✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
११. केवट्टसुत्तं मुख्य > सुत्तपिटक > दीघनिकाय 1. दीघनिकाय बुद्ध के द्वारागृहस्थ के लिएप्रश्नोत्तरहास्यअनुपूर्वीशिक्षा ऋद्धिचमत्कारब्रह्माचार महाराज देवतादेवराज इन्द्रदेवताधातुविज्ञान अनिदर्शन पाँच नीवरण की उपमाएँचार ध्यान की उपमाएँछह अभिज्ञाओं की उपमाएँजहाज का पक्षी

केवट्ट के प्रश्न

अनुवादक: भिक्खु कश्यप | ९२ मिनट

सूत्र परिचय

“क्या भिक्षुओं का चमत्कार दिखाना उचित है, ताकि लोगों में श्रद्धा बढ़ जाएँ?”

एक उपासक ने भगवान से आकर यही आवश्यक और प्रासंगिक विनंती की। तब भगवान चमत्कार की संभावना को नकारते नहीं है, बल्कि तीन तरह के चमत्कारों के बारे में बताकर संतुष्ट करते हैं। और साथ ही, उसे एक भिक्षु की अनोखी कहानी भी सुनाते है, जो ऋद्धियों से परिपूर्ण होकर देवताओं को देख और वार्तालाप कर सकता था।

वह ऋद्धिमानी भिक्षु महाभूत धातुओं का निरोध ढूँढने के लिए तमाम देवताओं के पास जाता है। सभी देवतागण उसे उनसे बड़े देवताओं के पास भेज देते हैं, क्योंकि उनके पास उसका उत्तर नहीं होता है। अंततः सभी से गुज़रते हुए, वह सृष्टि के तथाकथित रचेता और ईश्वर महाब्रह्मा के पास पहुँचता है। लेकिन महाब्रह्मा की प्रतिक्रिया बहुत ही रोचक होती है। मुझे याद है कि जब मैंने यही प्रसंग अपने अमेरीकन मित्रों को सुनाई तो वे हँसते-हँसते लोटपोट हो गए थे। यह कहानी पालि साहित्य की बेहतरीन विनोद को दर्शाती है।

खैर, इस सूत्र के अंत में भगवान ने एक ऐसे ‘विज्ञान’ विज्ञान अनिदर्शन को उजागर किया है, जिसे गहराई से जानना जरूरी है। तो फूटनोट को पढ़ना न भूलें।

हिन्दी

केवट्ट गृहस्थी

ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान नालन्दा के पावारिक आम्रवन में विहार कर रहे थे। तब गृहस्थी केवट्ट भगवान के पास गया और अभिवादन कर एक-ओर बैठ गया। एक ओर बैठने पर गृहस्थी केवट्ट ने भगवान से कहा, “भन्ते, यह नालन्दा यशस्वी, समृद्ध, और घनी आबादी वाला है। यहाँ बहुत से लोग भगवान के प्रति गहरी आस्था रखते हैं। अच्छा होगा, भन्ते, जो भगवान अपने किसी भिक्षु को अलौकिक ऋद्धियों का चमत्कार (प्रदर्शित) करने के लिए कहे, ताकि नालन्दा के लोगों की भगवान के प्रति गहरी आस्था और भी बढ़ जाएँ।”

जब ऐसा कहा गया, तो भगवान ने केवट्ट गृहस्थी से कहा, “केवट्ट, मैं भिक्षुओं को ऐसा धम्म नहीं सिखाता हूँ कि ‘जाओ भिक्षुओं, श्वेत-वस्त्रधारी उपासकों के आगे अपनी अलौकिक ऋद्धियों का चमत्कार करों!’”

