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We Are Not One

हम सब ‘एक’ नहीं हैं

— एकात्मता का भ्रम —

लेखक: थानिस्सरो भिक्खु
| २० मिनट



पच्चीस साल पहले की बात है, मेरे एक गुरु, अजान सुवत ने मैसाचुसेट्स (अमेरिका) में ध्यान का एक शिविर लगाया था, जहाँ मैं उनके उपदेशों का अनुवाद कर रहा था। एक दोपहर बातचीत के दौरान, बौद्ध धर्म में नए-नए आए एक साधक ने चुटकी लेते हुए कहा:

“आप लोगों का यह धर्म बड़ा बढ़िया होता, बस कमी इतनी है कि यहाँ कोई ईश्वर नहीं है। अगर कोई ईश्वर होता, तो जब साधना में उतार-चढ़ाव आते हैं, तो लोगों को एक सहारा महसूस होता।”

अजान सुवत ने मुस्कुराते हुए जो बड़ा ही सीधा और प्यारा जवाब दिया, वह मेरे दिल में हमेशा के लिए दर्ज हो गया:

अगर कोई ऐसा ईश्वर होता जिसके पैर पड़ने से यह हो जाता कि खाना मैं खाऊँ और दुनिया के सारे जीवों का पेट भर जाए, तो मैं सबसे पहले उस ईश्वर के आगे सिर झुकाता। पर मुझे अभी तक ऐसा कोई मिला नहीं है।

ये शब्द मेरे दिल के इतने करीब क्यों रहे, इसके दो बड़े कारण हैं।

पहला कारण यह है कि यह बात एक सर्वशक्तिमान और दयालु ‘सृष्टि-रचयिता’ के वजूद के खिलाफ कितना शानदार और अकाट्य तर्क है। ज़रा देखिए कि यह दुनिया कैसे ज़िंदा रहती है: एक जीव दूसरे जीव को खाकर जीता है। खाने की इस मजबूरी में न केवल उसके लिए दुःख और तड़प छिपी है जो खाया जा रहा है, बल्कि उसके लिए भी एक अनवरत बेचैनी है जो खा रहा है; क्योंकि हम खाने (चरने) की इस भूख से कभी आज़ाद ही नहीं हो पाते। अगर कोई सर्वशक्तिमान और दयालु ईश्वर होता, तो क्या वह जीवन का इससे कोई बेहतर डिज़ाइन नहीं बना सकता था?

दूसरा कारण यह है कि अजान सुवत ने अनजाने में उस विचार की धज्जियाँ उड़ा दीं जिसे अक्सर लोग बुद्ध के नाम मढ़ देते हैं: यानी यह विचार कि “हम सब एक हैं” और हमें इस वैश्विक ‘एकात्मता’ का उत्सव मनाना चाहिए। ज़रा सोचिए, अगर हम सब सचमुच ‘एक’ होते, तो क्या हमारे पेट आपस में जुड़े नहीं होने चाहिए थे—ताकि एक इंसान खाना खाए और तृप्ति सबको मिल जाए?

पर हकीकत तो यह है कि मेरा पेट भरना कई बार किसी दूसरे के मुँह का निवाला छीन लेता है। मेरी भूख को शांत रखने के लिए न जाने कितने जीवों को हाड़-तोड़ मेहनत करनी पड़ती है। कई मामलों में तो एक जीव का पेट तभी भरता है जब दूसरा अपनी जान गंवा देता है। इस संसार में ‘एक होने’ का सीधा सा मतलब दूसरों के साथ पेट साझा करना नहीं है, बल्कि किसी दूसरे के पेट में पचकर उसके खून का हिस्सा बन जाना है। भला यह कौन से उत्सव मनाने की बात है?

