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“One Tool Among Many”

विपश्यना

– अनेक साधनाओं में एक साधना –

लेखक: थानिस्सरो भिक्खु
| २० मिनट



विपश्यना वास्तव में क्या है?

प्राचीन ध्यान विधियों पर लगभग सभी वर्णन कहते हैं कि बुद्ध ने दो प्रकार की साधनाएं सिखाईं थीं – शमथ और विपश्यना

  • “शमथ” का अर्थ है “शांति।” यह गहरी ध्यान समाधि (“झान”) लगाने की साधना मानी जाती है।
  • “विपश्यना” का मूल अर्थ है “विशेष रूप से देखना।”

आज इस ‘विपश्यना’ को हम एक अलग प्रकार की “ध्यान विधि” के नाम से जानते हैं। ऐसा माना जाता है कि यह क्षणिक (“खणिक”) समाधि का उपयोग करके, पल-पल होती वेदनाओं की अनित्यता को अनुभूति के स्तर पर जानने की साधना है। इस साधना से संस्कारों (मन के इरादों, कर्मों, घटनाओं – मन में जोड़ने और बनाने की क्रियाओं) के प्रति वैराग्य जागता है। इसके ज़रिए चित्त सभी विकारों और दुखों से मुक्ति पाने लगता है।

कहा जाता है कि शमथ और विपश्यना की दोनों साधनाएँ एक दूसरे से काफ़ी अलग हैं। अध्यात्म के क्षेत्र में, ‘विपश्यना’ को ही भगवान बुद्ध का विशेष योगदान माना जाता है, क्योंकि बुद्ध से पहले भी लोग ‘शमथ’ (ध्यान समाधि) को जानते थे। लेकिन वे बुद्ध ही थे, जिन्होंने ‘विपश्यना’ की खोज की। बेशक कोई साधक ‘विपश्यना’ करने से पहले ‘शमथ’ का अभ्यास करते होंगे, लेकिन बोधि प्राप्त करने के लिए शमथ अनिवार्य नहीं है। ऐसा माना जाता है कि प्रज्ञा और बोधि प्राप्त करने के लिए केवल ‘विपश्यना’ ही पर्याप्त है।

ऐसा सब सुनने में तो आता है। मगर यह किस हद तक सही है?

यदि हम पाली सूत्रों में मूल बुद्ध-वचन देखें, तो वे शमथ का अर्थ “शांति” (चित्त की निश्चलता) और विपश्यना का अर्थ “स्पष्ट दृष्टि” (या अंतर्दृष्टि) ही लेते हैं। लेकिन वे इनके बारे में किसी भी अन्य प्रचलित मान्यता की पुष्टि नहीं करते।

प्राचीन सूत्रों में “विपश्यना” शब्द बहुत ही कम दिखाई देता है, जबकि “झान” शब्द बार-बार आता है। जैसे, भगवान बुद्ध हमेशा कहते हैं, “जाओ झान (ध्यान) करो!” वे ऐसा कभी नहीं कहते कि “जाओ विपश्यना करो।”

जब बुद्ध “विपश्यना” शब्द का उपयोग करते हैं, तब वे किसी विशेष ध्यान साधना के बारे में बात नहीं कर रहे होते। “विपश्यना” का उल्लेख अक्सर “शमथ” के साथ ही किया जाता है। यहाँ ये शब्द अलग-अलग ध्यान विधियों के नाम नहीं हैं। बल्कि ये दो प्रकार के मानसिक गुण हैं, जिन्हें साधक प्राप्त कर सकता है, और जिन्हें एक साथ ही विकसित किया जाना चाहिए।

एक उपमा में (संयुक्तनिकाय 35:204), विपश्यना और शमथ की तुलना दो राजदूतों से की गई है। ये राजदूत शरीर रूपी नगर में आर्य अष्टांगिक मार्ग से प्रवेश करते हैं और अपना सही संदेश (यानी निर्वाण) नगर के प्रधान (चेतना) को सौंपते हैं।