केवट्ट गृहस्थी ने भगवान से दुबारा कहा, “भन्ते, मैं भगवान की बात काट नहीं रहा हूँ। बस इतना कह रहा हूँ कि ‘यह नालन्दा यशस्वी, समृद्ध, और घनी आबादी वाला है। यहाँ बहुत से लोग भगवान के प्रति गहरी आस्था रखते हैं। अच्छा होगा, भन्ते, जो भगवान अपने किसी भिक्षु को अलौकिक ऋद्धियों का चमत्कार करने के लिए कहे, ताकि नालन्दा के लोगों की भगवान के प्रति गहरी आस्था और भी बढ़ जाएँ।’”

दुबारा भगवान ने केवट्ट गृहस्थी से कहा, “केवट्ट, मैं भिक्षुओं को ऐसा धम्म नहीं सिखाता हूँ कि ‘जाओ भिक्षुओं, श्वेत-वस्त्रधारी उपासकों के आगे अपनी अलौकिक ऋद्धियों का चमत्कार करों!’”

तीसरी बार, केवट्ट गृहस्थी ने भगवान से कहा, “भन्ते, मैं भगवान की बात काट नहीं रहा हूँ। बस इतना कह रहा हूँ कि ‘यह नालन्दा यशस्वी, समृद्ध, और घनी आबादी वाला है। यहाँ बहुत से लोग भगवान के प्रति गहरी आस्था रखते हैं। अच्छा होगा, भन्ते, जो भगवान अपने किसी भिक्षु को अलौकिक ऋद्धियों का चमत्कार करने के लिए कहे, ताकि नालन्दा के लोगों की भगवान के प्रति गहरी आस्था और भी बढ़ जाएँ।’”

तीन चमत्कार

“केवट्ट, मैंने तीन (तरह के) चमत्कार बताए है, जिनका मैंने स्वयं प्रत्यक्ष-ज्ञान से साक्षात्कार किया है। कौन-से तीन? ऋद्धि-चमत्कार, खुलासा-चमत्कार, निर्देश-चमत्कार।

ऋद्धि-चमत्कार

यह ऋद्धि-चमत्कार क्या है? ऐसा होता है, केवट्ट, कि कोई भिक्षु विविध ऋद्धियों (के बल) को प्राप्त करता है—एक होकर अनेक (रूप) बनता है, अनेक होकर एक बनता है। प्रकट होता है, विलुप्त होता है। दीवार, परकोटे और पर्वतों से बिना टकराए आर-पार चला जाता है, मानो आकाश में हो। ज़मीन पर गोते लगाता है, मानो जल में हो। जल-सतह पर बिना डूबे चलता है, मानो ज़मीन पर हो। पालथी मारकर आकाश में उड़ता है, मानो पक्षी हो। महातेजस्वी सूर्य और चाँद को भी अपने हाथ से छूता और मलता है। अपनी काया से ब्रह्मलोक तक को वश कर लेता है।

तब कोई श्रद्धालु आस्थावान उस भिक्षु को विविध ऋद्धियाँ करते हुए देखता है—एक होकर अनेक बनते हुए, अनेक होकर एक बनते हुए। प्रकट होते हुए, विलुप्त होते हुए। दीवार, परकोटे और पर्वतों से बिना टकराए आर-पार चले जाते हुए, मानो आकाश में हो। ज़मीन पर गोते लगाते हुए, मानो जल में हो। जल-सतह पर बिना डूबे चलते हुए, मानो ज़मीन पर हो। पालथी मारकर आकाश में उड़ते हुए, मानो पक्षी हो। महातेजस्वी सूर्य और चाँद को भी अपने हाथ से छूते और मलते हुए। अपनी काया से ब्रह्मलोक तक को वश करते हुए।

तब वह श्रद्धालु आस्थावान जाकर किसी अन्य श्रद्धाहीन आस्थाहिन को बताता है—“आश्चर्य है, भाई, श्रमण की महाशक्ति और महासक्षमता! अद्भुत है, भाई! मैंने उस भिक्षु को विविध ऋद्धियाँ करते हुए देखा—एक होकर अनेक बनते हुए, अनेक होकर एक बनते हुए! प्रकट होते हुए, विलुप्त होते हुए! दीवार, परकोटे और पर्वतों से बिना टकराए आर-पार चले जाते हुए, मानो आकाश में हो! ज़मीन पर गोते लगाते हुए, मानो जल में हो! जल-सतह पर बिना डूबे चलते हुए, मानो ज़मीन पर हो! पालथी मारकर आकाश में उड़ते हुए, मानो पक्षी हो! महातेजस्वी सूर्य और चाँद को भी अपने हाथ से छूते और मलते हुए! अपनी काया से ब्रह्मलोक तक को वश करते हुए!”