बुद्ध और ‘एक’ होने का सच

खुद बुद्ध ने कभी यह नहीं सिखाया कि हम सब ‘एक’ हैं। एक बार एक ब्राह्मण ने उनसे पूछा, “क्या सब कुछ ‘एक’ है? या सब कुछ ‘अनेक’ है?” बुद्ध ने जवाब दिया कि ये दोनों ही बातें दो छोर हैं जिनसे बचना चाहिए। उन्होंने उस ब्राह्मण को यह तो नहीं समझाया कि सब कुछ ‘एक’ मानने से क्यों बचना चाहिए, लेकिन पालि त्रिपिटक के तीन हिस्से इसके पीछे की असली वजह साफ करते हैं:

  • पहला हिस्सा (अंगुत्तरनिकाय १०.२९):

    बुद्ध कहते हैं कि ध्यान की गहराइयों में एक साधक जिस सबसे ऊंची अद्वैत अवस्था को पा सकता है, वह यह है कि उसे अपनी चेतना एक असीम, अखंड ब्रह्मांडीय एकता जैसी महसूस होने लगती है। ऐसा लगता है जैसे पूरी दुनिया उसकी चेतना के साथ ‘एक’ हो गई है। लेकिन उस ऊंचे अनुभव के भीतर भी बदलाव और अनित्यता बनी रहती है।

    यानी, वह अवस्था भी दुखों का अंत नहीं करती। किसी भी दूसरी बनाई हुई अवस्था की तरह, उसे भी मोह-रहित होकर आखिरकार छोड़ना ही पड़ता है।

  • दूसरा हिस्सा (संयुक्तनिकाय ३५.८०):

    बुद्ध साफ कहते हैं कि अज्ञान के परदे को फाड़ने और सच्चे ज्ञान को जगाने के लिए यह देखना ज़रूरी है कि दुनिया की हर चीज़—हमारी सारी इंद्रियाँ और उनके विषय—हमसे ‘अलग’ हैं, वे ‘अनात्म’ हैं। अगर आप हर चीज़ को खुद से ‘एक’ मान लेंगे, तो वह विचार ही आपकी बोधि का रास्ता रोक देगा।

  • तीसरा हिस्सा (मज्झिमनिकाय २२):

    यहाँ बुद्ध उस विचार को महा-मूर्खतापूर्ण बताते हैं जो कहता है कि “मेरी आत्मा ही यह ब्रह्मांड है।” उन्होंने तर्क दिया कि अगर यह ब्रह्मांड ही आपकी असली आत्मा है, तो इस ब्रह्मांड के चलने पर आपका पूरा काबू होना चाहिए। पर सच तो यह है कि पूरे ब्रह्मांड को छोड़िए, आपके अपने आसपास की परिस्थितियों पर आपका कितना काबू है?

    जैसा कि जंगल के एक थाई गुरु, अजान ली ने एक बार मज़ेदार बात कही थी: “ज़रा अपने पड़ोसी के पेड़ को काटकर देखो, फिर पता चलेगा कि आप दोनों कितने ‘एक’ हैं और कितना बवाल होता है।”

इन तीनों बातों को मिला लें तो समझ आता है कि बुद्ध ‘सब कुछ एक है’ की इस धारणा से इसलिए बचना चाहते थे क्योंकि यह दुखों को ख़त्म नहीं करती, यह ज्ञान के रास्ते का रोड़ा बनती है, और यह बात हकीकत की कसौटी पर कहीं खरी नहीं उतरती।

‘इंटर-ईटिंग’ (आपसी पोषण) का जाल

जब उस ब्राह्मण ने पूछा कि इस ‘एक होने’ के भ्रम से कैसे बचा जाए, तो बुद्ध ने उसे पटिच्चसमुप्पाद का सिद्धांत सिखाया—यानी कार्य-कारण का वह नियम जो समझाता है कि दुःख कैसे पैदा होता है।

विडंबना देखिए कि आज के बहुत से बौद्ध सर्किलों में इसी प्रतीत्यसमुत्पाद को इस बात का सबूत मान लिया जाता है कि बुद्ध ‘एकात्मता’ और जीवों के आपसी जुड़ाव की तारीफ कर रहे थे। पर ऐसा सोचने वाले लोग बुद्ध के मूल वचनों को भूल जाते हैं और दो बहुत ज़रूरी बारीकियों को मिला देते हैं।

पहली बारीकी—‘एक होने’ और ‘आपस में जुड़े होने’ का फर्क: सिर्फ इसलिए कि हम एक-दूसरे पर निर्भर हैं और एक ऐसे ताने-बाने में जी रहे हैं जहाँ हर चीज़ एक-दूसरे से जुड़ी है, इसका मतलब यह नहीं कि हम सब ‘एक’ हैं। ‘एक होने’ का मतलब—जिसका उत्सव मनाया जा सके—तभी सच होता जब यह पूरी व्यवस्था अपने हर एक सदस्य के भले के लिए काम कर रही होती।

