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The Path of Concentration & Mindfulness

स्मृति और समाधि का मार्ग

— एक ही सिक्के के दो पहलू —

लेखक: थानिस्सरो भिक्खु
| १३ मिनट



अक्सर लोग कहते हैं कि भगवान बुद्ध दो तरह के ध्यान साधना सिखाते थे—एक स्मृति का और दूसरा समाधि का। यह भी कहा जाता है कि स्मृति वाला ध्यान सीधा रास्ता है, जबकि समाधि वाला रास्ता सुंदर तो है, लेकिन इसमें भटकने या अटक जाने का खतरा बना रहता है।

लेकिन, अगर हम गहराई से देखें कि बुद्ध ने वास्तव में क्या सिखाया था, तो पता चलता है कि उन्होंने कभी इन दोनों साधनाओं को अलग-अलग नहीं बाँटा। ये दोनों एक ही साधना के हिस्से हैं। जब भी बुद्ध ‘स्मृति’ के बारे में बताते हैं और मार्ग में इसके महत्व को समझाते हैं, तो वे साफ़-साफ़ कहते हैं कि सम्यक स्मृति का अंतिम उद्देश्य मन को सम्यक समाधि में ले जाना ही है। इसका मतलब है मन को इस तरह से स्थिर करना कि वह गहरी शांति और सुकून महसूस कर सके, जहाँ वह लंबे समय तक गहराई से चीज़ों का निरीक्षण कर सके और घटनाओं को ठीक वैसा ही देख सके जैसी वे असल में हैं।

‘झान’ का सही अर्थ

यह जो “दो अलग साधनाओं” की बात उठती है, वह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि हम पाली शब्द ‘झान’ (ध्यान-अवस्था) को कैसे समझते हैं। ‘सम्यक समाधि’ की परिभाषा हमेशा चार तरह के ‘झानों से दी जाती है।

अक्सर हमें यह सुनने को मिलता है कि ‘झान’ में जाने के लिए बहुत तीव्रता से किसी चीज़ पर ध्यान केंद्रित करना पड़ता है, यहाँ तक कि बाहरी दुनिया की पूरी सुध-बुध ही खो जाए। यह व्याख्या बिल्कुल भी ‘सम्यक स्मृति’ जैसी नहीं लगती, जिसमें हमें वर्तमान क्षण और अपने कर्मों के प्रति पूरी तरह सचेत रहना सिखाया जाता है।

लेकिन अगर हम बुद्ध के द्वारा दी गई ‘झान’ की व्याख्या को देखें, तो पाएँगे कि वे किसी दबी हुई या कटी हुई मनःस्थिति की बात नहीं कर रहे हैं। बुद्ध के अनुसार, ‘झान’ में होने का अर्थ है—अपने पूरे शरीर में एक बेहद सुखद एहसास के साथ मग्न होना। एक विशाल और फैली हुई चेतना पूरे शरीर को भर देती है। बुद्ध इसका वर्णन कुछ इस तरह करते हैं:

जैसे कोई आटे का गोला गूँथ रहा हो, जिसमें पानी पूरी तरह से समा जाए लेकिन बाहर एक बूँद भी न टपके। या फिर उस तालाब की तरह, जिसके ठीक नीचे से एक मीठे पानी का सोता (झरना) फूट रहा हो और वह शीतल जल धीरे-धीरे उभरकर पूरे तालाब को लबालब भर दे।

जब हम इस तरह पूरे शरीर के अनुभव पर ध्यान लगाते हैं, तो हम पूरी तरह से वर्तमान क्षण में ही मौजूद रहते हैं। ‘चौथे झान’ की अवस्था में शरीर एक उज्ज्वल चेतना से भर जाता है, और बुद्ध कहते हैं कि इसी अवस्था में स्मृति और उपेक्षा (तटस्थता) के गुण पूरी तरह से शुद्ध हो जाते हैं।

इसलिए, स्मृति का अभ्यास और पूरे शरीर की स्थिर व शांत चेतना (समाधि)—इन दोनों को एक साथ साधने में कोई टकराव नहीं है। सच तो यह है कि बुद्ध ने इन्हें हमेशा एक साथ ही सिखाया है। उदाहरण के लिए, आनापानसति (आती-जाती साँसों पर ध्यान) के पहले चार चरण देखें:

  1. लंबी साँसों को जानना।
  2. छोटी साँसों को जानना।
  3. साँस लेते और छोड़ते समय पूरे शरीर को महसूस करना।
  4. शरीर में साँसों के अनुभव को शांत होने देना।

जैसा कि सूत्रों से पता चलता है, यह एक बहुत ही बुनियादी स्मृति-प्रयोग है, लेकिन साथ ही यह एक समाधि-प्रयोग भी है। इसी का अभ्यास करते-करते साधक ‘सम्यक स्मृति’ के ज़रिए ‘सम्यक समाधि’ के पहले ‘झान’ में प्रवेश कर जाता है।

स्मृति के तीन स्तर

हम सतिपट्ठान सुत्त (मज्झिमनिकाय 10) में स्मृति-साधना के तीन स्तरों को देखकर यह समझ सकते हैं कि सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि एक-दूसरे की मदद कैसे करते हैं।

सबसे पहले इस सूत्र के नाम को समझते हैं: स्मृति का उपस्थान, यानी अपनी स्मृति को ‘उपस्थित’ करना। इसका मतलब है स्मृति को इस तरह हाज़िर रखना कि वह पल-पल की ज़रूरत के हिसाब से सही काम करने के लिए तुरंत उपलब्ध हो।

यह कैसे होता है? स्मृति को चार नींवों के आधार पर उपस्थित किया जाता है—काया, वेदना (अनुभूति), चित्त, और धम्म (मानसिक गुण या स्वभाव)।

चलिए, समझने के लिए शरीर का उदाहरण लेते हैं।

पहला स्तर: मन को स्थिर करना

स्मृति-उपस्थान के पहले स्तर का काम है “काया में काया” पर ध्यान टिकाए रखना और सांसारिक लालच या बेचैनी को दरकिनार करना। इसका मतलब है शरीर को केवल एक ‘शरीर’ के रूप में अनुभव करना, बिना यह सोचे कि दुनिया की नज़र में इसकी क्या अहमियत है। शरीर सुंदर है या बदसूरत, ताकतवर है या कमज़ोर, फुर्तीला है या सुस्त, मोटा है या पतला—बुद्ध कहते हैं कि इन सभी सांसारिक चिंताओं को बस एक किनारे रख दो।

केवल काया (शरीर) के संदर्भ में काया के साथ रहो। जब आप आँखें बंद करते हैं, तो क्या मौजूद होता है? बस यह “कायत्व” (शरीर होने का अहसास)। यही हमारा मुख्य आधार है। जो कुछ भी अनुभव हो, उसे इसी शरीर के संदर्भ में देखें।

बार-बार अपने मन को इसी काया के अनुभव पर वापस लाते रहें, जब तक कि मन शांत और स्थिर न हो जाए। शुरू-शुरू में आप पाएँगे कि मन कभी कुछ पकड़ कर भाग रहा है, तो कभी कुछ और। जब ऐसा हो, तो बस यह जान लें कि मन भटक गया है। उसे प्यार से याद दिलाएँ कि अभी तो उसे शरीर के साथ रहना है। फिर वापस आएँ और शरीर को महसूस करें।

अगर मन फिर किसी और विचार के पीछे भागे, तो उसे छोड़ें, वापस आएँ और साँस को मज़बूती से थाम लें। अभ्यास करते-करते आप एक ऐसी स्थिति में पहुँच जाएँगे जहाँ मन साँस को पकड़ लेगा और फिर उसे छोड़ेगा नहीं।

इसके बाद, आपकी चेतना में जो कुछ भी विचार या भावनाएँ आएँगी, वे ऐसी लगेंगी जैसे कुछ आपके हाथ के पिछले हिस्से को छूकर निकल गया हो। आपको उन पर ध्यान देने की ज़रूरत नहीं है। आपका मुख्य आधार शरीर ही रहेगा। विचार आएँगे और जाएँगे, आप उनके प्रति सचेत भी रहेंगे, लेकिन आप साँस को छोड़कर उनके पीछे नहीं भागेंगे। जब आप इस अवस्था में पहुँच जाते हैं, तो इसका मतलब है कि आपने ‘काया’ के आधार पर अपना ‘स्मृत्युपस्थान’ मज़बूत कर लिया है।

