✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
हुनर के सवाल मुख्य > लेख 3. लेख गंभीर विश्लेषण

Questions of Skill

हुनर के सवाल

— सही बात को सही ढंग से पूछना —

लेखक: थानिस्सरो भिक्खु
| १३ मिनट



बुद्ध ऐसे गुरु नहीं थे जो आपके हर सवाल का बस सीधा-सीधा जवाब दे दें। उन्होंने यह भी सिखाया कि आखिर सवाल कौन से पूछे जाने चाहिए। वे सवालों की ताकत को अच्छी तरह समझते थे। वे जानते थे कि सवाल दरअसल आपके अज्ञान के खालीपन को एक शक्ल दे देते हैं; और फिर, चाहे वह शक्ल सही हो या गलत, आप आने वाले जवाब को उसी सांचे में ढालने की कोशिश करने लगते हैं।

अगर आपके पास जानकारी बिलकुल सही भी हो, लेकिन आपका सवाल ही गलत हो, तो वह सही जानकारी भी गलत सांचे में ढल जाएगी। और अगर आप उस जवाब को एक औज़ार की तरह इस्तेमाल करेंगे, तो तय मानिए कि आप उसे गलत जगह आज़माएंगे और नतीजे भी उल्टे ही मिलेंगे।

यही वजह है कि बुद्ध ने सवालों का एक पूरा विज्ञान तैयार किया। उन्होंने बड़े सलीके से बताया कि कौन से सवाल—और किस क्रम में—इंसान को मुक्ति की तरफ ले जाते हैं, और कौन से सवाल भटका देते हैं। यहाँ तक कि वे जब भी उपदेश देते थे, तो अक्सर ‘सवाल-जवाब’ (शंका-समाधान) का तरीका अपनाते थे, ताकि यह पूरी तरह साफ हो सके कि वे किस सवाल की शक्ल को सुलझा रहे हैं।

इसलिए, अगर आप उनके वचनों में अपने दुखों का हल ढूंढ रहे हैं और उसका पूरा फायदा उठाना चाहते हैं, तो पहले खुद से साफ हो लीजिए कि आप अपने मन में कैसे सवाल लेकर आए हैं। देखिए कि क्या आपके सवाल उन्हीं बातों से मेल खाते हैं जिन्हें सुलझाने के लिए बुद्ध ने यह धम्म दिया था। ऐसा करने पर ही आपको मिलने वाले जवाब सही रास्ता दिखाएंगे।

‘अनात्म’ का असली सवाल

इस बात को समझने के लिए ‘अनात्म’ के उपदेश को देखिए। गंभीर चिंतन के इतिहास में दो सवाल सबसे ज़्यादा पूछे गए हैं: “मैं कौन हूँ?” और “क्या मेरी कोई सच्ची आत्मा है?” आज बहुत से लोग अनात्म के उपदेश को इन्हीं दो सवालों का जवाब मान लेते हैं। इस नज़रिए से देखने पर उन्हें लगता है कि यह उपदेश ‘आत्मा के अस्तित्व’ को पूरी तरह नकारता है—या तो सीधे तौर पर कि ‘कोई आत्मा नहीं है’, या फिर घुमा-फिराकर कि ‘कोई अलग या स्वतंत्र आत्मा नहीं है’।

लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि जब एक बार बुद्ध से सीधे-सीधे पूछा गया कि “क्या आत्मा होती है?”, तो उन्होंने कोई जवाब ही नहीं दिया। उनका मानना था कि इस सवाल का ‘हाँ’ या ‘ना’ में जवाब देना इंसान को ऐसी गलत धारणाओं (मिथ्या दृष्टि) के जाल में फंसा देगा, जहाँ से मुक्ति का रास्ता बंद हो जाता है।

  • अगर वे ‘हाँ’ कहते (या घुमा-फिराकर ‘ना’ कहते), तो इंसान के भीतर लगाव (आसक्ति) पैदा हो जाता; वह जिसे भी अपनी ‘आत्मा’ समझता, उसी से चिपक जाता।
  • और अगर वे सीधे ‘ना’ कह देते, तो इंसान उलझ जाता और खुद को अकेला पाता। उसे लगता कि उसके भीतर का जो सबसे गहरा आत्म-मूल्य है, उसे ही नकार दिया गया है।