लेकिन प्रकृति के इस क्रूर चक्रव्यूह में एक जीव सिर्फ इसलिए ज़िंदा है क्योंकि वह दूसरे जीवों का (शारीरिक और मानसिक रूप से) शिकार कर रहा है। यह कहना बड़ी बेरहमी होगी कि प्रकृति हम सबके साझे भले के लिए काम कर रही है।

बुद्ध ने इस कड़वे सच की तरफ इशारा करने के लिए नए शिष्यों से कुछ सीधे सवाल पूछे थे। वे पूछते थे: “एक क्या है? दो क्या है?” और ऐसे ही दस तक जाते थे। ज़्यादातर जवाब तो सीधे थे: जैसे चार का मतलब चार आर्य सत्य, आठ का मतलब आठ का रास्ता। लेकिन अचरज भरा जवाब था ‘एक क्या है’ का—“सब्बे सत्ता आहारट्ठितिका” यानी “सारे सत्व आहार पर टिके हैं।”

यहाँ यह कहने के बजाय कि सारे जीव ‘एक’ हैं, बुद्ध ने उस बात पर उंगली रखी जो हम सबमें साझी तो है, पर जो हमारे ‘एक न होने’ को सबसे ज़्यादा उजागर करती है: यानी हम सबको चरने के लिए खुराक चाहिए—और हम एक-दूसरे को ही खाकर जीते हैं। असल में, कार्य-कारण के इस नियम को समझाने के लिए बुद्ध का सबसे बुनियादी प्रतीक यही ‘खाना’ था।

रिश्तों का सीधा सा मतलब है—एक-दूसरे का शिकार करना। आपस में जुड़े होने का असली मतलब है—“एक-दूसरे को खाना”।

बाद की पीढ़ियों के बौद्धों ने इस डरावनी तस्वीर को बदलकर कुछ सुंदर और मीठे प्रतीक गढ़ लिए; जैसे—‘इंद्रजाल’ (एक ऐसा जाल जिसके हर कोने पर हीरा लगा है और हर हीरा दूसरे सारे हीरों की चमक को बिखेर रहा है), या एक दीया जिसके चारों तरफ आईने लगे हैं और हर आईना रोशनी को परावर्तित कर रहा है। रोशनी का यह जादुई खेल सुनने में बड़ा सुंदर लगता है।

लेकिन ये सुंदर तस्वीरें हकीकत को बयां नहीं करतीं। हमारी ज़िंदगी सिर्फ रोशनी बिखेरने और समेटने का खेल नहीं है। हम सब अलग-अलग जीव हैं और हम सबके पास अपना एक अलग पेट है। हम सब चौबीसों घंटे भूखे हैं और एक-दूसरे का मानसिक या शारीरिक शिकार करके भी हमारा पेट कभी नहीं भरता। यह कोई उत्सव मनाने की बात नहीं है। इसके उलट, बुद्ध कहते हैं कि इस ‘इंटर-ईटिंग’ को देखकर हमारे भीतर एक वैराग्य और मोहभंगिमा (निब्बिदा) जागनी चाहिए, ताकि मन इस चरने की मजबूरी से हमेशा के लिए आज़ाद होने का रास्ता ढूंढ सके।

बाहर का ताना-बाना बनाम भीतर का सच

दूरी बारीकी—बाहरी रिश्तों और अंदरूनी कड़ियों का फर्क: जब लोग प्रतीत्यसमुत्पाद को ‘एकात्मता’ का सबूत बताते हैं, तो वे जीवों के आपसी रिश्तों और एक जीव के अपने मन के भीतर घटने वाली घटनाओं के बीच की लकीर को मिटा देते हैं। अगर आप प्रतीत्यसमुत्पाद की कड़ियों को ध्यान से देखेंगे, तो पाएंगे कि इसका संबंध आपके मन के भीतर चलने वाले खेल से है, बाहर की दुनिया से नहीं।