एक और सूत्र (अंगुत्तरनिकाय 10:71) कहता है कि, जो व्यक्ति मानसिक विकार समाप्त करना चाहे, उसे शील में परिपूर्ण, एकांत के प्रति समर्पित, शमथ पर दृढ़, और विपश्यना में संपन्न होना चाहिए। यह बात मामूली लग सकती है। मगर उसी सूत्र में यही सलाह उन्हें भी दी जाती है जो चार झानों में निपुणता चाहते हैं – उन्हें भी शमथ पर दृढ़ और विपश्यना में संपन्न होना चाहिए।

इससे प्रतीत होता है कि सूत्रों का संकलन करने वालों के अनुसार, शमथ, झान और विपश्यना एक ही मार्ग के अंग हैं। झान में कुशलता प्राप्त करने के लिए शमथ और विपश्यना दोनों की आवश्यकता होती है। फिर झान के आधार पर शमथ और विपश्यना को और भी विकसित किया जाता है, ताकि वे मन के विकारों को समाप्त कर सकें और उसे दुख से मुक्त कर सकें। यही तात्पर्य अन्य सूत्रों से भी निकलता है।

उदाहरण के लिए, अंगुत्तरनिकाय 4:170 तीन प्रकार के रास्तों का वर्णन करता है जहाँ शमथ और विपश्यना मिलकर काम करते हैं और बोधि तक ले जाते हैं। या तो विपश्यना से पहले शमथ विकसित की जाती है, या शमथ से पहले विपश्यना, या फिर दोनों को एक साथ बढ़ाया जाता है। इस वर्णन में “बैल गाड़ी” की उपमा का प्रतीकात्मक प्रयोग किया गया है – अगर दो बैल गाड़ी खींच रहे हैं, तो उन्हें या तो एक-के-पीछे-एक बांधा जाएगा, या फिर दोनों को साथ-साथ।

अंगुत्तरनिकाय 4:94 में बताया गया है कि यदि विपश्यना शमथ से ज्यादा बलवान हो जाए, या शमथ विपश्यना से, तो साधना असंतुलित हो जाती है और उसे सुधारने की आवश्यकता होती है।

ऐसा साधक जिसने थोड़ी शमथ तो प्राप्त कर ली है, मगर “उच्च प्रज्ञा के आधार पर मानसिक घटनाओं में विपश्यना” (“अधिपञ्ञा-धम्म-विपस्सना”) नहीं, तो उसे विपश्यना में कुशल किसी साथी साधक (सह-ब्रह्मचारी) से पूछना चाहिए। उसे पूछना चाहिए – “संस्कारों को कैसे समझना चाहिए? उनकी जांच कैसे करनी चाहिए? उन्हें स्पष्ट रूप से कैसे देखना चाहिए?” और फिर उस अनुभवी व्यक्ति की सलाह के अनुसार विपश्यना बढ़ानी चाहिए।

इन प्रश्नों के क्रिया शब्द – “समझना,” “जांच करना,” “देखना” – दर्शाते हैं कि विपश्यना बढ़ाने के लिए केवल कोई एक ध्यान विधि पर्याप्त नहीं है। वास्तव में, हम देखेंगे कि ये क्रियाएं हमें खुद से एक कुशल प्रकार की पूछताछ करने में सहायता करती हैं। इसे “उचित विषय पर ध्यान देना” (पाली में “योनिसो मनसिकार”) कहा जाता है।

इसके विपरीत स्थिति में, जहाँ साधक को घटनाओं में थोड़ी सी प्रज्ञा आधारित विपश्यना प्राप्त हो गई हो, मगर शमथ नहीं, वहाँ उसे शमथ में कुशल व्यक्ति से पूछना चाहिए – “मन को स्थिर कैसे किया जाए? स्थापित कैसे किया जाए? एकाग्र कैसे किया जाए? समाहित कैसे किया जाए?” और फिर उस व्यक्ति की सलाह के अनुसार शमथ बढ़ानी चाहिए।

