✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
हृदय की पवित्रता मुख्य > लेख 3. लेख श्रद्धाऋद्धि

Purity of Heart

हृदय की पवित्रता

— निस्वार्थ सुख की खोज —

लेखक: थानिस्सरो भिक्खु
| ७ मिनट



जब मैं अपने गुरु, अजान फुआंग के पास नया-नया आया था, तो शुरुआती हफ़्तों में ही मुझे यह अहसास होने लगा कि उनके पास कुछ अलौकिक शक्तियां थीं।

वे कभी उनका दिखावा नहीं करते थे, लेकिन मुझे धीरे-धीरे यह भनक लग गई कि वे मेरा मन पढ़ लेते हैं और आगे होने वाली घटनाओं को पहले ही भांप लेते हैं। मेरे भीतर एक उत्सुकता जाग उठी: वे और क्या-क्या जानते हैं? उन्हें यह सब कैसे पता चलता है?

शायद उन्होंने भांप लिया था कि मेरे विचार किस दिशा में भाग रहे हैं, इसलिए एक शाम उन्होंने बड़े प्यार से मुझे टोकते हुए कहा: “देखो भाई, हमारी इस साधना का इकलौता मकसद है—हृदय की पवित्रता। बाकी सब तो बस मन के बहलावे के खेल हैं।”

यह एक छोटा सा जुमला—‘हृदय की पवित्रता’—सिर्फ मेरी उत्सुकता जगाने वाला नहीं था, यह मेरे भीतर बहुत गहराई तक गूँज गया। हालांकि उस समय ईसाई धर्म से मेरा मोहभंग हो चुका था, फिर भी मैं प्रसिद्ध दार्शनिक कीर्केगार्ड की इस बात की बहुत कद्र करता था कि:

हृदय की पवित्रता का मतलब है किसी एक ही चीज़ की चाह रखना।

वह ‘एक चीज़’ क्या होनी चाहिए, इस बात पर तो मैं कीर्केगार्ड से सहमत नहीं था, पर इस बात से पूरी तरह सहमत था कि हृदय की पवित्रता ही ज़िंदगी का सबसे अनमोल खजाना है। और यहाँ अजान फुआंग मुझे वही पवित्रता जगाने का हुनर सिखाने की पेशकश कर रहे थे। यही एक बड़ी वजह थी कि मैं उनके जीवन के आखिरी पलों तक उन्हीं के साथ टिका रहा।

‘इंटर-ईटिंग’ का कड़वा सच

हृदय की पवित्रता की उनकी बुनियादी परिभाषा बड़ी सरल थी: एक ऐसा सुख जिससे कभी किसी का तिनका भर भी नुकसान न हो।

लेकिन ऐसा सुख ढूंढ पाना बहुत मुश्किल है, क्योंकि हमारे इस आम सुख की पहली शर्त ही यह है कि हमें ‘खाना’ पड़ता है। जैसा कि नए भिक्षुओं के लिए बनाए गए पहले बुनियादी सवाल में पूछा जाता है: “एक क्या है? सारे जीव आहार के भरोसे हैं।”

बुद्ध ने युवा शिष्यों को कार्य-कारण का नियम इसी बात से समझाना शुरू किया था: हमारे बीच का यह बुनियादी रिश्ता कोई आईने से परावर्तित होती रोशनी या एक-दूसरे को चमकाते हीरों जैसा कोमल नहीं है। यह रिश्ता है—एक-दूसरे का शिकार करने का, एक-दूसरे को खाने का। हमारे शरीर को ठीक रहने के लिए भौतिक भोजन चाहिए।

हमारे मन को काम करने के लिए इंद्रियों के सुखद स्पर्श, इच्छाओं और खुद चेतना की खुराक चाहिए। अगर आपको कभी इस बात का सबूत चाहिए हो कि ‘आपस में जुड़े होना’ हमेशा कोई उत्सव मनाने की बात नहीं होती, तो बस इस बात पर ठंडे दिमाग से विचार कीजिए कि इस दुनिया के जीव कैसे शारीरिक और मानसिक रूप से एक-दूसरे को खाकर जी रहे हैं। आपस में होने का असली मतलब है—“एक-दूसरे को खाना।”