रहा सवाल इस बात का कि “मैं कौन हूँ?”, तो बुद्ध ने इसे उन बेकार और बंद रास्तों वाले सवालों की सूची में रखा है जो इंसान को “विचारों के घने जंगल, धारणाओं के मरुस्थल, और उलझनों की बेड़ियों” में बांध देते हैं। जो इंसान इन बेड़ियों में बंधा है, वह जन्म-मरण, बुढ़ापे, शोक, आंसू, दुःख और निराशा के चक्र से कभी आज़ाद नहीं हो सकता। सीधे शब्दों में कहें तो, इन दोनों में से किसी भी सवाल का जवाब ढूंढने की कोशिश करना अपने आप में एक ‘अकुशल कर्म’ है, जो असली आज़ादी का रास्ता रोक देता है।

तो फिर सवाल उठता है कि अगर अनात्म का उपदेश इन सवालों का जवाब नहीं है, तो यह किस सवाल को सुलझाता है? यह एक बेहद बुनियादी सवाल का जवाब देता है: “कुशल क्या है? (यानी सही हुनर क्या है?)”

असल में, बुद्ध की पूरी सीख प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इसी एक सवाल का जवाब है। उनका सबसे बड़ा बोध यही था कि हमारा सारा ज्ञान-अज्ञान, हमारा सारा सुख-दुःख, हमारे अपने कर्मों से आता है। इसलिए, सच्चे ज्ञान और सच्चे सुख की खोज असल में ‘सही हुनर’ का खेल है। इस मामले में सटीक सवाल यह बनता है: “क्या खुद को किसी पहचान (मैं और मेरा) से बांधना फायदेमंद (कुशल) है?”

और इसका जवाब है: “सिर्फ एक हद तक।”

ज़िंदगी के जिन हिस्सों में सही ढंग से काम करने के लिए एक स्वस्थ ‘आत्म-भाव’ की ज़रूरत है, वहाँ उसे बनाए रखना समझदारी है। लेकिन धीरे-धीरे, जब सही व्यवहार आपकी आदत बन जाता है और आपकी समझ और गहरी होती है, तब आप देख पाते हैं कि खुद को किसी भी पहचान से बांधना—चाहे वह कितनी ही ऊंची या पवित्र क्यों न हो—आखिरकार तनाव और दुःख ही देता है। तब आपको इसे छोड़ना ही पड़ता है।

साधना का नक्शा और जीने के नियम

जैसे किसी भी हुनर को सीखने के पड़ाव होते हैं, वैसे ही यहाँ भी हैं। और चूँकि कोई सवाल पूछना भी अपने आप में एक ‘कर्म’ है, इसलिए आपके सवाल न केवल हुनर से जुड़े होने चाहिए, बल्कि वे सवाल खुद भी बड़े ‘कुशल’ (सोच-समझकर पूछे गए) होने चाहिए। बुद्ध के बताए रास्ते का हर कदम ऐसे सवालों से तय होता है जो आपके ध्यान को सही दिशा में मोड़ते हैं। उनके बताए इन सवालों को आप साधना का एक नक्शा मान सकते हैं।

शुरुआत में आप ऐसे सवाल पूछते हैं जिनमें ‘मैं’ या ‘मेरा’ होना शामिल होता है, और आप इसी धारणा का इस्तेमाल खुद को बेहतर और कुशल कर्म करने के लिए प्रेरित करने में करते हैं। लेकिन जब आप एक खास स्तर पर पहुँच जाते हैं, तब ये सवाल आपके उसी ‘मैं’ के भाव को परत-दर-परत खोलकर देखने लगते हैं। वे उन चीज़ों की तरफ इशारा करते हैं जिन्हें आप ‘मैं’ समझते बैठे हैं और दिखाते हैं कि “यह आप नहीं हो।” जब ‘मैं’ की इस पहचान के पास छिपने का कोई रास्ता नहीं बचता, तो वह हवा में ही थम जाती है—और मन पूरी तरह आज़ाद हो जाता है। इसलिए, जब आप अनात्म के उपदेश को इन सही सवालों के साथ जोड़कर देखेंगे, तो पाएंगे कि यह कोई उलझाने वाला जवाब नहीं है, बल्कि मुक्ति का एक अचूक औज़ार है।

इस रास्ते पर चलने के लिए बुद्ध कहते हैं कि जब भी आप किसी ज्ञानी गुरु के पास जाएं, तो सबसे पहले ये सवाल पूछें:

कुशल क्या है? अकुशल क्या है? ऐसा क्या है जिसे करने से मुझे लंबे समय तक नुकसान और दुःख उठाना पड़ेगा? और ऐसा क्या है जिसे करने से मेरा लंबे समय तक कल्याण और सुख होगा?