यहाँ जिन क्रियाओं का उपयोग किया गया है, उनसे प्रतीत होता है कि इस संदर्भ में “शमथ” का अर्थ “झान” है। क्योंकि ये वही क्रियाएं हैं जिनसे अन्य सूत्रों में बार-बार झान की व्याख्या की गई है – “मन स्थिर हो जाता है, स्थापित हो जाता है, एकाग्र और समाहित हो जाता है।”

इस बात की पुष्टि एक और तथ्य से होती है। अक्सर यह प्रश्न उठता है कि मुक्ति के लिए आवश्यक प्रज्ञा को जगाने के लिए कितनी समाधि पर्याप्त होती है? सूत्रों में जब भी इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर दिया गया है, उन्होंने समाधि का वह पर्याप्त स्तर “झान” ही बताया है।

जब साधक शमथ और विपश्यना दोनों में कुछ हद तक कुशल हो जाए, तब उसे एक नया प्रयास करना चाहिए। उसे “इन कुशल मानसिक गुणों को आस्रवों के क्षय के लिए और अधिक विकसित करने की मेहनत करनी चाहिए।” (“आस्रव” का अर्थ है मन से बहने वाली अकुशलता की धाराएं, जिनके कारण पुनर्जन्म होता है।)

तीन प्रकार के आस्रव होते हैं –

  1. कामुक राग का आस्रव,
  2. भव का आस्रव (यानी किसी लोक में अस्तित्व ग्रहण करने की इच्छा),
  3. अविद्या का आस्रव (यानी चार आर्य सत्यों के बजाय किसी अन्य धारणा से अस्तित्व को देखना)।

यहाँ उस स्थिति की व्याख्या हो रही है जहाँ शमथ और विपश्यना एक साथ बढ़ रहे हैं।

मज्झिमनिकाय 149 में इसे विस्तार से समझाया गया है। छः इंद्रियों, उनके विषयों, प्रत्येक इंद्रिय की चेतना, प्रत्येक इन्द्रिय पर विषय का स्पर्श, और जो भी इस स्पर्श के कारण उत्पन्न हो (चाहे सुखद, दुखद, या अदुक्खमसुख यानी न दुःखद न सुखद अनुभूति) – इन सबको वैसे ही देखना और जानना जैसे वे वास्तव में हैं।

इन सारी घटनाओं से निर्लिप्त रहकर ध्यान बनाए रखना – अनासक्त भाव से, आत्मविश्वास के साथ, उनकी कमियों पर ध्यान रखते हुए, उनके प्रति तृष्णा को त्यागना – इसे विपश्यना माना जाएगा। साथ ही, शारीरिक और मानसिक पीड़ाओं और मुसीबतों को छोड़कर सुख-शांति का अनुभव करना – इसे शमथ माना जाएगा। इस प्रकार, यह साधना विपश्यना और शमथ को एक साथ विकसित करते हुए सभी 37 “बोधिपाक्षिक धर्मों” को पूरा करती है, जिनमें झान की प्राप्ति भी शामिल है।

तो सही मार्ग वह है जिसमें विपश्यना और शमथ को संतुलन में लाया जाए। यहाँ ये दोनों गुण एक दूसरे के सहायक और मार्गदर्शक बन जाते हैं। विपश्यना के कारण, शमथ की स्थिरता और शांति भ्रमित, आलस से भरी (सुस्त), या धुंधली नहीं होती। वहीं शमथ के कारण, साधना में द्वेष पैदा नहीं होता। अन्यथा मन को जबरदस्ती वर्तमान में बांधे रखने से घबराहट, चक्कर आना, उल्टी आना या भय जैसी समस्याएँ पैदा हो सकती हैं।

इस व्याख्या से ज़ाहिर है कि शमथ और विपश्यना दो अलग-अलग ध्यान विधियां नहीं हैं। बल्कि ये वर्तमान क्षण पर ध्यान देने के दो पहलू हैं, जो एक दूसरे को पूरा करते हैं। शमथ से वर्तमान क्षण में एक सुखद निवास मिलता है। विपश्यना से वर्तमान की घटनाओं का स्पष्ट दर्शन होता है, ठीक वैसे ही जैसे वे सचमुच हो रही हैं।

