
पोट्ठपाद परिव्राजक
सूत्र परिचय
दुनिया भर में ऐसे परिव्राजक मिलते हैं, जो अपनी सीमाओं से परे जाकर दूसरे देशों की सभ्यता, संस्कृति और दर्शन को समझने के लिए यात्रा करते हैं। प्राचीन भारत में इन्हें “परिव्राजक” कहा जाता था, जबकि आधुनिक पश्चिमी दुनिया में इन्हें “हिप्पी” के रूप में पहचाना जाता है। इनकी जीवनशैली सामान्य सामाजिक नियमों से हटकर होती है। भारतीय परंपरा में राहुल सांकृत्यायन जैसे परिव्राजक विद्वान इसी प्रवृत्ति के उदाहरण थे, जो ज्ञान की खोज में यात्रा करते रहे।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से, ऐसे परिव्राजकों का मानसिक स्वभाव प्रवाही और विद्रोही होता है। वे पारंपरिक ढाँचों और समाज द्वारा स्थापित स्थिरता को अस्वीकार करते हैं, क्योंकि उनकी आत्मा स्वतंत्रता और आत्म-अभिव्यक्ति की ओर उन्मुख होती है। यह विद्रोही मानसिकता उन्हें समाज के हर अनुशासन को चुनौती देने के लिए प्रेरित करती है, कभी-कभी उनके अपने भीतर के बंधनों को भी।
वे तात्कालिक अनुभवों और क्षणिक इच्छाओं की ओर आकर्षित होते हैं, जिससे दीर्घकालिक स्थायित्व उनके लिए अप्रासंगिक हो जाता है। उनकी विद्रोही ऊर्जा उन्हें रचनात्मक और अनूठा बनाती है, लेकिन यह अस्थिरता और गहरे संबंधों की कमी का कारण भी बन सकती है। ऐसे दिमाग को नियंत्रित करने और दिशा देने में केवल गहरे बोध वाले गुरु ही सफल हो सकते हैं, जैसा कि ओशो रजनीश ने अपने शिष्यों के साथ किया।
इस सूत्र में भगवान बुद्ध ऐसे ही परिव्राजकों से मिलते हैं और आत्मा से जुड़े विभिन्न दृष्टिकोणों पर उत्तर देते हुए विशिष्ट धारणाओं का खंडन करने का प्रयास करते हैं। परिव्राजकों को ठोस और निर्णायक मार्ग के बारे में सुनना रोचक और प्रेरणादायक तो लगता है, लेकिन उनके प्रवाही और विद्रोही स्वभाव के कारण, वे अक्सर इस मार्ग पर चलने से कतराते हैं या भटक जाते हैं।
फिर भी, एक परिव्राजक दुबारा आकर भगवान से मार्गदर्शन मांगता है। इस पर भगवान बुद्ध उसे गहरे धम्म की देशना देते हुए आत्मा की तीन अवस्थाओं के बारे में विस्तार से समझाते हैं, जो उसे उपासक बनने पर जरूर मजबूर करती है, लेकिन वह प्रतिबद्ध नहीं हो पाता। किन्तु, पास ही बैठा दूसरा साधारण व्यक्ति उसी उत्तर को सुनकर भिक्षु बनने की ठानता है, और अरहंतपद का साक्षी बनता है।
हिन्दी
पोट्ठपाद परिव्राजक
ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के जेतवन उद्यान में विहार कर रहे थे। उस समय पोट्ठपाद परिव्राजक वाद-विवाद करने के लिए तीन-सौ परिव्राजकों की बड़ी परिषद के साथ आबनूस के पेड़ों से घिरे हुए मल्लिका के एक-मंडप उद्यान में आकर रह रहा था। तब भगवान ने प्रातःकाल में चीवर ओढ़, पात्र और संघाटि ले, भिक्षाटन के लिए श्रावस्ती में प्रवेश किया।
तब भगवान को लगा, “अभी श्रावस्ती में भिक्षाटन के लिए जाना जल्दी होगा। क्यों न मैं अभी वाद-विवाद करने के लिए आबनूस के पेड़ों से घिरे हुए मल्लिका के एक-मंडप उद्यान में जाऊँ, जहाँ पोट्ठपाद परिव्राजक है?”
तब भगवान वाद-विवाद करने के लिए आबनूस के पेड़ों से घिरे हुए मल्लिका के एक-मंडप उद्यान में गए, जहाँ पोट्ठपाद परिव्राजक था।
उस समय पोट्ठपाद परिव्राजक, परिव्राजकों की बड़ी परिषद के साथ चीखते-चिल्लाते शोर मचाते हुए, नाना-तरह की पशुवत चर्चा में लगा हुआ था। 1 जैसे—राजाओं की बातें, चोरों की बातें, महामंत्रियों की बातें; सेना, भय और युद्ध की बातें; भोजन, पान, वस्त्र की बातें; शय्या, माला और गन्ध की बातें; रिश्तेदारों, यान (वाहन), गाँव, निगम (कस्बे), नगर और जनपद (देश) की बातें; स्त्रियों और शूरवीरों की बातें; सड़क और पनघट (कुएं) की बातें; भूत-प्रेतों की बातें; दुनिया की विविध घटनाएँ; ब्रह्मांड और समुद्र की उत्पत्ति की बातें, अथवा ‘भव-विभव’ (वस्तुओं के अस्तित्व में होने न होने) की बातें।
तब पोट्ठपाद परिव्राजक ने भगवान को दूर से आते हुए देखा, और अपनी परिषद को चुप कराया, “शान्त हो जाओ, श्रीमानों! आवाज मत करों! यहाँ श्रमण गौतम आ रहे है। इन आयुष्मान को शान्ति पसंद है, धीमा बोलने की सिफ़ारिश करते है। संभव है, अपनी परिषद शान्त देख यहाँ आए।”
ऐसा कहा जाने पर परिव्राजक चुप हो गए।
तब भगवान पोट्ठपाद परिव्राजक के पास गए। पोट्ठपाद परिव्राजक ने भगवान से कहा, “आईये भन्ते, भगवान! स्वागत है भन्ते, भगवान! बहुत दिन बीतें, भन्ते, जो भगवान ने यहाँ आने का अवसर लिया! बैठिए, भन्ते, भगवान, ये आसन तयार है।”
भगवान बिछे आसन पर बैठ गए। जबकि पोट्ठपाद परिव्राजक ने नीचे दूसरा आसन बिछाया, और एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे पोट्ठपाद परिव्राजक को भगवान ने कहा, “यहाँ बैठकर अभी क्या चर्चा चल रही थी, पोट्ठपाद? कौन-सी चर्चा अधूरी रह गई?”
ऐसा कहने पर पोट्ठपाद परिव्राजक ने भगवान से कहा, “जाने दीजिये, भन्ते, कि हम यहाँ बैठकर अभी क्या चर्चा कर रहे थे। बाद में वैसी चर्चा सुनना दुर्लभ नहीं है।
कुछ दिनों पहले, भन्ते, भिन्न-भिन्न समुदायों के श्रमण और ब्राह्मण कौतूहल-मंडप (=जहाँ वाद-विवाद होता हो) में साथ बैठकर, साथ चर्चा करते हुए, उनकी अभिसंज्ञा-निरोध पर बात निकली थी—‘यह अभिसंज्ञा-निरोध कैसे होता है?’ 2
अभिसंज्ञा-निरोध
किसी ने कहा, ‘अकारण, बिना परिस्थिति के ही व्यक्ति की संज्ञा उत्पन्न होती है और निरुद्ध होती है। जिस समय उपजते हैं, आप बोधगम्य होते है। जिस समय खत्म होते हैं, आप अबोधगम्य होते है।’ इस तरह किसी ने अभिसंज्ञा-निरोध बताया।
तब किसी और ने कहा, ‘ऐसे नहीं होता है, श्रीमान। बल्कि कुछ श्रमण और ब्राह्मण महाशक्तिशाली महासक्षम होते हैं। वे व्यक्ति में संज्ञा डालते हैं और निकालते हैं। जिस समय डालते हैं, आप बोधगम्य होते है। जिस समय निकालते हैं, आप अबोधगम्य होते है।’ इस तरह किसी ने अभिसंज्ञा-निरोध बताया।
तब किसी और ने कहा, ‘ऐसे नहीं होता है, श्रीमान। बल्कि कुछ देवता महाशक्तिशाली महासक्षम होते हैं। वे व्यक्ति में संज्ञा डालते हैं और निकालते हैं। जिस समय डालते हैं, आप बोधगम्य होते है। जिस समय निकालते हैं, आप अबोधगम्य होते है।’ इस तरह किसी ने अभिसंज्ञा-निरोध बताया।
तब, भन्ते, मुझे भगवान की याद आयी, ‘अरे वे भगवान ही है, सुगत ही है, जो इन धर्मों में सुकुशल (=अच्छे निपुण) है!’ भगवान ही कुशल है, भन्ते, भगवान ही अभिसंज्ञा-निरोध में विद्वान है! तो, भन्ते, अभिसंज्ञा-निरोध कैसे होता है?”
कारणपूर्ण संज्ञा
(भगवान ने कहा,) “इस बारे में, पोट्ठपाद, जो श्रमण और ब्राह्मण कहते हैं कि ‘अकारण, बिना परिस्थिति के ही व्यक्ति की संज्ञा उत्पन्न होती है और निरुद्ध होती है’, वे आरंभ से ही गलत हैं। ऐसा क्यों?
क्योंकि व्यक्ति की संज्ञा कारण के साथ (“स-हेतु”) और (ख़ास) परिस्थिति में ही (“स-पच्चय”) उपजते हैं और खत्म भी होते हैं। शिक्षा से एक तरह की संज्ञा उत्पन्न होती है, और शिक्षा से एक तरह की संज्ञा निरुद्ध होती है। कैसी शिक्षा?” भगवान ने कहा।
“ऐसा होता है, पोट्ठपाद! यहाँ कभी इस लोक में ‘तथागत अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध’ प्रकट होते हैं—जो विद्या और आचरण से संपन्न होते हैं, परम लक्ष्य पा चुके, दुनिया के ज्ञाता, दमनशील पुरुषों के अनुत्तर सारथी, देवों और मनुष्यों के गुरु, बुद्ध भगवान!’ वे प्रत्यक्ष-ज्ञान का साक्षात्कार कर, उसे—देव, मार, ब्रह्मा, श्रमण, ब्राह्मण, राजा और जनता से भरे इस लोक में—प्रकट करते हैं। वे ऐसा सार्थक और शब्दशः धम्म बताते हैं, जो आरंभ में कल्याणकारी, मध्य में कल्याणकारी, अन्त में कल्याणकारी हो; और सर्वपरिपूर्ण, परिशुद्ध ‘ब्रह्मचर्य’ प्रकाशित हो।
ऐसा धम्म सुनकर किसी गृहस्थ या कुलपुत्र को तथागत के प्रति श्रद्धा जागती है। उसे लगता है, “गृहस्थ जीवन बंधनकारी है, जैसे धूलभरा रास्ता हो! किंतु प्रवज्या, मानो खुला आकाश हो! घर रहते हुए ऐसा परिपूर्ण, परिशुद्ध ब्रह्मचर्य निभाना कठिन है, जो शुद्ध शंख जैसा उज्ज्वल हो! क्यों न मैं सिरदाढ़ी मुंडवाकर, काषाय वस्त्र धारण कर, घर से बेघर होकर प्रव्रज्यित हो जाऊँ?’
फिर वह समय पाकर, थोड़ी या अधिक धन-संपत्ति त्यागकर, छोटा या बड़ा परिवार त्यागकर, सिरदाढ़ी मुंडवाकर, काषाय वस्त्र धारण कर, घर से बेघर हो प्रव्रज्यित होता है।
प्रव्रज्यित होकर ऐसा भिक्षु शीलवान बनता है। वह पातिमोक्ख के अनुसार संयम से विनीत होकर, आर्य आचरण और जीवनशैली से संपन्न होकर रहता है। वह (धर्म-विनय) शिक्षापदों को सीख कर धारण करता है, अल्प पाप में भी ख़तरा देखता है। वह काया और वाणी के कुशल कर्मों से युक्त होता है, जीविका परिशुद्ध रखता है, और शील में समृद्ध होता है। इंद्रिय-द्वारों पर पहरा देता है, स्मृतिमान और सचेत होता है, और संतुष्ट जीता है।
शील विश्लेषण
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निम्न शील
और, पोट्ठपाद, कोई भिक्षु शील-संपन्न कैसे होता है?
- कोई भिक्षु हिंसा त्यागकर जीवहत्या से विरत रहता है—डंडा या शस्त्र फेंक चुके; लज्जावान, दयावान, समस्त जीवहित के प्रति करुणामयी। यह उसका शील होता है।
- वह ‘न सौंपी चीज़ें’ त्यागकर चोरी से विरत रहता है। गांव या जंगल से न दी गई, न सौंपी, पराई वस्तु को चोरी की इच्छा से नहीं उठाता है, नहीं लेता है। बल्कि मात्र सौंपी चीज़ें ही उठाता है, स्वीकारता है। पावन जीवन जीता है, चोरी-छिपे नहीं। यह भी उसका शील होता है।
- वह अब्रह्मचर्य त्यागकर ब्रह्मचर्य धारण करता है—मैथुन ग्रामधर्म 3 से विरत! यह भी उसका शील होता है।
- वह झूठ बोलना त्यागकर असत्यवचन से विरत रहता है। वह सत्यवादी, सत्य का पक्षधर, दृढ़ और भरोसेमंद बनता है; दुनिया को ठगता नहीं। यह भी उसका शील होता है।
- वह विभाजित करने वाली बातें त्यागकर फूट डालने वाले वचन से विरत रहता है। यहाँ सुनकर वहाँ नहीं बताता है, ताकि वहाँ दरार पड़े। वहाँ सुनकर यहाँ नहीं बताता है, ताकि यहाँ दरार पड़े। बल्कि वह बटे हुए लोगों का मेल कराता है, साथ रहते लोगों को जोड़ता है, एकता चाहता है, भाईचारे में रत रहता है, मेलमिलाप में प्रसन्न होता है। ऐसे बोल बोलता है कि सामंजस्यता बढ़े। यह भी उसका शील होता है।
- वह तीखा बोलना त्यागकर कटु वचन से विरत रहता है। वह ऐसे मीठे बोल बोलता है—जो राहत दे, कर्णमधुर लगे, हृदय छू ले, स्नेहपूर्ण हो, सौम्य हो, अधिकांश लोगों को अनुकूल और स्वीकार्य लगे। यह भी उसका शील होता है।
- वह बकवाद त्यागकर निरर्थक वचन से विरत रहता है। वह समय पर, तथ्यों के साथ, अर्थपूर्ण (=हितकारक), धर्मानुकूल, विनयानुकूल बोलता है। बहुमूल्य लगे ऐसे सटीक वचन बोलता है—तर्क के साथ, नपेतुले शब्दों में, सही समय पर, सही दिशा में, ध्येय के साथ। यह भी उसका शील होता है।
- वह बीज और पौधों का जीवनाश करना त्यागता है…
- वह दिन में एक-बार भोजन करता है—रात्रिभोज व विकालभोज 4 से विरत…
- वह नृत्य, गीत, वाद्यसंगीत तथा मनोरंजन से विरत रहता है।…
- वह मालाएँ, गन्ध, लेप, सुडौलता लाने वाले तथा अन्य सौंदर्य-प्रसाधन से विरत रहता है।…
- वह बड़े विलासी आसन और पलंग का उपयोग करने से विरत रहता है।…
- वह स्वर्ण व रुपये स्वीकारने से विरत रहते है।…
- वह कच्चा अनाज… कच्चा माँस… स्त्री व कुमारी… दासी व दास… भेड़ व बकरी… मुर्गी व सूवर… हाथी, गाय, घोड़ा, खच्चर… ख़ेत व संपत्ति स्वीकारने से विरत रहता है।…
- वह दूत (=संदेशवाहक) का काम… ख़रीद-बिक्री… भ्रामक तराज़ू, नाप, मानदंडों द्वारा ठगना… घूसख़ोरी, ठगना, ज़ाली काम, छलकपट… हाथ-पैर काटने, पीटने बाँधने, लूट डाका व हिंसा करने से विरत रहता है।
यह भी उसका शील होता है।
मध्यम शील
- अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, बीज-समूह और भूत-समूह (वनस्पति) के जीवनाश में लगे रहते हैं—जैसे कंद से उगने वाले, तने से उगने वाले, पोर (जोड़) से उगने वाले, कलम से उगने वाले, और पाँचवें बीज से उगने वाले पौधे। कोई भिक्षु इस तरह के बीज और पौधों के जीवनाश से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।
- अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, वस्तुओं का संग्रह करने में लगे रहते हैं, जैसे—अन्न का संग्रह, पान (पेय) का संग्रह, वस्त्रों का संग्रह, वाहनों का संग्रह, शय्या (बिस्तर) का संग्रह, गन्ध (इत्र) का संग्रह, और मांस (खाद्य) का संग्रह। कोई भिक्षु इस तरह के संग्रहीत वस्तुओं का भोग करने से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।
- अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, प्रेक्षणीय (=तमाशे/मनोरंजन) देखने में लगे रहते हैं, जैसे—नृत्य, गीत, वाद्य; नाटक, आख्यान (कथा या लीला), ताली बजाना, झांझ-मंजीरा, ढोल; चित्र-प्रदर्शनी, मेले; कलाबाजी, बाँस पर नट का खेल; हाथियों की लड़ाई, घोड़ों की लड़ाई, भैंसों की लड़ाई, बैलों की लड़ाई, बकरों की लड़ाई, भेड़ों की लड़ाई, मुर्गों की लड़ाई, बटेरों की लड़ाई; लाठी-युद्ध, मुष्टि-युद्ध, कुश्ती; सैन्य-अभ्यास, सेना का व्यूह-निरीक्षण, सेना की समीक्षा इत्यादि। कोई भिक्षु इस तरह के अनुचित दर्शन से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।
- अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, प्रमादी जुआ और खेलों में लगे रहते हैं, जैसे—आठ खानों वाला शतरंज (अष्टापद), दस खानों वाला शतरंज (दशपद), आकाश-शतरंज (बिना देखे खेलना), लंगड़ी टांग, कंचों का खेल, पासा, डंडे का खेल (गिल्ली-डंडा), हाथ से चित्र बनाना, गेंद का खेल, पत्तों की सीटी बजाना, हल चलाने का खेल, गुलाटी मारना, फिरकी चलाना, तराजू का खेल, रथ दौड़, धनुर्विद्या, अक्षरों को पहचानना (अक्षरिका), मन की बात बुझना, और दूसरों की नकल उतारना, इत्यादि। कोई भिक्षु इस तरह के व्यर्थ प्रमादी खेलों से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।
- अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, उच्च और विलासी शय्या (बिस्तरों) के उपयोग में लगे रहते हैं, जैसे—ऊँचे आसन (सोफा), पलंग, नक्काशीदार या खाल से सजा आसन, लंबे रोएँ वाले ऊनी वस्त्र, रंगीन कसीदाकारी वाले बिछौने, सफेद ऊनी कंबल, फूलों की कढ़ाई वाले बिछौने, रुई भरे गद्दे, शेर-बाघ के चित्रों वाले आसन, लाल झालर वाले आसन, रेशमी या कढ़ाई (एंब्रोईडरी) वाला आसन, लंबा ऊनी कालीन, हाथी-घोड़े-रथ के लिए उपयुक्त गलीचे, मृगचर्म के आसन, छाता-ताना आसन, और सिरहाने तथा पायताने लाल तकिये वाले बिस्तर इत्यादि। कोई भिक्षु इस तरह के बड़े और विलासी सज्जा से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।
- अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, प्रसाधन और सजावट में लगे रहते हैं, जैसे—सुगंधित उबटन लगाना, तेल मालिश, सुगंधित स्नान, शरीर गूंथना (मालिश), दर्पण देखना, अंजन (काजल) लगाना, माला पहनना, गन्ध-लेप, मुख-चूर्ण (पाउडर), कंगन, जूड़ा बांधना, अलंकृत छड़ी, अलंकृत नली (बोतल), खड़ग (तलवार या छुरी), छाता, कढ़ाई वाली (डिजाइनर) चप्पलें, साफा (पगड़ी), मणि, चंवर और लम्बे झालर वाले श्वेत वस्त्र इत्यादि। कोई भिक्षु इस तरह स्वयं को सजाने में, सौंदर्यीकरण से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।
- अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, पशुवत चर्चा 5 में लगे रहते हैं, जैसे—राजाओं की बातें, चोरों की बातें, महामंत्रियों की बातें; सेना, भय और युद्ध की बातें; भोजन, पान, वस्त्र की बातें; शय्या, माला और गन्ध की बातें; रिश्तेदारों, यान (वाहन), गाँव, निगम (कस्बे), नगर और जनपद (देश) की बातें; स्त्रियों और शूरवीरों की बातें; सड़क और पनघट (कुएं) की बातें; भूत-प्रेतों की बातें; दुनिया की विविध घटनाएँ; ब्रह्मांड और समुद्र की उत्पत्ति की बातें, अथवा ‘भव-विभव’ (वस्तुओं के अस्तित्व में होने न होने) की बातें। कोई भिक्षु इस तरह की पशुवत चर्चा से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।
- अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, वाक-युद्ध (बहस) में लगे रहते हैं, जैसे—“तुम इस धर्म-विनय को नहीं जानते।” “मैं इस धर्म-विनय को जानता हूँ।” “तुम भला इस धर्म-विनय को क्या जानोगे?” “तुम गलत रास्ते पर हो, मैं सही रास्ते पर हूँ!” “मैं धर्मानुसार (=सुसंगत) बताता हूँ। तुम उल्टा बताते हो।” “जो पहले कहना था वह तुमने बाद में कहा, जो बाद में कहना था वह पहले!” “तुम्हारी दीर्घकाल तक सोची हुई धारणा का खण्डन हुआ।” “तुम्हारी बात कट गई।” “तुम हार गए।” “जाओ, अपनी धारणा को बचाने का प्रयास करो, या उत्तर दे सको तो दो!” कोई भिक्षु इस तरह के वाद-विवाद से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।
- अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, दूत-कर्म और संदेशवाहक बनने में लगे रहते हैं, जैसे—राजाओं, महामंत्रियों, क्षत्रियों, ब्राह्मणों, गृहस्थों, या युवाओं के लिए यह काम करना कि: “वहाँ जाओ”, “यहाँ आओ”, “यह ले जाओ”, “वहाँ से यह ले आओ”। कोई भिक्षु इस तरह लोगों के लिए संदेशवाहक या दूत बनने से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।
- अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, ढोंग-पाखंड करते हैं, चाटुकारिता करते हैं, संकेत देते हैं, दूसरों को नीचा दिखाते हैं, लाभ से लाभ ढूँढते हैं। कोई भिक्षु इस प्रकार के छल-कपट से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।
ऊँचे शील
- अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, पशुवत (हीन) विद्या से मिथ्या आजीविका चलाते हैं, जैसे—
- अंग (=काया की बनावट देखकर भविष्य बताना),
- निमित्त (=शकुन-अपशकुन / संकेत बताना),
- उत्पात (=वज्रपात, उल्कापात, धूमकेतु इत्यादि का अर्थ बताना),
- स्वप्न (=स्वप्न का शुभ-अशुभ अर्थ बताना),
- लक्षण (=शशिर के चिन्ह या बर्ताव इत्यादि का अर्थ बताना),
- मूषिक-छिद्र (=चूहे के काटे हुए कपड़े का फल बताना),
- अग्नि-हवन (=अग्नि को चढ़ावा),
- दर्बी-होम (=करछुल से हवन), तुष-होम (=भूसी से हवन), कण-होम (=कनी/टूटे चावल से हवन), तंडुल-होम (=चावल से हवन), सर्पि-होम (=घी से हवन), तैल-होम (=तेल से हवन), मुख-होम (=मुँह से आहुति देना), रुधिर-होम (=खून से हवन),
- अंगविद्या (=हस्तरेखा, पादरेखा, कपालरेखा इत्यादि देखकर भविष्यवर्तन),
- वास्तुविद्या (=निवास में शुभ-अशुभ बताना),
- क्षेत्रविद्या (=खेत-जमीन-जायदाद में शुभ-अशुभ बताना),
- शिवविद्या (=श्मशान-भूमि में शुभ-अशुभ बताना),
- भूतविद्या (=भूतबाधा और मुक्तिमंत्र बताना),
- भुरिविद्या (=घर के सुरक्षामंत्र बताना),
- सर्पविद्या (=सर्पदंश में सुरक्षामंत्र बताना),
- विषविद्या (=विषबाधा में सुरक्षामंत्र बताना),
- वृश्चिकविद्या (=बिच्छूदंश में सुरक्षामंत्र बताना),
- मूषिकविद्या (=चूहों से सुरक्षामंत्र बताना),
- पक्षीविद्या (=पक्षीध्वनि का अर्थ बताना),
- कौवाविद्या (=कौंवों की ध्वनि या बर्ताव का अर्थ बताना),
- पक्षध्यान (=आयुसीमा या मृत्युकाल बताना),
- शरपरित्राण (=बाण से सुरक्षामंत्र बताना),
- और मृगचक्र (=हिरण इत्यादि पशुध्वनि का अर्थ बताना)।
कोई भिक्षु इस तरह की पशुवत विद्या से मिथ्या आजीविका चलाने से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।
- अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, पशुवत विद्या से मिथ्या आजीविका चलाते हैं, जैसे—
- मणि-लक्षण (मणि की विलक्षणता बताना),
- वस्त्र-लक्षण (=वस्त्र पर उभरे शुभ-लक्षण बताना),
- दण्ड-लक्षण (=छड़ी पर उभरे शुभ-लक्षण बताना),
- शस्त्र-लक्षण (=छुरे पर उभरे शुभ-लक्षण बताना),
- असि-लक्षण (तलवार पर उभरे शुभ-लक्षण बताना),
- बाण-लक्षण (=बाण पर उभरे शुभ-लक्षण बताना),
- धनुष-लक्षण (=धनुष पर उभरे शुभ-लक्षण बताना),
- आयुध-लक्षण(=शस्त्र, औज़ार पर उभरे शुभ-लक्षण बताना),
- स्त्री-लक्षण (=स्त्री के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
- पुरुष-लक्षण (=पुरुष के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
- कुमार-लक्षण (=लड़के के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
- कुमारी-लक्षण (=लड़की के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
- दास-लक्षण (=गुलाम/नौकर के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
- दासी-लक्षण (=गुलाम/नौकरानी के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
- हस्ति-लक्षण (=हाथी के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
- अश्व-लक्षण (=घोड़े के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
- भैस-लक्षण (=भैंस के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
- वृषभ-लक्षण (=बैल के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
- गाय-लक्षण (=गाय के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
- अज-लक्षण (=बकरी के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
- मेष-लक्षण (=भेड़ के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
- मुर्गा-लक्षण (=मुर्गे के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
- बत्तक-लक्षण (=बदक के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
- गोह-लक्षण (=गोह/छिपकली के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
- कर्णिका-लक्षण (=ख़रगोश के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
- कच्छप-लक्षण (=कछुए के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
- और मृग-लक्षण (=मृग/हिरण के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना)।
कोई भिक्षु इस तरह की पशुवत विद्या से मिथ्या आजीविका चलाने से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।
- अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, पशुवत विद्या से भविष्यवर्तन कर मिथ्या आजीविका चलाते हैं, जैसे—(युद्ध के बारे में भविष्यवाणी करना कि) “राजा कूच करेंगे”, “राजा कूच नहीं करेंगे”, “भीतरी राजा हमला करेंगे”, “बाहरी राजा पीछे हटेंगे”, “बाहरी राजा हमला करेंगे”, “भीतरी राजा पीछे हटेंगे” “इस राजा की जीत होगी, उस राजा की हार होगी”। कोई भिक्षु इस तरह की पशुवत विद्या से भविष्यवर्तन कर मिथ्या आजीविका चलाने से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।
- अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, पशुवत विद्या से भविष्यवर्तन कर मिथ्या आजीविका चलाते हैं, जैसे—
- चंद्रग्रहण होगा, सूर्यग्रहण होगा, नक्षत्रग्रहण होगा,
- सूर्य-चंद्रमा का मार्ग प्रशस्त (सीधा) होगा,
- सूर्य-चंद्रमा का मार्ग विपथ (उल्टा) होगा,
- नक्षत्र प्रशस्त होंगे,
- नक्षत्र विपथ होंगे,
- उल्कापात होगा,
- क्षितिज उज्ज्वल होगा (=ऑरोरा?),
- भूकंप होगा,
- देवढ़ोल बजेंगे (बादल-गर्जना?),
- सूर्य, चंद्र या नक्षत्रों का उदय, अस्त, मंद या तेजस्वी होंगे,
- चंद्रग्रहण का परिणाम ऐसा होगा,
- सूर्यग्रहण…, नक्षत्रग्रहण…, (और एक-एक कर इन सब का) परिणाम ऐसा होगा।
कोई भिक्षु इस तरह की पशुवत विद्या से भविष्यवर्तन कर मिथ्या आजीविका चलाने से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।
- अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, पशुवत विद्या से भविष्यवर्तन कर मिथ्या आजीविका चलाते हैं, जैसे—
- प्रचुर वर्षा होगी,
- अल्प वर्षा होगी,
- सुभिक्ष (=भोजन भरपूर) होगा,
- दुर्भिक्ष (=भोजन नहीं) होगा,
- क्षेम (=राहत, सुरक्षा) होगा,
- भय (=खतरा, चुनौतीपूर्ण काल) होगा,
- रोग (=बीमारियाँ) होंगे,
- आरोग्य (=चंगाई) होगा,
- अथवा वे लेखांकन, गणना, आंकलन, कविताओं की रचना, भौतिकवादी कला (लोकायत) सिखाकर अपनी मिथ्या आजीविका चलाते हैं।
कोई भिक्षु इस तरह की पशुवत विद्या से मिथ्या आजीविका चलाने से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।
- अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, पशुवत विद्या से भविष्यवर्तन कर मिथ्या आजीविका चलाते हैं, जैसे—
- आवाह (=दुल्हन घर लाने का) मुहूर्त बताना,
- विवाह (=कन्या भेजने का) मुहूर्त बताना,
- संवरण (=घूँघट या संयम करने का) मुहूर्त बताना,
- विवरण (=घूँघट हटाने या संभोग का) मुहूर्त बताना,
- जमा-बटोरने का मुहूर्त बताना,
- निवेश-फैलाने का मुहूर्त बताना,
- शुभ-वरदान देना,
- श्राप देना,
- गर्भ-गिराने की दवाई देना,
- जीभ बांधने का मंत्र बताना,
- जबड़ा बांधने का मंत्र बताना,
- हाथ उल्टेपूल्टे मुड़ने का मंत्र बताना,
- जबड़ा बंद करने का मंत्र बताना,
- कान बंद करने का मंत्र बताना,
- दर्पण (के भूत) से प्रश्न पुछना,
- भूत-बाधित कन्या से प्रश्न पुछना,
- देवता से प्रश्न पुछना,
- सूर्य की पुजा करना,
- महादेव की पुजा करना,
- मुँह से अग्नि निकालना,
- श्रीदेवी (=सौभाग्य लानेवाली देवी) का आह्वान करना।
कोई भिक्षु इस तरह की पशुवत विद्या से मिथ्या आजीविका चलाने से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।
- अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, पशुवत विद्या से भविष्यवर्तन कर मिथ्या आजीविका चलाते हैं, जैसे—
- शान्ति-पाठ कराना,
- इच्छापूर्ति-पाठ कराना,
- भूतात्मा-पाठ कराना,
- भूमि-पूजन कराना,
- वर्ष-पाठ कराना (=नपुंसक को पौरुषत्व दिलाने के लिए),
- वोस्स-पाठ कराना (=कामेच्छा ख़त्म कराने के लिए),
- वास्तु-पाठ कराना (घर बनाने पूर्व),
- वास्तु-परिकर्म कराना (=भूमि का उपयोग करने पूर्व देवताओं को बलि देना इत्यादि),
- शुद्धजल से धुलवाना,
- शुद्धजल से नहलाना,
- बलि चढ़ाना,
- वमन (=उलटी) कराना,
- विरेचन (=जुलाब देकर) कराना,
- ऊपर (=मुख) से विरेचन कराना,
- नीचे से विरेचन (=दस्त) कराना,
- शीर्ष-विरेचन कराना (=कफ निकालना?),
- कान के लिए औषधियुक्त तेल देना,
- आँखों की धुंधलाहट हटाने के लिए औषधि देना,
- नाक के लिए औषधि देना,
- मरहम देना, प्रति-मरहम देना,
- आँखें शीतल करने की दवा देना,
- आँख और कान की शल्यक्रिया करना,
- शरीर की शल्यक्रिया (=छुरी से सर्जरी) करना,
- बच्चों का वैद्य बनना,
- जड़ीबूटी देना, जड़ीबूटी बांधना।
कोई भिक्षु इस तरह की पशुवत विद्या से मिथ्या आजीविका चलाने से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।
इस तरह, पोट्ठपाद, कोई भिक्षु शील से संपन्न होकर, शील से सँवर कर, कही कोई खतरा नहीं देखता है।
जैसे, कोई राजतिलक हुआ क्षत्रिय राजा हो, जिसने सभी शत्रुओं को जीत लिया हो, वह कही किसी शत्रु से खतरा नहीं देखता है। उसी तरह, पोट्ठपाद, कोई भिक्षु शील से संपन्न होकर, शील से सँवर कर, कही कोई खतरा नहीं देखता है। वह ऐसे आर्यशील-संग्रह से संपन्न होकर निष्पाप (जीवन के) सुख का अनुभव करता है। इस तरह, पोट्ठपाद, कोई भिक्षु शील-संपन्न होता है।
इन्द्रिय सँवर
और, पोट्ठपाद, कैसे कोई भिक्षु अपने इंद्रिय-द्वारों की रक्षा करता है?
- जब भिक्षु आँख से किसी रूप को देखता है, तो वह न तो उसकी छाप (“निमित्त”) पकड़ता है और न ही उसके सूक्ष्म विवरणों (“अनुव्यंजन”) में उलझता है। यदि वह अपनी चक्षु-इंद्रिय को असंयमित छोड़ दे, तो लालसा या निराशा जैसे पाप-अकुशल स्वभाव उस पर हावी हो सकते हैं। अतः वह संयम का मार्ग अपनाता है, चक्षु-इंद्रिय की रक्षा करता है, और उस पर संयम बरतता है।
- जब वह कान से किसी शब्द (या आवाज) को सुनता है…
- जब वह नाक से किसी गंध को सूँघता है…
- जब वह जीभ से किसी स्वाद को चखता है…
- जब वह शरीर से किसी संस्पर्श का अनुभव करता है…
- जब वह मन से किसी विचार को जानता है, तो वह न तो उसकी छाप पकड़ता है और न ही उसके सूक्ष्म विवरणों में उलझता है। यदि वह अपनी मन-इंद्रिय को असंयमित छोड़ दे, तो लालसा या निराशा जैसे पाप-अकुशल स्वभाव उस पर हावी हो सकते हैं। अतः वह संयम का मार्ग अपनाता है, मन-इंद्रिय की रक्षा करता है, और उस पर संयम बरतता है।
वह ऐसे आर्यसँवर से संपन्न होकर निष्पाप सुख का अनुभव करता है। इस तरह, पोट्ठपाद, कोई भिक्षु अपने इंद्रिय-द्वारों की रक्षा करता है।
स्मृति-संप्रजन्य
और, पोट्ठपाद, कैसे कोई भिक्षु स्मृति और सचेतता से संपन्न होता है? वह आगे बढ़ने और पीछे लौटने में सजग रहता है। वह नज़र टिकाने और नज़र हटाने में सजग रहता है। वह अपने अंगों को सिकोड़ने और पसारने में सजग रहता है। वह चीवर, संघाटी और भिक्षा-पात्र को धारण करने में सजग रहता है। वह खाते, पीते, चबाते और स्वाद लेने में सजग रहता है। वह पेशाब और शौच करते हुए भी सजग रहता है। वह चलते, खड़े रहते, बैठते, सोते, जागते, बोलते और मौन रहते हुए भी निरंतर सचेत रहता है। इस तरह, पोट्ठपाद, कोई भिक्षु स्मृति और सचेतता से संपन्न होता है।
सन्तोष
और, पोट्ठपाद, कैसे कोई भिक्षु संतुष्ट रहता है? कोई भिक्षु मात्र अपने शरीर को ढंकने के लिए चीवर और पेट की पूर्ति के लिए भिक्षा से संतुष्ट रहता है। वह जहाँ भी जाता है, अपनी इन अल्प सामग्रियों से साथ ही प्रस्थान करता है।
जैसे कोई पक्षी जहाँ भी उड़ता है, वह केवल अपने पंखों के भार के साथ ही उड़ता है। उसी तरह, भिक्षु भी अपने चीवर और भिक्षा-पात्र से ही संतुष्ट रहता है। वह जहाँ कहीं भी जाता है, अपनी इन अनिवार्य वस्तुओं को साथ लेकर ही गमन करता है।
इस प्रकार, पोट्ठपाद, कोई भिक्षु संतुष्ट रहता है।
नीवरण त्याग
इस तरह वह आर्य-शीलसंग्रह से संपन्न होकर, इंद्रियों पर आर्य-सँवर से संपन्न होकर, स्मृतिमान और सचेत होकर, आर्य-संतुष्ट होकर एकांतवास ढूँढता है—जैसे जंगल, पेड़ के तले, पहाड़, सँकरी घाटी, गुफ़ा, श्मशानभूमि, उपवन, खुली-जगह या पुआल का ढ़ेर। भिक्षाटन से लौटकर भोजन के पश्चात, वह पालथी मार, काया सीधी रखकर बैठता है और स्मृति आगे लाता है।
- वह लोक के प्रति लालसा (“अभिज्झा”) हटाकर लालसाविहीन चित्त से रहता है। अपने चित्त से लालसा को साफ़ करता है।
- वह भीतर से दुर्भावना और द्वेष (“ब्यापादपदोस”) हटाकर दुर्भावनाविहीन चित्त से रहता है—समस्त जीवहित के लिए करुणामयी। अपने चित्त से दुर्भावना और द्वेष को साफ़ करता है।
- वह भीतर से सुस्ती और तंद्रा (“थिनमिद्धा”) हटाकर सुस्ती और तंद्राविहीन चित्त से रहता है—उजाला देखने वाला, स्मृतिमान और सचेत। अपने चित्त से सुस्ती और तंद्रा को साफ़ करता है।
- वह भीतर से बेचैनी और पश्चाताप (“उद्धच्चकुक्कुच्च”) हटाकर बिना व्याकुलता के रहता है; भीतर से शान्त चित्त। अपने चित्त से बेचैनी और पश्चाताप को साफ़ करता है।
- वह अनिश्चितता (“विचिकिच्छा”) हटाकर उलझन को लाँघता है; कुशल स्वभावों के प्रति संभ्रमता के बिना। अपने चित्त से अनिश्चितता को साफ़ करता है।
जैसे, पोट्ठपाद, कल्पना करें कि कोई पुरुष ऋण लेकर व्यवसाय करता है और उसका व्यवसाय यशस्वी हो जाता है। तब समय बीतने पर, वह न केवल अपना पुराना ऋण चुकाता है, बल्कि अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए अतिरिक्त धन भी बचाता है। तब उसे लगता है, “मैंने ऋण लेकर व्यापार किया और मेरा व्यवसाय सफल हुआ। अब मैं ऋणमुक्त हूँ और मेरे पास अतिरिक्त धन भी है।” इस विचार से वह हर्षित और आनंदित हो उठेगा।
अब कल्पना करें, पोट्ठपाद, कि कोई पुरुष बीमार पड़ता है—गंभीर रोग से पीड़ित। उसे भोजन में रुचि नहीं रहती और उसकी काया का बल क्षीण हो जाता है। तब समय बीतने पर, वह रोगमुक्त हो जाता है; उसे भोजन का स्वाद मिलने लगता है और शरीर में पुनः बल लौट आता है। तब उसे लगता है, “मैं पीड़ादायक रोग से ग्रस्त था, न भोजन भाता था और न शरीर में शक्ति थी। अब मैं पूर्णतः स्वस्थ हूँ।” इस विचार से वह हर्षित और आनंदित हो उठेगा।
