हम सभी सुख की तलाश में हैं। राजा हो या भिखारी, चोर हो या संत—हर कोई दुख से छुटकारा पाना चाहता है और सुख पाना चाहता है। इस सार्वभौमिक सच्चाई को समझते हुए, बौद्ध दर्शन सुख की इस खोज पर दो शर्तें रखता है:
पहली शर्त: सुख सच्चा होना चाहिए। यानी यह निष्कपट, स्थायी और परम हो।
दूसरी शर्त: सुख की खोज गंभीर होनी चाहिए। यह चिंता या दुख से भरी गंभीरता नहीं है, बल्कि एक दृढ़ संकल्प और निष्ठा है, जहाँ साधक एक लाभकारी ‘त्याग’ करने के लिए तैयार रहता है।
कल्याणकारी त्याग क्या है?
किस तरह के त्याग को कल्याणकारी माना जाए? यहाँ बौद्ध दर्शन एक बहुत ही सामान्य सिद्धांत को गहराई से समझाता है: जब किसी छोटे सुख को छोड़ने पर कोई बड़ा सुख मिल जाए, तो ऐसे त्याग को कल्याणकारी (लाभदायक) त्याग कहा जाता है।
उदाहरण के लिए, अगर कोई आपको एक थैली जलेबी के बदले एक किलो सोना देना चाहे, तो आप खुशी-खुशी जलेबी छोड़ने को तैयार हो जाएंगे। यानी, कल्याणकारी त्याग एक फायदे के सौदे की तरह है। यह बौद्ध परंपरा की एक प्राचीन उपमा है:
अजरं जीरमानेन, तप्पमानेन निब्बुतिं,
निमियं परमं सन्तिं, योगक्खेमं अनुत्तरं।— थेरगाथा 1:32 - सुप्पियो थेरो
अर्थात,
तपन के बदले निर्वाण!
परम शान्ति और शीतलता!
योगबंधन से अनुत्तर सुरक्षा।”
आमतौर पर, हम कुछ भी त्यागने के नाम पर झिझकते हैं। हमारा बस चले तो हम जलेबी और सोना, दोनों रख लें! लेकिन जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, यह समझ में आने लगता है कि सब कुछ पा लेना असंभव है।
किसी एक तरह के सुख को भोगने के लिए हमें किसी दूसरे (शायद बेहतर) सुख का त्याग करना ही पड़ता है। इसलिए, हमें अपनी प्राथमिकताएं तय करनी होती हैं, ताकि हम अपनी सीमित ऊर्जा और समय वहाँ लगा सकें जहाँ हमें सबसे लंबे समय तक चलने वाला फल मिल सके।
मन को प्राथमिकता
इसका सीधा सा मतलब है कि हमें अपने ‘मन’ को सबसे पहला महत्व देना होगा। भौतिक वस्तुएं और रिश्ते हमेशा एक जैसे नहीं रहते; वे बाहरी शक्तियों से प्रभावित होते हैं। इसलिए उनसे मिलने वाला सुख भी अंततः टूट ही जाता है, उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इसके विपरीत, एक सही तरह से प्रशिक्षित मन का सुख बुढ़ापे, बीमारी और यहाँ तक कि मृत्यु से भी पार पा लेता है।
लेकिन, मन को इस तरह प्रशिक्षित करने के लिए समय और ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह पहला कारण है कि सच्चे सुख की खोज में हमें कुछ बाहरी सुखों का त्याग करना पड़ता है।
दूसरा कारण: बाहरी सुखों को पकड़े रहना अक्सर एक भारी मानसिक बोझ बन जाता है। जब हम उन्हें त्याग देते हैं, तो यह बोझ उतर जाता है। पाली सूत्रों (उदान 2:10) में एक प्रसिद्ध कथा है जिसमें एक राजा अपना राज्य छोड़कर भिक्षु बन जाता है। एक दिन उसके साथी भिक्षु उसे एक पेड़ के नीचे बैठे ज़ोर-ज़ोर से बोलते हुए सुनते हैं: “आह, क्या आनंद! ओह, क्या आनंद!”