यह भी स्पष्ट है कि झान में कुशलता प्राप्त करने हेतु दोनों गुणों को एक साथ काम क्यों करना होगा। जैसा कि आनापानसति (मज्झिमनिकाय 118) के निर्देश बताते हैं, इस कौशल में तीन बातें शामिल हैं – मन को मुदित करना, समाहित करना, और विमोचित करना (मुक्त करना)। मुदित करने का अर्थ है वर्तमान में सुख और आनंद महसूस करना। समाहित करने का अर्थ है मन को ध्यान के विषय पर स्थिर रखना। और विमोचित करने का अर्थ है मन को स्थूल समाधि की स्थिति से सूक्ष्म की ओर ले जाने के लिए उन प्रक्रियाओं को छोड़ना जो बाधा बन रही हों।

ये पहली दो क्रियाएं शमथ के कार्य हैं, और तीसरी विपश्यना का। तीनों को साथ मिलकर काम करना होगा। अगर मन को बिना कुछ त्यागे केवल मुदित और समाहित किया जाए, तो मन अपनी समाधि का शोधन ही नहीं कर पाएगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि जो प्रक्रियाएं मन को समाधि के किसी एक स्तर तक पहुँचाती हैं, उन्हें ही त्यागने पर मन उससे गहरे स्तर तक पहुँच सकता है (अंगुत्तरनिकाय 9:34)।

मन को बिल्कुल उन्हीं प्रक्रियाओं से मुक्त करना, जो समाधि के निचले स्तर को कायम रखती हैं मगर उच्च स्तर के लिए बाधा बन जाती हैं – ऐसा कुशलतापूर्वक करने का एक ही उपाय है। वह उपाय है वर्तमान में मानसिक घटनाओं का स्पष्ट निरीक्षण करना। वहीं दूसरी ओर, अगर बिना यह पहचाने केवल उन प्रक्रियाओं को त्यागने का प्रयास किया जाए कि त्यागने पर मन की स्थिरता कैसे गहरी होती है, तो मन समाधि से बाहर ही निकल जाएगा। इसीलिए सम्यक समाधि में कुशलता प्राप्त करने के लिए शमथ और विपश्यना को साथ-साथ काम करना होगा।

फिर प्रश्न उठता है – अगर झान में कुशलता प्राप्त करने के लिए शमथ के साथ-साथ विपश्यना की भी भूमिका है, और झान केवल बौद्धों की साधना नहीं है, तो फिर विपश्यना कैसे केवल बौद्धों की हुई? उत्तर यह है कि विपश्यना भी केवल बौद्धों की नहीं है।

शमथ और विपश्यना में विशेष रूप से बौद्ध योगदान ये हैं –

  1. जिस हद तक दोनों को विकसित किया गया।
  2. उन्हें विकसित करने का मार्ग, यानी किन प्रकार के प्रश्नों द्वारा उन्हें बढ़ाया गया।
  3. मन की पूर्ण मुक्ति लाने के लिए कैसे उनका अलग-अलग साधनाओं के साथ उपयोग किया गया।

मज्झिमनिकाय 73 में बुद्ध एक ऐसे भिक्षु को निर्देश देते हैं जो झान में सम्पन्न हो चुका है। वे उसे शमथ और विपश्यना को और विकसित करने की सलाह देते हैं ताकि वह छः चैतसिक कौशलों (अभिज्ञाओं) में संपन्नता प्राप्त कर सके। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है: “मानसिक आस्रवों की समाप्ति से वह आस्रव-रहित चित्त-विमुक्ति और प्रज्ञा-विमुक्ति में निवास करता है, स्वयं उन्हें अस्तित्व में लाकर और जानकर, अभी और यहीं।” यह बौद्ध धर्म के अंतिम लक्ष्य की व्याख्या है। कुछ लेखकों के मुताबिक यह केवल विपश्यना का फल है, मगर कुछ सूत्र ऐसे हैं जिनसे बात अलग मालूम पड़ती है।

