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Pushing the Limits

सीमाओं को धकेलना

— बौद्ध मार्ग में इच्छा और कल्पनाशीलता —

लेखक: थानिस्सरो भिक्खु
| २२ मिनट



बुद्ध ने एक बार कहा था:

सब्बे धम्मा छन्दमूलका!

— अंगुत्तरनिकाय १०:५८

अर्थात, संसार के समस्त धम्म छन्द (चाहत या इच्छा) की जड़ से ही उपजे हैं। हम जो कुछ भी सोचते हैं, बोलते हैं या करते हैं—यहाँ तक कि हमारा हर अनुभव—चाहत या इच्छा से ही उत्पन्न होता है।

हम स्वयं भी इसी छन्द की उपज हैं। इस जीवन में हमारा पुनर्जन्म केवल इसलिए हुआ क्योंकि हमारे भीतर ‘होने’ या ‘बने रहने’ की तीव्र इच्छा (भव-तृष्णा) थी। हम चाहें सजग हों या न हों, हमारी इच्छाएँ ही प्रतिक्षण हमारी अस्मिता और पहचान (मैं/मेरे) को गढ़ती रहती हैं। छन्द ही वह माध्यम है जिसके द्वारा हम समय और स्थान के इस कार्य-कारण के ताने-बाने में अपना जगह निश्चित करते हैं।

इस पूरे ब्रह्मांड में केवल एक ही तत्व ऐसा है जिसकी जड़ें इच्छा में नहीं हैं, और वह है ‘निर्वाण’

चूँकि निर्वाण समस्त सांसारिक प्रपंचों का अंत है, इसलिए वह बुद्ध के ‘सब कुछ’ (“सब्ब”) शब्द की सीमा से भी परे है।

लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है कि निर्वाण का मार्ग भी छन्द में ही निहित है—कुशल इच्छाओं में।

मुक्ति का यह मार्ग असल में कुशल इच्छाओं की अंतिम सीमा को वहाँ तक धकेलता है जहाँ जाकर वे अपनी पराकाष्ठा को छू लें।

‘कुशल छन्द’ (अर्थपूर्ण इच्छा या कल्याणकारी चाहत) का विचार सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन एक परिपक्व मन स्वाभाविक रूप से उन्हीं इच्छाओं का पीछा करता है जिन्हें वह कल्याणकारी समझता है, और उन्हें छोड़ देता है जो अहितकर हैं।

हर मनुष्य के भीतर सबसे बुनियादी इच्छा ‘सुख’ की होती है। अर्थात, शारीरिक और मानसिक सुखद अनुभूति, राहत, सुख-चैन, शांति इत्यादि। संसार की अन्य सभी इच्छाएँ केवल उस सुख को पाने की रणनीतियाँ मात्र हैं। यदि आपको कोई आधुनिक उपकरण चाहिए, कोई जीवनसाथी चाहिए, या मानसिक शांति का कोई अनुभव चाहिए—तो यह केवल इसलिए है क्योंकि आपको लगता है कि इससे आपको ‘सुख’ मिलेगा।

चूँकि ये सहायक इच्छाएँ केवल रणनीतियाँ हैं, इसलिए इनके काम करने का एक निश्चित ढर्रा (पैटर्न) होता है। ये सबसे पहले किसी आंतरिक अभाव या सीमा की अधूरी भावना से जनम लेती हैं; फिर ये आपके नजरिए का उपयोग करके उस अभाव के कारण को ढूंढती हैं; और अंत में ये आपकी ‘सृजनात्मक कल्पनाशीलता’ का प्रयोग करके उस समस्या का एक समाधान तैयार करती हैं।

परंतु, इस साझा ढर्रे के बावजूद सभी इच्छाएँ एक जैसी नहीं होतीं। हर इच्छा जीवन के अभाव को एक अलग चश्मे से देखती है और उसका एक अलग समाधान प्रस्तुत करती है। भोजन की इच्छा शारीरिक भूख के अभाव से पैदा होती है और उसका समाधान स्वादिष्ट व्यंजनों में ढूंढती है। वहीं, किसी पर्वत की चोटी पर चढ़ने की इच्छा एक अलग प्रकार की भूख से पैदा होती है—कीर्ति, रोमांच और आत्म-विजय की भूख—और उसकी तृप्ति का चित्र भी अलग होता है।

इच्छा चाहे जो भी हो, यदि उसका समाधान वास्तव में वास्तविक और स्थायी सुख की ओर ले जाता है, तो वह इच्छा ‘कुशल’ है। यदि वह सुख नहीं देती, तो वह ‘अकुशल’ है।