तब वह श्रद्धाहिन आस्थाहीन उस श्रद्धालु आस्थावान को कहता है, “अरे भाई, गन्धारी नाम की एक विद्या होती है! उसी से वह भिक्षु विविध ऋद्धियाँ करते हुए दिखाता होगा—एक होकर अनेक बनना, अनेक होकर एक बनना। प्रकट होना, विलुप्त होना। दीवार, परकोटे और पर्वतों से बिना टकराए आर-पार चले जाना, मानो आकाश में हो। ज़मीन पर गोते लगाना, मानो जल में हो। जल-सतह पर बिना डूबे चलना, मानो ज़मीन पर हो। पालथी मारकर आकाश में उड़ना, मानो पक्षी हो। महातेजस्वी सूर्य और चाँद को भी अपने हाथ से छूना और मलना। अपनी काया से ब्रह्मलोक तक को वश कर लेना।”

क्या लगता है, केवट्ट? क्या वह श्रद्धाहिन आस्थाहीन उस श्रद्धालु आस्थावान को ऐसा कहेगा ना?”

“हाँ, भन्ते! वह तो ऐसा ही कहेगा!”

“इसलिए, केवट्ट। ऋद्धि-चमत्कार दिखाने की यह ख़ामी देखकर, मैं ऋद्धि-चमत्कार दिखाने के प्रति लज्जा, संकोच, और घिन महसूस करता हूँ।

खुलासा-चमत्कार

और खुलासा-चमत्कार क्या है? ऐसा होता है, केवट्ट, कि कोई भिक्षु पराए सत्वों और पराए लोगों का चित्त (पढ़कर) बताता है, चित्त में (प्रकट हुआ) स्वभाव बताता है, (मन में चल रही) सोच बताता है, और (मन में चल रहा) चिंतन बताता है, “इस तरह तुम्हारा मन (सोच रहा) है, ऐसी तुम्हारी सोच है, और तुम्हारा वाकई ऐसा चित्त है!”

तब कोई श्रद्धालु आस्थावान उस भिक्षु को खुलासा चमत्कार करते हुए देखता है—पराए सत्वों और पराए लोगों का चित्त बताते हुए, चित्त का स्वभाव बताते हुए, सोच बताते हुए, और चिंतन बताते हुए, “इस तरह तुम्हारा मन है, ऐसी तुम्हारी सोच है, और तुम्हारा वाकई ऐसा चित्त है!”

तब वह श्रद्धालु आस्थावान जाकर किसी अन्य श्रद्धाहीन आस्थाहिन को बताता है—“आश्चर्य है, भाई, श्रमण की महाशक्ति और महासक्षमता! अद्भुत है, भाई! मैंने उस भिक्षु को खुलासा चमत्कार करते हुए देखा—पराए सत्वों और पराए लोगों का चित्त बताते हुए, चित्त का स्वभाव बताते हुए, सोच बताते हुए, और चिंतन बताते हुए, “इस तरह तुम्हारा मन है, ऐसी तुम्हारी सोच है, और तुम्हारा वाकई ऐसा चित्त है!”

तब वह श्रद्धाहिन आस्थाहीन उस श्रद्धालु आस्थावान को कहता है, “अरे भाई, मणिका नाम की एक विद्या होती है! उसी से वह भिक्षु खुलासा चमत्कार करते हुए दिखाता होगा—पराए सत्वों और पराए लोगों का चित्त बताना, चित्त का स्वभाव बताना, सोच बताना, और चिंतन बताना, “इस तरह तुम्हारा मन है, ऐसी तुम्हारी सोच है, और तुम्हारा वाकई ऐसा चित्त है!”