पहले देखिए कि मुक्ति के दो अंग हैं – चित्त-विमुक्ति और प्रज्ञा-विमुक्ति। चित्त-विमुक्ति तब होती है जब साधक राग के प्रति पूरी तरह से वैरागी हो जाता है। यह शमथ का अंतिम फल है। प्रज्ञा-विमुक्ति तब होती है जब अविद्या के प्रति वैराग्य जागता है। यह विपश्यना का अंतिम फल है (अंगुत्तरनिकाय 2:29-30)। इस प्रकार, शमथ और विपश्यना दोनों इस दो-अंग वाली विमुक्ति में भाग लेते हैं।

“सब्बासव सुत्त” में कहा गया है कि मुक्ति “आस्रव-रहित” तभी होती है जब साधक “उचित तरह से ध्यान देता है” (योनिसो मनसिकार)। सूत्र में समझाए गए अनुसार, उचित तरह से ध्यान देने का मतलब घटनाओं के बारे में उचित प्रश्न उठाना है – स्वयं/अन्य या अस्तित्व/अस्तित्वहीनता के संदर्भ में नहीं, बल्कि चार आर्य सत्यों के संदर्भ में।

यानी कि, “क्या मैं हूँ? क्या नहीं हूँ? मैं क्या हूँ?” पूछे बिना, किसी भी अनुभव के बारे में यह पूछना: “क्या यह दुख है? दुख का कारण है? दुख की समाप्ति है? दुख समाप्ति का मार्ग है?” चूँकि चारों सत्यों के साथ संबंधित कर्तव्य जुड़े हैं, ये प्रश्न उत्तर के रूप में कार्रवाई मांगते हैं – दुख को समझना चाहिए, उसके कारण को त्यागना चाहिए, उसकी समाप्ति का साक्षात्कार करना चाहिए, और उसकी समाप्ति के मार्ग को विकसित करना चाहिए।

चूंकि शमथ और विपश्यना मार्ग वाले सत्य में शामिल हैं, इसलिए उन्हें विकसित करना चाहिए। यह करने के लिए, हमें दुख को समझने के कार्य पर उचित ध्यान देना पड़ेगा। दुख को “पांच उपादान स्कंधों” (आसक्ति के स्कंधों) के स्तर पर समझना होगा। ये स्कंध हैं: रूप (शरीर), वेदना (संवेदना), संज्ञा (किसी घटना को नाम देने या पहचानने की क्रिया), संस्कार (मानस और शरीर की घटनाओं को जोड़ने की क्रिया, जैसे कि विचारों की उत्पत्ति), और विज्ञान (इंद्रियों पर होने वाली घटनाओं को जानने की चेतना)।

इन स्कंधों पर उचित ध्यान देने का अर्थ है इनकी कमियों पर ध्यान देना। यह देखना कि ये हैं “अनित्य, दुखदायक, एक रोग, एक फोड़ा, एक तीर, बुरे, एक पीड़ा, पराए, एक विघटन, शून्य, अनात्मीय” (संयुक्तनिकाय 22:122)। इस कार्य को पूरा करने के लिए बुद्ध की एक विशेष प्रश्न सूची है – “यह स्कंध नित्य है या अनित्य?” “और जो अनित्य है वह सुखदायक होता है या दुखदायक?” “और जो अनित्य है, दुखदायक है, परिवर्तनशील है, क्या उसके बारे में ऐसा मानना उचित है कि ‘यह मेरा है, यह मैं हूँ, यह मेरी आत्मा है’?” (संयुक्तनिकाय 22:59)।

पांचों स्कंधों के हर उदाहरण पर ये प्रश्न पूछे जाते हैं, चाहे वे जैसे भी प्रकट हों – “अतीत, वर्तमान या भविष्य के, आंतरिक या बाहरी, स्थूल या सूक्ष्म, साधारण या उत्कृष्ट, पास या दूर।” यानी कि, साधक अपने छः इंद्रियों के लोक में हर अनुभव के बारे में ये प्रश्न पूछता है।