कई बार ऐसा होता है कि जो इच्छा ऊपर से कुशल दिखाई देती है, वह अंत में केवल एक छलावे या क्षणिक सुख पर जाकर समाप्त होती है, जो उस प्रयास के योग्य बिल्कुल नहीं होता। इसलिए, बुद्धिमत्ता की शुरुआत एक ‘महा-इच्छा’ से होती है: यह सीखने की इच्छा कि हम कुशल और अकुशल इच्छाओं को उनके वास्तविक रूप में पहचान सकें।

अकुशल इच्छाओं का संकट

अकुशल इच्छाएँ मनुष्य के जीवन में कई तरह से दुःख बुनती हैं। कभी-कभी वे असंभव लक्ष्यों पर टिक जाती हैं—जैसे कभी बूढ़ा न होने या कभी न मरने की चाह। कभी-कभी वे ऐसे रास्तों को चुनती हैं जिनमें झूठ, कपट या बेईमानी शामिल हो। या फिर ऐसा भी होता है कि जब आप उस लक्ष्य को पा लेते हैं, तब भी वह आपको सुखी नहीं रख पाता। यहाँ तक कि एवरेस्ट के शिखर पर पहुँचकर भी मनुष्य को निराशा घेर सकती है।

और यदि निराशा न भी हो, तो आप सदा के लिए उस शिखर पर ठहर नहीं सकते। जब आप वहाँ से नीचे आते हैं, तो आपके पास केवल स्मृतियाँ रह जाती हैं, जो समय के साथ धुंधली पड़ने लगती हैं। यदि आपने उस मुकाम तक पहुँचने के लिए दूसरों के साथ बुरा व्यवहार किया था, तो वे कड़वी यादें शिखर की सफलता के सारे आनंद को जलाकर राख कर देती हैं।

इसके अतिरिक्त, इच्छाएँ अक्सर एक-दूसरे के विपरीत दिशाओं में खींचती हैं। उदाहरण के लिए, आपकी शारीरिक भोग की इच्छा आपकी मानसिक शांति की इच्छा के आड़े आ सकती है। वास्तव में, इच्छाओं का यह आपसी द्वंद्व ही हमें यह सिखाता है कि इच्छाएँ कितनी कष्टप्रद हो सकती हैं। इसी संघर्ष ने हर इच्छा को अपनी वकालत करना, फुसलाना, कुतर्क करना और ज़बरदस्ती मन की सत्ता पर कब्ज़ा करना सिखाया है।

कोई इच्छा केवल इसलिए कि वह ‘कुशल’ है, अकुशल इच्छाओं से अधिक चतुर नहीं हो जाती। अकुशल इच्छाएँ अक्सर सबसे अधिक हठी, सबसे अधिक मुखर और अपना काम निकालने में सबसे अधिक माहिर होती हैं। इसका अर्थ यह है कि प्रज्ञा को भी अपनी रणनीति सीखनी होगी; उसे कुशल इच्छाओं को इतना सुदृढ़ करना होगा कि अकुशल इच्छाएँ उनकी बात सुनने पर विवश हो जाएँ।

इस प्रकार इच्छाओं को प्रशिक्षित किया जा सकता है ताकि वे सब मिलकर एक बड़े सुख की ओर बढ़ सकें। एक स्वस्थ और परिपक्व मन इसी ढर्रे पर काम करता है: वहाँ संवाद ‘तर्क और इच्छा’ के बीच नहीं, बल्कि ‘ज़िम्मेदार इच्छाओं और ग़ैर-ज़िम्मेदार इच्छाओं’ के बीच होता है।

परंतु, एक परिपक्व मन में भी यह आंतरिक संवाद अक्सर ऐसे समझौतों पर जाकर रुक जाता है जो समस्या को जड़ से नहीं सुलझाते—जैसे इंद्रिय सुख के कुछ झोंके, आध्यात्मिक शांति की कुछ झलकियाँ, परंतु कुछ भी ऐसा नहीं जो पूर्ण और स्थायी रूप से तृप्त कर सके। कुछ लोग इन समझौतों से तंग आकर विवेकपूर्ण इच्छाओं से अपना मुँह मोड़ लेते हैं और तात्कालिक सुख की मांगों के आगे आत्मसमर्पण कर देते हैं—जितना हो सके वासना, सत्ता और धन बटोरने की अंधी दौड़ में शामिल हो जाते हैं। परंतु, जब सुख का यह उन्माद थमता है, तो जो तबाही पीछे छूट जाती है, उसे ठीक करने में कई जन्म लग जाते हैं।

दूसरी ओर, कुछ लोग इच्छाओं के बीच इस समझौते को ही अपनी नियति मानकर स्वीकार कर लेते हैं; वे जिसे ‘असंभव’ समझते हैं, उसे पाने की चाह छोड़ देने में ही अपनी भलाई मानते हैं। परंतु यह शांति भी अंदरूनी तौर पर बहरे हो जाने जैसी है, जो इच्छाओं के उस बुनियादी सच को नकार देती है कि—क्षमताओं और सीमाओं से बंधी हुई यह अधूरी ज़िंदगी वास्तव में असहनीय है।