ऐसा करने से आपके भीतर तीन मानसिक गुण विकसित होने लगते हैं:

  1. स्मृति (सति): इसका अर्थ है याद रखने की क्षमता। ध्यान के समय इसका मतलब है यह याद रखना कि आपको सब कुछ ‘काया’ के संदर्भ में ही देखना है। खुद को भूलने नहीं देना है।
  2. सचेतता (सम्पजञ्ञ): इसका अर्थ है यह पूरी तरह से जानना कि आप वर्तमान में क्या कर रहे हैं। क्या आपका ध्यान शरीर और साँस पर है? इसका क्या नतीजा मिल रहा है? साँस आरामदायक है या नहीं? अक्सर हम स्मृति और सजगता को एक ही मान लेते हैं, लेकिन ये अलग हैं। स्मृति यह ‘याद रखती है’ कि ध्यान कहाँ लगाना है, जबकि सजगता यह ‘देखती है’ कि असल में क्या हो रहा है।
  3. तत्परता (आतप्प): यह है मेहनत करने और सीखने की चाह। इसका मतलब है कि जैसे ही पता चले कि मन भटक गया है, उसे तुरंत (बिना समय गँवाए) वापस ले आना। मन को आवारा घूमने न देना। और जब मन टिक जाए, तो इस ‘लगन’ का मतलब है जो घट रहा है उसे बहुत करीब और बारीकी से देखना।

जब आप इन तीनों गुणों (आतापी सम्पजानो सतिमा) के साथ शरीर पर ध्यान देते हैं, तो मन निश्चित रूप से शांत, स्थिर और आरामदायक होकर वर्तमान में टिक जाता है। यही ‘समाधि’ है। अब आप साधना के दूसरे स्तर के लिए तैयार हैं।

दूसरा स्तर: कारण और परिणाम को समझना

समाधि के इस स्तर पर पहुँचने के बाद, हमारा काम मन में होने वाली घटनाओं के उठने (उदय) और मिटने (व्यय) को समझना होता है। हम यह समझना चाहते हैं कि कारण और परिणाम कैसे काम करते हैं, ताकि हम समाधि में इतने कुशल हो जाएँ कि किसी भी परिस्थिति में मन को लंबे समय तक स्थिर रख सकें। इसके लिए हमें केवल मूक दर्शक नहीं बने रहना है, बल्कि मन की प्रक्रियाओं में हिस्सा लेकर सीखना है।

कुछ लोगों को लगता है कि ध्यान का मतलब सिर्फ आँखें बंद करके बैठ जाना है और मन में जो भी आए उसे बिना किसी नियंत्रण के बस ‘देखते रहना’ (निर्विकल्प ध्यान) है। लेकिन इस स्तर पर मन ऐसी साधना के लिए तैयार ही नहीं होता। असल में, मन की घटनाओं को परखने के लिए मन के पास एक ‘स्थिर जगह’ होनी चाहिए।

जैसे, अगर आप आसमान में उड़ते बादलों की गति नापना चाहते हैं, तो आपको किसी स्थिर चीज़ (जैसे छत का कोई कोना या बिजली का खंभा) को आधार बनाना होगा। तभी आप जान पाएँगे कि बादल किस दिशा में और कितनी तेज़ी से जा रहे हैं। इसी तरह, हमारे मन में कामुकता, क्रोध या अन्य विचार बादलों की तरह आते-जाते रहते हैं। यह जानने के लिए कि वे कब आए और कब गए, हमें साँस के ध्यान जैसी एक ‘स्थिर जगह’ बनानी पड़ती है।

मान लीजिए, ध्यान करते समय आपको क्रोध आ गया। आप सिर्फ यह देख सकते हैं कि क्रोध मौजूद है। लेकिन इतना ही काफी नहीं है। आपको साँस पर ध्यान टिकाए रखते हुए यह भी समझना होगा कि इस क्रोध को कैसे खत्म किया जाए।