यह प्रश्न सूची एक खास प्रकार के ज्ञान तक पहुँचाने वाली रणनीति का हिस्सा है। उस ज्ञान को कहते हैं “जैसे (घटना) हो गई है, वैसे उसे देखना और जानना” (“यथा भूत ञाण दस्सन”)। इसमें, घटनाओं को पांच स्तरों के माध्यम से जाना जाता है – उनका उदय, उनका व्यय, उनका आकर्षण, उनकी कमियां, और उनसे छुटकारा (जो वैराग्य से मिलता है)।

कुछ लेखकों के अनुसार, ये पांच स्तरों वाली दृष्टि केवल पहले दो स्तरों पर ध्यान देने से हासिल हो सकती है। उनका मानना है कि वर्तमान में स्कंधों के उदय और व्यय पर निरंतर ध्यान रखने से स्वाभाविक रूप से आकर्षण, कमियां और छुटकारे का ज्ञान हो जाएगा, जो पूर्ण विमुक्ति के लिए पर्याप्त है।

मगर सूत्र इस बात की पुष्टि नहीं करते, और व्यावहारिक अनुभव से भी यह बात सही नहीं लगती। जैसा कि मज्झिमनिकाय 101 में कहा गया है, हर साधक पाएगा कि स्थिति के हिसाब से, कभी केवल समता (उपेक्षा) से देखकर ही वह दुख के किसी कारण के प्रति वैराग्य जगा लेगा। मगर कभी-कभी उसे वैराग्य जगाने के लिए जानबूझकर प्रयत्न करना पड़ेगा, जिससे छुटकारा मिल सके। किस स्थिति में कौन-सी तरकीब काम करेगी, इसके बारे में सूत्र अस्पष्ट हैं, और शायद जानबूझकर। यह एक ऐसी बात है जो प्रत्येक साधक को स्वयं अपने अनुभव से जाननी पड़ेगी।

सब्बासव सुत्त इस बात को और विस्तार से समझाता है। उसमें वैराग्य जगाने के लिए सात प्रकार की साधनाओं की व्याख्या की गई है। विपश्यना, एक मानसिक गुण के तौर पर, सातों से संबंधित है। मगर यह सबसे स्पष्ट रूप से पहली साधना के साथ जुड़ी है – “देखना” – यानी, हर घटना को चार आर्य सत्यों और उनसे संबंधित कर्तव्यों के संदर्भ में देखना।

बाकी की छः साधनाएँ इन कर्तव्यों को पूरा करने में सहायक बनती हैं। वे हैं –

  • अकुशल मनोस्थिति पैदा करने वाले इंद्रिय-विषयों से मन का संयम करना।
  • भोजन, कपड़ा, घर और दवा – इन चार आवश्यकताओं के उपयोग के उचित कारणों पर चिंतन करना।
  • दुखद संवेदनाओं को सहना।
  • प्रत्यक्ष खतरों और अनुचित साथियों से दूर रहना।
  • कामुक इच्छा, दुर्भावना, हिंसकता, और अन्य अकुशल गुणों को नष्ट करना।
  • सात बोध्यांगों (बोधि के अंगों) को विकसित करना – यानी कि, स्मृति, धर्म-विचय (मानसिक गुणों का विश्लेषण), वीर्य (परिश्रम), प्रीति, प्रस्सद्धि (शांति), समाधि, और उपेक्षा (समता)।

प्रत्येक साधना में कई तरीके शामिल हैं। जैसे “नष्ट करने” के वक्त हम किसी अकुशल मनोस्थिति को पांच तरीकों से हटा सकते हैं – उसकी जगह एक कुशल मनोस्थिति स्थापित करके, उसकी कमियों के बारे में सोचकर, उस पर से ध्यान हटाकर, उसे जगाने वाले विचार-संस्कारों को शांत करके, या बस अपनी इच्छा शक्ति से उसका दमन करके (मज्झिमनिकाय 20)। अन्य सूत्रों में ऐसे कई उदाहरण ढूंढे जा सकते हैं।