ये दोनों ही प्रकार के लोग एक झूठी मान्यता के शिकार हैं कि सच्चा, असीम और अनंत सुख मानवीय पहुँच से परे है। उनकी कल्पनाशीलता इतनी संकुचित हो चुकी है कि वे इस जीवन में किसी पूर्ण और असीम सुख की कल्पना तक नहीं कर पाते।

बुद्ध की महानता इसी बात में थी कि उन्होंने कभी अपने लक्ष्यों को छोटा नहीं किया। उन्होंने एक ऐसे ‘परम सुख’ की कल्पना की जो सीमाओं और अभावों से इतना मुक्त हो कि उसके बाद किसी और इच्छा की आवश्यकता ही न बचे—और फिर उन्होंने उस परम सुख को पाने की चाह को अपने जीवन की सर्वोच्च प्राथमिकता बना लिया। अपनी अन्य सभी इच्छाओं को इस परम लक्ष्य के साथ संवाद में लाकर, उन्होंने तब तक अनेक रणनीतियों के प्रयोग किए जब तक कि उन्होंने उस असीम लक्ष्य को पा नहीं लिया।

यही रणनीति उनकी सबसे बुनियादी शिक्षा बनी, जिसे हम ‘चार आर्य सत्य’ के नाम से जानते हैं।

छन्द का मनोविज्ञान

हममें से अधिकांश लोग जब ‘चार आर्य सत्यों’ को देखते हैं, तो यह समझ ही नहीं पाते कि ये पूरी तरह से इच्छा के मनोविज्ञान पर आधारित हैं। हमें अक्सर यह सिखाया जाता है कि बुद्ध ने इच्छा या चाहत को केवल एक ही भूमिका दी है—दुःख के कारण के रूप में। चूँकि वे दुःख के कारण को छोड़ देने की बात करते हैं, इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि वे इच्छा और उसके रचनात्मक साथियों—जैसे सृजनात्मकता, कल्पनाशीलता और आशा—की सकारात्मक भूमिका को सिरे से नकार रहे हैं। परंतु यह अधूरी दृष्टि दो अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दों को छोड़ देती है:

  1. पहला मुद्दा:

    चारों आर्य सत्य इच्छा की अपनी बुनियादी गतिशीलता के अनुकूल ही बात करते हैं—अभाव का बोध, समाधान की कल्पना, और उसे पाने की रणनीति।

    • पहला आर्य सत्य हमें हमारे जीवन के मूल अभाव और सीमा से परिचित कराता है—अर्थात वह आसक्ति (उपादान) जो स्वयं दुःख है।
    • दूसरा आर्य सत्य उन इच्छाओं की ओर संकेत करता है जो इस आसक्ति को जन्म देती हैं—काम-तृष्णा, भव-तृष्णा और विभव-तृष्णा।
    • तीसरा आर्य सत्य हमारी कल्पनाशीलता का विस्तार करता है ताकि हम इस संभावना को देख सकें कि आसक्ति का पूरी तरह उन्मूलन संभव है।
    • चौथा आर्य सत्य (दुःख-मुक्ति का मार्ग) हमें वह अचूक रणनीति सिखाता है जिससे हम दुःख के कारण को छोड़कर आसक्ति पर विजय पा सकें।
  2. दूसरा मुद्दा:

    आर्य सत्य इच्छा को दो अलग-अलग भूमिकाएँ देते हैं, इस आधार पर कि वह इच्छा कुशल है या अकुशल। अकुशल इच्छा दुःख का कारण है; जबकि कुशल इच्छा दुःख के निरोध का मार्ग है।

    कुशल इच्छा अकुशल इच्छा का दमन नहीं करती, बल्कि वह मन में संतुष्टि और आत्मिक कल्याण के इतने ऊंचे स्तर निर्मित कर देती है कि अकुशल इच्छाओं के खड़े होने के लिए कोई भूमि ही शेष नहीं बचती। मार्ग के अंगों में ‘सम्यक व्यायाम’ के अंतर्गत कुशल इच्छा की यह रणनीति पूरी तरह स्पष्ट की गई है:

सम्यक प्रयास क्या है?