इसमें कहीं यह नहीं लिखा कि जीव एक-दूसरे पर कैसे निर्भर हैं। इसके बजाय, इसकी हर कड़ी उस अनुभव को बयां करती है जो ठीक इसी पल आपके अपने भीतर घट रहा है—आपके शरीर और मन का वह बिल्कुल निजी अनुभव जिसे आप चाहकर भी किसी दूसरे के साथ बांट नहीं सकते। ये कड़ियाँ हैं: जैसे संस्कार (कसरत) से विज्ञान (होश) का पैदा होना, इंद्रिय-स्पर्श से वेदना (अहसास) का उठना, और तृष्णा (चाहत) से उपादान (पकड़) का बनना।

तो यह जुड़ाव आपके और दूसरों के बीच नहीं है। यह सिर्फ आपके अपने भीतर के अनुभवों का आपस का खेल है। जैसे मैं आपके भीतर उतरकर यह नहीं देख सकता कि जिसे आप ‘नीला’ रंग कह रहे हैं, वह मेरी आँखों को दिखने वाले नीले जैसा ही है या नहीं; वैसे ही मैं आपके भीतर चल रहे प्रतीत्यसमुत्पाद के कचरों को सीधे महसूस नहीं कर सकता। और न ही आप मेरे अनुभवों को छू सकते हैं। यहाँ तक कि जब मुझे पूरी दुनिया के साथ ‘एक’ होने का एक बहुत ऊंचा भ्रम हो रहा हो, तब भी आप—भले ही आप इस दुनिया का हिस्सा हों—यह सीधे महसूस नहीं कर सकते कि वह अहसास मुझे कैसा लग रहा है।

दूसरे शब्दों में, प्रतीत्यसमुत्पाद किसी साझी दुनिया का ज़िक्र नहीं करता, बल्कि यह ठीक उसी हिस्से की बात करता है जो हममें से किसी का भी सांझा नहीं है। यहाँ तक कि जब बुद्ध इसे “दुनिया के पैदा होने का नियम” कहते हैं, तो याद रखिए कि उनकी भाषा में ‘दुनिया’ का मतलब आसमान या ज़मीन नहीं है, बल्कि आपकी छह इंद्रियों से पैदा होने वाली आपकी अपनी निजी दुनिया है।

यहाँ मुख्य संदेश यह है कि दुःख—जो पूरी तरह आपके भीतर का एक निजी अनुभव है—वह आपके ही भीतर उठने वाले कुछ दूसरे अवगुणों के कारण पैदा होता है (जब तक आप उनके साथ नासमझी से पेश आते हैं)। लेकिन इसका इलाज भी आपके भीतर ही छिपा है, अगर आप सही हुनर सीख जाएं।

दुःख का इलाज सिर्फ अंदर से ही हो सकता है। मेरे भीतर का जो अज्ञान है, उसे सिर्फ मैं ही साधना करके दूर कर सकता हूँ। इसीलिए बुद्ध ने कहा कि हर किसी को अपने भीतर खुद जागना होगा—इसके लिए उनका शब्द है ‘पच्चत्तं’ (प्रत्यक्ष अनुभव)। और यही वजह है कि कोई दूसरा इंसान, चाहे वह आपके प्रति कितनी ही गहरी करुणा क्यों न रखता हो, आपको ज़बरदस्ती बोधि नहीं दे सकता। बड़े से बड़ा बुद्ध भी सिर्फ रास्ता दिखा सकता है, इस उम्मीद में कि हम उनकी सलाह सुनेंगे और उस पर अमल करेंगे।

कर्म का नाता

इसका मतलब यह नहीं कि बुद्ध हमारे आपसी रिश्तों को नकार रहे थे; उन्होंने इन रिश्तों को एक दूसरे संदर्भ में समझाया: यानी ‘कर्म’ के सिद्धांत में।

कर्म का सिद्धांत कोई प्रतीत्यसमुत्पाद से अलग नहीं है—बुद्ध ने नीयत (“चेतना”) को ही कर्म माना है, और नीयत इस भीतर की कड़ियों का ही एक हिस्सा है।

लेकिन कर्म के दो पहलू होते हैं। जब आपके मन में कोई नीयत उठती है, तो उसे सिर्फ आप ही महसूस कर सकते हैं—यह कर्म का अंदरूनी पहलू है (प्रतीत्यसमुत्पाद का हिस्सा)। लेकिन जब वही नीयत आपके शब्दों या आपके हाथों से कोई काम करवाती है, तो वह उसका बाहरी पहलू बन जाती है, जो इस पूरी दुनिया में गूँजता है। इसी बाहरी पहलू को देखकर बुद्ध ने कहा था—‘कम्मबन्धु’, यानी हम सब अपने-अपने कर्मों के सगे-संबंधी हैं। मेरा आपके साथ क्या रिश्ता है, यह इस बात से तय होता है कि मैंने आपके साथ क्या किया है और आपने मेरे साथ क्या किया है। हमारा नाता इस बात से नहीं है कि हम पैदाइशी क्या हैं, बल्कि इस बात से है कि हम क्या करना चुनते हैं।