मूल बात यह है कि मन के तौर-तरीके जटिल और विभिन्न हैं। अलग-अलग किस्म के आस्रव अलग-अलग रूप धारण करके उमड़-उमड़ कर आ सकते हैं। इनसे अलग-अलग साधनाओं द्वारा निपटना होगा। एक साधक का कौशल यही है कि वह भिन्न-भिन्न तरीकों में निपुणता प्राप्त कर ले और अपनी संवेदनशीलता विकसित कर ले, ताकि वह जान सके कि कब कौन-सा तरीका काम करेगा।

मगर इन सबसे पहले हमें इन कौशलों को सीखने की प्रेरणा जगानी होगी और उसे तीव्र रखना होगा। आम तौर पर चिंतन के जो मूलभूत वर्ग हैं – जैसे कि “अस्तित्व होना/न होना” या “मैं/अन्य” – उचित तरह से ध्यान देने के लिए इन्हें ही छोड़ना पड़ता है। इसीलिए, साधक को उचित विषय पर ध्यान देने के कार्य को अपनाने के लिए बड़े तगड़े कारण चाहिए होते हैं।

सब्बासव सुत्त में कहा गया है कि जो भी उचित विषय पर ध्यान देना सीखना चाहे, उसे सबसे पहले आर्य लोगों को श्रेष्ठ मानना होगा। यानी भगवान बुद्ध और उनके जागृत शिष्यों को सर्वोत्तम मानना होगा। उनके शिक्षण और अनुशासन में शिक्षित भी होना होगा। मज्झिमनिकाय 118 के अनुसार, इसका अर्थ है कि कर्म और पुनर्जन्म की शिक्षा पर विश्वास करना होगा। इससे चार आर्य सत्यों को अनुभव के मूलभूत वर्गों के रूप में अपनाने की दार्शनिक और भावनात्मक प्रेरणा मिलती है। उनके अनुशासन में शिक्षित होने में शील का पालन करना और आस्रव समाप्ति की उल्लिखित सात साधनाओं में कौशल बनाए रखना शामिल है।

इस प्रकार की तैयारी के बिना, साधक वर्तमान में उदय-व्यय देखने की साधना में गलत दृष्टिकोण, मनोभाव और अपेक्षाएं लेकर आ सकता है। इस कारण वह गलत प्रश्न पूछने लगेगा। जैसे कि अगर कोई अपनी “सच्ची आत्मा” की खोज में हो, तो वह जाने-अनजाने समाधि की किसी विशाल, खुली हुई मनोस्थिति से आसक्ति पैदा कर सकता है जो हर बदलाव को स्वीकार करती लगती हो। या फिर, साधक पूरे ब्रह्मांड से संयुक्त होने का आभास चाह सकता है, यह मानते हुए कि कुछ भी नित्य ढूंढना मूर्खता है क्योंकि सबकुछ तो बदलता ही जाता है।

ऐसी कामनाएँ रखने वाले व्यक्ति को केवल वर्तमान में घटनाओं के उत्पाद-व्यय के अनुभव से पांच स्तरों वाला “यथा भूत” ज्ञान नहीं मिलेगा। वह अपने खयालों को “दृष्टियों के आस्रव (प्रवाह)” या समाधि की शांत मानसिक स्थिति को “भव (होने) के आस्रव” के रूप में देखने से कतराएगा। नतीजतन, वह इन अनुभवों पर चार आर्य सत्यों को लागू करना नहीं चाहेगा। सिर्फ़ एक ऐसा व्यक्ति जो इन आस्रवों को आस्रव के रूप में देखने के लिए तैयार हो, और ऐसी दृष्टि रखने की ज़रूरत समझता हो, वही उचित ध्यान देने और आस्रवों से छुटकारा पाने के योग्य होगा।