  • जो पापी अकुशल स्वभाव अभी प्रकट न हुआ हो—वह आगे भी प्रकट न हो, उसके लिए चाह पैदा करना, मेहनत करना, ज़ोर लगाना, इरादा बनाकर जुटना ।
  • जो पापी अकुशल स्वभाव प्रकट हुआ हो—उसे त्यागने के लिए चाह पैदा करना, मेहनत करना, ज़ोर लगाना, इरादा बनाकर जुटना ।
  • जो कुशल स्वभाव अभी प्रकट न हुआ हो—उसे प्रकट करने के लिए चाह पैदा करना, मेहनत करना, ज़ोर लगाना, इरादा बनाकर जुटना ।
  • जो कुशल स्वभाव प्रकट हुआ हो—उसे बनाएँ रखने और बढ़ाने के लिए, उसमें वृद्धि और प्रचुरता लाने के लिए, उन्हें विकसित कर परिपूर्ण करने के लिए चाह पैदा करना, मेहनत करना, ज़ोर लगाना, इरादा बनाकर जुटना ।

इस सूत्र से स्पष्ट है कि अकुशल विचारों को हटाकर कुशल गुणों को स्थापित करने के लिए तीन कड़ियाँ अनिवार्य हैं: चाह (छन्द), मेहनत, ज़ोर (वीर्य), इरादा (चित्त)। इच्छा सम्यक व्यायाम को शुरुआती गति और दिशा देती है, जबकि निरंतरता उसे टिके रहने की शक्ति प्रदान करती है।

इसमें ‘इरादा’ सबसे सूक्ष्म कारक है। इसके लिए मूल सूत्रों में ‘चित्त’ शब्द आया है, जिसका अर्थ है अपना ‘पूरा मन’ उस साधना में झोंक देना—आपकी संवेदनशीलता, बुद्धि, प्रज्ञा और कुशलता की पूरी शक्ति। आप नहीं चाहेंगे कि इस मार्ग पर आपका मन विभाजित रहे; आप चाहेंगे कि उसकी आंतरिक शक्तियाँ एक होकर एक ही दिशा में काम करें।

साधना के चार चरण

ये तीनों गुण—इच्छा, वीर्य और चित्त का संकल्प—किसी भी हुनर या शिल्प को सीखने का आधार हैं। इसलिए, इस मार्ग पर चलते समय यह स्मरण करना उपयोगी है कि अतीत में आपने किसी हुनर को सीखने के लिए इन गुणों का उपयोग कैसे किया था। बुद्ध ने अपने उपदेशों में साधक की तुलना एक कुशल शिल्पकार—जैसे एक संगीतकार, बढ़ई, शल्य-चिकित्सक, नट या रसोइये—से करते हुए अनेक दृष्टांत दिए हैं। किसी भी हुनर की तरह, इस साधना-मार्ग को विकसित करने के कई चरण हैं, जिनमें से चार मुख्य हैं:

१. आंतरिक कुतर्कों का खंडन

पहला चरण है अपनी बुद्धिमानी का उपयोग करके मन के भीतर उठने वाली उन आवाज़ों के शोर को शांत करना जो आपको शुरुआत में ही प्रयास करने से रोकती हैं। ये आवाज़ें उन चालाक वकीलों की तरह हैं जो आपके भीतर छिपी अकुशल इच्छाओं के स्वार्थों की पैरवी कर रहे होते हैं।

आपको उनके कुतर्कों का उत्तर देने के लिए अत्यंत सजग रहना होगा, क्योंकि वे हर दिशा से आ सकती हैं और ऊपर से बड़ी ईमानदार और ज्ञान से भरी लगती हैं, भले ही वे वैसी न हों। यहाँ कुछ आम कुतर्क और उनके अचूक उत्तर दिए गए हैं:


  • कुतर्क: “अपनी इच्छाओं को इस तरह वश में करना अप्राकृतिक/अस्वाभाविक (सृष्टि के विपरीत) है।”
  • उत्तर: वास्तव में, आप पहले से ही हर समय अपनी इच्छाओं को नियंत्रित कर रहे होते हैं जब आप किसी एक इच्छा को चुनकर दूसरी को छोड़ देते हैं। तो फिर इसे कुशलता से करना क्यों न सीखा जाए? और वैसे भी, इस संसार में बहुत से लोग (जैसे विज्ञापन कंपनियाँ) आपकी इच्छाओं को अपने लाभ के लिए नियंत्रित करने के लिए घात लगाए बैठे हैं; तो बेहतर है कि यह कमान आप किसी अधिक विश्वसनीय हाथ में सौंप दें—अर्थात अपने स्वयं के हाथों में।

  • कुतर्क: “अपनी इच्छाओं को बदलने का प्रयास आपके अपने आत्म पर हमला है।”
  • उत्तर: यह तर्क तभी तक काम करता है जब तक आप अपने ‘मैं’ (आत्म) को—जो कि असल में इच्छाओं का एक थैला मात्र है—उससे अधिक ठोस मानते हैं जितना वह वास्तव में है। आप इस तर्क को उलट कर कह सकते हैं कि चूँकि आपका ‘मैं’ सुख पाने की रणनीतियों का एक निरंतर बदलता हुआ क्रम मात्र है, तो क्यों न इसे एक ऐसी दिशा में बदला जाए जहाँ वास्तविक और स्थायी सुख मिलने की संभावना सबसे अधिक हो।