अब कल्पना करें, पोट्ठपाद, कि कोई पुरुष कारावास में बंदी हो। तब समय बीतने पर, वह कारावास से मुक्त हो जाता है—सुरक्षित और सही-सलामत, बिना संपत्ति की हानि हुए। तब उसे लगता है, “मैं कारावास में कैद था, किंतु अब बिना किसी क्षति के स्वतंत्र हूँ।” इस विचार से वह हर्षित और आनंदित हो उठेगा।
अब कल्पना करें, पोट्ठपाद, कि कोई पुरुष दास (गुलाम) हो—वह स्वयं के अधीन न होकर दूसरों के अधीन हो और अपनी इच्छा से कहीं आ-जा न सके। तब समय बीतने पर, वह उस दासत्व से मुक्त हो जाता है—स्वयं का स्वामी। अब वह जहाँ चाहे, जा सके। तब उसे लगता है, “पहले मैं परतंत्र था, किंतु अब स्वतंत्र हूँ और अपनी इच्छा से विचरण कर सकता हूँ।” इस विचार से वह हर्षित और आनंदित हो उठेगा।
अब कल्पना करें, पोट्ठपाद, कि कोई पुरुष धन और माल लेकर रेगिस्तान से यात्रा कर रहा हो, जहाँ भोजन अल्प हो, और खतरे अधिक। तब समय बीतने पर, वह उस रेगिस्तान पार कर किसी गाँव में पहुँच जाता है—सुरक्षित और सही-सलामत, बिना संपत्ति की हानि हुए। तब उसे लगता है, “मैं उस खतरनाक रेगिस्तान में था जहाँ जीवन संकट में था, किंतु अब मैं सुरक्षित हूँ।” इस विचार से वह हर्षित और आनंदित हो उठेगा।
उसी तरह, पोट्ठपाद, जब तक ये पाँच अवरोध भीतर से छूटते नहीं हैं, तब तक भिक्षु उन्हें ऋण, रोग, कारावास, गुलामी और रेगिस्तान की तरह देखता है।
किंतु जब ये पाँच अवरोध भीतर से छूट जाते हैं, तब भिक्षु उन्हें ऋणमुक्ति, आरोग्य, बन्धनमुक्ति, स्वतंत्रता और राहतस्थल की तरह देखता है।
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इन पाँच अवरोधों (“पञ्चनीवरण”) के दूर हो जाने पर, उसके भीतर प्रसन्नता का उदय होता है। प्रसन्नता होने से प्रीति जागती है। मन में प्रीति होने से काया प्रशान्त हो जाती है। प्रशान्त काया को सुख की अनुभूति होती है; और सुखी होने पर चित्त समाहित (एकाग्र+स्थिर) हो जाता है।
प्रथम-ध्यान
वह कामुकता से विलग, अकुशल-स्वभाव से विलग होकर—वितर्क और विचार सहित, विलगता से जन्मे प्रीति और सुख वाले प्रथम-ध्यान में प्रवेश कर विहार करता है।
तब उसे पहले जो कामसंज्ञा थी, वह निरुद्ध (खत्म) होती है। उस समय, विलगता से उत्पन्न प्रीति और सुख की सूक्ष्म और सच्ची संज्ञा होती है। और वह उस विलगता से उपजे हुए प्रीति और सुख के सूक्ष्म और सच्चे संज्ञा के प्रति बोधगम्य होता है।
इस तरह शिक्षा से एक तरह की संज्ञा उत्पन्न होती है, और शिक्षा से एक तरह की संज्ञा निरुद्ध होती है। यही वह शिक्षा है।” भगवान ने कहा।
द्वितीय-ध्यान
“तब आगे, पोट्ठपाद, भिक्षु वितर्क और विचार के थमने पर, भीतर से आश्वस्त हुआ मानस एकरस होकर—बिना-वितर्क बिना-विचार के, समाधि से जन्मे प्रीति और सुख वाले द्वितीय-ध्यान में प्रवेश कर विहार करता है।
तब उसे पहले जो विलगता से उत्पन्न प्रीति और सुख की सूक्ष्म और सच्ची संज्ञा थी, वह निरुद्ध होती है। उस समय, समाधि से उत्पन्न प्रीति और सुख की सूक्ष्म और सच्ची संज्ञा होती है। और वह उस समाधि से उपजे हुए प्रीति और सुख के सूक्ष्म और सच्चे संज्ञा के प्रति बोधगम्य होता है।
इस तरह शिक्षा से एक तरह की संज्ञा उत्पन्न होती है, और शिक्षा से एक तरह की संज्ञा निरुद्ध होती है। यही वह शिक्षा है।” भगवान ने कहा।
तृतीय-ध्यान
“तब आगे, पोट्ठपाद, भिक्षु प्रीति से विरक्त हो जाता है, और उपेक्षा के साथ स्मृतिवान और सचेत होकर शरीर से सुख महसूस करता है। जिसे आर्यजन ‘उपेक्षक, स्मृतिमान, सुखविहारी’ कहते हैं—उस तृतीय-ध्यान में प्रवेश कर वह विहार करता है।
तब उसे पहले जो समाधि से उत्पन्न प्रीति और सुख की सूक्ष्म और सच्ची संज्ञा थी, वह निरुद्ध होती है। उस समय, उपेक्षा से उत्पन्न सुख की सूक्ष्म और सच्ची संज्ञा होती है। और वह उस उपेक्षा से उपजे हुए सुख के सूक्ष्म और सच्चे संज्ञा के प्रति बोधगम्य होता है।
इस तरह शिक्षा से एक तरह की संज्ञा उत्पन्न होती है, और शिक्षा से एक तरह की संज्ञा निरुद्ध होती है। यही वह शिक्षा है।” भगवान ने कहा।
चतुर्थ-ध्यान
“तब आगे, पोट्ठपाद, भिक्षु सुख और दुःख के त्याग से, तथा सौमनस्य और दौमनस्य के पहले ही मिट जाने के कारण—वह न सुख, न दुःख वाली, तथा उपेक्षा और स्मृति की शुद्धता से युक्त चतुर्थ-ध्यान में प्रवेश कर विहार करता है।
तब उसे पहले जो उपेक्षा से उत्पन्न सुख की सूक्ष्म और सच्ची संज्ञा थी, वह निरुद्ध होती है। उस समय, न-सुख-न-दर्द की सूक्ष्म और सच्ची संज्ञा होती है। और वह उस न-सुख-न-दर्द के सूक्ष्म और सच्चे संज्ञा के प्रति बोधगम्य होता है।
इस तरह शिक्षा से एक तरह की संज्ञा उत्पन्न होती है, और शिक्षा से एक तरह की संज्ञा निरुद्ध होती है। यही वह शिक्षा है।” भगवान ने कहा।
आकाश-आयाम
“तब आगे, पोट्ठपाद, भिक्षु रूप-संज्ञा को पूर्णतः लाँघ कर, प्रतिघात-संज्ञा के अस्त होने पर, और विविध-संज्ञाओं पर ध्यान न देते हुए—‘आकाश अनन्त है’ (अनुभव करते हुए) ‘अनन्त आकाश-आयाम’ में प्रवेश कर विहार करता है।
तब उसे पहले जो रूप संज्ञा थी, वह निरुद्ध होती है। उस समय, अनन्त आकाश-आयाम की सूक्ष्म और सच्ची संज्ञा होती है। और वह उस अनन्त आकाश-आयाम के सूक्ष्म और सच्चे संज्ञा के प्रति बोधगम्य होता है।
इस तरह शिक्षा से एक तरह की संज्ञा उत्पन्न होती है, और शिक्षा से एक तरह की संज्ञा निरुद्ध होती है। यही वह शिक्षा है।” भगवान ने कहा।
विज्ञान-आयाम
“तब आगे, पोट्ठपाद, भिक्षु अनन्त आकाश-आयाम को पूर्णतः लाँघ कर, ‘विज्ञान अनन्त है’ (अनुभव करते हुए) अनन्त विज्ञान-आयाम में प्रवेश कर विहार करता है।
तब उसे पहले जो अनन्त आकाश-आयाम संज्ञा थी, वह निरुद्ध होती है। उस समय, अनन्त विज्ञान-आयाम की सूक्ष्म और सच्ची संज्ञा होती है। और वह उस अनन्त विज्ञान-आयाम के सूक्ष्म और सच्चे संज्ञा के प्रति बोधगम्य होता है।
इस तरह शिक्षा से एक तरह की संज्ञा उत्पन्न होती है, और शिक्षा से एक तरह की संज्ञा निरुद्ध होती है। यही वह शिक्षा है।” भगवान ने कहा।
सूना-आयाम
“तब आगे, पोट्ठपाद, भिक्षु अनन्त विज्ञान-आयाम को पूर्णतः लाँघ कर, ‘कुछ नहीं है’ (अनुभव करते हुए) सूने-आयाम में प्रवेश कर विहार करता है।
तब उसे पहले जो अनन्त विज्ञान-आयाम संज्ञा थी, वह निरुद्ध होती है। उस समय, सूने-आयाम की सूक्ष्म और सच्ची संज्ञा होती है। और वह उस सूने-आयाम के सूक्ष्म और सच्चे संज्ञा के प्रति बोधगम्य होता है।
इस तरह शिक्षा से एक तरह की संज्ञा उत्पन्न होती है, और शिक्षा से एक तरह की संज्ञा निरुद्ध होती है। यही वह शिक्षा है।” भगवान ने कहा।
अभिसंज्ञा
“पोट्ठपाद, जब से भिक्षु स्वयंसंज्ञी (=स्वयं से संज्ञा बदलाने वाला) होता है, तब से वह, इस स्तर से उस स्तर तक क्रमशः बढ़ते हुए, श्रेष्ठतम संज्ञाओं को छूता है। श्रेष्ठतम (अग्र) संज्ञा पर स्थित होकर उसे लगता है, ‘मेरा चिंतनमान होना ही बुरा है, अ-चिंतनमान रहना बेहतर है। यदि मैं चिंतन करूँ, और (मानसिक) संस्कार बुनूँ, तो मेरी यह संज्ञा निरुद्ध हो जाएगी, और स्थूल संज्ञा प्रकट होगी। क्यों न मैं न चिंतन करूँ, न ही संस्कार बुनूँ?’
तब वह न चिंतन करता है, न ही संस्कार बुनता है। और जब वह न चिंतन करता है, न ही संस्कार बुनता है, तब उसकी वह भी संज्ञा निरुद्ध होकर, अन्य स्थूल संज्ञा प्रकट नहीं होती। वह निरोध छूता है। और इस तरह, पोट्ठपाद, कोई सचेत रहकर क्रमशः अभिसंज्ञा-निरोध को प्राप्त करता है।
क्या लगता है तुम्हें, पोट्ठपाद? क्या तुमने कभी इस तरह क्रमशः अभिसंज्ञा-निरोध को सचेत रहकर प्राप्त करने के बारे में सुना है?”
“नहीं, भन्ते! और मैं इस तरह भगवान के सिखाएँ धम्म को समझा हूँ: ‘जब से भिक्षु स्वयंसंज्ञी होता है, तब से वह, इस स्तर से उस स्तर तक क्रमशः बढ़ते हुए, श्रेष्ठतम संज्ञाओं को छूता है। श्रेष्ठतम संज्ञा पर स्थित होकर उसे लगता है, ‘मेरा चिंतनमान होना ही बुरा है, अ-चिंतनमान रहना बेहतर है। यदि मैं चिंतन करूँ, और संस्कार बुनूँ, तो मेरी यह संज्ञा निरुद्ध हो जाएगी, और स्थूल संज्ञा प्रकट होगी। क्यों न मैं न चिंतन करूँ, न ही संस्कार बुनूँ?’
तब वह न चिंतन करता है, न ही संस्कार बुनता है। और जब वह न चिंतन करता है, न ही संस्कार बुनता है, तब उसकी वह भी संज्ञा निरुद्ध होकर, अन्य स्थूल संज्ञा प्रकट नहीं होती। वह निरोध छूता है। और इस तरह कोई सचेत रहकर क्रमशः अभिसंज्ञा-निरोध को प्राप्त करता है।”
“बिलकुल ठीक, पोट्ठपाद।”
“किन्तु भन्ते, क्या भगवान एक ही श्रेष्ठतम संज्ञा की बात करते है, अथवा कई श्रेष्ठतम संज्ञाओं की बात करते है?”
“पोट्ठपाद, मैं एक श्रेष्ठतम संज्ञा की भी बात करता हूँ, और कई श्रेष्ठतम संज्ञाओं की भी बात करता हूँ।”
“किन्तु कैसे, भन्ते, भगवान एक श्रेष्ठतम संज्ञा की भी बात करते है, और कई श्रेष्ठतम संज्ञाओं की भी बात करते है?”
“जिस-जिस तरह से कोई निरोध छूता है, उस-उस तरह से मैं श्रेष्ठतम संज्ञा की बात करता हूँ। इस तरह, पोट्ठपाद, मैं एक श्रेष्ठतम संज्ञा की भी बात करता हूँ, और कई श्रेष्ठतम संज्ञाओं की भी बात करता हूँ।”
“किन्तु भन्ते, क्या पहले संज्ञा उत्पन्न होती है, फिर ज्ञान पश्चात में? अथवा पहले ज्ञान उपजता है, फिर संज्ञा पश्चात में? अथवा संज्ञा और ज्ञान एक साथ ही उपजते हैं?”
“पोट्ठपाद, संज्ञा पहले उपजती है, फिर ज्ञान पश्चात में। संज्ञा के उपजने से ही ज्ञान उपजता है। तब उन्हें पता चलता है, ‘इस परिस्थिति से कारण (“इदप्पच्चया”) मेरा ज्ञान उपजा है!’ कोई इस तरीके से भी जान लेता है कि संज्ञा पहले उपजती है, फिर ज्ञान पश्चात में। संज्ञा के उपजने से ही ज्ञान उपजता है।”
संज्ञा और आत्मा
“भन्ते, क्या संज्ञा व्यक्ति की आत्मा होती है? अथवा संज्ञा भिन्न है और आत्मा भिन्न?”
“किन्तु पोट्ठपाद, तुम ‘आत्मा’ किसे समझते हो?”
“भन्ते, मैं आत्मा को स्थूल, रूपयुक्त, चार महाभूतों से बनी हुई, निवाले चबाकर खाने वाली मानता हूँ।”
“यदि, पोट्ठपाद, तुम्हारी आत्मा स्थूल, रूपयुक्त, चार महाभूतों से बनी हुई, निवाले चबाकर खाने वाली हो, तो उस मामले में संज्ञा भिन्न होगी और आत्मा भिन्न। इस तरीके से भी पता चलता है कि संज्ञा भिन्न होती है और आत्मा भिन्न। और पोट्ठपाद, जब तक इस तरह की स्थूल, रूपयुक्त, चार महाभूतों से बनी हुई, निवाले चबाकर खाने वाली आत्मा बनी रहती है, तब तक व्यक्ति के लिए एक भिन्न संज्ञा उत्पन्न होती है, और एक भिन्न संज्ञा निरुद्ध होती है। इस तरीके से भी पता चलता है कि कैसे संज्ञा भिन्न होती है और आत्मा भिन्न।”
“भन्ते, मैं आत्मा को मन से रची, (तमाम) अंग-प्रत्यंग से परिपूर्ण मानता हूँ, जो हीन इंद्रियों वाली नहीं होती।”
“यदि, पोट्ठपाद, तुम्हारी आत्मा मन से रची, अंग-प्रत्यंग से परिपूर्ण हो, जो हीन इंद्रियों वाली न हो, तो उस मामले में संज्ञा भिन्न होगी और आत्मा भिन्न। इस तरीके से भी पता चलता है कि संज्ञा भिन्न होती है और आत्मा भिन्न। और पोट्ठपाद, जब तक इस तरह की मन से रची, अंग-प्रत्यंग से परिपूर्ण, न हीन इंद्रियों वाली आत्मा बनी रहती है, तब तक व्यक्ति के लिए एक भिन्न संज्ञा उत्पन्न होती है, और एक भिन्न संज्ञा निरुद्ध होती है। इस तरीके से भी पता चलता है कि कैसे संज्ञा भिन्न होती है और आत्मा भिन्न।”
“भन्ते, मैं आत्मा को अरूप (=निराकार), संज्ञा से रची (=संज्ञामय) मानता हूँ।”
“यदि, पोट्ठपाद, तुम्हारी आत्मा अरूप, संज्ञा से रची हो, तो उस मामले में भी संज्ञा भिन्न होगी और आत्मा भिन्न। इस तरीके से भी पता चलता है कि संज्ञा भिन्न होती है और आत्मा भिन्न। और पोट्ठपाद, जब तक इस तरह की अरूप, संज्ञा से रची आत्मा बनी रहती है, तब तक व्यक्ति के लिए एक भिन्न संज्ञा उत्पन्न होती है, और एक भिन्न संज्ञा निरुद्ध होती है। इस तरीके से भी पता चलता है कि कैसे संज्ञा भिन्न होती है और आत्मा भिन्न।”
“किन्तु भन्ते, क्या मैं जान सकता हूँ: ‘संज्ञा ही व्यक्ति की आत्मा होती है,’ अथवा ‘संज्ञा भिन्न होती है और आत्मा भिन्न’?”
“चूँकि तुम्हारी दृष्टि भिन्न है, धारणा भिन्न है, रुचि भिन्न है, अभ्यास भिन्न है, आचार्य भिन्न है, पोट्ठपाद, इसलिए तुम्हारे लिए यह जानना कठिन होगा: ‘संज्ञा ही व्यक्ति की आत्मा होती है,’ अथवा ‘संज्ञा भिन्न होती है और आत्मा भिन्न’?”
“भन्ते, चूँकि मेरी दृष्टि भिन्न है, धारणा भिन्न है, रुचि भिन्न है, अभ्यास भिन्न है, आचार्य भिन्न है, इसलिए मेरे लिए यह जानना कठिन होगा: ‘संज्ञा ही व्यक्ति की आत्मा होती है,’ अथवा ‘संज्ञा भिन्न होती है और आत्मा भिन्न’? (ठीक है, तब बताएँ) भन्ते, आपको क्या लगता है: ‘क्या लोक शाश्वत (=नित्य) है—यही मात्र सच है, बाकी सब तुच्छ?’”
अव्याकृत धम्म
“इसे, पोट्ठपाद, मैंने प्रकट नहीं किया (अव्याकृत रखा) है: ‘लोक शाश्वत है—यही मात्र सच है, बाकी सब तुच्छ।’”
“तब भन्ते, आपको क्या लगता है: ‘क्या लोक अशाश्वत (=अनित्य) है—यही मात्र सच है, बाकी सब तुच्छ?’”
“इसे भी, पोट्ठपाद, मैंने प्रकट नहीं किया है: ‘लोक अशाश्वत है—यही मात्र सच है, बाकी सब तुच्छ।’”
“तब भन्ते, आपको क्या लगता है: ‘क्या लोक सीमित है… क्या लोक अनन्त है… क्या जीव और शरीर एक हैं… क्या जीव और शरीर भिन्न-भिन्न हैं… क्या तथागत मरणोपरान्त (अस्तित्व में) होते है… क्या तथागत मरणोपरान्त नहीं होते है… क्या तथागत मरणोपरान्त होते भी है और नहीं भी… क्या तथागत मरणोपरान्त न होते है और न भी नहीं होते है—यही मात्र सच है, बाकी सब तुच्छ?’”
“इन्हे भी, पोट्ठपाद, मैंने प्रकट नहीं किया है: ‘क्या लोक सीमित है… क्या लोक अनन्त है… क्या जीव और शरीर एक हैं… क्या जीव और शरीर भिन्न-भिन्न हैं… क्या तथागत मरणोपरान्त होते है… क्या तथागत मरणोपरान्त नहीं होते है… क्या तथागत मरणोपरान्त होते भी है और नहीं भी… क्या तथागत मरणोपरान्त न होते है और न भी नहीं होते है—यही मात्र सच है, बाकी सब तुच्छ।’”
“किन्तु भन्ते, भगवान ने इन्हें प्रकट क्यों नहीं किया है?”
“क्योंकि, पोट्ठपाद, वे (बातें) न ध्येय से संबंधित हैं, न धम्म से संबंधित हैं, न ब्रह्मचर्य-मूल से ही संबंधित हैं। उनसे न मोहभंग होता है, न वैराग्य होता है, न निरोध होता है, न प्रशान्ति मिलती है, न प्रत्यक्ष-ज्ञान मिलता है, न संबोधि मिलती है, न ही निर्वाण मिलता है। इसलिए मैंने उन्हें प्रकट नहीं किया है।”
“तब भन्ते, भगवान ने क्या प्रकट किया है?”
“ऐसा दुःख (=कष्ट) है, यह मैंने प्रकट किया है। ऐसी दुःख की उत्पत्ति है, यह मैंने प्रकट किया है। ऐसा दुःख का निरोध है, यह मैंने प्रकट किया है। ऐसी दुःख-निरोध साधना है, यह मैंने प्रकट किया है।”
“किन्तु भन्ते, भगवान ने इन्हें क्यों प्रकट किया है?”
“क्योंकि, पोट्ठपाद, वे (बातें) ध्येय से संबंधित हैं, धम्म से संबंधित हैं, ब्रह्मचर्य-मूल से संबंधित हैं। उनसे मोहभंग होता है, वैराग्य होता है, निरोध होता है, प्रशान्ति मिलती है, प्रत्यक्ष-ज्ञान मिलता है, संबोधि मिलती है, निर्वाण मिलता है। इसलिए मैंने उन्हें प्रकट किया है।”
“ऐसा ही (सच) है, भगवान! ऐसा ही है, सुगत! तब भगवान जिसका उचित समय समझे।”
तब भगवान आसन से उठकर चले गए।
भगवान के जाने पर जल्द ही सभी परिव्राजक घेरकर पोट्ठपाद परिव्राजक पर व्यंग कसने लगे, उपहास बनाने लगे, “जो-जो श्रमण गौतम बोलते है, पोट्ठपाद, आप इस तरह उसका अनुमोदन करते है—‘ऐसा ही है, भगवान! ऐसा ही है, सुगत!’ किन्तु हम तो नहीं जान पाए कि श्रमण गौतम ने इन्हें लेकर कौन-सी निर्णायक सीख दी है—‘क्या लोक शाश्वत है… क्या लोक अशाश्वत है… (इत्यादि)’”
जब ऐसा कहा गया, तो पोट्ठपाद परिव्राजक ने उन परिव्राजकों से कहा, “मैं भी नहीं जान पाया हूँ कि श्रमण गौतम ने इन्हें लेकर कौन-सी निर्णायक सीख दी है—‘क्या लोक शाश्वत है… क्या लोक अशाश्वत है… (इत्यादि)’ किन्तु तब भी श्रमण गौतम ने यथार्थ, सच्ची और तथ्यात्मक साधना बताई, जो धम्म पर आधारित है, धम्म के नियम से है। और जब यथार्थ, सच्ची और तथ्यात्मक साधना बताई जाए, जो धम्म पर आधारित हो, धम्म के नियम से हो, तब उस श्रमण गौतम द्वारा बताई भली बात को मेरे जैसा जानकार ‘भली बात’ कहकर क्यों अनुमोदन नहीं करेगा?”