तो, अपने प्रारंभिक प्रश्न पर लौटते हुए – विपश्यना किसी साधना विधि का नाम नहीं, बल्कि एक मानसिक गुण का नाम है। इसका अर्थ है वर्तमान में हो रही घटनाओं को स्पष्ट रूप से देखने का कौशल। स्मृति और सजगता विपश्यना के लिए बेशक सहायक हैं, मगर केवल उनके सहारे पूर्ण विमुक्ति लाने वाली विपश्यना का विकास नहीं हो सकता। अन्य साधनाओं और तरीकों की भी ज़रूरत होती है।

विशेष रूप से, विपश्यना के साथ शमथ की भी ज़रूरत है। इसका अर्थ है वर्तमान में शांत और सुखद रूप से मन को स्थिर करने का कौशल, ताकि साधक झान (तीव्र समाधि की अवस्था) में निपुण हो जाए। फिर वह इस निपुणता के आधार पर शमथ और विपश्यना का उपयोग करता है और अपने पूरे अनुभव के बारे में कुशल रूप से पूछताछ करता है (जिसे उचित विषयों पर ध्यान देना कहते हैं)। इसमें घटनाओं का विश्लेषण “मैं/अन्य” या “अस्तित्व है/अस्तित्व नहीं है” के संदर्भ में नहीं किया जाता, बल्कि चार आर्य सत्यों के संदर्भ में किया जाता है। यह तब तक किया जाता है जब तक कि हर घटना का पांच अंगों वाला ज्ञान (उत्पाद, व्यय, आकर्षण, कमी, और छुटकारा) न मिल जाए। केवल तब मन मुक्ति चख पाएगा।

शमथ और विपश्यना के विकास के लिए और भी बहुत से मानसिक भावों, गुणों और साधना विधियों की ज़रूरत होती है। इसीलिए बुद्ध इन्हें एक महान कार्यक्रम का हिस्सा बनाकर सिखाते थे। इसमें आर्य लोगों का आदर करना, मानसिक आस्रवों को त्यागने की सातों तरकीबें सीखना, और आर्य मार्ग के आठों अंगों को विकसित करना शामिल है।

पूरी साधना को किसी एक छोटे अंश के समान मानने से परिणाम भी छोटे ही मिलेंगे। साधना बढ़ईगिरी की तरह एक कौशल है। इसमें निपुणता प्राप्त करने के लिए अलग-अलग परिस्थितियों के मुताबिक ढेरों उपकरणों के उपयोग में निपुणता प्राप्त करनी होगी। अपने आप को केवल एक साधना तक सीमित रखने का मतलब ऐसा है जैसे कोई घर बनाने की कोशिश कर रहा हो, मगर उसकी औजार पेटी में केवल एक हथौड़ा ही हो।

लेख समाप्त।

लेखक

थानिस्सरो भिक्खु

पूज्य गुरुजी थानिस्सरो भिक्खु

आप एक प्रतिष्ठित थेरवादी भिक्षु और ध्यानसाधना के आचार्य हैं, जिन्हें स्नेहपूर्वक “अजान जेफ़” के नाम से भी जाना जाता है। आप अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया स्थित “मेत्ता अरण्य विहार” (Metta Forest Monastery) में निवास करते हैं, जहाँ आपने गहन ध्यान साधना, धर्म-विनय के अनुशासित पालन, और प्राचीन पाली सूत्रों के अध्ययन व शिक्षण को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाया है।

धर्म और विनय पर आपकी गहरी पकड़ और तर्कसम्मत व्याख्यानों से दुनियाभर के भिक्षु और साधक प्रेरित हुए हैं। आपने सुत्तपिटक और विनयपिटक के अधिकांश सूत्रों का अंग्रेज़ी में सरल व सटीक अनुवाद किया है, जिससे पाली बौद्ध सूत्रों की मौलिकता और गहराई जनसामान्य तक सहज रूप से पहुँच सके। आपके ध्यान और बौद्ध दर्शन पर दिए गए प्रवचन आधुनिक जीवन में भी अत्यंत प्रासंगिक हैं, जिससे असंख्य साधकों को आध्यात्मिक दिशा मिली है।

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