  • कुतर्क: “इच्छाओं को ‘कुशल’ और ‘अकुशल’ में बांटना द्वैतवादी और संकीर्ण नज़रिया है।”
  • उत्तर: आप कभी नहीं चाहेंगे कि कोई ऐसा मैकेनिक आपकी कार ठीक करे जो कुशल और अकुशल कलपुर्जों में भेद न कर पाए, न ही ऐसा सर्जन चाहेंगे जो मस्तिष्क के अच्छे और खराब हिस्से में अंतर न समझता हो। जब आप अपनी कार और शरीर के लिए इतनी सूक्ष्म समझ की मांग करते हैं, तो जो व्यक्ति आपके वास्तविक सुख के लिए सबसे अधिक उत्तरदायी है—अर्थात आप स्वयं—उसके भीतर इस विवेक की मांग क्यों न की जाए?

  • कुतर्क: “यह मार्ग बहुत अधिक भविष्य और लक्ष्य-केंद्रित है। वर्तमान में जो जैसा है, उसे बस वैसे ही स्वीकार कर लो।”
  • उत्तर: हर इच्छा आपसे यही कहती है कि वर्तमान क्षण में कुछ कमी है। या तो आप उस इच्छा को स्वीकार कर लें या उस कमी को। दोनों को एक साथ स्वीकार करने का अर्थ है दोनों के सच को नकार देना। इन दोनों के बीच के तनाव में शांति से बैठने का प्रयास करना—यह सोचना कि “मुझे किसी भी चीज़ की चाह नहीं है”—इसे बुद्ध ने एक ‘सीमित उपेक्षा’ कहा था, जिसे थाईलैंड के एक अरण्य भिक्षु (अजान चाह) ने ‘भैंस की उपेक्षा’ की संज्ञा दी थी।

  • कुतर्क: “अकुशल इच्छाओं से लड़ना बहुत थका देने वाला काम है।”

  • उत्तर: इसके दूसरे विकल्प पर विचार कीजिए: एक सीमा से दूसरी सीमा के बीच जीवन भर अंतहीन भटकना, सुख की खोज में भागना और उसे सदा हाथ से फिसलते हुए देखना। सम्यक व्यायाम कम से कम आपको खड़े होने के लिए एक स्थिर स्थान तो देता है। यह इस मानसिक अराजकता में एक और भारी इच्छा को जोड़ना नहीं है, बल्कि उस पूरे कबाड़ को सलीके से छाँटने का मार्ग है।

    बुद्ध का यह मार्ग एक असीम सुख की आशा जगाता है, जिसके साथ-साथ मार्ग में भी कदम-कदम पर अधिक परिष्कृत और विश्वसनीय सुख के स्तर मिलते जाते हैं। संक्षेप में, बुद्ध का विकल्प ही वास्तव में अधिक आनंददायक है और इसमें श्रम भी कम है।

२. भूल से सीखना

जब आप इन भटकाने वाली आवाज़ों को शांत कर लेते हैं, तो अगला चरण है अपने कर्मों और उनके परिणामों का उत्तरदायित्व स्वयं लेना। इसके लिए अपनी भूलों से सीखने की तत्परता अनिवार्य है।

कुछ वर्ष पूर्व, एक समाजशास्त्री ने न्यूरोसर्जरी की पढ़ाई करने वाले छात्रों पर एक शोध किया कि कौन से गुण सफल होने वाले छात्रों को असफल होने वालों से अलग करते हैं। उसने पाया कि उसके साक्षात्कारों के दो प्रश्नों ने इस मुख्य अंतर को स्पष्ट कर दिया। वह छात्रों से पूछता था, “क्या आपसे कभी कोई भूल होती है? यदि हाँ, तो आपके जीवन की सबसे बड़ी भूल क्या थी?”

