‘संसार’ का सीधा सा मतलब होता है—“लगातार भटकते रहना”, “संसरण करना” या “चलते जाना।” बहुत से लोग सोचते हैं कि संसार उस जगह का नाम है जहाँ हम अभी रह रहे हैं—एक ऐसी जगह जिसे छोड़कर हम तब चले जाते हैं जब हमें निर्वाण मिल जाता है।
लेकिन शुरुआती बौद्ध सूत्रों में संसार इस सवाल का जवाब नहीं है कि “हम कहाँ हैं?”, बल्कि इस सवाल का जवाब है कि “हम क्या कर रहे हैं?”
यह कोई जगह नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया है: बार-बार अपने लिए नई-नई दुनियाएँ गढ़ना और फिर उन्हीं दुनियाओं में रहने के लिए चले जाना। जैसे ही एक दुनिया टूटकर बिखरती है, आप तुरंत दूसरी दुनिया बना लेते हैं और वहाँ रहने चले जाते हैं। और इसी आपाधापी में, आपकी टक्कर उन दूसरे लोगों से भी होती है जो खुद अपने लिए अपनी-अपनी दुनियाएँ बनाने में जुटे हुए हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में जो खेल और रचनात्मकता है, वह कभी-कभी बड़ी मज़ेदार लग सकती है। सच कहें तो, इस आदत में कोई बुराई नहीं होती अगर इसके साथ इतना सारा दुःख और दर्द न जुड़ा होता। दिक्कत यह है कि जो दुनियाएँ हम बनाते हैं, वे बार-बार हमारे ऊपर ही ढह जाती हैं और हमें मार देती हैं।
किसी नई दुनिया में कदम रखने के लिए बड़ी मेहनत करनी पड़ती है: सिर्फ जन्म लेने की तकलीफें और खतरे ही नहीं, बल्कि बचपन से जवानी और बुढ़ापे के सफर में मिलने वाली मानसिक और शारीरिक चोटें भी—और यह सब बार-बार, हर जन्म में होता है।
बुद्ध ने एक बार अपने भिक्षुओं से पूछा था, “तुम्हें क्या लगता है, क्या ज़्यादा है: इस विशाल समुद्र का पानी, या इस अनंत सफर में भटकते हुए तुम्हारी आँखों से बहे आँसू?” उनका अपना जवाब था: तुम्हारे आँसू। अगली बार जब आप समुद्र को देखें या उसकी लहरों से खेलें, तो इस बात को ज़रूर याद रखिएगा।
एक-दूसरे का शोषण
अपने लिए दुःख पैदा करने के अलावा, हमारी बनाई हुई दुनियाएँ दूसरों की दुनियाओं का शिकार करती हैं, उनसे अपना पेट भरती हैं; ठीक वैसे ही जैसे उनकी दुनियाएँ हमारी दुनियाओं से अपना पोषण लेती हैं। कुछ मामलों में यह लेन-देन आपसी तालमेल और फायदे का हो सकता है, लेकिन ऐसी व्यवस्था का भी एक न एक दिन अंत होना तय है। पर ज़्यादातर मौकों पर, इससे रिश्ते के किसी एक पक्ष को या फिर दोनों को ही नुकसान पहुँचता है।
ज़रा सोचिए कि महज़ एक इंसान को कपड़ा, रोटी, मकान और अच्छी सेहत देने के लिए कितने दुख झेलने पड़ते हैं—उन लोगों को भी जो इन चीज़ों की कीमत चुकाते हैं, और उन लोगों को भी जो इन्हें बनाने में हाड़-तोड़ मेहनत करते हैं या अपनी जान गंवा देते हैं। तब आपको समझ आएगा कि दुनिया बनाने की यह बुनियादी प्रक्रिया भी कितनी शोषण करने वाली हो सकती है।
यही वजह है कि बुद्ध ने इस ‘संसार-संसार खेलने’ की आदत को रोकने का रास्ता खोजा। जब उन्हें यह रास्ता मिल गया, तो उन्होंने दूसरों को भी इस पर चलने के लिए प्रेरित किया। चूँकि संसार बनाने का यह काम हममें से हर कोई खुद कर रहा है, इसलिए इसे रोकने का काम भी हर किसी को अकेले, खुद ही करना होगा।