जैसा कि मेरे दूसरे गुरु, अजान सुवत ने एक बार कहा था, “अगर कोई ऐसा भगवान होता जिसके खाने से दुनिया के सारे जीवों का पेट भर जाता, तो मैं उस भगवान के आगे सिर झुका देता।” पर खाने का नियम ऐसे काम नहीं करता।

आम तौर पर, अच्छे इरादे रखने वाले लोग भी इस खाने की आदत को कोई नुकसानदेह चीज़ नहीं मानते। हम खाने के लिए इतने मजबूर हैं कि हम इसके बड़े और गहरे असर से अपनी आँखें मूँद लेते हैं। इस दुनिया में पैदा होने के खौफ के बाद, जो पहला सुख हमें मिला था, वह पेट भरना ही था। हमने वह काम अपनी आँखें बंद करके किया था, और ज़्यादातर लोग ज़िंदगी भर इस बात से आँखें मूँद कर ही जीते हैं कि उनके जीने की खुराक दूसरों पर क्या असर डाल रही है।

लाचारी

लेकिन जब आप किसी शांत, एकांत जगह पर बैठकर अपनी ज़िंदगी का बारीकी से मुआयना करते हैं, तब आपको समझ आता है कि महज़ इस शरीर और मन का पेट भरे रखना ही अपने आप में कितना बड़ा झंझट है। एक तरफ, आप देख पाते हैं कि अपनी भूख मिटाने के चक्कर में आप दूसरों के लिए कितना दुःख खड़ा कर रहे हैं।

दूसरी तरफ, आपको एक और भी डरावनी बात दिखाई देती है: कि जब आपके शरीर और मन को मनमुताबिक खुराक नहीं मिलती, तो आपके भीतर कैसी-कैसी विकृत भावनाएँ (गुस्सा, जलन, डर) जाग उठती हैं।

आप समझ जाते हैं कि जब तक आपकी शारीरिक या मानसिक खुराक के साधन अनिश्चित हैं, तब तक आप खुद भी अनिश्चित और अविश्वसनीय हैं। आप देख पाते हैं कि क्यों अच्छे-भले लोग भी एक मोड़ पर आकर हत्या, धोखा, व्यभिचार या चोरी जैसे पाप करने के काबिल हो जाते हैं।

एक शरीर के साथ पैदा होने का मतलब ही है—ज़रूरतों का एक बहुत बड़ा गट्ठर लेकर पैदा होना, जो हमारे मन को अपनी उँगलियों पर नचाता है और कभी भी उस पर हावी हो सकता है।

खुशकिस्मती से, हम इंसानों के भीतर यह क्षमता है कि हम अपनी इस खाने की आदत को थोड़ा सभ्य बना सकें। हम खुद को रूप, रंग, आवाज़ जैसे बाहरी ‘जंक फूड’ की लत से छुड़ाकर, अपने भीतर ही एक अच्छी खुराक ढूंढना सीख सकते हैं। जब हम दान, ईमानदारी, करुणा और भरोसे से मिलने वाले असली आनंद की कद्र करना सीख जाते हैं, तो हमें अहसास होता है कि यह सुख दूसरों से चीज़ें छीनकर अपनी झोली भरने के मुकाबले कहीं ज़्यादा तृप्ति देता है।

हम जान जाते हैं कि हमारा सुख दूसरों के सुख से अलग होकर ज़िंदा नहीं रह सकता। तब हम एक-दूसरे को अपनी चीज़ें, अपना समय, अपना प्यार, यहाँ तक कि खुद को भी सौंप सकते हैं और इसे किसी नुकसान की तरह नहीं, बल्कि दोनों पक्षों के फायदे के रूप में देखते हैं।

सच्ची निडरता

लेकिन दिक्कत यह है कि दिल के ये सारे अच्छे गुण भी ‘शर्तों’ पर टिके होते हैं; क्योंकि ये मान्यताओं और भावनाओं के एक बड़े ही नाज़ुक ताने-बाने पर निर्भर करते हैं—जैसे न्याय और इंसान की अच्छाई पर भरोसा होना, आपसी विश्वास और लगाव का होना। जब यह नाज़ुक धागा टूटता है—और इसका टूटना बहुत आसान है—तो वही दिल पल भर में बेहद क्रूर और हिंसक हो सकता है। यह बात हम तलाक़ के मामलों में, टूटते परिवारों में और खुद अपने समाज में रोज़ देखते हैं।