जो छात्र अनुत्तीर्ण हो रहे थे, उनका उत्तर होता था कि उनसे भूलें बहुत कम होती हैं, या वे अपनी भूलों का दोष बाहरी परिस्थितियों पर मढ़ देते थे। इसके विपरीत, जो छात्र सफल हो रहे थे, वे न केवल अपनी अनेक भूलों को सहर्ष स्वीकार करते थे, बल्कि स्वयं यह भी बताते थे कि वे भविष्य में उन भूलों को न दोहराने के लिए क्या उपाय कर रहे हैं।

बुद्ध ने इसी परिपक्व दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के लिए अपने सात वर्षीय पुत्र राहुल को अपनी पहली शिक्षा में यही समझाया था। उन्होंने राहुल से कहा कि कोई भी कर्म करने से पहले अपनी नीयत या इरादा (“चेतना”) को देखो, और कर्म करते समय तथा कर्म पूरा हो जाने के बाद उसके परिणामों को निहारो। यदि राहुल ने देखा कि उसकी नीयत से स्वयं को या दूसरों को कोई हानि पहुँच सकती है, तो उसे वह कर्म नहीं करना चाहिए।

यदि कर्म करते हुए या करने के बाद यह दिखे कि उसके विचारों, शब्दों या कर्मों से किसी को कष्ट पहुँचा है, तो उसे तुरंत वहीं रुक जाना चाहिए, अपनी भूल स्वीकार करनी चाहिए और भविष्य में उसे न दोहराने का पक्का संकल्प लेना चाहिए—बिना किसी आत्म-ग्लानि या हीनभावना के। दूसरी ओर, यदि उसे अपने कर्मों से कोई हानिकारक परिणाम न दिखे, तो उसे मार्ग पर अपनी इस प्रगति का आनंद लेना चाहिए और उस आनंद को अपनी साधना का ईंधन बनाना चाहिए।

यद्यपि बुद्ध ने यह उपदेश एक सात वर्ष के बालक को दिया था, परंतु इसमें छिपा ढर्रा साधना के हर ऊंचे स्तर को संचालित करता है। बुद्धत्व का पूरा मार्ग इसी एक इच्छा पर टिके रहने से विकसित होता है कि—मुझे सदा सबसे कुशल कार्य ही करना है। जैसे-जैसे आपकी समझ सूक्ष्म होती जाती है, ‘कुशल’ की आपकी परिभाषा भी परिष्कृत होती जाती है।

यदि आपसे कोई अकुशल कार्य हो भी जाए, तो उसके परिणामों का उत्तरदायित्व लें और अपनी उस इच्छा को शिक्षित करें कि वह कहाँ चूक गई थी। इच्छाएँ भले ही कितनी भी हठी क्यों न हों, उनका मूल लक्ष्य एक ही होता है—सुख। और यही साझा भूमि एक प्रभावी आंतरिक संवाद का आधार बन सकती है: यदि कोई इच्छा वास्तव में सुख उत्पन्न नहीं कर पा रही है, तो वह अपने ही अस्तित्व के मूल उद्देश्य के विपरीत जा रही है।

इस सत्य को समझने का सबसे उत्तम उपाय यह है कि आप अपनी इच्छा से लेकर उसके द्वारा किए गए कर्म तक, और उस कर्म से लेकर उसके परिणाम तक की पूरी कड़ी को लगातार देखते रहें। यदि आपकी किसी इच्छा ने ऐसा सुख चाहा जिससे दूसरों को दुःख पहुँचा, तो ध्यान से देखें कि कैसे उन दूसरों की सुख की इच्छा आपके चाहे गए सुख को नष्ट कर देती है।

यदि आपकी इच्छा किसी ऐसी चीज़ पर टिकी थी जो बूढ़ी हो सकती है, बीमार हो सकती है, नष्ट हो सकती है या आपको छोड़कर जा सकती है, तो इस अकाट्य सत्य को देखें कि आप स्वयं अपने पतन की नींव रख रहे हैं। फिर यह भी देखें कि इस प्रकार की इच्छाओं से उत्पन्न होने वाला कष्ट सार्वभौमिक है। यह केवल आपके साथ नहीं है। जिसने भी, जब भी इस इच्छा के वश में होकर कार्य किया है, वह अतीत में भी दुखी था, वर्तमान में भी दुखी है, और भविष्य में भी दुखी रहेगा। इससे बचने का कोई मार्ग नहीं है।

इस प्रकार का चिंतन मन में उठने वाली इस हीनभावना को कम करता है कि “मेरे साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है?"—जो हमारे दुखों को और बढ़ा देती है और हमें उसी आत्मघाती इच्छा से और कसकर चिपका देती है। यह चिंतन दो महत्वपूर्ण दृष्टिकोणों को जन्म देता है जो कुशल इच्छाओं को बल देते हैं:

  1. संसार में दुखों की इस निरंतरता को देखकर पैदा होने वाला एक गहरा वैराग्य भाव ( संवेग ),
  2. भविष्य में उस इच्छा के छलावे में दोबारा न आने की अप्रमाद (लापरवाह न होना) की भावना।