पुनः भेंट
तब दो-तीन दिन बीतने पर, चित्त हत्थिसारिपुत्त (=हाथी प्रशिक्षक का पुत्र) और पोट्ठपाद परिव्राजक भगवान के पास गए।
हत्थिसारिपुत्त चित्त ने भगवान को अभिवादन किया, और एक ओर बैठ गया। पोट्ठपाद परिव्राजक ने भगवान से मैत्रीपूर्ण वार्तालाप किया, और एक ओर बैठ गया।
एक ओर बैठते हुए पोट्ठपाद परिव्राजक ने भगवान से कहा, “भन्ते! उस दिन भगवान के आसन से उठकर चले जाने पर जल्द ही सभी परिव्राजक घेरकर मुझ पर व्यंग कसने लगे, उपहास बनाने लगे, ‘जो-जो श्रमण गौतम बोलते है, पोट्ठपाद, आप इस तरह उसका अनुमोदन करते है—‘ऐसा ही है, भगवान! ऐसा ही है, सुगत!’ किन्तु हम तो नहीं जान पाए कि श्रमण गौतम ने इन्हें लेकर कौन-सी निर्णायक सीख दी है—‘क्या लोक शाश्वत है… क्या लोक अशाश्वत है… (इत्यादि)’
जब ऐसा कहा गया, तो मैंने उन परिव्राजकों से कहा, “मैं भी नहीं जान पाया हूँ कि श्रमण गौतम ने इन्हें लेकर कौन-सी निर्णायक सीख दी है—‘क्या लोक शाश्वत है… क्या लोक अशाश्वत है… (इत्यादि)’ किन्तु तब भी श्रमण गौतम ने यथार्थ, सच्ची और तथ्यात्मक साधना बताई, जो धम्म पर आधारित है, धम्म के नियम से है। और जब यथार्थ, सच्ची और तथ्यात्मक साधना बताई जाए, जो धम्म पर आधारित हो, धम्म के नियम से हो, तब उस श्रमण गौतम द्वारा बताई भली बात को मेरे जैसा जानकार ‘भली बात’ कहकर क्यों अनुमोदन नहीं करेगा?’”
निर्णायक और अनिर्णायक धम्म
(भगवान ने कहा:) “पोट्ठपाद, वे सभी परिव्राजक अंधे हैं, चुक्षहीन हैं। तुम ही मात्र चक्षुमान हो। क्योंकि, पोट्ठपाद, मैंने धम्म निर्णायक बताकर दर्शाएँ है, और मैंने धम्म अनिर्णायक बताकर भी दर्शाएँ है।
मैंने कौन-से धम्म अनिर्णायक बताकर दर्शाएँ है? ‘क्या लोक शाश्वत है… क्या लोक अशाश्वत है… क्या लोक सीमित है… क्या लोक अनन्त है… क्या जीव और शरीर एक हैं… क्या जीव और शरीर भिन्न-भिन्न हैं… क्या तथागत मरणोपरान्त होते है… क्या तथागत मरणोपरान्त नहीं होते है… क्या तथागत मरणोपरान्त होते भी है और नहीं भी… क्या तथागत मरणोपरान्त न होते है और न भी नहीं होते है—यही मात्र सच है, बाकी सब तुच्छ?’ मैंने ये धम्म अनिर्णायक बताकर दर्शाएँ है।
और पोट्ठपाद, मैंने ये धम्म अनिर्णायक बताकर क्यों दर्शाएँ है? क्योंकि वे न ध्येय से संबंधित हैं, न धम्म से संबंधित हैं, न ब्रह्मचर्य-मूल से ही संबंधित हैं। उनसे न मोहभंग होता है, न वैराग्य होता है, न निरोध होता है, न प्रशान्ति मिलती है, न प्रत्यक्ष-ज्ञान मिलता है, न संबोधि मिलती है, न ही निर्वाण मिलता है। इसलिए मैंने ये धम्म अनिर्णायक बताकर दर्शाएँ है।”
और पोट्ठपाद, मैंने कौन-से धम्म निर्णायक बताकर दर्शाएँ है? ‘ऐसा दुःख है’—यह मैंने निर्णायक धम्म बताकर दर्शाया है। ‘ऐसी दुःख की उत्पत्ति है’—यह मैंने निर्णायक धम्म बताकर दर्शाया है। ‘ऐसा दुःख का निरोध है’—यह मैंने निर्णायक धम्म बताकर दर्शाया है। ‘ऐसी दुःख-निरोध साधना है’—यह मैंने निर्णायक धम्म बताकर दर्शाया है।
और पोट्ठपाद, मैंने ये निर्णायक धम्म बताकर क्यों दर्शाएँ है? क्योंकि वे ध्येय से संबंधित हैं, धम्म से संबंधित हैं, ब्रह्मचर्य-मूल से संबंधित हैं। उनसे मोहभंग होता है, वैराग्य होता है, निरोध होता है, प्रशान्ति मिलती है, प्रत्यक्ष-ज्ञान मिलता है, संबोधि मिलती है, निर्वाण मिलता है। इसलिए मैंने ये धम्म निर्णायक बताकर दर्शाएँ है।
पोट्ठपाद, कुछ श्रमण और ब्राह्मणों की ऐसी धारणा, ऐसी दृष्टि होती हैं: ‘मरणोपरान्त आत्मा (अनन्य रूप से) केवल सुखी और निरोगी होती है।’
मैं उनके पास जाकर कहता हूँ, “क्या यह सच है कि आप आयुष्मान की ऐसी धारणा, ऐसी दृष्टि है: ‘मरणोपरान्त आत्मा केवल सुखी और निरोगी होती है’?
मेरे पुछने पर वे “हाँ!” कहकर स्वीकारते हैं।
तब मैं उन्हें कहता हूँ, “किन्तु क्या आप आयुष्मान ऐसा ‘केवल सुखी और निरोगी’ लोक जानते हुए, देखते हुए विहार करते हैं?”
ऐसा पुछने पर वे “नहीं!” कहते हैं।
तब मैं उन्हें कहता हूँ, “किन्तु क्या आप आयुष्मान एक दिन या एक रात, अथवा आधा दिन या आधी रात तक ऐसे ‘केवल सुखी और निरोगी’ आत्मा का बोध करते है?”
ऐसा पुछने पर वे “नहीं!” कहते हैं।
तब मैं उन्हें कहता हूँ, “किन्तु क्या आप आयुष्मान जानते है: ऐसे ‘केवल सुखी और निरोगी’ लोक का साक्षात्कार करने का यह मार्ग है, यह साधना है?”
ऐसा पुछने पर वे “नहीं!” कहते हैं।
तब मैं उन्हें कहता हूँ, “किन्तु क्या आप आयुष्मान को ऐसे ‘केवल सुखी और निरोगी’ लोक में उपजे हुए देवताओं के ऐसे शब्द सुनाई देते है, “‘केवल सुखी और निरोगी’ लोक का साक्षात्कार करने के लिए सुमार्ग पर चलिए, श्रीमान! सीधे मार्ग पर चलिए, श्रीमान! क्योंकि ऐसे ही मार्ग पर चलकर हम भी ‘केवल सुखी और निरोगी’ लोक में उपजे हैं”?”
ऐसा पुछने पर वे “नहीं!” कहते हैं।
तब तुम्हें क्या लगता है, पोट्ठपाद? क्या ऐसा हो तो उन श्रमण और ब्राह्मणों का कहना निराधार है?”
“निश्चित ही, भन्ते। ऐसा हो तो उन श्रमण और ब्राह्मणों का कहना निराधार ही है।”
जनपदकल्याणी की उपमा
“कल्पना करो, पोट्ठपाद, कोई पुरुष कहे, “जो इस देश की सबसे खूबसूरत स्त्री (“जनपदकल्याणी”) है, मैं उसे चाहता हूँ, उसकी कामना करता हूँ!”
तब लोग उसे कहते हैं, “अच्छा, भले आदमी! देश की जिस सबसे खूबसूरत स्त्री को तुम चाहते हो, कामना करते हो, क्या तुम जानते हो कि वह क्षत्रिय है, या ब्राह्मण है, या वैश्य है, अथवा शूद्र है?”
ऐसा पुछने पर वह “नहीं (जानता)!” कहता है।
तब लोग उसे कहते हैं, “अच्छा, भले आदमी! देश की जिस सबसे खूबसूरत स्त्री को तुम चाहते हो, कामना करते हो, क्या तुम जानते हो कि उसका नाम क्या है, गोत्र क्या है, क्या लंबी है, या नाटी है, अथवा मजले-कद की है? क्या काली है, या साँवली है, अथवा गोरी (स्वर्ण-वर्ण की) त्वचा है? किस गाँव से है, या नगर से है, अथवा शहर से है?”
ऐसा पुछने पर वह “नहीं (जानता)!” कहता है।
तब लोग उसे कहते हैं, “अच्छा, भले आदमी! तुम जिसे चाहते हो, कामना करते हो, क्या उसे जानते भी हो? क्या उसे देखा भी है?”
ऐसा पुछने पर वह “हाँ!” कहता है।
तब तुम्हें क्या लगता है, पोट्ठपाद? क्या ऐसा हो तो उस पुरुष का कहना निराधार है?”
“निश्चित ही, भन्ते। ऐसा हो तो उस पुरुष का कहना निराधार ही है।”
“उसी तरह, पोट्ठपाद, कुछ श्रमण और ब्राह्मणों की ऐसी धारणा, ऐसी दृष्टि होती हैं: ‘मरणोपरान्त आत्मा केवल सुखी और निरोगी होती है’… मैं उनके पास जाकर कहता हूँ, “क्या यह सच है कि आप आयुष्मान की ऐसी धारणा, ऐसी दृष्टि है… (इत्यादि) तब तुम्हें क्या लगता है, पोट्ठपाद? क्या ऐसा हो तो उन श्रमण और ब्राह्मणों का कहना निराधार है?”
“निश्चित ही, भन्ते। ऐसा हो तो उन श्रमण और ब्राह्मणों का कहना निराधार ही है।”
अदृश्य महल की सीढ़ी की उपमा
“कल्पना करो, पोट्ठपाद, कोई पुरुष चौराहे पर सीढ़ी का निर्माण करे, जो किसी महल पर चढ़ने के लिए हो।
तब लोग उसे कहते हैं, “अच्छा, भले आदमी! जिस महल पर चढ़ने के लिए तुम सीढ़ी का निर्माण कर रहे हो, क्या तुम जानते हो कि वह महल पूर्व दिशा में है, या दक्षिण दिशा में है, या पश्चिम दिशा में है, अथवा उत्तर दिशा में है? क्या वह महल ऊँचा है, या नीचा है, अथवा मजले-स्तर का है?”
ऐसा पुछने पर वह “नहीं (जानता)!” कहता है।
तब लोग उसे कहते हैं, “अच्छा, भले आदमी! जिस महल पर चढ़ने के लिए तुम सीढ़ी का निर्माण कर रहे हो, क्या उसे जानते भी हो? क्या उसे देखा भी है?”
ऐसा पुछने पर वह “हाँ!” कहता है।
तब तुम्हें क्या लगता है, पोट्ठपाद? क्या ऐसा हो तो उस पुरुष का कहना निराधार है?”
“निश्चित ही, भन्ते। ऐसा हो तो उस पुरुष का कहना निराधार ही है।”
“उसी तरह, पोट्ठपाद, कुछ श्रमण और ब्राह्मणों की ऐसी धारणा, ऐसी दृष्टि होती हैं: ‘मरणोपरान्त आत्मा केवल सुखी और निरोगी होती है’… मैं उनके पास जाकर कहता हूँ, “क्या यह सच है कि आप आयुष्मान की ऐसी धारणा, ऐसी दृष्टि है… (इत्यादि) तब तुम्हें क्या लगता है, पोट्ठपाद? क्या ऐसा हो तो उन श्रमण और ब्राह्मणों का कहना निराधार है?”
“निश्चित ही, भन्ते। ऐसा हो तो उन श्रमण और ब्राह्मणों का कहना निराधार ही है।”
आत्मा की प्राप्ति (अत्तपटिलाभ)
“तीन तरह से, पोट्ठपाद, आत्मा की प्राप्ति होती है—स्थूल आत्मा की प्राप्ति, मन से रची आत्मा की प्राप्ति, और अरूप आत्मा की प्राप्ति।
स्थूल आत्मा की प्राप्ति क्या होती है? रूपयुक्त, चार महाभूतों से बनी हुई, निवाले चबाकर खाने वाली—स्थूल आत्मा की प्राप्ति है।
मन से रची आत्मा की प्राप्ति क्या है? रूपयुक्त, मन से रची हुई, सभी अंग-प्रत्यंगों से युक्त, हीन इंद्रियों वाली नहीं—मन से रची आत्मा की प्राप्ति है।
अरूप आत्मा की प्राप्ति क्या है? अरूप (=निराकार), संज्ञा से रची हुई—अरूप आत्मा की प्राप्ति है।
पोट्ठपाद, मैं स्थूल आत्मप्राप्ति को त्यागने का धम्म सिखाता हूँ: “इस तरह की साधना कर के दूषित-धर्म त्यागे जाएँगे, (स्वच्छ करने वाले) उजालेदार-धर्म बढ़ते जाएँगे, अन्तर्ज्ञान को विपुलता और परिपूर्णता प्राप्त होगी, और इसी जीवन में स्वयं प्रत्यक्ष जानकर, साक्षात्कार कर विहार होगा।”
हो सकता है, पोट्ठपाद, तुम्हें लगे, “दूषित-धर्म त्यागे जाएँगे, उजालेदार-धर्म बढ़ते जाएँगे, अन्तर्ज्ञान को विपुलता और परिपूर्णता प्राप्त होगी, और इसी जीवन में स्वयं प्रत्यक्ष जानकर, साक्षात्कार कर विहार होगा—तब ऐसे जीना दुःखपूर्ण होगा!”
किन्तु पोट्ठपाद, ऐसे मत देखों। बल्कि जब दूषित-धर्म त्यागे जाएँगे, उजालेदार-धर्म बढ़ते जाएँगे, अन्तर्ज्ञान को विपुलता और परिपूर्णता प्राप्त होगी, और इसी जीवन में स्वयं प्रत्यक्ष जानकर, साक्षात्कार कर विहार होगा—तब केवल प्रसन्नता होगी, प्रीति होगी, प्रशान्ति होगी, स्मृति होगी, सचेतता होगी, और ऐसे जीना सुखपूर्वक होगा!
और पोट्ठपाद, मैं मन से रची आत्मप्राप्ति को त्यागने का धम्म सिखाता हूँ: “इस तरह की साधना कर के दूषित-धर्म त्यागे जाएँगे, उजालेदार-धर्म बढ़ते जाएँगे, अन्तर्ज्ञान को विपुलता और परिपूर्णता प्राप्त होगी, और इसी जीवन में स्वयं प्रत्यक्ष जानकर, साक्षात्कार कर विहार होगा।”
हो सकता है, पोट्ठपाद, तुम्हें लगे, “दूषित-धर्म त्यागे जाएँगे, उजालेदार-धर्म बढ़ते जाएँगे, अन्तर्ज्ञान को विपुलता और परिपूर्णता प्राप्त होगी, और इसी जीवन में स्वयं प्रत्यक्ष जानकर, साक्षात्कार कर विहार होगा—तब ऐसे जीना दुःखपूर्ण होगा!”
किन्तु पोट्ठपाद, ऐसे मत देखों। बल्कि जब दूषित-धर्म त्यागे जाएँगे, उजालेदार-धर्म बढ़ते जाएँगे, अन्तर्ज्ञान को विपुलता और परिपूर्णता प्राप्त होगी, और इसी जीवन में स्वयं प्रत्यक्ष जानकर, साक्षात्कार कर विहार होगा—तब केवल प्रसन्नता होगी, प्रीति होगी, प्रशान्ति होगी, स्मृति होगी, सचेतता होगी, और ऐसे जीना सुखपूर्वक होगा!
और पोट्ठपाद, मैं अरूप आत्मप्राप्ति को त्यागने का धम्म सिखाता हूँ: “इस तरह की साधना कर के दूषित-धर्म त्यागे जाएँगे, उजालेदार-धर्म बढ़ते जाएँगे, अन्तर्ज्ञान को विपुलता और परिपूर्णता प्राप्त होगी, और इसी जीवन में स्वयं प्रत्यक्ष जानकर, साक्षात्कार कर विहार होगा।”
हो सकता है, पोट्ठपाद, तुम्हें लगे, “दूषित-धर्म त्यागे जाएँगे, उजालेदार-धर्म बढ़ते जाएँगे, अन्तर्ज्ञान को विपुलता और परिपूर्णता प्राप्त होगी, और इसी जीवन में स्वयं प्रत्यक्ष जानकर, साक्षात्कार कर विहार होगा—तब ऐसे जीना दुःखपूर्ण होगा!”
किन्तु पोट्ठपाद, ऐसे मत देखों। बल्कि जब दूषित-धर्म त्यागे जाएँगे, उजालेदार-धर्म बढ़ते जाएँगे, अन्तर्ज्ञान को विपुलता और परिपूर्णता प्राप्त होगी, और इसी जीवन में स्वयं प्रत्यक्ष जानकर, साक्षात्कार कर विहार होगा—तब केवल प्रसन्नता होगी, प्रीति होगी, प्रशान्ति होगी, स्मृति होगी, सचेतता होगी, और ऐसे जीना सुखपूर्वक होगा!
और, पोट्ठपाद, यदि कोई हमसे पुछता है, “किन्तु, मित्र, तुम कौन-से स्थूल आत्मप्राप्ति को… कौन-से मन से रची आत्मप्राप्ति को… और कौन-से अरूप आत्मप्राप्ति को त्यागने का धम्म सिखाते हो, जिस पर चलकर दूषित-धर्म त्यागे जाएँगे, उजालेदार-धर्म बढ़ते जाएँगे, अन्तर्ज्ञान को विपुलता और परिपूर्णता प्राप्त होगी, और इसी जीवन में स्वयं प्रत्यक्ष जानकर, साक्षात्कार कर विहार होगा?”
ऐसा पूछा जाने पर मैं कहता हूँ, “मैं इस स्थूल आत्मप्राप्ति को… इस मन से रची आत्मप्राप्ति को… और इस अरूप आत्मप्राप्ति को त्यागने का धम्म सिखाता हूँ, जिस पर चलकर दूषित-धर्म त्यागे जाएँगे, उजालेदार-धर्म बढ़ते जाएँगे, अन्तर्ज्ञान को विपुलता और परिपूर्णता प्राप्त होगी, और इसी जीवन में स्वयं प्रत्यक्ष जानकर, साक्षात्कार कर विहार होगा!”
तब तुम्हें क्या लगता है, पोट्ठपाद? जब ऐसा हो तो ऐसा कहना प्रमाणित (=जो साबित हो सके) है?”
“निश्चित ही, भन्ते। जब ऐसा हो तो ऐसा कहना प्रमाणित ही है।”
विरुद्ध उपमा
“कल्पना करो, पोट्ठपाद, कोई पुरुष चौराहे पर किसी महल पर चढ़ने के लिए उसी के नीचे सीढ़ी का निर्माण करे।
तब लोग उसे कहते हैं, “अच्छा, भले आदमी! जिस महल पर चढ़ने के लिए तुम सीढ़ी का निर्माण कर रहे हो, क्या तुम जानते हो कि वह महल पूर्व दिशा में है, या दक्षिण दिशा में है, या पश्चिम दिशा में है, अथवा उत्तर दिशा में है? क्या वह महल ऊँचा है, या नीचा है, अथवा मजले-स्तर का है?”
ऐसा पुछने पर वह कहता है, “मित्रों, यह है वह महल, जिस पर चढ़ने के लिए मैं सीढ़ी का निर्माण कर रहा हूँ!”
तब तुम्हें क्या लगता है, पोट्ठपाद? क्या ऐसा हो तो उस पुरुष का कहना प्रमाणित है?”
“निश्चित ही, भन्ते। ऐसा हो तो उस पुरुष का कहना प्रमाणित ही है।”
चित्त हत्थिसारिपुत्र के प्रश्न
ऐसा कहा जाने पर चित्त हत्थिसारिपुत्र ने भगवान से कहा, “भन्ते, जिस समय स्थूल आत्मा की प्राप्ति होती है, क्या उस समय मन से रची आत्मप्राप्ति और अरूप आत्मप्राप्ति (दोनों) निकम्मे (=निष्प्रभाव) होते हैं, और केवल स्थूल आत्म-प्राप्ति ही सच्ची होती है?
और जिस समय मन से रची आत्मा की प्राप्ति होती है, क्या उस समय स्थूल आत्मप्राप्ति और अरूप आत्मप्राप्ति निकम्मे होते हैं, और केवल मन से रची आत्म-प्राप्ति ही सच्ची होती है?