बेशक, लोग एक-दूसरे के साथ जो कुछ भी करते हैं—बहुत गहरे प्यार से लेकर बेहद क्रूरता तक—उसे देखकर कर्मों का यह ताना-बाना बहुत सुरक्षित या सुकून देने वाला नहीं लगता। चूँकि हम सब हमेशा भूखे हैं, इसलिए हमारी चरने की यह भूख कई बार अच्छे रिश्तों की चाहत पर हावी हो जाती है। इसके साथ ही, कर्मों का यह सिद्धांत हर इंसान पर एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी डालता है। यह हमसे मांग करता है कि हम बहुत सावधान रहें, और चाहे जो हो जाए, किसी भी परिस्थिति में पंचशील के नियमों को न तोड़ें ताकि नए बुरे कर्मों का ताना-बाना न बुने।

इसके विपरीत, ‘एकात्मता’ का जो विचार है, वह इंसान पर ऐसी कोई साफ ज़िम्मेदारी नहीं डालता। वह तो बस यह हवा-हवाई बात करता है कि “चूँकि हम सब एक हैं, इसलिए सही-गलत के मामले में तुम्हारी भावनाएँ जो कहें, उन पर भरोसा कर लो; और आखिरकार यह एकात्मता की महान शक्ति हमारी सारी गलतियों को खुद-ब-खुद ठीक कर देगी।”

चूँकि कर्मों का यह रास्ता एक तरफ तो डराता है और दूसरी तरफ बहुत कड़ी मेहनत मांगता है, इसलिए ‘एकात्मता’ का यह सुंदर विचार लोगों को बहुत जल्दी लुभा लेता है—जहाँ लगता है कि कोई परम शक्ति हमारे कर्मों के बावजूद हमारा ख्याल रख लेगी। इसीलिए लोगों को लगता है कि यह एकात्मता वाली सोच ज़्यादा दयालु और करुणा से भरी है, क्योंकि यह दुनिया की एक बड़ी मीठी तस्वीर दिखाती है और नियमों को तोड़ने पर भी आसानी से माफ कर देती है।

असली करुणा क्या है?

लेकिन सच तो यह है कि कर्मों का यह सिद्धांत ही दुनिया की सबसे बड़ी और सच्ची करुणा है—यह उस इंसान के प्रति भी सच्ची दया दिखाता है जिसे यह सिखाया जा रहा है, और यह दूसरों के साथ भी दया से पेश आने की सबसे ठोस वजह देता है।

पहली बात तो यह कि कर्मों का सिद्धांत हमें ‘चुनने की आज़ादी’ देता है, जो एकात्मता कभी नहीं दे सकती। अगर हम सब सचमुच किसी एक ही विराट शरीर के हिस्से होते, तो हममें से कोई यह कैसे तय कर पाता कि उसे क्या काम करना है? यह बिल्कुल वैसा ही होता जैसे पेट अचानक ज़िंद कर बैठे कि आज से वह लीवर का काम करेगा या हड़ताल पर जा रहा है—नतीजा यह होता कि पूरा शरीर ही मर जाता। पेट सिर्फ वही करने के लिए मजबूर है जो एक पेट को करना चाहिए। और तो और, उस विराट शरीर के अंगों के आपसी लेन-देन के कारण, कोई भी अंग अपनी मर्ज़ी से अपनी भूख भी तय नहीं कर सकता। जब पेट में पाचक रस निकलते हैं, तो उसका इशारा भी कहीं और से आता है। यानी वह अपनी मर्जी में भी आज़ाद नहीं है।