३. निरंतरता, सजगता और साधना का आनंद

अकुशल इच्छाएँ तब तक पूरी तरह से पीछे नहीं हटतीं, जब तक आप मन को यह न दिखा दें कि अन्य कुशल इच्छाएँ वास्तव में इससे कहीं अधिक ऊंचे स्तर का सुख दे सकती हैं। यही कारण है कि बुद्ध सदाचार, दानशीलता और सेवा से युक्त जीवन के पुरस्कारों पर इतना बल देते हैं—दूसरों के सुख को बढ़ावा देने में मिलने वाला अलौकिक आनंद, और कठिन परिस्थितियों में भी सही मार्ग चुनने से मिलने वाला आत्म-सम्मान।

यही वजह है कि उनका यह मार्ग समाधि के उस परम आनंद और शांति (आनंद-रस) पर केंद्रित है। जब आप अपनी साधना में इस आंतरिक रस का अनुभव करते हैं, तो आपको इस बात का साक्षात और प्रत्यक्ष प्रमाण मिल जाता है कि बुद्ध कोई वैरागी या जीवन के सुखों को छीनने वाले व्यक्ति नहीं थे। उनकी सुझाई गई इच्छाएँ वास्तव में एक ऐसा सुख उत्पन्न करती हैं जो आपको इस मार्ग पर बने रहने की आत्मिक शक्ति देता है।

यही अगला चरण है: हर परिस्थिति में अत्यंत धैर्य और निरंतरता के साथ कुशल कार्य करने की इच्छा पर टिके रहना। यह केवल कोरे परिश्रम का मामला नहीं है। जैसा कि खेल जगत का कोई भी अच्छा कोच आपको बता देगा कि केवल घंटों अभ्यास करने से परिणाम की गारंटी नहीं मिलती। आपको अपनी निरंतरता के साथ ‘चित्त के संकल्प’—अर्थात संवेदनशीलता, सूक्ष्म समझ और रचनात्मकता को जोड़ना होगा।

लगातार इस बात पर नज़र रखें कि साधना को और अधिक प्रभावी कैसे बनाया जाए। अपने कर्मों के ढर्रे को समझने का प्रयास करें। इसके साथ ही, अपनी साधना में थोड़ा उत्साह, विविधता और नवीनता का समावेश करें ताकि प्रगति के ठहराव आपको उबाऊ न लगें, और साधना के उतार-चढ़ाव आपके मनोबल को न गिरा सकें।

बुद्ध अपनी ध्यान-साधना के उपदेशों में भी इसी बात पर बल देते हैं। एक बार जब आप समाधि की किसी अवस्था में महारत हासिल कर लेते हैं, तो सूक्ष्मता से देखें कि उसमें अभी भी तनाव या दुःख का कौन सा महीन अंश छिपा हुआ है। फिर उस तनाव के ढर्रे को खोजें: आप ऐसा क्या कर रहे हैं जिससे यह खिंचाव पैदा हो रहा है?

जब मन उदास हो, तो उसे प्रफुल्लित करने के उपाय खोजें; जब वह बंधनों में जकड़ा हो, तो उसे मुक्त करें; और जब वह चंचल हो, तो उसे स्थिर करें। इस प्रकार, जैसे-जैसे आप ध्यान की इन चुनौतियों का आनंद लेना सीखते हैं, आप मन में छिपे कार्य-कारण के अत्यंत सूक्ष्म नियमों से भी भली-भाँति परिचित होते जाते हैं।

४. अंतिम सीमाओं को पार करना

चौथा चरण है—एक बार जब आप उन नियमों के ढर्रे को समझ लेते हैं, तो उनकी अंतिम सीमाओं को चुनौती देना। पुनः, यह केवल बल बढ़ाने का काम नहीं है। यह आपकी कल्पनाशीलता को दोबारा जाग्रत करके कार्य-कारण के अनछुए मोड़ों की खोज करने जैसा है।

एक प्रसिद्ध संगीतकार ने एक बार कहा था कि उसके जीवन का सबसे अद्भुत और रोमांचक कार्यक्रम वह था जिसमें प्रस्तुति के दौरान उसके वाद्य यंत्र का एक तार टूट गया था, और उसने हार मानने के बजाय शेष बचे हुए तारों पर ही तुरंत नई उंगलियाँ बिठाकर उस धुन को सफलता पूर्वक पूरा किया।

ध्यान-साधना में सबसे प्रत्यक्ष ‘तार’ वे तकनीकें हैं जो मन को स्थिर और जाग्रत करने के लिए अपनाई जाती हैं; परंतु इससे भी अधिक रोचक ‘तार’ वे बुनियादी मान्यताएँ हैं जिन पर इस पूरी कुशलता की खोज टिकी हुई थी—जैसे अभाव का बोध, रणनीति, आंतरिक संवाद, और स्वयं के होने का भाव (‘मैं’)। क्या आप इन मान्यताओं के बिना भी जीना सीख सकते हैं?