और जिस समय अरूप आत्मा की प्राप्ति होती है, क्या उस समय स्थूल आत्मप्राप्ति और मन से रची आत्मप्राप्ति निकम्मे होते हैं, और केवल अरूप आत्म-प्राप्ति ही सच्ची होती है?”
(भगवान ने उत्तर दिया,) “चित्त, जिस समय स्थूल आत्मा की प्राप्ति होती है, उस समय उसे ‘मन से रची आत्मप्राप्ति’ नहीं समझा जाता है, और न ही उसे ‘अरूप आत्मप्राप्ति’ समझा जाता हैं। तब उसे केवल ‘स्थूल आत्म-प्राप्ति’ ही समझा जाता है।
और जिस समय मन से रची आत्मा की प्राप्ति होती है, उस समय उसे ‘स्थूल आत्मप्राप्ति’ नहीं समझा जाता है, और न ही उसे ‘अरूप आत्मप्राप्ति’ समझा जाता हैं। तब उसे केवल ‘मन से रची आत्म-प्राप्ति’ ही समझा जाता है।
और जिस समय अरूप आत्मा की प्राप्ति होती है, उस समय उसे ‘स्थूल आत्मप्राप्ति’ नहीं समझा जाता है, और न ही उसे ‘मन से रची आत्मप्राप्ति’ समझा जाता हैं। तब उसे केवल ‘अरूप आत्म-प्राप्ति’ ही समझा जाता है।
यदि, चित्त, कोई तुमसे पुछे कि “क्या तुम अतीत में थे? कही नहीं तो नहीं थे? क्या तुम भविष्य में रहोगे? कही नहीं तो नहीं रहोगे? क्या तुम अभी (वर्तमान में) हो? कही नहीं तो नहीं हो?” ऐसा पूछा जाने पर तुम कैसे उत्तर दोगे?” 6
“भन्ते, ऐसा पूछा जाने पर मैं उत्तर दूँगा, “हाँ, मैं अतीत में था, निश्चित ही था। मैं भविष्य में रहूँगा, निश्चित ही रहूँगा। मैं अभी हूँ, निश्चित ही हूँ!” इस तरह, भन्ते, मैं उत्तर दूँगा।”
“किन्तु यदि, चित्त, कोई तुमसे पुछे कि “जो अतीत में तुम्हें आत्म-प्राप्ति हुई थी, क्या वही आत्म-प्राप्ति सच्ची थी, जबकि भविष्य और वर्तमान की निकम्मी थी? जो भविष्य में तुम्हें आत्म-प्राप्ति होगी, क्या वही आत्म-प्राप्ति सच्ची होगी, जबकि अतीत और वर्तमान की निकम्मी होगी?” जो अभी तुम्हें आत्म-प्राप्ति हुई है, क्या वही आत्म-प्राप्ति सच्ची है, जबकि अतीत और भविष्य की निकम्मी हैं?” ऐसा पूछा जाने पर तुम कैसे उत्तर दोगे?”
“भन्ते, ऐसा पूछा जाने पर मैं उत्तर दूँगा, “जो अतीत में मुझे आत्म-प्राप्ति हुई थी, उस समय वही आत्म-प्राप्ति सच्ची थी, जबकि भविष्य और वर्तमान की निकम्मी थी। जो भविष्य में मुझे आत्म-प्राप्ति होगी, उस समय वही आत्म-प्राप्ति सच्ची होगी, जबकि अतीत और वर्तमान की निकम्मी होगी। जो अभी मुझे आत्म-प्राप्ति हुई है, इस समय यही आत्म-प्राप्ति सच्ची है, जबकि भविष्य और वर्तमान की निकम्मी हैं।” इस तरह, भन्ते, मैं उत्तर दूँगा।”
“उसी तरह, चित्त, जिस समय स्थूल आत्मा की प्राप्ति होती है, उस समय उसे ‘मन से रची आत्मप्राप्ति’ नहीं समझा जाता है, और न ही उसे ‘अरूप आत्मप्राप्ति’ समझा जाता हैं। तब उसे केवल ‘स्थूल आत्म-प्राप्ति’ ही समझा जाता है।
और जिस समय मन से रची आत्मा की प्राप्ति होती है, उस समय उसे ‘स्थूल आत्मप्राप्ति’ नहीं समझा जाता है, और न ही उसे ‘अरूप आत्मप्राप्ति’ समझा जाता हैं। तब उसे केवल ‘मन से रची आत्म-प्राप्ति’ ही समझा जाता है।
और जिस समय अरूप आत्मा की प्राप्ति होती है, उस समय उसे ‘स्थूल आत्मप्राप्ति’ नहीं समझा जाता है, और न ही उसे ‘मन से रची आत्मप्राप्ति’ समझा जाता हैं। तब उसे केवल ‘अरूप आत्म-प्राप्ति’ ही समझा जाता है।
जैसे गाय से दूध आता है, दूध से दही, दही से मक्खन, मक्खन से घी, घी से घी-मण्ड (=घी से निकलने वाली पारदर्शक परत।)
- जब दूध होता है, तब उस समय उसे दही, मक्खन, घी, अथवा घी-मण्ड नहीं समझा जाता है। तब उसे केवल ‘दूध’ ही समझा जाता है।
- जब दही होती है, तब उस समय उसे दूध, मक्खन, घी, अथवा घी-मण्ड नहीं समझा जाता है। तब उसे केवल ‘दही’ ही समझा जाता है।
- जब मक्खन होता है, तब उस समय उसे दूध, दही, घी, अथवा घी-मण्ड नहीं समझा जाता है। तब उसे केवल ‘मक्खन’ ही समझा जाता है।
- जब घी होता है, तब उस समय उसे दूध, दही, मक्खन, अथवा घी-मण्ड नहीं समझा जाता है। तब उसे केवल ‘घी’ ही समझा जाता है।
- जब घी-मण्ड होता है, तब उस समय उसे दूध, दही, मक्खन, अथवा घी नहीं समझा जाता है। तब उसे केवल ‘घी-मण्ड’ ही समझा जाता है।
उसी तरह, जिस समय स्थूल आत्मा की प्राप्ति होती है, उस समय उसे ‘मन से रची आत्मप्राप्ति’ नहीं समझा जाता है, और न ही उसे ‘अरूप आत्मप्राप्ति’ समझा जाता हैं। तब उसे केवल ‘स्थूल आत्म-प्राप्ति’ ही समझा जाता है।
और जिस समय मन से रची आत्मा की प्राप्ति होती है, उस समय उसे ‘स्थूल आत्मप्राप्ति’ नहीं समझा जाता है, और न ही उसे ‘अरूप आत्मप्राप्ति’ समझा जाता हैं। तब उसे केवल ‘मन से रची आत्म-प्राप्ति’ ही समझा जाता है।
और जिस समय अरूप आत्मा की प्राप्ति होती है, उस समय उसे ‘स्थूल आत्मप्राप्ति’ नहीं समझा जाता है, और न ही उसे ‘मन से रची आत्मप्राप्ति’ समझा जाता हैं। तब उसे केवल ‘अरूप आत्म-प्राप्ति’ ही समझा जाता है।
और चित्त, ये लौकिक शब्दावली हैं, लौकिक भाषा हैं, लौकिक वाक्यों में उपयोग हैं, लौकिक वर्णन हैं, जिनका तथागत वाक्यों में उपयोग करते है, किन्तु उनमें लिप्त नहीं होते।” 7
ऐसा कहा जाने पर पोट्ठपाद परिव्राजक ने भगवान से कहा, “अतिउत्तम, भन्ते! अतिउत्तम! जैसे कोई पलटे को सीधा करे, छिपे को खोल दे, भटके को मार्ग दिखाए, या अँधेरे में दीप जलाकर दिखाए, ताकि तेज आँखों वाला स्पष्ट देख पाए—उसी तरह भगवान ने धम्म को अनेक तरह से स्पष्ट कर दिया।
मैं बुद्ध की शरण जाता हूँ! धम्म की और संघ की भी! भगवान मुझे आज से लेकर प्राण रहने तक शरणागत उपासक धारण करें!”
तब चित्त हत्थिसारिपुत्र ने भगवान से कहा, “अतिउत्तम, भन्ते! अतिउत्तम! जैसे कोई पलटे को सीधा करे, छिपे को खोल दे, भटके को मार्ग दिखाए, या अँधेरे में दीप जलाकर दिखाए, ताकि तेज आँखों वाला स्पष्ट देख पाए—उसी तरह भगवान ने धम्म को अनेक तरह से स्पष्ट कर दिया।
मैं बुद्ध की शरण जाता हूँ! धम्म की और संघ की भी! भन्ते, क्या मुझे प्रव्रज्या, और भगवान की उपस्थिती में (भिक्षु बनने की) उपसंपदा मिलेगी?”
तब चित्त हत्थिसारिपुत्र को भगवान की उपस्थिती में प्रव्रज्या और उपसंपदा भी मिल गयी। तब उपसंपदा पाए अधिक समय नहीं बीता था, जब चित्त हत्थिसारिपुत्र भन्ते निर्लिप्त-एकांतवास लेकर फ़िक्रमन्द, सचेत और दृढ़निश्चयी होकर रहते हुए, जिस ध्येय से कुलपुत्र घर से बेघर होकर प्रव्रज्यित होते हैं, उस ब्रह्मचर्य की सर्वोच्च मंज़िल पर पहुँचकर वे स्थित हुए। उन्होंने स्वयं जाना, साक्षात्कार किया, और उन्हें पता चला—‘जन्म समाप्त हुए! ब्रह्मचर्य परिपूर्ण हुआ! जो करना था, सो कर लिया! अभी यहाँ करने के लिए कुछ बचा नहीं!’
इस तरह, आयुष्मान चित्त हत्थिसारिपुत्र (अनेक) अर्हन्तों में एक हुए।
सुत्त समाप्त।
इसके ठीक विपरीत, सामञ्ञफलसुत्त में भिक्षुसंघ की उस ‘गहन नीरवता’ का वर्णन है जिसे देखकर मगधराज अजातशत्रु सिहर उठे थे। उन्हें विश्वास ही नहीं हो पा रहा था कि १२५० भिक्षुओं का समूह इतना शांत भी हो सकता है। संघ की इस शांति और अनुशासन को बनाए रखना भगवान के लिए कितना महत्वपूर्ण था, यह चातुमा सुत्त से स्पष्ट होता है; जहाँ उन्होंने आगंतुक भिक्षुओं के बातचीत करने समूह को भगा दिया था, यह कहते हुए कि वे ‘मछली पकड़ने वाले मछुआरों जैसा शोर कर रहे हैं।’ ↩︎
यद्यपि अट्ठकथा यहाँ ‘अभि’ उपसर्ग को केवल एक निपात मानकर छोड़ देती है, किंतु मेरे विचार से दार्शनिक दृष्टि से इसका एक गहरा अर्थ संभव है। सत्वों का ‘विज्ञान’ निराधार नहीं रहता; वह इन्हीं संज्ञाओं को अपना ‘आलंबन’ बनाकर उन पर प्रतिष्ठित होता है, और इन्हीं के सहारे वह भव-चक्र में यहाँ-वहाँ विचरण करता है। इस संदर्भ में, ‘अभिसंज्ञा’ उन ‘आधारभूत संज्ञाओं’ को इंगित करती है जो विज्ञान के अस्तित्व और विचरण के लिए ‘मंच’ प्रदान करती हैं। अतः ‘अभिसंज्ञा-निरोध’ का अर्थ केवल एक संज्ञा का रुकना नहीं, बल्कि उस आधार का ही ढह जाना है जिस पर सत्व का संसार टिका हुआ है। ↩︎
ग्रामधर्म का शाब्दिक अर्थ है ‘गाँव का आचरण’। विनय और सूत्रों में इसका प्रयोग ‘मैथुन’ या ‘संभोग’ के लिए किया गया है, जो गृहस्थों का आचरण है, भिक्षुओं का नहीं। ↩︎
विकालभोज: भिक्षु नियमों के अनुसार, मध्यान्ह (दोपहर) के बाद भोजन ग्रहण करना वर्जित है। ↩︎
तिरच्छान कथा का शाब्दिक अर्थ है ‘पशुवत’ या ‘आड़ी-तिरछी’ बातें। जिस प्रकार अशिष्ट जानवर जमीन पर आड़े-तिरछे कुचलते हुए चलते हैं, वैसे ही ये अशिष्ट बातें केवल सांसारिक जीवन के इर्द-गिर्द ही व्यर्थ विषयों को कुचलते हुए घूमती रहती हैं और शिष्ट आर्य दिशा में अग्रसर नहीं होतीं। ↩︎
यह अंश बौद्ध इतिहास के उस महान दार्शनिक विवाद की पूर्वपीठिका है, जिसने आगे चलकर ‘सर्वास्तिवाद’ संप्रदाय को जन्म दिया। सर्वास्तिवाद का केंद्रीय सिद्धांत था—‘सर्वम् अस्ति’ (सब कुछ है)। उनका मानना था कि धर्म अपने ‘द्रव्य’ रूप में तीनों कालों—अतीत, अनागत (भविष्य) और वर्तमान—में एक साथ विद्यमान रहते हैं। उनका तर्क था कि यदि अतीत का अस्तित्व नहीं है, तो वह वर्तमान में फल कैसे दे सकता है?
किंतु, भगवान बुद्ध यहाँ इस धारणा का भाषाई और तार्किक आधार पर पूर्व-खंडन करते हैं। वे तीनों कालों के लिए स्पष्ट रूप से तीन अलग-अलग व्याकरणिक कालों का प्रयोग करते हैं:
- अतीत के लिए—‘अहोसि’ (था),
- भविष्य के लिए—‘भविस्सति’ (होगा),
- वर्तमान के लिए—‘अत्थि’ (है)।
भाषा का यह सटीक भेद ही यह सिद्ध करता है कि बुद्ध की दृष्टि में तीनों कालों का स्वभाव भिन्न है। जो ‘बीत गया’ (निरुद्ध हो गया) और जो ‘अभी आया नहीं’ (अनुत्पन्न), उसका वर्तमान में कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है; केवल वर्तमान क्षण ही यथार्थ है। ↩︎
यहाँ बुद्ध एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण (डिसक्लेमर) देते हैं। वे बताते हैं कि ‘मैं’, ‘मेरा’ या ‘आत्मा’ जैसे शब्द केवल लोक-व्यवहार के लिए हैं। जब तक हम इनका प्रयोग केवल बातचीत के लिए करते हैं, तब तक ही उचित हैं। बुद्ध स्वयं भी इनका प्रयोग करते हैं, लेकिन ‘अपरामसन्’ (उनमें बिना लिप्त हुए)। यानी वे जानते हैं कि ये केवल नाम-मात्र हैं, इनके पीछे कोई नित्य सत्ता नहीं है।
ऐतिहासिक संदर्भ में यह समझना आवश्यक है कि यहाँ बुद्ध ‘दो सत्यों’ (संवृति और परमार्थ) का कोई तकनीकी सिद्धांत स्थापित नहीं कर रहे हैं। मूल बुद्ध वचन (EBT) में सत्य का ऐसा दो-स्तरीय विभाजन नहीं मिलता; यह बाद के दार्शनिक संप्रदायों की देन है। यहाँ बुद्ध का दृष्टिकोण सीधा है—भाषा एक साधन मात्र है। उसे अंतिम सत्य मानकर पकड़ना नहीं चाहिए, और न ही लोक-व्यवहार में उसे पूरी तरह नकारना चाहिए। ↩︎
पालि
पोट्ठपादपरिब्बाजकवत्थु
४०६. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे। तेन खो पन समयेन पोट्ठपादो परिब्बाजको समयप्पवादके तिन्दुकाचीरे एकसालके मल्लिकाय आरामे पटिवसति महतिया परिब्बाजकपरिसाय सद्धिं तिंसमत्तेहि परिब्बाजकसतेहि। अथ खो भगवा पुब्बण्हसमयं निवासेत्वा पत्तचीवरमादाय सावत्थिं पिण्डाय पाविसि।
४०७. अथ खो भगवतो एतदहोसि – ‘‘अतिप्पगो खो ताव सावत्थियं पिण्डाय चरितुं। यंनूनाहं येन समयप्पवादको तिन्दुकाचीरो एकसालको मल्लिकाय आरामो, येन पोट्ठपादो परिब्बाजको तेनुपसङ्कमेय्य’’न्ति। अथ खो भगवा येन समयप्पवादको तिन्दुकाचीरो एकसालको मल्लिकाय आरामो तेनुपसङ्कमि।
४०८. तेन खो पन समयेन पोट्ठपादो परिब्बाजको महतिया परिब्बाजकपरिसाय सद्धिं निसिन्नो होति उन्नादिनिया उच्चासद्दमहासद्दाय अनेकविहितं तिरच्छानकथं कथेन्तिया। सेय्यथिदं – राजकथं चोरकथं महामत्तकथं सेनाकथं भयकथं युद्धकथं अन्नकथं पानकथं वत्थकथं सयनकथं मालाकथं गन्धकथं ञातिकथं यानकथं गामकथं निगमकथं नगरकथं जनपदकथं इत्थिकथं सूरकथं विसिखाकथं कुम्भट्ठानकथं पुब्बपेतकथं नानत्तकथं लोकक्खायिकं समुद्दक्खायिकं इतिभवाभवकथं इति वा।
४०९. अद्दसा खो पोट्ठपादो परिब्बाजको भगवन्तं दूरतोव आगच्छन्तं; दिस्वान सकं परिसं सण्ठपेसि – ‘‘अप्पसद्दा भोन्तो होन्तु, मा भोन्तो सद्दमकत्थ। अयं समणो गोतमो आगच्छति। अप्पसद्दकामो खो सो आयस्मा अप्पसद्दस्स वण्णवादी। अप्पेव नाम अप्पसद्दं परिसं विदित्वा उपसङ्कमितब्बं मञ्ञेय्या’’ति। एवं वुत्ते ते परिब्बाजका तुण्ही अहेसुं।
४१०. अथ खो भगवा येन पोट्ठपादो परिब्बाजको तेनुपसङ्कमि। अथ खो पोट्ठपादो परिब्बाजको भगवन्तं एतदवोच – ‘‘एतु खो, भन्ते, भगवा। स्वागतं, भन्ते, भगवतो। चिरस्सं खो, भन्ते, भगवा इमं परियायमकासि, यदिदं इधागमनाय। निसीदतु, भन्ते, भगवा, इदं आसनं पञ्ञत्त’’न्ति।
निसीदि भगवा पञ्ञत्ते आसने। पोट्ठपादोपि खो परिब्बाजको अञ्ञतरं नीचं आसनं गहेत्वा एकमन्तं निसीदि। एकमन्तं निसिन्नं खो पोट्ठपादं परिब्बाजकं भगवा एतदवोच – ‘‘काय नुत्थ (काय नोत्थ (स्या॰ क॰)), पोट्ठपाद, एतरहि कथाय सन्निसिन्ना, का च पन वो अन्तराकथा विप्पकता’’ति?
अभिसञ्ञानिरोधकथा
४११. एवं वुत्ते पोट्ठपादो परिब्बाजको भगवन्तं एतदवोच – ‘‘तिट्ठतेसा, भन्ते, कथा, याय मयं एतरहि कथाय सन्निसिन्ना। नेसा, भन्ते, कथा भगवतो दुल्लभा भविस्सति पच्छापि सवनाय। पुरिमानि, भन्ते, दिवसानि पुरिमतरानि, नानातित्थियानं समणब्राह्मणानं कोतूहलसालाय सन्निसिन्नानं सन्निपतितानं अभिसञ्ञानिरोधे कथा उदपादि – ‘कथं नु खो, भो, अभिसञ्ञानिरोधो होती’ति? तत्रेकच्चे एवमाहंसु – ‘अहेतू अप्पच्चया पुरिसस्स सञ्ञा उप्पज्जन्तिपि निरुज्झन्तिपि। यस्मिं समये उप्पज्जन्ति, सञ्ञी तस्मिं समये होति। यस्मिं समये निरुज्झन्ति, असञ्ञी तस्मिं समये होती’ति। इत्थेके अभिसञ्ञानिरोधं पञ्ञपेन्ति।
‘‘तमञ्ञो एवमाह – ‘न खो पन मेतं (न खो नामेतं (सी॰ पी॰)), भो, एवं भविस्सति। सञ्ञा हि, भो, पुरिसस्स अत्ता। सा च खो उपेतिपि अपेतिपि। यस्मिं समये उपेति, सञ्ञी तस्मिं समये होति। यस्मिं समये अपेति, असञ्ञी तस्मिं समये होती’ति। इत्थेके अभिसञ्ञानिरोधं पञ्ञपेन्ति।
‘‘तमञ्ञो एवमाह – ‘न खो पन मेतं, भो, एवं भविस्सति। सन्ति हि, भो, समणब्राह्मणा महिद्धिका महानुभावा। ते इमस्स पुरिसस्स सञ्ञं उपकड्ढन्तिपि अपकड्ढन्तिपि। यस्मिं समये उपकड्ढन्ति, सञ्ञी तस्मिं समये होति। यस्मिं समये अपकड्ढन्ति, असञ्ञी तस्मिं समये होती’ति। इत्थेके अभिसञ्ञानिरोधं पञ्ञपेन्ति।
‘‘तमञ्ञो एवमाह – ‘न खो पन मेतं, भो, एवं भविस्सति। सन्ति हि, भो, देवता महिद्धिका महानुभावा। ता इमस्स पुरिसस्स सञ्ञं उपकड्ढन्तिपि अपकड्ढन्तिपि। यस्मिं समये उपकड्ढन्ति, सञ्ञी तस्मिं समये होति। यस्मिं समये अपकड्ढन्ति, असञ्ञी तस्मिं समये होती’ति। इत्थेके अभिसञ्ञानिरोधं पञ्ञपेन्ति।
‘‘तस्स मय्हं, भन्ते, भगवन्तंयेव आरब्भ सति उदपादि – ‘अहो नून भगवा, अहो नून सुगतो, यो इमेसं धम्मानं सुकुसलो’ति। भगवा, भन्ते, कुसलो, भगवा पकतञ्ञू अभिसञ्ञानिरोधस्स। कथं नु खो, भन्ते, अभिसञ्ञानिरोधो होती’’ति?