अगर संसार कोई भौतिक जगह होता, तो शायद किसी एक इंसान का यहाँ से भाग निकलने की सोचना स्वार्थी बात लगती कि वह बाकी सबको पीछे छोड़ गया। लेकिन जब आप समझ जाते हैं कि यह महज़ एक मानसिक प्रक्रिया है, तो इसे रोकने में कोई स्वार्थ नहीं है। यह बिल्कुल किसी नशे या किसी बुरी लत को छोड़ने जैसा है।
जब आप अपनी दुखों की दुनिया को बनाने से रोकने का हुनर सीख जाते हैं, तो आप यह हुनर दूसरों के साथ भी बांट सकते हैं ताकि वे भी अपने दुखों की दुनिया बनाना बंद कर सकें। साथ ही, जब आप इस आदत को छोड़ देते हैं, तो आपको अपनी दुनिया चलाने के लिए दूसरों का शोषण नहीं करना पड़ता, और इस तरह आप उनका बोझ भी हल्का कर देते हैं।
समय और स्थान के पार
यह सच है कि बुद्ध ने संसार को रोकने की इस साधना की तुलना एक जगह से दूसरी जगह जाने से की है: जैसे नदी के इस घाट से उस पार के घाट पर जाना। लेकिन जिन हिस्सों में वे यह तुलना करते हैं, उनका अंत अक्सर एक विरोधाभास के साथ होता है: वे कहते हैं कि उस दूसरे किनारे पर कोई “यहाँ” नहीं है, कोई “वहाँ” नहीं है, और न ही “इन दोनों के बीच” की कोई जगह है।
इस नज़रिए से देखें तो यह साफ हो जाता है कि संसार में दिखने वाले समय और स्थान के ये पैमाने कोई ऐसी बनी-बनाई जगह नहीं थे जिसमें हम भटक रहे थे। बल्कि, ये पैमाने तो हमारी इस भटकने की आदत का ही नतीजा थे।
जिस किसी को दुनियाएँ बनाने (यानी नई-नई इच्छाओं और पहचानों को गढ़ने) का नशा चढ़ा हुआ है, उसके लिए बिना किसी ‘यहाँ’ या ‘वहाँ’ के रहने की बात बड़ी अजीब और डरावनी लग सकती है। लेकिन अगर आप रोज़-रोज़ की इस बेवजह की तकलीफ और दुखों की दुनिया बनाने से थक चुके हैं, तो आपको इसे एक बार आज़माकर ज़रूर देखना चाहिए।
आखिरकार, अगर आपको ‘यहाँ’ या ‘वहाँ’ का न होना बहुत उबाऊ लगे, तो आप कभी भी वापस लौटकर अपनी दुनिया बनाने का काम फिर से शुरू कर सकते हैं! लेकिन सच तो यह है कि जिन्होंने भी एक बार इस आदत को तोड़ना सीख लिया, उनमें से आज तक किसी का भी मन दोबारा इस संसार के चक्कर में आने का नहीं हुआ।
लेखक: थानिस्सरो भिक्खु

आप एक प्रतिष्ठित थेरवादी भिक्षु और ध्यानसाधना के आचार्य हैं, जिन्हें स्नेहपूर्वक “अजान जेफ़” के नाम से भी जाना जाता है। आप अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया स्थित “मेत्ता अरण्य विहार” (Metta Forest Monastery) में निवास करते हैं, जहाँ आपने गहन ध्यान साधना, धर्म-विनय के अनुशासित पालन, और प्राचीन पाली सूत्रों के अध्ययन व शिक्षण को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाया है।
धर्म और विनय पर आपकी गहरी पकड़ और तर्कसम्मत व्याख्यानों से दुनियाभर के भिक्षु और साधक प्रेरित हुए हैं। आपने सुत्तपिटक और विनयपिटक के अधिकांश सूत्रों का अंग्रेज़ी में सरल व सटीक अनुवाद किया है, जिससे पाली बौद्ध सूत्रों की मौलिकता और गहराई जनसामान्य तक सहज रूप से पहुँच सके। आपके ध्यान और बौद्ध दर्शन पर दिए गए प्रवचन आधुनिक जीवन में भी अत्यंत प्रासंगिक हैं, जिससे असंख्य साधकों को आध्यात्मिक दिशा मिली है।
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