साधना में एक ऐसा मोड़ आता है जहाँ इससे अधिक सुख पाने का एकमात्र मार्ग यही बचता है कि आप इन बुनियादी मान्यताओं पर ही प्रश्नचिह्न लगा दें। और यहीं से कुछ अत्यंत विस्मयकारी विरोधाभास जनम लेते हैं: यदि इच्छा का जनम हमेशा किसी अभाव या सीमा से होता है, तो उस इच्छा का क्या होगा जब वह एक ऐसा परम सुख उत्पन्न कर दे जिसमें कोई अभाव या सीमा बची ही न हो?

बिना किसी इच्छा की आवश्यकता के जीना कैसा होता है? तब आपके मन के आंतरिक संवाद और आपके ‘मैं’ के भाव का क्या होगा? और यदि इच्छा ही वह माध्यम थी जिससे आप समय और स्थान में अपनी जगह निश्चित करते थे, तो उस इच्छा की पूर्ण अनुपस्थिति में देश और काल का क्या स्वरूप रह जाएगा?

बुद्ध ने इन प्रश्नों को यह कहकर और गहरा कर दिया कि एक पूर्ण जाग्रत व्यक्ति (बुद्ध) इतना असीम और परिभाषाओं से परे हो जाता है कि उसे इस जीवन में किसी सीमा में बांधकर नहीं देखा जा सकता, और न ही इस जीवन के बाद उसके होने, न होने, दोनों या दोनों ही न होने जैसी श्रेणियों में उसे वर्णित किया जा सकता है। यह सुनने में कोई अमूर्त और अप्राप्य लक्ष्य लग सकता है, लेकिन बुद्ध ने स्वयं अपने जीवन से इसका एक अत्यंत मानवीय और सजीव उदाहरण प्रस्तुत किया।

कार्य-कारण की सीमाओं को पार कर जाने के बाद भी, वे इसी जीवन में उन नियमों के बीच अत्यंत कुशलता से कार्य करते रहे—कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सदा प्रसन्न रहे, और परम करुणा के साथ हर वर्ग के मनुष्यों को मार्ग दिखाते रहे। और उनका यह साक्ष्य भी मौजूद है कि न केवल भिक्षु और भिक्षुणियाँ, बल्कि गृहस्थ लोग—यहाँ तक कि बालक भी—अपनी कुशल इच्छाओं को इस सीमा तक परिष्कृत कर चुके थे जहाँ उन्होंने भी इस पूर्ण जागृति का स्वाद चख लिया था।

इसलिए, उस परम सुख की कल्पना कीजिए। और अपने भीतर उठने वाली उस हर इच्छा की पुकार को ध्यान से सुनिए जो आपको उस दिशा में ले जाना चाहती है, क्योंकि वही वास्तविक और असीम सुख का आपका एकमात्र प्रामाणिक मार्ग है।

लेखक: थानिस्सरो भिक्खु

थानिस्सरो भिक्खु

पूज्य गुरुजी थानिस्सरो भिक्खु

आप एक प्रतिष्ठित थेरवादी भिक्षु और ध्यानसाधना के आचार्य हैं, जिन्हें स्नेहपूर्वक “अजान जेफ़” के नाम से भी जाना जाता है। आप अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया स्थित “मेत्ता अरण्य विहार” (Metta Forest Monastery) में निवास करते हैं, जहाँ आपने गहन ध्यान साधना, धर्म-विनय के अनुशासित पालन, और प्राचीन पाली सूत्रों के अध्ययन व शिक्षण को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाया है।

धर्म और विनय पर आपकी गहरी पकड़ और तर्कसम्मत व्याख्यानों से दुनियाभर के भिक्षु और साधक प्रेरित हुए हैं। आपने सुत्तपिटक और विनयपिटक के अधिकांश सूत्रों का अंग्रेज़ी में सरल व सटीक अनुवाद किया है, जिससे पाली बौद्ध सूत्रों की मौलिकता और गहराई जनसामान्य तक सहज रूप से पहुँच सके। आपके ध्यान और बौद्ध दर्शन पर दिए गए प्रवचन आधुनिक जीवन में भी अत्यंत प्रासंगिक हैं, जिससे असंख्य साधकों को आध्यात्मिक दिशा मिली है।

आपका योगदान धम्मदीप.com से जुड़े सभी भिक्षुओं के आध्यात्मिक विकास में सबसे महत्वपूर्ण रहा है, और आप ही इस मंच के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं। आप की शिक्षाएँ और अनुवाद dhammatalks.org पर अँग्रेजी में निःशुल्क उपलब्ध हैं।

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इस लेख को उसकी मूल भाषा अँग्रेजी में पढ़ें: Pushing the Limits