सहेतुकसञ्ञुप्पादनिरोधकथा
४१२. ‘‘तत्र, पोट्ठपाद, ये ते समणब्राह्मणा एवमाहंसु – ‘अहेतू अप्पच्चया पुरिसस्स सञ्ञा उप्पज्जन्तिपि निरुज्झन्तिपी’ति, आदितोव तेसं अपरद्धं। तं किस्स हेतु? सहेतू हि, पोट्ठपाद, सप्पच्चया पुरिसस्स सञ्ञा उप्पज्जन्तिपि निरुज्झन्तिपि। सिक्खा एका सञ्ञा उप्पज्जति, सिक्खा एका सञ्ञा निरुज्झति’’।
४१३. ‘‘का च सिक्खा’’ति? भगवा अवोच – ‘‘इध, पोट्ठपाद, तथागतो लोके उप्पज्जति अरहं, सम्मासम्बुद्धो…पे॰… (यथा १९०-२१२ अनुच्छेदेसु, एवं वित्थारेतब्बं)। एवं खो, पोट्ठपाद, भिक्खु सीलसम्पन्नो होति…पे॰… तस्सिमे पञ्चनीवरणे पहीने अत्तनि समनुपस्सतो पामोज्जं जायति, पमुदितस्स पीति जायति, पीतिमनस्स कायो पस्सम्भति, पस्सद्धकायो सुखं वेदेति, सुखिनो चित्तं समाधियति। सो विविच्चेव कामेहि, विविच्च अकुसलेहि धम्मेहि, सवितक्कं सविचारं विवेकजं पीतिसुखं पठमं झानं उपसम्पज्ज विहरति। तस्स या पुरिमा कामसञ्ञा, सा निरुज्झति। विवेकजपीतिसुखसुखुमसच्चसञ्ञा तस्मिं समये होति, विवेकजपीतिसुखसुखुम-सच्चसञ्ञीयेव तस्मिं समये होति। एवम्पि सिक्खा एका सञ्ञा उप्पज्जति, सिक्खा एका सञ्ञा निरुज्झति। अयं सिक्खा’’ति भगवा अवोच।
‘‘पुन चपरं, पोट्ठपाद, भिक्खु वितक्कविचारानं वूपसमा अज्झत्तं सम्पसादनं चेतसो एकोदिभावं अवितक्कं अविचारं समाधिजं पीतिसुखं दुतियं झानं उपसम्पज्ज विहरति। तस्स या पुरिमा विवेकजपीतिसुखसुखुमसच्चसञ्ञा, सा निरुज्झति। समाधिजपीतिसुखसुखुमसच्चसञ्ञा तस्मिं समये होति, समाधिजपीतिसुखसुखुमसच्चसञ्ञीयेव तस्मिं समये होति। एवम्पि सिक्खा एका सञ्ञा उप्पज्जति, सिक्खा एका सञ्ञा निरुज्झति। अयम्पि सिक्खा’’ति भगवा अवोच।
‘‘पुन चपरं, पोट्ठपाद, भिक्खु पीतिया च विरागा उपेक्खको च विहरति सतो च सम्पजानो, सुखञ्च कायेन पटिसंवेदेति, यं तं अरिया आचिक्खन्ति – ‘‘उपेक्खको सतिमा सुखविहारी’’ति, ततियं झानं उपसम्पज्ज विहरति। तस्स या पुरिमा समाधिजपीतिसुखसुखुमसच्चसञ्ञा, सा निरुज्झति। उपेक्खासुखसुखुमसच्चसञ्ञा तस्मिं समये होति, उपेक्खासुखसुखुमसच्चसञ्ञीयेव तस्मिं समये होति। एवम्पि सिक्खा एका सञ्ञा उप्पज्जति, सिक्खा एका सञ्ञा निरुज्झति। अयम्पि सिक्खा’’ति भगवा अवोच।
‘‘पुन चपरं, पोट्ठपाद, भिक्खु सुखस्स च पहाना दुक्खस्स च पहाना पुब्बेव सोमनस्सदोमनस्सानं अत्थङ्गमा अदुक्खमसुखं उपेक्खासतिपारिसुद्धिं चतुत्थं झानं उपसम्पज्ज विहरति। तस्स या पुरिमा उपेक्खासुखसुखुमसच्चसञ्ञा, सा निरुज्झति। अदुक्खमसुखसुखुमसच्चसञ्ञा तस्मिं समये होति, अदुक्खमसुखसुखुमसच्चसञ्ञीयेव तस्मिं समये होति। एवम्पि सिक्खा एका सञ्ञा उप्पज्जति, सिक्खा एका सञ्ञा निरुज्झति। अयम्पि सिक्खा’’ति भगवा अवोच।
‘‘पुन चपरं, पोट्ठपाद, भिक्खु सब्बसो रूपसञ्ञानं समतिक्कमा पटिघसञ्ञानं अत्थङ्गमा नानत्तसञ्ञानं अमनसिकारा ‘अनन्तो आकासो’ति आकासानञ्चायतनं उपसम्पज्ज विहरति। तस्स या पुरिमा रूपसञ्ञा (पुरिमसञ्ञा (क॰)), सा निरुज्झति। आकासानञ्चायतनसुखुमसच्चसञ्ञा तस्मिं समये होति, आकासानञ्चायतनसुखुमसच्चसञ्ञीयेव तस्मिं समये होति। एवम्पि सिक्खा एका सञ्ञा उप्पज्जति, सिक्खा एका सञ्ञा निरुज्झति। अयम्पि सिक्खा’’ति भगवा अवोच।
‘‘पुन चपरं, पोट्ठपाद, भिक्खु सब्बसो आकासानञ्चायतनं समतिक्कम्म ‘अनन्तं विञ्ञाण’न्ति विञ्ञाणञ्चायतनं उपसम्पज्ज विहरति। तस्स या पुरिमा आकासानञ्चायतनसुखुमसच्चसञ्ञा, सा निरुज्झति। विञ्ञाणञ्चायतनसुखुमसच्चसञ्ञा तस्मिं समये होति, विञ्ञाणञ्चायतनसुखुमसच्चसञ्ञीयेव तस्मिं समये होति। एवम्पि सिक्खा एका सञ्ञा उप्पज्जति, सिक्खा एका सञ्ञा निरुज्झति। अयम्पि सिक्खा’’ति भगवा अवोच।
‘‘पुन चपरं, पोट्ठपाद, भिक्खु सब्बसो विञ्ञाणञ्चायतनं समतिक्कम्म ‘नत्थि किञ्ची’ति आकिञ्चञ्ञायतनं उपसम्पज्ज विहरति। तस्स या पुरिमा विञ्ञाणञ्चायतनसुखुमसच्चसञ्ञा, सा निरुज्झति। आकिञ्चञ्ञायतनसुखुमसच्चसञ्ञा तस्मिं समये होति, आकिञ्चञ्ञायतनसुखुमसच्चसञ्ञीयेव तस्मिं समये होति। एवम्पि सिक्खा एका सञ्ञा उप्पज्जति, सिक्खा एका सञ्ञा निरुज्झति। अयम्पि सिक्खा’’ति भगवा अवोच।
४१४. ‘‘यतो खो, पोट्ठपाद, भिक्खु इध सकसञ्ञी होति, सो ततो अमुत्र ततो अमुत्र अनुपुब्बेन सञ्ञग्गं फुसति। तस्स सञ्ञग्गे ठितस्स एवं होति – ‘चेतयमानस्स मे पापियो, अचेतयमानस्स मे सेय्यो। अहञ्चेव खो पन चेतेय्यं, अभिसङ्खरेय्यं, इमा च मे सञ्ञा निरुज्झेय्युं, अञ्ञा च ओळारिका सञ्ञा उप्पज्जेय्युं; यंनूनाहं न चेव चेतेय्यं न च अभिसङ्खरेय्य’न्ति। सो न चेव चेतेति, न च अभिसङ्खरोति। तस्स अचेतयतो अनभिसङ्खरोतो ता चेव सञ्ञा निरुज्झन्ति, अञ्ञा च ओळारिका सञ्ञा न उप्पज्जन्ति। सो निरोधं फुसति। एवं खो, पोट्ठपाद, अनुपुब्बाभिसञ्ञानिरोध-सम्पजान-समापत्ति होति।
‘‘तं किं मञ्ञसि, पोट्ठपाद, अपि नु ते इतो पुब्बे एवरूपा अनुपुब्बाभिसञ्ञानिरोध-सम्पजान-समापत्ति सुतपुब्बा’’ति? ‘‘नो हेतं, भन्ते। एवं खो अहं, भन्ते, भगवतो भासितं आजानामि – ‘यतो खो, पोट्ठपाद, भिक्खु इध सकसञ्ञी होति, सो ततो अमुत्र ततो अमुत्र अनुपुब्बेन सञ्ञग्गं फुसति, तस्स सञ्ञग्गे ठितस्स एवं होति – ‘‘चेतयमानस्स मे पापियो, अचेतयमानस्स मे सेय्यो। अहञ्चेव खो पन चेतेय्यं अभिसङ्खरेय्यं, इमा च मे सञ्ञा निरुज्झेय्युं, अञ्ञा च ओळारिका सञ्ञा उप्पज्जेय्युं; यंनूनाहं न चेव चेतेय्यं, न च अभिसङ्खरेय्य’’न्ति। सो न चेव चेतेति, न चाभिसङ्खरोति, तस्स अचेतयतो अनभिसङ्खरोतो ता चेव सञ्ञा निरुज्झन्ति, अञ्ञा च ओळारिका सञ्ञा न उप्पज्जन्ति। सो निरोधं फुसति। एवं खो, पोट्ठपाद, अनुपुब्बाभिसञ्ञानिरोध-सम्पजान-समापत्ति होती’’’ति। ‘‘एवं, पोट्ठपादा’’ति।
४१५. ‘‘एकञ्ञेव नु खो, भन्ते, भगवा सञ्ञग्गं पञ्ञपेति, उदाहु पुथूपि सञ्ञग्गे पञ्ञपेती’’ति? ‘‘एकम्पि खो अहं, पोट्ठपाद, सञ्ञग्गं पञ्ञपेमि, पुथूपि सञ्ञग्गे पञ्ञपेमी’’ति। ‘‘यथा कथं पन, भन्ते, भगवा एकम्पि सञ्ञग्गं पञ्ञपेति, पुथूपि सञ्ञग्गे पञ्ञपेती’’ति? ‘‘यथा यथा खो, पोट्ठपाद, निरोधं फुसति, तथा तथाहं सञ्ञग्गं पञ्ञपेमि। एवं खो अहं, पोट्ठपाद, एकम्पि सञ्ञग्गं पञ्ञपेमि, पुथूपि सञ्ञग्गे पञ्ञपेमी’’ति।
४१६. ‘‘सञ्ञा नु खो, भन्ते, पठमं उप्पज्जति, पच्छा ञाणं, उदाहु ञाणं पठमं उप्पज्जति, पच्छा सञ्ञा, उदाहु सञ्ञा च ञाणञ्च अपुब्बं अचरिमं उप्पज्जन्ती’’ति? ‘‘सञ्ञा खो, पोट्ठपाद, पठमं उप्पज्जति, पच्छा ञाणं, सञ्ञुप्पादा च पन ञाणुप्पादो होति। सो एवं पजानाति – ‘इदप्पच्चया किर मे ञाणं उदपादी’ति। इमिना खो एतं, पोट्ठपाद, परियायेन वेदितब्बं – यथा सञ्ञा पठमं उप्पज्जति, पच्छा ञाणं, सञ्ञुप्पादा च पन ञाणुप्पादो होती’’ति।
सञ्ञाअत्तकथा
४१७. ‘‘सञ्ञा नु खो, भन्ते, पुरिसस्स अत्ता, उदाहु अञ्ञा सञ्ञा अञ्ञो अत्ता’’ति? ‘‘कं पन त्वं, पोट्ठपाद, अत्तानं पच्चेसी’’ति? ‘‘ओळारिकं खो अहं, भन्ते, अत्तानं पच्चेमि रूपिं चातुमहाभूतिकं कबळीकाराहारभक्ख’’न्ति (कबळीकारभक्खन्ति (स्या॰ क॰))। ‘‘ओळारिको च हि ते, पोट्ठपाद, अत्ता अभविस्स रूपी चातुमहाभूतिको कबळीकाराहारभक्खो। एवं सन्तं खो ते, पोट्ठपाद, अञ्ञाव सञ्ञा भविस्सति अञ्ञो अत्ता। तदमिनापेतं, पोट्ठपाद, परियायेन वेदितब्बं यथा अञ्ञाव सञ्ञा भविस्सति अञ्ञो अत्ता। तिट्ठतेव सायं (तिट्ठतेवायं (सी॰ पी॰)), पोट्ठपाद, ओळारिको अत्ता रूपी चातुमहाभूतिको कबळीकाराहारभक्खो, अथ इमस्स पुरिसस्स अञ्ञा च सञ्ञा उप्पज्जन्ति, अञ्ञा च सञ्ञा निरुज्झन्ति। इमिना खो एतं, पोट्ठपाद, परियायेन वेदितब्बं यथा अञ्ञाव सञ्ञा भविस्सति अञ्ञो अत्ता’’ति।
४१८. ‘‘मनोमयं खो अहं, भन्ते, अत्तानं पच्चेमि सब्बङ्गपच्चङ्गिं अहीनिन्द्रिय’’न्ति। ‘‘मनोमयो च हि ते, पोट्ठपाद, अत्ता अभविस्स सब्बङ्गपच्चङ्गी अहीनिन्द्रियो, एवं सन्तम्पि खो ते, पोट्ठपाद, अञ्ञाव सञ्ञा भविस्सति अञ्ञो अत्ता। तदमिनापेतं, पोट्ठपाद, परियायेन वेदितब्बं यथा अञ्ञाव सञ्ञा भविस्सति अञ्ञो अत्ता। तिट्ठतेव सायं, पोट्ठपाद, मनोमयो अत्ता सब्बङ्गपच्चङ्गी अहीनिन्द्रियो, अथ इमस्स पुरिसस्स अञ्ञा च सञ्ञा उप्पज्जन्ति, अञ्ञा च सञ्ञा निरुज्झन्ति। इमिनापि खो एतं, पोट्ठपाद, परियायेन वेदितब्बं यथा अञ्ञाव सञ्ञा भविस्सति अञ्ञो अत्ता’’ति।
४१९. ‘‘अरूपिं खो अहं, भन्ते, अत्तानं पच्चेमि सञ्ञामय’’न्ति। ‘‘अरूपी च हि ते, पोट्ठपाद, अत्ता अभविस्स सञ्ञामयो, एवं सन्तम्पि खो ते, पोट्ठपाद, अञ्ञाव सञ्ञा भविस्सति अञ्ञो अत्ता। तदमिनापेतं, पोट्ठपाद, परियायेन वेदितब्बं यथा अञ्ञाव सञ्ञा भविस्सति अञ्ञो अत्ता। तिट्ठतेव सायं, पोट्ठपाद, अरूपी अत्ता सञ्ञामयो, अथ इमस्स पुरिसस्स अञ्ञा च सञ्ञा उप्पज्जन्ति, अञ्ञा च सञ्ञा निरुज्झन्ति। इमिनापि खो एतं, पोट्ठपाद, परियायेन वेदितब्बं यथा अञ्ञाव सञ्ञा भविस्सति अञ्ञो अत्ता’’ति।
४२०. ‘‘सक्का पनेतं, भन्ते, मया ञातुं – ‘सञ्ञा पुरिसस्स अत्ता’ति वा ‘अञ्ञाव सञ्ञा अञ्ञो अत्ताति वा’ति? ‘‘दुज्जानं खो एतं (एवं (क॰)), पोट्ठपाद, तया अञ्ञदिट्ठिकेन अञ्ञखन्तिकेन अञ्ञरुचिकेन अञ्ञत्रायोगेन अञ्ञत्राचरियकेन – ‘सञ्ञा पुरिसस्स अत्ता’ति वा, ‘अञ्ञाव सञ्ञा अञ्ञो अत्ताति वा’’’ति।
‘‘सचे तं, भन्ते, मया दुज्जानं अञ्ञदिट्ठिकेन अञ्ञखन्तिकेन अञ्ञरुचिकेन अञ्ञत्रायोगेन अञ्ञत्राचरियकेन – ‘सञ्ञा पुरिसस्स अत्ता’ति वा, ‘अञ्ञाव सञ्ञा अञ्ञो अत्ता’ति वा; ‘किं पन, भन्ते, सस्सतो लोको, इदमेव सच्चं मोघमञ्ञ’न्ति? अब्याकतं खो एतं, पोट्ठपाद, मया – ‘सस्सतो लोको, इदमेव सच्चं मोघमञ्ञ’न्ति।
‘‘किं पन, भन्ते, ‘असस्सतो लोको, इदमेव सच्चं मोघमञ्ञ’’’न्ति? ‘‘एतम्पि खो, पोट्ठपाद, मया अब्याकतं – ‘असस्सतो लोको, इदमेव सच्चं मोघमञ्ञ’’’न्ति।
‘‘किं पन, भन्ते, ‘अन्तवा लोको…पे॰… ‘अनन्तवा लोको … ‘तं जीवं तं सरीरं… ‘अञ्ञं जीवं अञ्ञं सरीरं… ‘होति तथागतो परं मरणा… ‘न होति तथागतो परं मरणा… ‘होति च न च होति तथागतो परं मरणा… ‘नेव होति न न होति तथागतो परं मरणा, इदमेव सच्चं मोघमञ्ञ’’’न्ति? ‘‘एतम्पि खो, पोट्ठपाद, मया अब्याकतं – ‘नेव होति न न होति तथागतो परं मरणा, इदमेव सच्चं मोघमञ्ञ’’’न्ति।
‘‘कस्मा पनेतं, भन्ते, भगवता अब्याकत’’न्ति? ‘‘न हेतं, पोट्ठपाद, अत्थसंहितं न धम्मसंहितं नादिब्रह्मचरियकं, न निब्बिदाय न विरागाय न निरोधाय न उपसमाय न अभिञ्ञाय न सम्बोधाय न निब्बानाय संवत्तति, तस्मा एतं मया अब्याकत’’न्ति।
‘‘किं पन, भन्ते, भगवता ब्याकत’’न्ति? ‘‘इदं दुक्खन्ति खो, पोट्ठपाद, मया ब्याकतं। अयं दुक्खसमुदयोति खो, पोट्ठपाद, मया ब्याकतं। अयं दुक्खनिरोधोति खो, पोट्ठपाद, मया ब्याकतं। अयं दुक्खनिरोधगामिनी पटिपदाति खो, पोट्ठपाद, मया ब्याकत’’न्ति।
‘‘कस्मा पनेतं, भन्ते, भगवता ब्याकत’’न्ति? ‘‘एतञ्हि, पोट्ठपाद, अत्थसंहितं, एतं धम्मसंहितं, एतं आदिब्रह्मचरियकं, एतं निब्बिदाय विरागाय निरोधाय उपसमाय अभिञ्ञाय सम्बोधाय निब्बानाय संवत्तति; तस्मा एतं मया ब्याकत’’न्ति। ‘‘एवमेतं, भगवा, एवमेतं, सुगत। यस्सदानि, भन्ते, भगवा कालं मञ्ञती’’ति। अथ खो भगवा उट्ठायासना पक्कामि।
४२१. अथ खो ते परिब्बाजका अचिरपक्कन्तस्स भगवतो पोट्ठपादं परिब्बाजकं समन्ततो वाचा (वाचाय (स्या॰ क॰)) सन्नितोदकेन सञ्झब्भरिमकंसु – ‘‘एवमेव पनायं भवं पोट्ठपादो यञ्ञदेव समणो गोतमो भासति, तं तदेवस्स अब्भनुमोदति – ‘एवमेतं भगवा एवमेतं, सुगता’ति। न खो पन मयं किञ्चि (कञ्चि (पी॰)) समणस्स गोतमस्स एकंसिकं धम्मं देसितं आजानाम – ‘सस्सतो लोको’ति वा, ‘असस्सतो लोको’ति वा, ‘अन्तवा लोको’ति वा, ‘अनन्तवा लोको’ति वा, ‘तं जीवं तं सरीर’न्ति वा, ‘अञ्ञं जीवं अञ्ञं सरीर’न्ति वा, ‘होति तथागतो परं मरणा’ति वा, ‘न होति तथागतो परं मरणा’ति वा, ‘होति च न च होति तथागतो परं मरणा’ति वा, ‘नेव होति न न होति तथागतो परं मरणा’ति वा’’ति।
एवं वुत्ते पोट्ठपादो परिब्बाजको ते परिब्बाजके एतदवोच – ‘‘अहम्पि खो, भो, न किञ्चि समणस्स गोतमस्स एकंसिकं धम्मं देसितं आजानामि – ‘सस्सतो लोको’ति वा, ‘असस्सतो लोको’ति वा…पे॰… ‘नेव होति न न होति तथागतो परं मरणा’ति वा; अपि च समणो गोतमो भूतं तच्छं तथं पटिपदं पञ्ञपेति धम्मट्ठिततं धम्मनियामतं। भूतं खो पन तच्छं तथं पटिपदं पञ्ञपेन्तस्स धम्मट्ठिततं धम्मनियामतं, कथञ्हि नाम मादिसो विञ्ञू समणस्स गोतमस्स सुभासितं सुभासिततो नाब्भनुमोदेय्या’’ति?