ध्यान दीजिए, इन दोनों आख़िरी सवालों में ‘मुझे’ और ‘मेरा’ शब्द आए ज़रूर हैं, लेकिन यहाँ ज़ोर ‘मैं कौन हूँ’ पर नहीं है। पूरा ज़ोर ‘करने’ पर है, अपने हुनर को निखारने पर है। यहाँ आप ‘अपने भले’ की चिंता का इस्तेमाल अपने कर्मों को सच्चे सुख की तरफ मोड़ने के लिए कर रहे हैं।

इन बुनियादी सवालों के जो जवाब बुद्ध देते हैं, वे किसी घने जंगल में ज़िंदा बचे रहने की गाइडलाइन जैसे लगते हैं। सबसे पहले आते हैं ‘क्या करें और क्या न करें’ के नियम। जैसे जंगल का कोई गाइड आपसे कहेगा: “अगर सामने से सांड आए तो भागो, मगर भालू आए तो चुपचाप खड़े रहो।” वैसे ही बुद्ध ने हमारे शरीर, वाणी और मन के लिए दस नियम (दस कुशल कर्म) बताए हैं:

  • शरीर के लिए: हिंसा न करना (जीव हत्या से बचना), चोरी न करना, और व्यभिचार न करना।
  • वाणी के लिए: झूठ न बोलना, चुगली न करना (आपसी फूट से बचना), कड़वे या गाली-गलौज वाले शब्द न बोलना, और बेकार की बकवास न करना।
  • मन के लिए: लोभ को छोड़ना, द्वेष (नफ़रत) को त्यागना, और सही नज़रिया (सम्यक दृष्टि) रखना।

यह आपके सुख को ज़िंदा रखने के लिए बुद्ध के बुनियादी नियम हैं। उनकी बहुत सी शिक्षाएँ इन्हीं दस बातों का विस्तार हैं।

लेकिन जैसा कि कोई भी समझदार ट्रेनर कहेगा—ज़िंदगी सिर्फ बंधे-बंधाए नियमों से नहीं चलती। आपको उन जगहों पर भी चौकन्ना रहना होगा जहाँ नियम सीधे तौर पर लागू नहीं होते। आपको अपनी परख, कल्पना और सूझबूझ का इस्तेमाल करके अपने भीतर की छिपी हुई बुरी आदतों को बाहर निकालना होगा। तभी आप इस दुनिया रूपी जंगल में खतरों के बीच भी बिना डरे, पूरे सम्मान के साथ चैन से रह पाएंगे।

अकुशल की जड़ों को खोदना

बुद्ध के इस हुनर में भी यही बात लागू होती है। नियमों को मानने के साथ-साथ आपको यह सीखना होगा कि गलत व्यवहार की जड़ों को कैसे काटा जाए, ताकि आप ज़िंदगी के हर मोड़ पर माहिर बन सकें—वहाँ भी जहाँ कोई लिखित नियम नहीं है। गलत व्यवहार (अकुशल कर्म) की तीन जड़ें हैं: लोभ (लालच), द्वेष (गुस्सा/नफ़रत) और मोह (अज्ञान/भ्रम)

इन तीनों में मोह सबसे खतरनाक है, क्योंकि यह होने पर भी इंसान को लगता है कि वह बिलकुल सही है। इससे पार पाने का एक ही रास्ता है—अपने कर्मों को कार्य-कारण की कसौटी पर लगातार कसते रहना; यह देखना कि जो मैं कर रहा हूँ उसका मेरे और दूसरों पर तुरंत और आगे चलकर क्या असर पड़ेगा।

यहाँ फिर से सही सवाल पूछने की कला काम आती है। जब भी आप कोई काम करने वाले हों, तो खुद से पूछें:

यह काम जो मैं करना चाहता हूँ, क्या इससे मुझे नुकसान होगा, दूसरों को नुकसान होगा, या दोनों का बुरा होगा? क्या यह कोई गलत कदम है जिसका नतीजा दुःखद होगा?