बुद्ध की नज़र में, जो भी शिक्षा इंसान के चुनने की आज़ादी को छीनती है, वह खुद अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारती है और दुखों के अंत की संभावना को ख़त्म कर देती है। अगर इंसान अपने कर्म चुनने के लिए, अच्छे गुणों को अपनाने और बुरे को छोड़ने के लिए आज़ाद ही नहीं है, तो फिर उसे धम्म सिखाने का फायदा ही क्या है? वह दुखों को ख़त्म करने के रास्ते पर कदम कैसे बढ़ाएगा? इसके साथ ही, अगर आप लोगों से कहेंगे कि आज वे जो कुछ भी भुगत रहे हैं उसका उनके आज के फैसलों से कोई लेना-देना नहीं है, तो आप उन्हें उनकी अपनी इच्छाओं और दूसरों के शोषण के आगे बिल्कुल लाचार छोड़ देंगे।

लेकिन कर्म का नियम—इसके बारे में फैली इस गलतफहमी के बावजूद कि यह भाग्यवादी है—असल में हमें इसी वर्तमान जीवन में अपना कर्म चुनने की पूरी आज़ादी देता है। इसी आज़ादी के दम पर बुद्ध ने निर्वाण का रास्ता खोजा और दूसरों को भी इसे सिखाना ज़रूरी समझा।

एकात्मता का विचार न केवल रोज़मर्रा के फैसलों की आज़ादी छीनता है, बल्कि यह इस ‘एक-दूसरे को खाने’ के चक्रव्यूह से हमेशा के लिए बाहर निकलने (मुक्ति) के रास्ते को भी बंद कर देता है। इसीलिए एकात्मता सिखाने वाले कुछ संप्रदाय आपको इसी चक्रव्यूह के भीतर मज़े से रहने की तरकीबें सिखाते हैं और यहाँ से बाहर निकलने का ख्याल भी दिमाग से निकाल देने को कहते हैं।

अगर आपकी पहचान ही इस व्यवस्था के एक हिस्से के रूप में तय है, तो आप इसे छोड़कर जा ही नहीं सकते—और आप इस बात का पूरा ख्याल रखेंगे कि कोई दूसरा भी यहाँ से भागने की कोशिश न करे। यह तो बिल्कुल वैसा ही हुआ कि बुढ़ापे, बीमारी और मौत के भारी ट्रैफ़िक से भरी एक सड़क के बीचों-बीच आपको सोना पड़ रहा है, और कुछ तकिए-कंबल और दोस्तों के साथ होने के कारण आपको वह अकेलापन उतना डरावना नहीं लग रहा।

लेकिन बुद्ध ने कभी इस परिभाषा से शुरुआत नहीं की कि ‘इंसान क्या है।’ उन्होंने इस बात की खोज से शुरुआत की कि ‘इंसान क्या कर सकता है।’ और उन्होंने अपनी मेहनत से यह खोज निकाला कि इंसानी पुरुषार्थ—यानी आर्य अष्टांगिक मार्ग—पर चलकर इस चक्रव्यूह के पार उस सच्चे सुख को पाया जा सकता है, जो कर्मों के खेल को ही ख़त्म कर देता है; यानी जहाँ न तो चरने की भूख बचती है और न ही किसी का शिकार बनने का डर।

चूँकि हममें से हर कोई अपने ही कर्मों के कारण इस चक्रव्यूह में फंसा है, इसलिए सिर्फ हम खुद ही समझदारी भरे कर्म करके यहाँ से बाहर निकल सकते हैं। बुद्ध और उनका संघ हमें रास्ता दिखा सकते हैं, पर हुनर तो हमें खुद ही निखारना होगा। अगर वे हमें सड़क के बीचों-बीच सोता हुआ पाएंगे, तो वे हमें वहाँ रहने के बहाने नहीं सिखाएंगे। और न ही वे हमें इस बात के लिए शर्मिंदा करेंगे कि हम इस खतरनाक रास्ते से हटकर एक सुरक्षित और बेदाग सुख पाना चाहते हैं। वे बड़े प्यार से बाहर निकलने का दरवाज़ा दिखाएंगे।

इसलिए लोगों को कर्म का नियम सिखाना एकात्मता के झूठे दिलासे देने से कहीं बड़ी करुणा है।