जैसे ही हमारी खुराक की सुरक्षा पर—जो हमारे मानसिक और भौतिक सुख का आधार है—कोई आंच आती है, मन के ये सारे ऊंचे और सुंदर गुण हवा हो जाते हैं। दया और करुणा की बातें करने वाले लोग अचानक बदले की आग में जलने लगते हैं। अहिंसा का दम भरने वाले लोग पल भर में युद्ध की वकालत करने लगते हैं।

और जो लोग समाज को बांटकर राज करना चाहते हैं—जो करुणा, समझदारी और इंसानियत का मज़ाक उड़ाते हैं—उन्हें अपनी इस ‘जंगलराज’ वाली सोच के लिए बड़े आराम से अंधभक्त मिल जाते हैं।

यही वजह है कि सिर्फ किसी मान्यता या भावना पर टिकी हुई करुणा हमारे अच्छे आचरण की गारंटी नहीं दे सकती। और इसीलिए, मन को साधना और एक ऐसी मुक्ति (निर्वाण) को पाना जो किसी भी बाहरी शर्त से आज़ाद हो, कोई स्वार्थ की बात नहीं है। अगर आप करुणा और आपसी विश्वास की कद्र करते हैं, तो आपके लिए यह साधना बेहद ज़रूरी है; क्योंकि सिर्फ एक शर्त-मुक्त सुख ही आपके आचरण की पवित्रता की पक्की गारंटी दे सकता है।

चूँकि यह सुख समय और स्थान के दायरे से बाहर होता है, इसलिए इसमें कभी कोई बदलाव नहीं आ सकता। इसकी खुराक के साधन को कोई चुनौती नहीं दे सकता, क्योंकि इसे ज़िंदा रहने के लिए बाहर से कुछ चरने की ज़रूरत ही नहीं होती। जब आपको इस सुख की एक छोटी सी झलक भी मिल जाती है, तो अच्छाई पर आपका भरोसा ऐसा अडिग हो जाता है जिसे कोई हिला नहीं सकता।

उस मुकाम पर पहुँचकर पूरी दुनिया आप पर आँख मूँदकर भरोसा कर सकती है, और आप खुद भी अपनी नीयत पर पक्का भरोसा कर सकते हैं। फिर आपके भीतर कोई कमी नहीं रह जाती।

हृदय की पवित्रता का सीधा सा मतलब है—बस इस एक सच को जान लेना।

लेखक: थानिस्सरो भिक्खु

थानिस्सरो भिक्खु

पूज्य गुरुजी थानिस्सरो भिक्खु

आप एक प्रतिष्ठित थेरवादी भिक्षु और ध्यानसाधना के आचार्य हैं, जिन्हें स्नेहपूर्वक “अजान जेफ़” के नाम से भी जाना जाता है। आप अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया स्थित “मेत्ता अरण्य विहार” (Metta Forest Monastery) में निवास करते हैं, जहाँ आपने गहन ध्यान साधना, धर्म-विनय के अनुशासित पालन, और प्राचीन पाली सूत्रों के अध्ययन व शिक्षण को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाया है।

धर्म और विनय पर आपकी गहरी पकड़ और तर्कसम्मत व्याख्यानों से दुनियाभर के भिक्षु और साधक प्रेरित हुए हैं। आपने सुत्तपिटक और विनयपिटक के अधिकांश सूत्रों का अंग्रेज़ी में सरल व सटीक अनुवाद किया है, जिससे पाली बौद्ध सूत्रों की मौलिकता और गहराई जनसामान्य तक सहज रूप से पहुँच सके। आपके ध्यान और बौद्ध दर्शन पर दिए गए प्रवचन आधुनिक जीवन में भी अत्यंत प्रासंगिक हैं, जिससे असंख्य साधकों को आध्यात्मिक दिशा मिली है।

आपका योगदान धम्मदीप.com से जुड़े सभी भिक्षुओं के आध्यात्मिक विकास में सबसे महत्वपूर्ण रहा है, और आप ही इस मंच के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं। आप की शिक्षाएँ और अनुवाद dhammatalks.org पर अँग्रेजी में निःशुल्क उपलब्ध हैं।

आप के लेखों को हिन्दी में यहाँ पढ़ा जा सकता हैं।

इस लेख को उसकी मूल भाषा अँग्रेजी में पढ़ें: Purity of Heart