अगर आपको लगे कि इससे किसी का भी नुकसान हो सकता है, तो कदम पीछे खींच लीजिए। अगर कोई नुकसान न दिखे, तो आगे बढ़िए। काम करते समय भी खुद से पूछते रहिए कि कहीं इसका कोई अनपेक्षित बुरा असर तो नहीं पड़ रहा? अगर पड़ रहा हो, तो तुरंत रुक जाइए। और जब काम पूरा हो जाए, तब भी उसके असली नतीजों को ठंडे दिमाग से परखिए।

अगर आपकी वाणी या कर्म से कोई गलती हो गई है, तो इस रास्ते पर चल रहे किसी अनुभवी साथी को (इसीलिए बुद्ध ने ‘संघ’ बनाया था) ईमानदारी से बताएं और उसकी सलाह सुनें। अगर गलती सिर्फ मन के स्तर पर हुई है, तो वैसी सोच के प्रति अपने भीतर एक सजग अरुचि पैदा करें। दोनों ही सूरतों में संकल्प लें कि यह गलती दोबारा नहीं होगी और अपनी पूरी सूझबूझ से उस संकल्प पर टिके रहें। लेकिन, अगर आपके काम का नतीजा सुखद और हानिरहित रहा है, तो इस बात की खुशी मनाएं कि आप सही रास्ते पर हैं और अपनी साधना जारी रखें।

आत्म-सम्मान और सजगता का संतुलन

जब आप लगातार इस तरह से सवाल पूछते हैं, तो इसके दो बड़े फायदे होते हैं।

पहला यह कि आप अपने कर्मों और उनके असर के प्रति बहुत संवेदनशील और ज़िम्मेदार हो जाते हैं। आप उस बच्चे की तरह बहाने नहीं बनाते जो कहता है कि “मेरे पैर रखने से पहले ही यह खिलौना टूटा हुआ था।” आपको अच्छी तरह पता होता है कि कब आपकी वजह से कोई चीज़—चाहे वह किसी का दिल हो या कोई नियम—टूटी है और कब नहीं।

दूसरा फायदा यह होता है कि आप कर्म और उसके नतीजे के खेल को पूरी तरह समझ जाते हैं। आप चीज़ों को इतनी खूबी से संभालना सीख जाते हैं कि वे टूटती ही नहीं। इससे आपके भीतर एक ऐसा ‘आत्म-भाव’ जागता है जो अपनी काबिलियत और हुनर पर टिका होता है। यह ‘मैं’ इतना सुलझा हुआ होता है कि अपनी गलतियों को मुस्कुराकर मान लेता है, उनसे सीखता है, और दूर के लक्ष्यों के लिए धीरज रखना जानता है। अपनी परख पर भरोसा होने के बावजूद, इस ‘मैं’ में इतनी विनम्रता होती है कि वह दूसरों के अनुभव और सलाह की कद्र कर सके।

ये दोनों बातें—अपने कर्मों के प्रति सजगता और एक काबिल आत्म-भाव—आपको मन की एक गहरी और तृप्त करने वाली एकाग्रता (समाधि) की तरफ ले जाती हैं। आपके मन का यह असमंजस हमेशा के लिए ख़त्म हो जाता है कि क्या सही है और क्या गलत। लेकिन जैसे-जैसे यह एकाग्रता गहरी होती है, एक दिलचस्प मोड़ आता है: आपकी कर्मों के प्रति संवेदनशीलता और आपका यह ‘मैं’ आमने-सामने आ खड़े होते हैं।

आप देख पाते हैं कि यह ‘मैं’ कोई जमी-जमाई ठोस चीज़ नहीं है, बल्कि एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है—‘मैं-मेरा’ करने की एक मानसिक कसरत, जिसमें आप हर पल अपनी एक पहचान गढ़ते और बदलते रहते हैं। आप यह भी भांप लेते हैं कि यह ‘मैं’ की कसरत, चाहे कितनी भी कुशल क्यों न हो, आखिरकार एक बारीक सा तनाव पैदा कर ही देती है।