कभी-कभी सिर्फ क्रोध को देखने भर से वह पिघल जाता है, लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता। कभी-कभी आपको उस क्रोध के कारणों से तर्क करना पड़ता है, या उससे होने वाले नुकसान को याद करना पड़ता है। यह काम हमेशा आसान या सुखद नहीं होता, लेकिन आपको यह करना पड़ता है। आप जानते हैं कि क्रोध एक अकुशल (बुरी) मनःस्थिति है, इसलिए आपको यह समझना ही होगा कि यह क्यों पैदा हुआ, क्यों खत्म हुआ और इसे कैसे दूर रखा जा सकता है।

इसके लिए आपको प्रयोग करने होंगे, थोड़ी गलतियाँ करने के लिए भी तैयार रहना होगा। आप गलतियों से सीखकर ही कुशल बनते हैं। क्रोध से नफरत करके उसे धकेलना, या उसे गले लगाना—ये लंबे समय के लिए सही उपाय नहीं हैं। सही उपाय यह है कि क्रोध की जड़ों (अंशों) को पहचाना जाए और उन्हें तोड़ा जाए।

जब भी क्रोध आए, तो बड़े प्यार से खुद से पूछें: “अच्छा भाई, तुम गुस्से में क्यों हो?” मन कोई जवाब देगा। फिर पूछें: “लेकिन इस बात पर गुस्सा क्यों?” कुरेदते जाएँ। अंत में मन कोई ऐसी बेवकूफी भरी बात उगल देगा जिसे वह खुद से ही छिपाए बैठा था (जैसे—“लोग मेरे हिसाब से क्यों नहीं चलते!")। ऐसा करने से आप क्रोध को गहराई से समझने लगते हैं और खुद पर से उसकी ताकत कम कर देते हैं।

इसी तरह से कुशल मानसिक स्थितियों (जैसे शांति, स्मृति और समाधि) को भी सँभाला जाता है। आप देखते हैं कि जब ये मौजूद होती हैं, तो मन कितना सुखद होता है। फिर आप समझने की कोशिश करते हैं कि इन्हें कैसे पैदा किया जाए और कैसे लंबे समय तक टिकाए रखा जाए। यह सब प्रयोगों से और गहरी नज़र रखने से ही आता है।

यह ज्ञान बिल्कुल एक बावर्ची के ज्ञान जैसा है। आप अंडे को दूर से देखकर उसके बारे में थोड़ा बहुत ही जान सकते हैं। लेकिन अगर आपको अंडे को सच में समझना है, तो आपको उसे पकाना होगा—उबालना होगा, तलना होगा। काम करते-करते आपको समझ आ जाएगा कि अंडे कितने प्रकार के होते हैं और तापमान का उन पर क्या असर होता है। इसी तरह, मिट्टी को समझने के लिए आपको कुम्हार बनना पड़ता है।

मन के साथ भी ठीक ऐसा ही है। जब तक आप मन को किसी एक स्थिति में टिकाने का प्रयास नहीं करते, तब तक आप उसे समझ ही नहीं सकते। आपको खुद इस प्रक्रिया का हिस्सा बनना होगा।

तीसरा स्तर: पूर्ण संतुलन और विमुक्ति

इस सजग और समाहित अवस्था का एक सबसे बड़ा फायदा यह है कि जैसे-जैसे मन को यह शांति और सुख सुरक्षित लगने लगता है, व्यक्ति को यह गहरा एहसास हो जाता है कि सच्चा सुख और आनंद तो मेरे अपने ही भीतर मौजूद है। इसे पाने के लिए मुझे बाहरी दुनिया, रिश्तों या दूसरों की तारीफ की कोई ज़रूरत नहीं है। इसी बोध से हमारी बाहरी चीज़ों के प्रति आसक्ति (उपादान, लगाव) छूटने लगती है।

जब मन ध्यान के सुख से पूरी तरह पोषित हो जाता है, तब वह अपनी ही गलतियों और मूर्खताओं को देखने और स्वीकार करने के लिए तैयार हो जाता है (जैसे एक भूखे इंसान को उसकी गलती बताना मुश्किल है, लेकिन पेट भरा होने पर वह आराम से बात सुन लेता है)।