कर्म और करुणा की ठोस कसौटी

और यही नियम खुद हमारे भीतर भी दूसरों के प्रति एक सच्ची करुणा जगाता है। ऊपर-ऊपर से देखने पर लगता है कि एकात्मता करुणा जगाने का एक अच्छा बहाना है: कि तुम्हें दूसरों के साथ वैसा ही अच्छा बर्भाव करना चाहिए जैसा तुम अपने हाथ-पैरों के साथ करते हो, क्योंकि वे भी तुम ही हो। लेकिन जब आप एकात्मता के गहरे कड़वे सच को समझते हैं—कि यह हकीकत के नियमों को झुठलाती है और चुनने की आज़ादी ही छीन लेती है—तो आप देख पाते हैं कि यह आपको कोई सही रास्ता नहीं दिखा सकती कि कौन सा काम सचमुच करुणा या भलाई का है; और यह तो आपके भीतर दयालु होने की इच्छा को ही मार देती है।

इससे भी बदतर बात यह है कि अगर सब कुछ एक ही विराट शरीर का हिस्सा है, तो इस दुनिया में जो भी पाप या क्रूरता हम देखते हैं, उसका भी उस विराट शरीर में अपना कोई न कोई काम ज़रूर होगा—तो फिर हम उसे गलत कैसे कह सकते हैं? हो सकता है वह उस विराट सत्ता के किसी छिपे हुए मकसद को पूरा कर रही हो! और एक ऐसा सिद्धांत—जो आखिरकार सही-गलत और अच्छे-बुरे की परिभाषा को ही मटियामेट कर दे—वह भला किस आधार पर यह तय करेगा कि कौन सा काम करुणा का है और कौन सा क्रूरता का?

लेकिन कर्म की सीख करुणा को बिल्कुल सटीक और साफ बनाती है। यह हकीकत का एक सच्चा नक्शा दिखाती है; यह आपके फैसले की आज़ादी और आपके इरादों की ताकत पर मुहर लगाती है; और यह बिल्कुल साफ गाइडलाइन देती है कि कौन से काम करुणा के हैं और कौन से नहीं।

इसका सबसे पहला संदेश यह है कि दुनिया का सबसे बड़ा करुणा का काम खुद अपनी मुक्ति के लिए साधना करना है। कुछ विचारकों को चिंता सताती है कि यह सोच दुनिया की कद्र कम कर देती है और लोग पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने लगेंगे; पर याद रखिए, आज तक कोई भी प्रकृति का सीना चीरकर या माइनिंग (Fracking) करके निर्वाण तक नहीं पहुँचा है।

बोधि के रास्ते में दान, सदाचार और ध्यान का हुनर शामिल है, जिसमें सबके प्रति असीम मैत्री और करुणा जगाना पहली शर्त है। आप इस ‘इंटर-ईटिंग’ की व्यवस्था का शोषण करके इससे आज़ाद नहीं हो सकते। सच तो यह है कि आप जितना इसका शोषण करेंगे, यह आपको उतना ही गहरे निगलती जाएगी। खुद को आज़ाद करने के लिए आपको इसके साथ बड़े सलीके से पेश आना होगा, और सलीके का मतलब है कि आप समाधि और विवेक के ज़रिए अपने भीतर ही खुराक का एक ऐसा स्रोत पैदा कर लें कि आपको बाहर चरने की ज़रूरत न पड़े।

जब यह अंदरूनी खुराक पूरी तरह तैयार हो जाती है, तो मन इस पूरी फूड-चेन (खुराक के चक्र) से बाहर निकल जाता है। इस तरह, आप इस खाने की अंधी दौड़ से अपना मुँह हटा लेते हैं, और दूसरों को भी दिखाते हैं कि वे भी ऐसा कर सकते हैं। भला इसमें कौन सी बात है जो करुणा के खिलाफ है?

बेशक, हममें से ज़्यादातर लोगों के लिए इस मुकाम तक पहुँचने में कई जन्म लग सकते हैं—और यह दुनिया के साथ अच्छा बर्ताव करने की एक और बड़ी वजह है। अगर हमें इस सफर में लंबा टिकना है, तो हमें बड़े शिष्टाचार और सलीके से खाना होगा, ताकि जब तक यह सफर चले, हमें अच्छी खुराक मिलती रहे। अगर हम दूसरों के साथ बुरा करेंगे, तो हम एक ऐसी ही बुरी दुनिया में दोबारा जन्म लेंगे जहाँ हमारे साथ भी बुरा होगा। अगर हम दुनिया के साधनों को बर्बाद करेंगे, तो हम एक उजाड़ दुनिया में पैदा होंगे। चूँकि हमें लौटकर इसी दुनिया में आना है जिसे हम छोड़कर जा रहे हैं, इसलिए इसे एक अच्छी शक्ल में छोड़कर जाना ही समझदारी है।