क्यों? क्योंकि ‘मैं’ या ‘मेरा’ होने के इस अहसास में कहीं न कहीं एक पकड़ (आसक्ति) छिपी होती है—भले ही आपकी एकाग्रता आपको पूरी कायनात के साथ एक होने का अहसास क्यों न करा रही हो। और जहाँ पकड़ है, वहाँ तनाव तय है। इसलिए, अगर आपको अपने हुनर को उसके आखिरी मुकाम तक ले जाना है, तो आपको इस ‘मैं-मेरा’ करने की आदत को ही छोड़ना होगा। और इसके लिए एक आखिरी तरह के सवालों की ज़रूरत पड़ती है।

अनात्म की रणनीति और आखिरी आज़ादी

यहीं से ‘अनात्म’ की रणनीति शुरू होती है। बुद्ध कहते हैं कि जिस भी चीज़ के इर्द-गिर्द आपको ‘मैं’ या ‘मेरा’ होने का अहसास होता है, उसे ध्यान से देखें और ये सवाल पूछें:

  • “क्या यह सदा रहने वाली (नित्य) है या बदल जाने वाली (अनित्य)?” अगर आप अपने शरीर को ‘मैं’ समझते हैं, तो उसे देखिए। यह भूखा-प्यासा होता है, बूढ़ा होता है, बीमार पड़ता है और एक दिन ख़त्म हो जाता है। यानी यह अनित्य है।
  • “और जो चीज़ अनित्य है, बदल जाने वाली है, क्या वह सुख देगी या दुःख (तनाव)?” जब आप इस बदलते शरीर के भरोसे कोई स्थाई सुख ढूंढने की कोशिश करेंगे, तो समझ जाएंगे कि यह कितना तनावपूर्ण है।
  • “तो फिर, जो चीज़ बदल रही है, दुःख का कारण है, और जिसके बदलने पर आपका कोई बस नहीं है, क्या उसके बारे में यह कहना सही है कि: ‘यह मेरा है, यह मैं हूँ, यही मेरी असली पहचान है’?”

इस सवाल की धार को अपने भीतर ले जाइए—शारीरिक संवेदनाओं से लेकर मन के विचारों की एक-एक परत तक। यहाँ तक कि उस ‘कमांडिंग सेंटर’ (उस आंतरिक मैनेजर) को भी देखिए जो आपकी एकाग्रता को संभाल रहा है और आपके भीतर ये सवाल-जवाब कर रहा है। जब आपकी समाधि गहरी और शांत होगी, तो आप बिना किसी डर के उस ‘मैनेजर वाले मैं’ को भी खोलकर देख पाएंगे। आपको यह डर नहीं सताएगा कि इसके चले जाने के बाद मेरा क्या होगा।

और जब उस ‘मैं’ को बनाने वाली इच्छाएँ और नीयत बिखर जाती हैं, तो एक चमत्कार होता है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे किसी सुंदर कालीन का कोई एक मुख्य धागा खींच दिया जाए और पूरी कालीन अपने आप खुलती चली जाए। हर वो चीज़ जिससे आप चिपक सकते थे, खुद-ब-खुद छूट जाती है। जो बचता है, वह है पूर्ण, असीम आज़ादी—समय और स्थान के पार, ‘मैं’ और ‘अनात्म’ दोनों के पार। क्योंकि ‘मैं’ और ‘अनात्म’ तो महज़ दिमागी धारणाएँ थीं, और वह आज़ादी इन दोनों से बहुत ऊपर है।

जब आप इस आज़ादी का पहला छोटा सा स्वाद भी चख लेते हैं, तब आपको समझ आता है कि ‘अनात्म’ का उपदेश कितने जादुई ढंग से इस सवाल का जवाब देता है कि “कुशल क्या है?” तब आप जान पाते हैं कि बुद्ध ने “मैं कौन हूँ?” के सवाल को एक तरफ रखने की सलाह क्यों दी थी।