क्या लगता है, केवट्ट? क्या वह श्रद्धाहिन आस्थाहीन उस श्रद्धालु आस्थावान को ऐसा कहेगा ना?”

“हाँ, भन्ते! वह तो ऐसा ही कहेगा!”

“इसलिए, केवट्ट। खुलासा-चमत्कार दिखाने की यह ख़ामी देखकर, मैं खुलासा-चमत्कार दिखाने के प्रति लज्जा, संकोच, और घिन महसूस करता हूँ।

निर्देश-चमत्कार

और निर्देश-चमत्कार क्या है? ऐसा होता है, केवट्ट, कि कोई भिक्षु (दूसरों को मन पढ़कर सटीक) निर्देश देता है, “इस तरह सोचों, उस तरह मत सोचो! यहाँ ध्यान दो, वहाँ ध्यान मत दो! इसे त्याग दो, उसे धारण कर के रहो!” इसे, केवट्ट, निर्देश-चमत्कार कहते हैं।

फिर ऐसा होता है, केवट्ट! यहाँ कभी इस लोक में ‘तथागत अरहंत सम्यक-सम्बुद्ध’ प्रकट होते हैं—जो विद्या और आचरण से संपन्न होते हैं, परम लक्ष्य पा चुके, दुनिया के ज्ञाता, दमनशील पुरुषों के अनुत्तर सारथी, देवों और मनुष्यों के गुरु, बुद्ध भगवान!’ वे प्रत्यक्ष-ज्ञान का साक्षात्कार कर, उसे—देव, मार, ब्रह्मा, श्रमण, ब्राह्मण, राजा और जनता से भरे इस लोक में—प्रकट करते हैं। वे ऐसा सार्थक और शब्दशः धम्म बताते हैं, जो आरंभ में कल्याणकारी, मध्य में कल्याणकारी, अन्त में कल्याणकारी हो; और सर्वपरिपूर्ण, परिशुद्ध ‘ब्रह्मचर्य’ प्रकाशित हो।

ऐसा धम्म सुनकर किसी गृहस्थ या कुलपुत्र को तथागत के प्रति श्रद्धा जागती है। उसे लगता है, “गृहस्थ जीवन बंधनकारी है, जैसे धूलभरा रास्ता हो! किंतु प्रवज्या, मानो खुला आकाश हो! घर रहते हुए ऐसा परिपूर्ण, परिशुद्ध ब्रह्मचर्य निभाना कठिन है, जो शुद्ध शंख जैसा उज्ज्वल हो! क्यों न मैं सिरदाढ़ी मुंडवाकर, काषाय वस्त्र धारण कर, घर से बेघर होकर प्रव्रज्यित हो जाऊँ?’

फिर वह समय पाकर, थोड़ी या अधिक धन-संपत्ति त्यागकर, छोटा या बड़ा परिवार त्यागकर, सिरदाढ़ी मुंडवाकर, काषाय वस्त्र धारण कर, घर से बेघर हो प्रव्रज्यित होता है।

प्रव्रज्यित होकर ऐसा भिक्षु शीलवान बनता है। वह पातिमोक्ख के अनुसार संयम से विनीत होकर, आर्य आचरण और जीवनशैली से संपन्न होकर रहता है। वह (धर्म-विनय) शिक्षापदों को सीख कर धारण करता है, अल्प पाप में भी ख़तरा देखता है। वह काया और वाणी के कुशल कर्मों से युक्त होता है, जीविका परिशुद्ध रखता है, और शील में समृद्ध होता है। इंद्रिय-द्वारों पर पहरा देता है, स्मृतिमान और सचेत होता है, और संतुष्ट जीता है।

शील विश्लेषण

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निम्न शील

और, केवट्ट, कोई भिक्षु शील-संपन्न कैसे होता है?