दिल का बोझ हल्का करना

और इस रास्ते पर चलकर जब हम अपने भीतर का कचरा साफ करते हैं, तो यह भी दूसरों के प्रति करुणा का ही एक रूप है। इस दुनिया में सबसे लाचार और दुःखद नज़ारा वह होता है जब आपके सामने आपका कोई अपना गहरे दर्द में तड़प रहा हो और आप उस तक पहुँच ही न पा रहे हों: जैसे कोई छोटा बच्चा जो बिना रुके रोए जा रहा हो, या कोई बीमार इंसान जो अपनी आखिरी घड़ियों में दर्द से बेसुध और बदहवास पड़ा हो। आपका दिल चाहता है कि आप उसके भीतर उतर जाएं और उसके दर्द का एक हिस्सा अपने सिर ले लें ताकि उसकी तकलीफ कम हो सके, पर आप चाहकर भी ऐसा नहीं कर सकते।

उनका वह दर्द ठीक उसी स्तर पर घट रहा होता है जिसे प्रतीत्यसमुत्पाद कहते हैं—होश का वह बिल्कुल निजी और बंद कोना जिसे वे किसी के साथ बांट नहीं सकते, और जहाँ कोई दूसरा बदलाव करने के लिए कदम नहीं रख सकता। यही वजह है कि उनका दर्द देखकर हमें इतनी गहरी चोट पहुँचती है: क्योंकि हम दोनों के बीच की उस असीम खाई के आगे हम खुद को बिल्कुल बेबस पाते हैं। यह इस बात का जीता-जागता सबूत है कि हम सब ‘एक’ नहीं हैं।

एक न एक दिन, हम खुद भी ठीक उसी मोड़ पर खड़े होंगे। अगर हम आज अपने अंदरूनी स्तर की ज़िम्मेदारी खुद उठाना सीख लें—यह सीख लें कि सुख या दुःख आने पर कैसे खुद को टूटने नहीं देना है, और अपनी तृष्णा और धारणाओं के बहकावे में नहीं आना है—तो उस आखिरी वक्त में, मौत से पहले होने वाले दर्दों के बीच भी हम दुखी नहीं होंगे। नतीजा यह होगा कि हमारे कारण हमारे आसपास के लोगों का दिल बेवजह नहीं तड़पेगा। इसका मतलब यह हुआ कि भले ही हम अपने मुँह का खाना उनके पेट में न डाल सकें, पर कम से कम हम उनके दिल पर अपना बोझ तो नहीं डालेंगे।

और जब आप इस हुनर में माहिर हो जाते हैं, तो आप दूसरों को और खुद को दुनिया का सबसे खूबसूरत तोहफा देते हैं।

लेखक: थानिस्सरो भिक्खु

थानिस्सरो भिक्खु

पूज्य गुरुजी थानिस्सरो भिक्खु

आप एक प्रतिष्ठित थेरवादी भिक्षु और ध्यानसाधना के आचार्य हैं, जिन्हें स्नेहपूर्वक “अजान जेफ़” के नाम से भी जाना जाता है। आप अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया स्थित “मेत्ता अरण्य विहार” (Metta Forest Monastery) में निवास करते हैं, जहाँ आपने गहन ध्यान साधना, धर्म-विनय के अनुशासित पालन, और प्राचीन पाली सूत्रों के अध्ययन व शिक्षण को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाया है।

धर्म और विनय पर आपकी गहरी पकड़ और तर्कसम्मत व्याख्यानों से दुनियाभर के भिक्षु और साधक प्रेरित हुए हैं। आपने सुत्तपिटक और विनयपिटक के अधिकांश सूत्रों का अंग्रेज़ी में सरल व सटीक अनुवाद किया है, जिससे पाली बौद्ध सूत्रों की मौलिकता और गहराई जनसामान्य तक सहज रूप से पहुँच सके। आपके ध्यान और बौद्ध दर्शन पर दिए गए प्रवचन आधुनिक जीवन में भी अत्यंत प्रासंगिक हैं, जिससे असंख्य साधकों को आध्यात्मिक दिशा मिली है।

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