पहली बात तो यह कि वह सवाल आपको कभी इस आज़ादी तक नहीं लाता, बल्कि रास्ते का रोड़ा बन जाता। चूँकि आपका ‘मैं’ कोई स्थिर चीज़ नहीं बल्कि एक गतिविधि है, इसलिए कर्म के विज्ञान को समझे बिना उसे पकड़ने की कोशिश करना परछाइयों पर झपट्टा मारने जैसा होता—आप असली काम से भटक जाते। और अगर आप इस ‘मैं’ के स्वस्थ और परिपक्व होने से पहले ही उसे तोड़ने की कोशिश करते, तो यह एक मानसिक कमज़ोरी जैसा होता; आप अपनी ज़िंदगी की उलझनों का सामना करने के बजाय उनसे भाग रहे होते। इसके अलावा, “मैं कौन हूँ?” का कोई भी जवाब इस नई मिली आज़ादी को बयां नहीं कर सकता; क्योंकि यह एक अलग ही आयाम है जहाँ “मैं”, “गैर-मैं”, “हूँ” या “नहीं हूँ” जैसे शब्द बेमानी हो जाते हैं।

अब आपके मन में सिर्फ एक ही काम बचता है: अकुशलता की जो भी बारीक जड़ें मन की गहराइयों में छिपी रह गई हैं, उन्हें पूरी तरह खोदकर बाहर निकालना। बुद्ध का वादा है कि एक बार वे जड़ें साफ हो गईं, तो पूरी और अंतिम मुक्ति के आड़े कोई चीज़ नहीं आ सकती। और उस आज़ादी में, मन न तो किसी कमी को महसूस करता है और न ही उसमें कुछ फालतू होता है। वहाँ न तो ऐसा कोई भ्रम होता है जो किसी जलते हुए सवाल का खालीपन पैदा करे, और न ही ऐसा कोई राग या द्वेष होता है जो उस सवाल को नुकीला बनाए।

इसके बाद अगर कोई सवाल बचते भी हैं, तो वे महज़ बोनस की तरह होते हैं: कि आपने रास्ते में जो भी हुनर और कलाएँ सीखी हैं, उनका इस्तेमाल निस्वार्थ भाव से इस दुनिया की भलाई के लिए कैसे किया जाए।

और भला, इसके बाद कोई और क्या ही मांग सकता है?

लेखक: थानिस्सरो भिक्खु

थानिस्सरो भिक्खु

पूज्य गुरुजी थानिस्सरो भिक्खु

आप एक प्रतिष्ठित थेरवादी भिक्षु और ध्यानसाधना के आचार्य हैं, जिन्हें स्नेहपूर्वक “अजान जेफ़” के नाम से भी जाना जाता है। आप अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया स्थित “मेत्ता अरण्य विहार” (Metta Forest Monastery) में निवास करते हैं, जहाँ आपने गहन ध्यान साधना, धर्म-विनय के अनुशासित पालन, और प्राचीन पाली सूत्रों के अध्ययन व शिक्षण को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाया है।

धर्म और विनय पर आपकी गहरी पकड़ और तर्कसम्मत व्याख्यानों से दुनियाभर के भिक्षु और साधक प्रेरित हुए हैं। आपने सुत्तपिटक और विनयपिटक के अधिकांश सूत्रों का अंग्रेज़ी में सरल व सटीक अनुवाद किया है, जिससे पाली बौद्ध सूत्रों की मौलिकता और गहराई जनसामान्य तक सहज रूप से पहुँच सके। आपके ध्यान और बौद्ध दर्शन पर दिए गए प्रवचन आधुनिक जीवन में भी अत्यंत प्रासंगिक हैं, जिससे असंख्य साधकों को आध्यात्मिक दिशा मिली है।

आपका योगदान धम्मदीप.com से जुड़े सभी भिक्षुओं के आध्यात्मिक विकास में सबसे महत्वपूर्ण रहा है, और आप ही इस मंच के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं। आप की शिक्षाएँ और अनुवाद dhammatalks.org पर अँग्रेजी में निःशुल्क उपलब्ध हैं।

आप के लेखों को हिन्दी में यहाँ पढ़ा जा सकता हैं।

इस लेख को उसकी मूल भाषा अँग्रेजी में पढ़ें: Questions of Skill