अन्य भिक्षुओं को लगता है कि वह राजा अपने राजसी सुखों को याद करके तरस रहा है, और वे यह बात बुद्ध को बता देते हैं। बुद्ध उसे बुलाकर कारण पूछते हैं। पूर्व राजा जवाब देता है:
“भंते! पहले मेरे महल के भीतर-बाहर, शहर के भीतर-बाहर और देश के भीतर-बाहर कई पहरेदार होते थे। इतनी सुरक्षा के बाद भी मैं हमेशा डरा हुआ, बेचैन और शक से भरा रहता था। लेकिन अब, मैं अकेले जंगल में जाता हूँ, किसी पेड़ के नीचे या खाली कुटिया में बैठता हूँ—निडर, शांत और पूरी तरह आश्वस्त! बेफिक्र होकर दूसरों के दिए दान पर जीता हूँ, और मेरा मन एक जंगली हिरण की तरह आज़ाद है।”
तीसरा कारण: हम अपनी इंद्रियों का रस भोगने के लिए—आँखों, कानों, नाक, जीभ और शरीर के लिए ‘जलेबियां’ पाने के लिए—लोभ, द्वेष (घृणा) और मोह (भ्रम) जैसे मानसिक विकारों को बहुत बढ़ा लेते हैं। ये विकार हमारी आंतरिक शांति को सीधे तौर पर नष्ट कर देते हैं। हमारे पास दुनिया भर का समय और ऊर्जा हो, तो भी कामुक सुखों की अंधी दौड़ हमें हमारे असली लक्ष्य से दूर ही ले जाती है।
अष्टांगिक मार्ग के दूसरे अंग, ‘सम्यक संकल्प’ में इसी बारे में बताया गया है। सम्यक संकल्प का अर्थ है कामुकता, बैर-भाव और हिंसक विचारों को त्यागना। ‘कामुकता’ में केवल यौन इच्छा ही नहीं, बल्कि हर वह इंद्रिय-सुख शामिल है जो मन की शांति को भंग कर दे। ‘बैर-भाव’ का अर्थ है अपनी या किसी और की पीड़ा चाहना, और ‘हिंसा’ का अर्थ है ऐसा कोई भी काम करना जिससे यह पीड़ा सचमुच पैदा हो।
त्याग की चुनौती
बैर और हिंसा को छोड़ना चाहिए—यह बात मानना आसान है, भले ही इसे हमेशा अमल में लाना आसान न हो। लेकिन कामुक लालसा (राग) को छोड़ने का संकल्प लेना ही अपने आप में बहुत दुर्लभ है, उसे निभाना तो दूर की बात है।
इस संकल्प का विरोध करना शायद इंसानी फितरत है। बुद्ध खुद बताते हैं कि जब वे सत्य की खोज में निकले थे, तब कामुकता छोड़ने के विचार से उनका मन भी कोई बहुत उत्साहित नहीं हुआ था। लेकिन आज के आधुनिक युग में तो हमारे पास इस संन्यास का विरोध करने के और भी कई बहाने हैं।
आधुनिक मनोविज्ञान हमें सिखाता है कि कामुकता के मामले में हमारे पास केवल दो ही विकल्प हैं: या तो उसे “स्वस्थ” तरीके से भोग लें, या फिर डरकर उसका दमन कर दें। और यह माना जाता है कि दमन करने से इच्छाएँ मन की गहराइयों में छिप जाती हैं और बाद में किसी गलत मौके पर भयंकर रूप से फूट पड़ती हैं, इसलिए उन्हें भोग लेना ही बेहतर है।
लेकिन ये दोनों ही तरीके डर पर आधारित हैं और दोनों ही मन को बुरी तरह बाँधते हैं। इन दोनों के खतरों को पहचानते हुए, बुद्ध ने एक तीसरा विकल्प खोजा—एक ऐसा कुशल और निडर तरीका जो दोनों तरफ के खतरों से बचाता है।
सम्यक दृष्टि और सम्यक समाधि
इस तरीके को समझने के लिए हमें सम्यक संकल्प को अष्टांगिक मार्ग के अन्य अंगों (खासकर सम्यक दृष्टि और सम्यक समाधि) के साथ जोड़कर देखना होगा।
सम्यक दृष्टि (सही समझ) हमें कामुक लालसा को समझने का एक स्पष्ट नज़रिया देती है, ताकि हम भटक न जाएँ। इसके दो स्तर हैं:
- कर्म और फल का स्तर: यह हमें दिखाता है कि कामुक सुख कितने क्षणिक, अस्थिर और अंततः दुख देने वाले हैं। पैसे कमाने की होड़ से लेकर पारिवारिक झगड़ों और देशों के बीच युद्धों तक—दुनिया के ज़्यादातर दुख इसी कामुक लालसा की देन हैं।
- चार आर्य सत्यों का स्तर: यह हमें समझाता है कि असली समस्या बाहरी सुख-सुविधाओं में नहीं, बल्कि हमारे भीतर बैठी उस ‘आसक्ति’ (लगाव) में है। हम मानते हैं कि यह सुख हमेशा रहेगा, जबकि सच्चाई यह है कि हर सुख नश्वर है।
हम अपनी झूठी धारणाओं (संज्ञाओं) के कारण अनित्य (बदलती हुई) चीज़ों में नित्यता, दुख में सुख, और जो हमारा नहीं है उसमें अपनी मालकियत देखते हैं। जब हम इन कामुक सुखों को त्यागने का प्रयास करते हैं, तो हमारे भीतर छिपी यह आसक्ति सामने आ जाती है और हमसे तर्क-वितर्क करने लगती है। इस तरह, कुशल संन्यास (त्याग) हमारे भीतर की कमियों को सामने लाकर हमें सिखाने का एक साधन बन जाता है।
सम्यक समाधि (सही एकाग्रता) वह हथियार है जो मन को इस आसक्ति से लड़ने की ताकत देती है। जब व्यक्ति सम्यक समाधि में प्रवेश करता है, तो उसे पूरे शरीर में एक गहरे आनंद और शांति का अनुभव होता है। यह सुख किसी बाहरी इंद्रिय-सुख (कामुकता) जैसा नहीं है।
इस तरह, सम्यक समाधि हमें सुख भोगने का एक ऐसा ऊँचा तरीका देती है, जिससे कामुकता छोड़ने पर मन को किसी चीज़ की ‘कमी’ महसूस नहीं होती। यह निचले दर्जे के सुखों (जलेबी) के बदले एक कहीं अधिक स्थायी और शुद्ध सुख (सोना) प्रदान करती है। जब मन इस उच्च सुख का अनुभव कर लेता है और अपनी झूठी धारणाओं के पार विमुक्ति (आज़ादी) की एक झलक देख लेता है, तो कामुक लालसा की जड़ें हमेशा के लिए कट जाती हैं।
दैनिक जीवन में अभ्यास
अब सवाल यह है कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इस ‘कुशल त्याग’ और ‘कुशल भोग’ का अभ्यास कैसे किया जाए?
