाद, जब बुद्ध ने उनसे पूछा:

सारिपुत्त! क्या तुम श्रद्धा के भरोसे यह मानते हो कि ये पाँचों बल (श्रद्धा, वीर्य, सति, समाधि और प्रज्ञा) मनुष्य को अमृत पद तक ले जाते हैं?

तो सारिपुत्त ने पूरी गरिमा से सिर उठाकर कहा:

नहीं भंते, मैं इसे श्रद्धा के भरोसे नहीं कहता। मैं इसे स्वयं जानता हूँ।

सारिपुत्त का यह प्रमाण पूरी तरह अनुभवजन्य था, लेकिन वह इतना आंतरिक था कि उसने उस आयाम को छू लिया था जहाँ न तो बाहर की इंद्रियाँ पहुँच सकती हैं और न ही भौतिक विज्ञान के नियम काम करते हैं।

यदि आपको उनके इस ज्ञान की पुष्टि करनी है, तो आपको उस आयाम को अपने भीतर की उसी इकलौती जगह पर छूना होगा जहाँ आपकी पहुँच है—यानी खुद अपने भीतर। यही वह पहला बिंदु है जहाँ बुद्ध का यह मार्ग आज के आधुनिक विज्ञान के नज़रिए से बिल्कुल अलग हो जाता है।

और दूसरा सबसे बड़ा अंतर है—उस साधक का चरित्र और सत्यनिष्ठा, जो इस सच को साबित करने निकला है।

विज्ञान की ही तरह, बुद्ध की बोधि पर श्रद्धा रखना एक कार्यकारी परिकल्पना की तरह काम अवश्य करता है, लेकिन इस परिकल्पना को कसौटी पर कसने के लिए जिस आंतरिक सत्यनिष्ठा की आवश्यकता होती है, वह विज्ञान की किसी भी मांग से कहीं ज़्यादा गहरी और कड़ा इम्तिहान लेने वाली है।

आपको खुद को—अपने अहंकार की एक-एक परत को—इस अग्निपरीक्षा में पूरी तरह झोंक देना होगा। जब आप अपने अस्तित्व की पकड़ को पूरी तरह छोड़ देंगे, केवल तभी आप यह प्रमाणित कर पाएंगे कि क्या यह पकड़ने की आदत ही उस अमृत पद को छिपाए बैठी थी।

बुद्ध ने कभी किसी को इस इम्तिहान में बैठने के लिए बाध्य नहीं किया; क्योंकि आप किसी को खुद के प्रति ईमानदार होने के लिए मजबूर नहीं कर सकते, और दूसरा इसलिए क्योंकि वे जानते थे कि बाहर दहक रहा संसार का यह दुःखरूपी अंगारों का गड्ढा ही मनुष्य को बदलने के लिए पर्याप्त विवशता है।

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क्या धर्म का तार्किक होना अनिवार्य है?

लेखक: थानिस्सरो भिक्खु

थानिस्सरो भिक्खु

पूज्य गुरुजी थानिस्सरो भिक्खु

आप एक प्रतिष्ठित थेरवादी भिक्षु और ध्यानसाधना के आचार्य हैं, जिन्हें स्नेहपूर्वक “अजान जेफ़” के नाम से भी जाना जाता है। आप अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया स्थित “मेत्ता अरण्य विहार” (Metta Forest Monastery) में निवास करते हैं, जहाँ आपने गहन ध्यान साधना, धर्म-विनय के अनुशासित पालन, और प्राचीन पाली सूत्रों के अध्ययन व शिक्षण को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाया है।

धर्म और विनय पर आपकी गहरी पकड़ और तर्कसम्मत व्याख्यानों से दुनियाभर के भिक्षु और साधक प्रेरित हुए हैं। आपने सुत्तपिटक और विनयपिटक के अधिकांश सूत्रों का अंग्रेज़ी में सरल व सटीक अनुवाद किया है, जिससे पाली बौद्ध सूत्रों की मौलिकता और गहराई जनसामान्य तक सहज रूप से पहुँच सके। आपके ध्यान और बौद्ध दर्शन पर दिए गए प्रवचन आधुनिक जीवन में भी अत्यंत प्रासंगिक हैं, जिससे असंख्य साधकों को आध्यात्मिक दिशा मिली है।

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