धीरे-धीरे, साधक स्मृति-उपस्थान के तीसरे स्तर पर पहुँचता है—यह एक पूर्ण संतुलन की स्थिति है। यहाँ समाधि इतनी पक चुकी होती है कि अब और कुछ करने को बाकी नहीं रहता। इस अवस्था को पाली में ‘अतम्मयता’ (अ-तन्मयता) कहा जाता है।

इस अवस्था में आकर साधक को समझ आता है कि मन की हर प्रक्रिया—यहाँ तक कि समाधि और ज्ञान भी—एक चिपचिपे जाल की तरह है। अगर आप उन्हें अपनी ओर खींचते हैं तो भी फँसते हैं, और अगर दूर धकेलते हैं तो भी फँसते हैं।

तो फिर रास्ता क्या है? रास्ता यह है कि आप अपनी तरफ से वर्तमान क्षण में कुछ भी ‘डालना’ बंद कर दें। अपनी भागीदारी पूरी तरह से खत्म कर दें।

अक्सर लोग शुरुआत में ही इस स्तर की नकल करने की कोशिश करते हैं और ‘कुछ न करने’ का दिखावा करते हैं, लेकिन यह काम नहीं करता। जब तक आप साधना के पहले और दूसरे स्तरों में कुशलता प्राप्त नहीं करते, तब तक आप यह समझ ही नहीं पाते कि आपका मन चुपके-चुपके वर्तमान में कितनी सूक्ष्म छेड़छाड़ कर रहा है। जब आप इन सूक्ष्म चीज़ों के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं, तब आप जान-बूझकर अपनी हर भागीदारी को खत्म कर देते हैं। मन सब कुछ त्याग देता है और अंततः विमुक्ति (मोक्ष/निर्वाण) को प्राप्त हो जाता है।

निष्कर्ष

स्मृति-उपस्थान के इन तीन स्तरों में समाधि की भूमिका बिल्कुल साफ़ है: पहले दो स्तरों में यह आपके कौशल को बढ़ाती है, ताकि आप तीसरे और अंतिम स्तर तक पहुँच सकें।

यदि ‘सम्यक समाधि’ (झान) को लक्ष्य नहीं बनाया गया, तो आप अपने मन को समझने लायक कुशलता कभी हासिल नहीं कर पाएँगे। जैसे किसी झुंड को समझे बिना आप उसे चरा नहीं सकते, वैसे ही सजग और समाहित हुए बिना आप अपने मन में चलने वाली तृष्णा और मुक्ति की धाराओं को कभी नहीं समझ सकते। और जब तक आप इन्हें पूरी तरह समझेंगे नहीं, तब तक आप इन्हें त्याग कर सच्ची आज़ादी कैसे पा सकेंगे?

लेखक: थानिस्सरो भिक्खु

थानिस्सरो भिक्खु

पूज्य गुरुजी थानिस्सरो भिक्खु

आप एक प्रतिष्ठित थेरवादी भिक्षु और ध्यानसाधना के आचार्य हैं, जिन्हें स्नेहपूर्वक “अजान जेफ़” के नाम से भी जाना जाता है। आप अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया स्थित “मेत्ता अरण्य विहार” (Metta Forest Monastery) में निवास करते हैं, जहाँ आपने गहन ध्यान साधना, धर्म-विनय के अनुशासित पालन, और प्राचीन पाली सूत्रों के अध्ययन व शिक्षण को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाया है।

धर्म और विनय पर आपकी गहरी पकड़ और तर्कसम्मत व्याख्यानों से दुनियाभर के भिक्षु और साधक प्रेरित हुए हैं। आपने सुत्तपिटक और विनयपिटक के अधिकांश सूत्रों का अंग्रेज़ी में सरल व सटीक अनुवाद किया है, जिससे पाली बौद्ध सूत्रों की मौलिकता और गहराई जनसामान्य तक सहज रूप से पहुँच सके। आपके ध्यान और बौद्ध दर्शन पर दिए गए प्रवचन आधुनिक जीवन में भी अत्यंत प्रासंगिक हैं, जिससे असंख्य साधकों को आध्यात्मिक दिशा मिली है।

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