दीक्षित भिक्षु तो पूरी तरह ब्रह्मचर्य और कामुकता त्यागने का व्रत लेते हैं, लेकिन गृहस्थों (आम लोगों) के लिए यह हमेशा संभव या उचित नहीं होता। इसलिए बुद्ध ने गृहस्थों को महीने में कुछ दिन (पारंपरिक रूप से पूर्णिमा, अमावस्या और अष्टमी के दिन) अस्थायी रूप से यह अभ्यास करने की सलाह दी।
इन दिनों वे ‘अष्टशील’ (आठ नियमों) का पालन करते हैं, जो आम ‘पंचशील’ से थोड़े कड़े होते हैं। इनमें शामिल है:
- पूरी तरह ब्रह्मचर्य का पालन,
- दोपहर 12 बजे के बाद भोजन न करना,
- कोई मनोरंजन (नृत्य-संगीत) न देखना, इत्र या मेकअप का इस्तेमाल न करना,
- ऊँचे या आरामदायक बिस्तर पर न सोना।
इन नियमों का उद्देश्य पांचों इंद्रियों पर थोड़ा संयम लगाना है। फिर, इस दिन का उपयोग धर्म को सुनने, ध्यान करने और अपनी समझ को गहरा करने में किया जाता है। आधुनिक समय में चाँद के हिसाब से छुट्टियाँ निकालना मुश्किल हो सकता है, इसलिए इसे सप्ताहांत (Weekends) या किसी भी छुट्टी के दिन किया जा सकता है।
इस तरह, सामान्य जीवन की भागदौड़ और चिंताओं के बीच, हम थोड़े समय के लिए ही सही, संन्यास के इस कौशल को विकसित कर सकते हैं। यह कौशल उस सच्चे और स्थायी सुख को पाने के लिए बेहद ज़रूरी है।
और ज़रा सोचिए, क्या जलेबी के बदले सोना पाना घाटे का सौदा है?
लेखक: थानिस्सरो भिक्खु

आप एक प्रतिष्ठित थेरवादी भिक्षु और ध्यानसाधना के आचार्य हैं, जिन्हें स्नेहपूर्वक “अजान जेफ़” के नाम से भी जाना जाता है। आप अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया स्थित “मेत्ता अरण्य विहार” (Metta Forest Monastery) में निवास करते हैं, जहाँ आपने गहन ध्यान साधना, धर्म-विनय के अनुशासित पालन, और प्राचीन पाली सूत्रों के अध्ययन व शिक्षण को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाया है।
धर्म और विनय पर आपकी गहरी पकड़ और तर्कसम्मत व्याख्यानों से दुनियाभर के भिक्षु और साधक प्रेरित हुए हैं। आपने सुत्तपिटक और विनयपिटक के अधिकांश सूत्रों का अंग्रेज़ी में सरल व सटीक अनुवाद किया है, जिससे पाली बौद्ध सूत्रों की मौलिकता और गहराई जनसामान्य तक सहज रूप से पहुँच सके। आपके ध्यान और बौद्ध दर्शन पर दिए गए प्रवचन आधुनिक जीवन में भी अत्यंत प्रासंगिक हैं, जिससे असंख्य साधकों को आध्यात्मिक दिशा मिली है।
आपका योगदान धम्मदीप.com से जुड़े सभी भिक्षुओं के आध्यात्मिक विकास में सबसे महत्वपूर्ण रहा है, और आप ही इस मंच के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं। आप की शिक्षाएँ और अनुवाद dhammatalks.org पर अँग्रेजी में निःशुल्क उपलब्ध हैं।
आप के लेखों को हिन्दी में यहाँ पढ़ा जा सकता हैं।
इस लेख को उसकी मूल भाषा अँग्रेजी में पढ़ें: Trading Candy for Gold