चित्तहत्थिसारिपुत्तपोट्ठपादवत्थु
४२२. अथ खो द्वीहतीहस्स अच्चयेन चित्तो च हत्थिसारिपुत्तो पोट्ठपादो च परिब्बाजको येन भगवा तेनुपसङ्कमिंसु; उपसङ्कमित्वा चित्तो हत्थिसारिपुत्तो भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदि। पोट्ठपादो पन परिब्बाजको भगवता सद्धिं सम्मोदि। सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा एकमन्तं निसीदि। एकमन्तं निसिन्नो खो पोट्ठपादो परिब्बाजको भगवन्तं एतदवोच – ‘‘तदा मं, भन्ते, ते परिब्बाजका अचिरपक्कन्तस्स भगवतो समन्ततो वाचासन्नितोदकेन सञ्झब्भरिमकंसु – ‘एवमेव पनायं भवं पोट्ठपादो यञ्ञदेव समणो गोतमो भासति, तं तदेवस्स अब्भनुमोदति – ‘एवमेतं भगवा एवमेतं सुगता’’ति। न खो पन मयं किञ्चि समणस्स गोतमस्स एकंसिकं धम्मं देसितं आजानाम – ‘‘सस्सतो लोको’’ति वा, ‘‘असस्सतो लोको’’ति वा, ‘‘अन्तवा लोको’’ति वा, ‘‘अनन्तवा लोको’’ति वा, ‘‘तं जीवं तं सरीर’’न्ति वा, ‘‘अञ्ञं जीवं अञ्ञं सरीर’’न्ति वा, ‘‘होति तथागतो परं मरणा’’ति वा, ‘‘न होति तथागतो परं मरणा’’ति वा, ‘‘होति च न च होति तथागतो परं मरणा’’ति वा, ‘‘नेव होति न न होति तथागतो परं मरणा’’ति वा’ति। एवं वुत्ताहं, भन्ते, ते परिब्बाजके एतदवोचं – ‘अहम्पि खो, भो, न किञ्चि समणस्स गोतमस्स एकंसिकं धम्मं देसितं आजानामि – ‘‘सस्सतो लोको’’ति वा, ‘‘असस्सतो लोको’’ति वा…पे॰… ‘‘नेव होति न न होति तथागतो परं मरणा’’ति वा; अपि च समणो गोतमो भूतं तच्छं तथं पटिपदं पञ्ञपेति धम्मट्ठिततं धम्मनियामतं। भूतं खो पन तच्छं तथं पटिपदं पञ्ञपेन्तस्स धम्मट्ठिततं धम्मनियामतं, कथञ्हि नाम मादिसो विञ्ञू समणस्स गोतमस्स सुभासितं सुभासिततो नाब्भनुमोदेय्या’’ति?
४२३. ‘‘सब्बेव खो एते, पोट्ठपाद, परिब्बाजका अन्धा अचक्खुका; त्वंयेव नेसं एको चक्खुमा। एकंसिकापि हि खो, पोट्ठपाद, मया धम्मा देसिता पञ्ञत्ता; अनेकंसिकापि हि खो, पोट्ठपाद, मया धम्मा देसिता पञ्ञत्ता।
‘‘कतमे च ते, पोट्ठपाद, मया अनेकंसिका धम्मा देसिता पञ्ञत्ता? ‘सस्सतो लोको’ति (लोकोति वा (सी॰ क॰)) खो, पोट्ठपाद, मया अनेकंसिको धम्मो देसितो पञ्ञत्तो; ‘असस्सतो लोको’ति (लोकोति वा (सी॰ क॰)) खो, पोट्ठपाद, मया अनेकंसिको धम्मो देसितो पञ्ञत्तो; ‘अन्तवा लोको’ति (लोकोति वा (सी॰ क॰)) खो पोट्ठपाद…पे॰… ‘अनन्तवा लोको’ति (लोकोति वा (सी॰ क॰)) खो पोट्ठपाद… ‘तं जीवं तं सरीर’न्ति खो पोट्ठपाद… ‘अञ्ञं जीवं अञ्ञं सरीर’न्ति खो पोट्ठपाद… ‘होति तथागतो परं मरणा’ति खो पोट्ठपाद… न होति तथागतो परं मरणा’ति खो पोट्ठपाद… ‘होति च न च होति तथागतो परं मरणा’ति खो पोट्ठपाद… ‘नेव होति न न होति तथागतो परं मरणा’ति खो, पोट्ठपाद, मया अनेकंसिको धम्मो देसितो पञ्ञत्तो।
‘‘कस्मा च ते, पोट्ठपाद, मया अनेकंसिका धम्मा देसिता पञ्ञत्ता? न हेते, पोट्ठपाद, अत्थसंहिता न धम्मसंहिता न आदिब्रह्मचरियका न निब्बिदाय न विरागाय न निरोधाय न उपसमाय न अभिञ्ञाय न सम्बोधाय न निब्बानाय संवत्तन्ति। तस्मा ते मया अनेकंसिका धम्मा देसिता पञ्ञत्ता’’।
एकंसिकधम्मो
४२४. ‘‘कतमे च ते, पोट्ठपाद, मया एकंसिका धम्मा देसिता पञ्ञत्ता? इदं दुक्खन्ति खो, पोट्ठपाद, मया एकंसिको धम्मो देसितो पञ्ञत्तो। अयं दुक्खसमुदयोति खो, पोट्ठपाद, मया एकंसिको धम्मो देसितो पञ्ञत्तो। अयं दुक्खनिरोधोति खो, पोट्ठपाद, मया एकंसिको धम्मो देसितो पञ्ञत्तो। अयं दुक्खनिरोधगामिनी पटिपदाति खो, पोट्ठपाद, मया एकंसिको धम्मो देसितो पञ्ञत्तो।
‘‘कस्मा च ते, पोट्ठपाद, मया एकंसिका धम्मा देसिता पञ्ञत्ता? एते, पोट्ठपाद, अत्थसंहिता, एते धम्मसंहिता, एते आदिब्रह्मचरियका एते निब्बिदाय विरागाय निरोधाय उपसमाय अभिञ्ञाय सम्बोधाय निब्बानाय संवत्तन्ति। तस्मा ते मया एकंसिका धम्मा देसिता पञ्ञत्ता।
४२५. ‘‘सन्ति, पोट्ठपाद, एके समणब्राह्मणा एवंवादिनो एवंदिट्ठिनो – ‘एकन्तसुखी अत्ता होति अरोगो परं मरणा’ति। त्याहं उपसङ्कमित्वा एवं वदामि – ‘सच्चं किर तुम्हे आयस्मन्तो एवंवादिनो एवंदिट्ठिनो – ‘‘एकन्तसुखी अत्ता होति अरोगो परं मरणा’ति? ते चे मे एवं पुट्ठा ‘आमा’ति पटिजानन्ति। त्याहं एवं वदामि – ‘अपि पन तुम्हे आयस्मन्तो एकन्तसुखं लोकं जानं पस्सं विहरथा’ति? इति पुट्ठा ‘नो’ति वदन्ति।
‘‘त्याहं एवं वदामि – ‘अपि पन तुम्हे आयस्मन्तो एकं वा रत्तिं एकं वा दिवसं उपड्ढं वा रत्तिं उपड्ढं वा दिवसं एकन्तसुखिं अत्तानं सञ्जानाथा’ति (सम्पजानाथाति (सी॰ स्या॰ क॰))? इति पुट्ठा ‘नो’ति वदन्ति। त्याहं एवं वदामि – ‘अपि पन तुम्हे आयस्मन्तो जानाथ – ‘‘अयं मग्गो अयं पटिपदा एकन्तसुखस्स लोकस्स सच्छिकिरियाया’’’ति? इति पुट्ठा ‘नो’ति वदन्ति।
‘‘त्याहं एवं वदामि – ‘अपि पन तुम्हे आयस्मन्तो या ता देवता एकन्तसुखं लोकं उपपन्ना, तासं भासमानानं सद्दं सुणाथ – ‘‘सुप्पटिपन्नात्थ, मारिसा, उजुप्पटिपन्नात्थ, मारिसा, एकन्तसुखस्स लोकस्स सच्छिकिरियाय; मयम्पि हि, मारिसा, एवंपटिपन्ना एकन्तसुखं लोकं उपपन्ना’ति? इति पुट्ठा ‘नो’ति वदन्ति।
‘‘तं किं मञ्ञसि, पोट्ठपाद, ननु एवं सन्ते तेसं समणब्राह्मणानं अप्पाटिहीरकतं भासितं सम्पज्जती’’ति? ‘‘अद्धा खो, भन्ते, एवं सन्ते तेसं समणब्राह्मणानं अप्पाटिहीरकतं भासितं सम्पज्जती’’ति।
४२६. ‘‘सेय्यथापि, पोट्ठपाद, पुरिसो एवं वदेय्य – ‘अहं या इमस्मिं जनपदे जनपदकल्याणी, तं इच्छामि तं कामेमी’ति। तमेनं एवं वदेय्युं – ‘अम्भो पुरिस, यं त्वं जनपदकल्याणिं इच्छसि कामेसि, जानासि तं जनपदकल्याणिं खत्तियी वा ब्राह्मणी वा वेस्सी वा सुद्दी वा’ति? इति पुट्ठो ‘नो’ति वदेय्य। तमेनं एवं वदेय्युं – ‘अम्भो पुरिस, यं त्वं जनपदकल्याणिं इच्छसि कामेसि, जानासि तं जनपदकल्याणिं एवंनामा एवंगोत्ताति वा, दीघा वा रस्सा वा मज्झिमा वा काळी वा सामा वा मङ्गुरच्छवी वाति, अमुकस्मिं गामे वा निगमे वा नगरे वा’ति? इति पुट्ठो ‘नो’ति वदेय्य। तमेनं एवं वदेय्युं – ‘अम्भो पुरिस, यं त्वं न जानासि न पस्ससि, तं त्वं इच्छसि कामेसी’ति? इति पुट्ठो ‘आमा’ति वदेय्य।
‘‘तं किं मञ्ञसि, पोट्ठपाद, ननु एवं सन्ते तस्स पुरिसस्स अप्पाटिहीरकतं भासितं सम्पज्जती’’ति? ‘‘अद्धा खो, भन्ते, एवं सन्ते तस्स पुरिसस्स अप्पाटिहीरकतं भासितं सम्पज्जती’’ति।
‘‘एवमेव खो, पोट्ठपाद, ये ते समणब्राह्मणा एवंवादिनो एवंदिट्ठिनो – ‘एकन्तसुखी अत्ता होति अरोगो परं मरणा’ति। त्याहं उपसङ्कमित्वा एवं वदामि – ‘सच्चं किर तुम्हे आयस्मन्तो एवंवादिनो एवंदिट्ठिनो – ‘‘एकन्तसुखी अत्ता होति अरोगो परं मरणा’’’ति? ते चे मे एवं पुट्ठा ‘आमा’ति पटिजानन्ति। त्याहं एवं वदामि – ‘अपि पन तुम्हे आयस्मन्तो एकन्तसुखं लोकं जानं पस्सं विहरथा’ति? इति पुट्ठा ‘नो’ति वदन्ति।
‘‘त्याहं एवं वदामि – ‘अपि पन तुम्हे आयस्मन्तो एकं वा रत्तिं एकं वा दिवसं उपड्ढं वा रत्तिं उपड्ढं वा दिवसं एकन्तसुखिं अत्तानं सञ्जानाथा’ति? इति पुट्ठा ‘नो’ति वदन्ति। त्याहं एवं वदामि – ‘अपि पन तुम्हे आयस्मन्तो जानाथ – ‘‘अयं मग्गो अयं पटिपदा एकन्तसुखस्स लोकस्स सच्छिकिरियाया’ति? इति पुट्ठा ‘नो’ति वदन्ति।
‘‘त्याहं एवं वदामि – ‘अपि पन तुम्हे आयस्मन्तो या ता देवता एकन्तसुखं लोकं उपपन्ना, तासं भासमानानं सद्दं सुणाथ – ‘‘सुप्पटिपन्नात्थ, मारिसा, उजुप्पटिपन्नात्थ, मारिसा, एकन्तसुखस्स लोकस्स सच्छिकिरियाय; मयम्पि हि, मारिसा, एवंपटिपन्ना एकन्तसुखं लोकं उपपन्ना’’’ति? इति पुट्ठा ‘नो’ति वदन्ति।
‘‘तं किं मञ्ञसि, पोट्ठपाद, ननु एवं सन्ते तेसं समणब्राह्मणानं अप्पाटिहीरकतं भासितं सम्पज्जती’’ति? ‘‘अद्धा खो, भन्ते, एवं सन्ते तेसं समणब्राह्मणानं अप्पाटिहीरकतं भासितं सम्पज्जती’’ति।
४२७. ‘‘सेय्यथापि, पोट्ठपाद, पुरिसो चातुमहापथे निस्सेणिं करेय्य पासादस्स आरोहणाय। तमेनं एवं वदेय्युं – ‘अम्भो पुरिस, यस्स त्वं (यं त्वं (सी॰ क॰)) पासादस्स आरोहणाय निस्सेणिं करोसि, जानासि तं पासादं पुरत्थिमाय वा दिसाय दक्खिणाय वा दिसाय पच्छिमाय वा दिसाय उत्तराय वा दिसाय उच्चो वा नीचो वा मज्झिमो वा’ति? इति पुट्ठो ‘नो’ति वदेय्य। तमेनं एवं वदेय्युं – ‘अम्भो पुरिस, यं त्वं न जानासि न पस्ससि, तस्स त्वं पासादस्स आरोहणाय निस्सेणिं करोसी’ति? इति पुट्ठो ‘आमा’ति वदेय्य।
‘‘तं किं मञ्ञसि, पोट्ठपाद, ननु एवं सन्ते तस्स पुरिसस्स अप्पाटिहीरकतं भासितं सम्पज्जती’’ति? ‘‘अद्धा खो, भन्ते, एवं सन्ते तस्स पुरिसस्स अप्पाटिहीरकतं भासितं सम्पज्जती’’ति।
‘‘एवमेव खो, पोट्ठपाद, ये ते समणब्राह्मणा एवंवादिनो एवंदिट्ठिनो – ‘एकन्तसुखी अत्ता होति अरोगो परं मरणा’ति। त्याहं उपसङ्कमित्वा एवं वदामि – ‘सच्चं किर तुम्हे आयस्मन्तो एवंवादिनो एवंदिट्ठिनो – ‘‘एकन्तसुखी अत्ता होति अरोगो परं मरणा’ति? ते चे मे एवं पुट्ठा ‘आमा’ति पटिजानन्ति। त्याहं एवं वदामि – ‘अपि पन तुम्हे आयस्मन्तो एकन्तसुखं लोकं जानं पस्सं विहरथा’ति? इति पुट्ठा ‘नो’ति वदन्ति।
‘‘त्याहं एवं वदामि – ‘अपि पन तुम्हे आयस्मन्तो एकं वा रत्तिं एकं वा दिवसं उपड्ढं वा रत्तिं उपड्ढं वा दिवसं एकन्तसुखिं अत्तानं सञ्जानाथा’ति? इति पुट्ठा ‘नो’ति वदन्ति। त्याहं एवं वदामि – ‘अपि पन तुम्हे आयस्मन्तो जानाथ अयं मग्गो अयं पटिपदा एकन्तसुखस्स लोकस्स सच्छिकिरियाया’ति? इति पुट्ठा ‘नो’ति वदन्ति।
‘‘त्याहं एवं वदामि – ‘अपि पन तुम्हे आयस्मन्तो या ता देवता एकन्तसुखं लोकं उपपन्ना’ तासं देवतानं भासमानानं सद्दं सुणाथ- ‘‘सुप्पटिपन्नात्थ, मारिसा, उजुप्पटिपन्नात्थ, मारिसा, एकन्तसुखस्स लोकस्स सच्छिकिरियाय; मयम्पि हि, मारिसा, एवं पटिपन्ना एकन्तसुखं लोकं उपपन्ना’ति? इति पुट्ठा ‘‘नो’’ति वदन्ति।
‘‘तं किं मञ्ञसि, पोट्ठपाद, ननु एवं सन्ते तेसं समणब्राह्मणानं अप्पाटिहीरकतं भासितं सम्पज्जती’’ति? ‘‘अद्धा खो, भन्ते, एवं सन्ते तेसं समणब्राह्मणानं अप्पाटिहीरकतं भासितं सम्पज्जती’’ति।
तयो अत्तपटिलाभा
४२८. ‘‘तयो खो मे, पोट्ठपाद, अत्तपटिलाभा – ओळारिको अत्तपटिलाभो, मनोमयो अत्तपटिलाभो, अरूपो अत्तपटिलाभो। कतमो च, पोट्ठपाद, ओळारिको अत्तपटिलाभो? रूपी चातुमहाभूतिको कबळीकाराहारभक्खो (कबळीकारभक्खो (स्या॰ क॰)), अयं ओळारिको अत्तपटिलाभो। कतमो मनोमयो अत्तपटिलाभो? रूपी मनोमयो सब्बङ्गपच्चङ्गी अहीनिन्द्रियो, अयं मनोमयो अत्तपटिलाभो। कतमो अरूपो अत्तपटिलाभो? अरूपी सञ्ञामयो, अयं अरूपो अत्तपटिलाभो।
४२९. ‘‘ओळारिकस्सपि खो अहं, पोट्ठपाद, अत्तपटिलाभस्स पहानाय धम्मं देसेमि – यथापटिपन्नानं वो संकिलेसिका धम्मा पहीयिस्सन्ति, वोदानिया धम्मा अभिवड्ढिस्सन्ति, पञ्ञापारिपूरिं वेपुल्लत्तञ्च दिट्ठेव धम्मे सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरिस्सथाति। सिया खो पन ते, पोट्ठपाद, एवमस्स – संकिलेसिका धम्मा पहीयिस्सन्ति, वोदानिया धम्मा अभिवड्ढिस्सन्ति, पञ्ञापारिपूरिं वेपुल्लत्तञ्च दिट्ठेव धम्मे सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरिस्सति, दुक्खो च खो विहारोति, न खो पनेतं, पोट्ठपाद, एवं दट्ठब्बं। संकिलेसिका चेव धम्मा पहीयिस्सन्ति, वोदानिया च धम्मा अभिवड्ढिस्सन्ति, पञ्ञापारिपूरिं वेपुल्लत्तञ्च दिट्ठेव धम्मे सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरिस्सति, पामुज्जं चेव भविस्सति पीति च पस्सद्धि च सति च सम्पजञ्ञञ्च सुखो च विहारो।
४३०. ‘‘मनोमयस्सपि खो अहं, पोट्ठपाद, अत्तपटिलाभस्स पहानाय धम्मं देसेमि यथापटिपन्नानं वो संकिलेसिका धम्मा पहीयिस्सन्ति, वोदानिया धम्मा अभिवड्ढिस्सन्ति, पञ्ञापारिपूरिं वेपुल्लत्तञ्च दिट्ठेव धम्मे सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरिस्सथाति। सिया खो पन ते, पोट्ठपाद, एवमस्स – ‘संकिलेसिका धम्मा पहीयिस्सन्ति, वोदानिया धम्मा अभिवड्ढिस्सन्ति, पञ्ञापारिपूरिं वेपुल्लत्तञ्च दिट्ठेव धम्मे सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरिस्सति, दुक्खो च खो विहारो’ति, न खो पनेतं, पोट्ठपाद, एवं दट्ठब्बं। संकिलेसिका चेव धम्मा पहीयिस्सन्ति, वोदानिया च धम्मा अभिवड्ढिस्सन्ति, पञ्ञापारिपूरिं वेपुल्लत्तञ्च दिट्ठेव धम्मे सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरिस्सति, पामुज्जं चेव भविस्सति पीति च पस्सद्धि च सति च सम्पजञ्ञञ्च सुखो च विहारो।
४३१. ‘‘अरूपस्सपि खो अहं, पोट्ठपाद, अत्तपटिलाभस्स पहानाय धम्मं देसेमि यथापटिपन्नानं वो संकिलेसिका धम्मा पहीयिस्सन्ति, वोदानिया धम्मा अभिवड्ढिस्सन्ति, पञ्ञापारिपूरिं वेपुल्लत्तञ्च दिट्ठेव धम्मे सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरिस्सथाति। सिया खो पन ते, पोट्ठपाद, एवमस्स – ‘संकिलेसिका धम्मा पहीयिस्सन्ति, वोदानिया धम्मा अभिवड्ढिस्सन्ति, पञ्ञापारिपूरिं वेपुल्लत्तञ्च दिट्ठेव धम्मे सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरिस्सति, दुक्खो च खो विहारो’ति, न खो पनेतं, पोट्ठपाद, एवं दट्ठब्बं। संकिलेसिका चेव धम्मा पहीयिस्सन्ति, वोदानिया च धम्मा अभिवड्ढिस्सन्ति, पञ्ञापारिपूरिं वेपुल्लत्तञ्च दिट्ठेव धम्मे सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरिस्सति, पामुज्जं चेव भविस्सति पीति च पस्सद्धि च सति च सम्पजञ्ञञ्च सुखो च विहारो।
४३२. ‘‘परे चे, पोट्ठपाद, अम्हे एवं पुच्छेय्युं – ‘कतमो पन सो, आवुसो, ओळारिको अत्तपटिलाभो, यस्स तुम्हे पहानाय धम्मं देसेथ, यथापटिपन्नानं वो संकिलेसिका धम्मा पहीयिस्सन्ति, वोदानिया धम्मा अभिवड्ढिस्सन्ति, पञ्ञापारिपूरिं वेपुल्लत्तञ्च दिट्ठेव धम्मे सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरिस्सथा’ति, तेसं मयं एवं पुट्ठा एवं ब्याकरेय्याम – ‘अयं वा सो, आवुसो, ओळारिको अत्तपटिलाभो, यस्स मयं पहानाय धम्मं देसेम, यथापटिपन्नानं वो संकिलेसिका धम्मा पहीयिस्सन्ति, वोदानिया धम्मा अभिवड्ढिस्सन्ति, पञ्ञापारिपूरिं वेपुल्लत्तञ्च दिट्ठेव धम्मे सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरिस्सथा’ति।
४३३. ‘‘परे चे, पोट्ठपाद, अम्हे एवं पुच्छेय्युं – ‘कतमो पन सो, आवुसो, मनोमयो अत्तपटिलाभो, यस्स तुम्हे पहानाय धम्मं देसेथ, यथापटिपन्नानं वो संकिलेसिका धम्मा पहीयिस्सन्ति, वोदानिया धम्मा अभिवड्ढिस्सन्ति, पञ्ञापारिपूरिं वेपुल्लत्तञ्च दिट्ठेव धम्मे सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरिस्सथा’ति? तेसं मयं एवं पुट्ठा एवं ब्याकरेय्याम – ‘अयं वा सो, आवुसो, मनोमयो अत्तपटिलाभो यस्स मयं पहानाय धम्मं देसेम, यथापटिपन्नानं वो संकिलेसिका धम्मा पहीयिस्सन्ति, वोदानिया धम्मा अभिवड्ढिस्सन्ति, पञ्ञापारिपूरिं वेपुल्लत्तञ्च दिट्ठेव धम्मे सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरिस्सथा’ति।
४३४. ‘‘परे चे, पोट्ठपाद, अम्हे एवं पुच्छेय्युं – ‘कतमो पन सो, आवुसो, अरूपो अत्तपटिलाभो, यस्स तुम्हे पहानाय धम्मं देसेथ, यथापटिपन्नानं वो संकिलेसिका धम्मा पहीयिस्सन्ति, वोदानिया धम्मा अभिवड्ढिस्सन्ति, पञ्ञापारिपूरिं वेपुल्लत्तञ्च दिट्ठेव धम्मे सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरिस्सथा’ति, तेसं मयं एवं पुट्ठा एवं ब्याकरेय्याम – ‘अयं वा सो, आवुसो, अरूपो अत्तपटिलाभो यस्स मयं पहानाय धम्मं देसेम, यथापटिपन्नानं वो संकिलेसिका धम्मा पहीयिस्सन्ति, वोदानिया धम्मा अभिवड्ढिस्सन्ति, पञ्ञापारिपूरिं वेपुल्लत्तञ्च दिट्ठेव धम्मे सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरिस्सथा’ति।
‘‘तं किं मञ्ञसि, पोट्ठपाद, ननु एवं सन्ते सप्पाटिहीरकतं भासितं सम्पज्जती’’ति? ‘‘अद्धा खो, भन्ते, एवं सन्ते सप्पाटिहीरकतं भासितं सम्पज्जती’’ति।
४३५. ‘‘सेय्यथापि, पोट्ठपाद, पुरिसो निस्सेणिं करेय्य पासादस्स आरोहणाय तस्सेव पासादस्स हेट्ठा। तमेनं एवं वदेय्युं – ‘अम्भो पुरिस, यस्स त्वं पासादस्स आरोहणाय निस्सेणिं करोसि, जानासि तं पासादं, पुरत्थिमाय वा दिसाय दक्खिणाय वा दिसाय पच्छिमाय वा दिसाय उत्तराय वा दिसाय उच्चो वा नीचो वा मज्झिमो वा’ति? सो एवं वदेय्य – ‘अयं वा सो, आवुसो, पासादो, यस्साहं आरोहणाय निस्सेणिं करोमि, तस्सेव पासादस्स हेट्ठा’ति।
‘‘तं किं मञ्ञसि, पोट्ठपाद, ननु एवं सन्ते तस्स पुरिसस्स सप्पाटिहीरकतं भासितं सम्पज्जती’’ति? ‘‘अद्धा खो, भन्ते, एवं सन्ते तस्स पुरिसस्स सप्पाटिहीरकतं भासितं सम्पज्जती’’ति।
४३६. ‘‘एवमेव खो, पोट्ठपाद, परे चे अम्हे एवं पुच्छेय्युं – ‘कतमो पन सो, आवुसो, ओळारिको अत्तपटिलाभो…पे॰… कतमो पन सो, आवुसो, मनोमयो अत्तपटिलाभो…पे॰… कतमो पन सो, आवुसो, अरूपो अत्तपटिलाभो, यस्स तुम्हे पहानाय धम्मं देसेथ, यथापटिपन्नानं वो संकिलेसिका धम्मा पहीयिस्सन्ति, वोदानिया धम्मा अभिवड्ढिस्सन्ति, पञ्ञापारिपूरिं वेपुल्लत्तञ्च दिट्ठेव धम्मे सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरिस्सथा’ति, तेसं मयं एवं पुट्ठा एवं ब्याकरेय्याम – ‘अयं वा सो, आवुसो, अरूपो अत्तपटिलाभो, यस्स मयं पहानाय धम्मं देसेम, यथापटिपन्नानं वो संकिलेसिका धम्मा पहीयिस्सन्ति, वोदानिया धम्मा अभिवड्ढिस्सन्ति, पञ्ञापारिपूरिं वेपुल्लत्तञ्च दिट्ठेव धम्मे सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहरिस्सथा’ति।
‘‘तं किं मञ्ञसि, पोट्ठपाद, ननु एवं सन्ते सप्पाटिहीरकतं भासितं सम्पज्जती’’ति? ‘‘अद्धा खो, भन्ते, एवं सन्ते सप्पाटिहीरकतं भासितं सम्पज्जती’’ति।
४३७. एवं वुत्ते चित्तो हत्थिसारिपुत्तो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘यस्मिं, भन्ते, समये ओळारिको अत्तपटिलाभो होति, मोघस्स तस्मिं समये मनोमयो अत्तपटिलाभो होति, मोघो अरूपो अत्तपटिलाभो होति; ओळारिको वास्स अत्तपटिलाभो तस्मिं समये सच्चो होति। यस्मिं, भन्ते, समये मनोमयो अत्तपटिलाभो होति, मोघस्स तस्मिं समये ओळारिको अत्तपटिलाभो होति, मोघो अरूपो अत्तपटिलाभो होति; मनोमयो वास्स अत्तपटिलाभो तस्मिं समये सच्चो होति। यस्मिं, भन्ते, समये अरूपो अत्तपटिलाभो होति, मोघस्स तस्मिं समये ओळारिको अत्तपटिलाभो होति, मोघो मनोमयो अत्तपटिलाभो होति; अरूपो वास्स अत्तपटिलाभो तस्मिं समये सच्चो होती’’ति।
‘‘यस्मिं, चित्त, समये ओळारिको अत्तपटिलाभो होति, नेव तस्मिं समये मनोमयो अत्तपटिलाभोति सङ्खं गच्छति, न अरूपो अत्तपटिलाभोति सङ्खं गच्छति; ओळारिको अत्तपटिलाभोत्वेव तस्मिं समये सङ्खं गच्छति। यस्मिं, चित्त, समये मनोमयो अत्तपटिलाभो होति, नेव तस्मिं समये ओळारिको अत्तपटिलाभोति सङ्खं गच्छति, न अरूपो अत्तपटिलाभोति सङ्खं गच्छति; मनोमयो अत्तपटिलाभोत्वेव तस्मिं समये सङ्खं गच्छति। यस्मिं, चित्त, समये अरूपो अत्तपटिलाभो होति, नेव तस्मिं समये ओळारिको अत्तपटिलाभोति सङ्खं गच्छति, न मनोमयो अत्तपटिलाभोति सङ्खं गच्छति; अरूपो अत्तपटिलाभोत्वेव तस्मिं समये सङ्खं गच्छति।
४३८. ‘‘सचे तं, चित्त, एवं पुच्छेय्युं – ‘अहोसि त्वं अतीतमद्धानं, न त्वं नाहोसि; भविस्ससि त्वं अनागतमद्धानं, न त्वं न भविस्ससि; अत्थि त्वं एतरहि, न त्वं नत्थी’ति, एवं पुट्ठो त्वं, चित्त, किन्ति ब्याकरेय्यासी’’ति?
‘‘सचे मं, भन्ते, एवं पुच्छेय्युं – ‘अहोसि त्वं अतीतमद्धानं, न त्वं न अहोसि; भविस्ससि त्वं अनागतमद्धानं, न त्वं न भविस्ससि; अत्थि त्वं एतरहि, न त्वं नत्थी’ति। एवं पुट्ठो अहं, भन्ते, एवं ब्याकरेय्यं – ‘अहोसाहं अतीतमद्धानं, नाहं न अहोसिं; भविस्सामहं अनागतमद्धानं, नाहं न भविस्सामि; अत्थाहं एतरहि, नाहं नत्थी’ति। एवं पुट्ठो अहं, भन्ते, एवं ब्याकरेय्य’’न्ति।
‘‘सचे पन तं, चित्त, एवं पुच्छेय्युं – ‘यो ते अहोसि अतीतो अत्तपटिलाभो, सोव (स्वेव (सी॰ पी॰), सोयेव (स्या॰)) ते अत्तपटिलाभो सच्चो, मोघो अनागतो, मोघो पच्चुप्पन्नो? यो (यो वा (पी॰)) ते भविस्सति अनागतो अत्तपटिलाभो, सोव ते अत्तपटिलाभो सच्चो, मोघो अतीतो, मोघो पच्चुप्पन्नो? यो (यो वा (पी॰)) ते एतरहि पच्चुप्पन्नो अत्तपटिलाभो, सोव (सो च (क॰)) ते अत्तपटिलाभो सच्चो, मोघो अतीतो, मोघो अनागतो’ति। एवं पुट्ठो त्वं, चित्त, किन्ति ब्याकरेय्यासी’’ति?
‘‘सचे पन मं, भन्ते, एवं पुच्छेय्युं – ‘यो ते अहोसि अतीतो अत्तपटिलाभो, सोव ते अत्तपटिलाभो सच्चो, मोघो अनागतो, मोघो पच्चुप्पन्नो। यो ते भविस्सति अनागतो अत्तपटिलाभो, सोव ते अत्तपटिलाभो सच्चो, मोघो अतीतो, मोघो पच्चुप्पन्नो। यो ते एतरहि पच्चुप्पन्नो अत्तपटिलाभो, सोव ते अत्तपटिलाभो सच्चो, मोघो अतीतो, मोघो अनागतो’ति। एवं पुट्ठो अहं, भन्ते, एवं ब्याकरेय्यं – ‘यो मे अहोसि अतीतो अत्तपटिलाभो, सोव मे अत्तपटिलाभो तस्मिं समये सच्चो अहोसि, मोघो अनागतो, मोघो पच्चुप्पन्नो। यो मे भविस्सति अनागतो अत्तपटिलाभो, सोव मे अत्तपटिलाभो तस्मिं समये सच्चो भविस्सति, मोघो अतीतो, मोघो पच्चुप्पन्नो। यो मे एतरहि पच्चुप्पन्नो अत्तपटिलाभो, सोव मे अत्तपटिलाभो सच्चो, मोघो अतीतो, मोघो अनागतो’ति। एवं पुट्ठो अहं, भन्ते, एवं ब्याकरेय्य’’न्ति।
४३९. ‘‘एवमेव खो, चित्त, यस्मिं समये ओळारिको अत्तपटिलाभो होति, नेव तस्मिं समये मनोमयो अत्तपटिलाभोति सङ्खं गच्छति, न अरूपो अत्तपटिलाभोति सङ्खं गच्छति। ओळारिको अत्तपटिलाभो त्वेव तस्मिं समये सङ्खं गच्छति। यस्मिं, चित्त, समये मनोमयो अत्तपटिलाभो होति…पे॰… यस्मिं, चित्त, समये अरूपो अत्तपटिलाभो होति, नेव तस्मिं समये ओळारिको अत्तपटिलाभोति सङ्खं गच्छति, न मनोमयो अत्तपटिलाभोति सङ्खं गच्छति; अरूपो अत्तपटिलाभो त्वेव तस्मिं समये सङ्खं गच्छति।
४४०. ‘‘सेय्यथापि, चित्त, गवा खीरं, खीरम्हा दधि, दधिम्हा नवनीतं, नवनीतम्हा सप्पि, सप्पिम्हा सप्पिमण्डो। यस्मिं समये खीरं होति, नेव तस्मिं समये दधीति सङ्खं गच्छति, न नवनीतन्ति सङ्खं गच्छति, न सप्पीति सङ्खं गच्छति, न सप्पिमण्डोति सङ्खं गच्छति; खीरं त्वेव तस्मिं समये सङ्खं गच्छति। यस्मिं समये दधि होति…पे॰… नवनीतं होति… सप्पि होति… सप्पिमण्डो होति, नेव तस्मिं समये खीरन्ति सङ्खं गच्छति, न दधीति सङ्खं गच्छति, न नवनीतन्ति सङ्खं गच्छति, न सप्पीति सङ्खं गच्छति; सप्पिमण्डो त्वेव तस्मिं समये सङ्खं गच्छति। एवमेव खो, चित्त, यस्मिं समये ओळारिको अत्तपटिलाभो होति…पे॰… यस्मिं, चित्त, समये मनोमयो अत्तपटिलाभो होति…पे॰… यस्मिं, चित्त, समये अरूपो अत्तपटिलाभो होति, नेव तस्मिं समये ओळारिको अत्तपटिलाभोति सङ्खं गच्छति, न मनोमयो अत्तपटिलाभोति सङ्खं गच्छति; अरूपो अत्तपटिलाभो त्वेव तस्मिं समये सङ्खं गच्छति। इमा खो चित्त, लोकसमञ्ञा लोकनिरुत्तियो लोकवोहारा लोकपञ्ञत्तियो, याहि तथागतो वोहरति अपरामस’’न्ति।
४४१. एवं वुत्ते, पोट्ठपादो परिब्बाजको भगवन्तं एतदवोच – ‘‘अभिक्कन्तं, भन्ते! अभिक्कन्तं, भन्ते, सेय्यथापि, भन्ते, निक्कुज्जितं वा उक्कुज्जेय्य, पटिच्छन्नं वा विवरेय्य, मूळ्हस्स वा मग्गं आचिक्खेय्य, अन्धकारे वा तेलपज्जोतं धारेय्य – ‘चक्खुमन्तो रूपानि दक्खन्ती’ति। एवमेवं भगवता अनेकपरियायेन धम्मो पकासितो। एसाहं, भन्ते, भगवन्तं सरणं गच्छामि धम्मञ्च भिक्खुसङ्घञ्च। उपासकं मं भगवा धारेतु अज्जतग्गे पाणुपेतं सरणं गत’’न्ति।
चित्तहत्थिसारिपुत्तउपसम्पदा
४४२. चित्तो पन हत्थिसारिपुत्तो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘अभिक्कन्तं, भन्ते; अभिक्कन्तं, भन्ते! सेय्यथापि, भन्ते, निक्कुज्जितं वा उक्कुज्जेय्य, पटिच्छन्नं वा विवरेय्य, मूळ्हस्स वा मग्गं आचिक्खेय्य, अन्धकारे वा तेलपज्जोतं धारेय्य – ‘चक्खुमन्तो रूपानि दक्खन्ती’ति। एवमेवं भगवता अनेकपरियायेन धम्मो पकासितो। एसाहं, भन्ते, भगवन्तं सरणं गच्छामि धम्मञ्च भिक्खुसङ्घञ्च। लभेय्याहं, भन्ते, भगवतो सन्तिके पब्बज्जं, लभेय्यं उपसम्पद’’न्ति।
४४३. अलत्थ खो चित्तो हत्थिसारिपुत्तो भगवतो सन्तिके पब्बज्जं, अलत्थ उपसम्पदं। अचिरूपसम्पन्नो खो पनायस्मा चित्तो हत्थिसारिपुत्तो एको वूपकट्ठो अप्पमत्तो आतापी पहितत्तो विहरन्तो न चिरस्सेव – यस्सत्थाय कुलपुत्ता सम्मदेव अगारस्मा अनगारियं पब्बजन्ति, तदनुत्तरं – ब्रह्मचरियपरियोसानं दिट्ठेव धम्मे सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा उपसम्पज्ज विहासि। ‘खीणा जाति, वुसितं ब्रह्मचरियं, कतं करणीयं, नापरं इत्थत्ताया’ति – अब्भञ्ञासि। अञ्ञतरो खो पनायस्मा चित्तो हत्थिसारिपुत्तो अरहतं अहोसीति।
पोट्ठपादसुत्तं निट्ठितं नवमं।
सार
✔️ परिव्राजकों की परंपरा और मानसिकता
प्राचीन भारत में “परिव्राजक” उन भिक्षुओं या परिव्राजकों को कहा जाता था, जो ज्ञान, दर्शन, और आत्मा की खोज में यात्रा करते थे। इनका स्वभाव पारंपरिक सामाजिक नियमों को अस्वीकार करना और स्वतंत्रता की ओर उन्मुख होना था। उनकी विद्रोही मानसिकता उन्हें अद्वितीय और रचनात्मक बनाती थी, लेकिन यह अस्थिरता और गहरे संबंधों की कमी का कारण भी बनती थी।
✔️ भगवान बुद्ध और परिव्राजकों का संवाद
इस सूत्र में भगवान बुद्ध ने ऐसे परिव्राजकों से संवाद किया, जो आत्मा और जीवन के जटिल पहलुओं को समझने के इच्छुक थे। बुद्ध ने आत्मा की विभिन्न धारणाओं और उनके खंडन पर विस्तारपूर्वक चर्चा की।
✔️ आत्मा की तीन अवस्थाएँ
भगवान बुद्ध ने आत्मा से संबंधित तीन अवस्थाओं का वर्णन किया:
- पहली अवस्था – तात्कालिक अनुभवों और क्षणिक इच्छाओं पर आधारित।
- दूसरी अवस्था – प्रवाही और अस्थिर मानसिकता।
- तीसरी अवस्था – गहन बोध और आत्म-प्राप्ति की ओर उन्मुख अवस्था।
✔️ धर्म की दिशा और गहन बोध
भगवान बुद्ध ने बताया कि केवल गहरे बोध वाले गुरु ही ऐसे अस्थिर और विद्रोही मन को दिशा दे सकते हैं। धम्म का ठोस और निर्णायक मार्ग आत्मा की अस्थिरता को शांत कर सकता है और उसे स्थायित्व की ओर ले जा सकता है।
✔️ परिव्राजकों का स्वभाव और संघर्ष
परिव्राजकों को बुद्ध की शिक्षाएँ रोचक और प्रेरणादायक लगीं, लेकिन उनकी विद्रोही और प्रवाही स्वभाव के कारण वे धम्म के पथ पर दृढ़ता से चलने में असमर्थ थे।
✔️ साधारण व्यक्ति की प्रेरणा
हालांकि, एक साधारण व्यक्ति, जो पास बैठा था, बुद्ध की शिक्षाओं से इतना प्रेरित हुआ कि उसने भिक्षु बनने का निश्चय किया। उसने धम्म का अभ्यास किया और अंततः अरहंतपद प्राप्त किया।
✔️ धर्म का प्रभाव
यह सुत्त समाज के उन वर्गों के लिए एक प्रेरणा का स्रोत बनता है, जो स्वतंत्रता और विद्रोह के बीच फंसे हुए हैं। यह धम्म के गहन महत्व और सामाजिक स्थिरता की आवश्यकता को रेखांकित करता है।