  • कोई भिक्षु हिंसा त्यागकर जीवहत्या से विरत रहता है—डंडा या शस्त्र फेंक चुके; लज्जावान, दयावान, समस्त जीवहित के प्रति करुणामयी। यह उसका शील होता है।
  • वह ‘न सौंपी चीज़ें’ त्यागकर चोरी से विरत रहता है। गांव या जंगल से न दी गई, न सौंपी, पराई वस्तु को चोरी की इच्छा से नहीं उठाता है, नहीं लेता है। बल्कि मात्र सौंपी चीज़ें ही उठाता है, स्वीकारता है। पावन जीवन जीता है, चोरी-छिपे नहीं। यह भी उसका शील होता है।
  • वह अब्रह्मचर्य त्यागकर ब्रह्मचर्य धारण करता है—मैथुन ग्रामधर्म 1 से विरत! यह भी उसका शील होता है।
  • वह झूठ बोलना त्यागकर असत्यवचन से विरत रहता है। वह सत्यवादी, सत्य का पक्षधर, दृढ़ और भरोसेमंद बनता है; दुनिया को ठगता नहीं। यह भी उसका शील होता है।
  • वह विभाजित करने वाली बातें त्यागकर फूट डालने वाले वचन से विरत रहता है। यहाँ सुनकर वहाँ नहीं बताता है, ताकि वहाँ दरार पड़े। वहाँ सुनकर यहाँ नहीं बताता है, ताकि यहाँ दरार पड़े। बल्कि वह बटे हुए लोगों का मेल कराता है, साथ रहते लोगों को जोड़ता है, एकता चाहता है, भाईचारे में रत रहता है, मेलमिलाप में प्रसन्न होता है। ऐसे बोल बोलता है कि सामंजस्यता बढ़े। यह भी उसका शील होता है।
  • वह तीखा बोलना त्यागकर कटु वचन से विरत रहता है। वह ऐसे मीठे बोल बोलता है—जो राहत दे, कर्णमधुर लगे, हृदय छू ले, स्नेहपूर्ण हो, सौम्य हो, अधिकांश लोगों को अनुकूल और स्वीकार्य लगे। यह भी उसका शील होता है।
  • वह बकवाद त्यागकर निरर्थक वचन से विरत रहता है। वह समय पर, तथ्यों के साथ, अर्थपूर्ण (=हितकारक), धर्मानुकूल, विनयानुकूल बोलता है। बहुमूल्य लगे ऐसे सटीक वचन बोलता है—तर्क के साथ, नपेतुले शब्दों में, सही समय पर, सही दिशा में, ध्येय के साथ। यह भी उसका शील होता है।
  • वह बीज और पौधों का जीवनाश करना त्यागता है…
  • वह दिन में एक-बार भोजन करता है—रात्रिभोज व विकालभोज 2 से विरत…
  • वह नृत्य, गीत, वाद्यसंगीत तथा मनोरंजन से विरत रहता है।…
  • वह मालाएँ, गन्ध, लेप, सुडौलता लाने वाले तथा अन्य सौंदर्य-प्रसाधन से विरत रहता है।…
  • वह बड़े विलासी आसन और पलंग का उपयोग करने से विरत रहता है।…
  • वह स्वर्ण व रुपये स्वीकारने से विरत रहते है।…
  • वह कच्चा अनाज… कच्चा माँस… स्त्री व कुमारी… दासी व दास… भेड़ व बकरी… मुर्गी व सूवर… हाथी, गाय, घोड़ा, खच्चर… ख़ेत व संपत्ति स्वीकारने से विरत रहता है।…
  • वह दूत (=संदेशवाहक) का काम… ख़रीद-बिक्री… भ्रामक तराज़ू, नाप, मानदंडों द्वारा ठगना… घूसख़ोरी, ठगना, ज़ाली काम, छलकपट… हाथ-पैर काटने, पीटने बाँधने, लूट डाका व हिंसा करने से विरत रहता है।

यह भी उसका शील होता है।

मध्यम शील

  • अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, बीज-समूह और भूत-समूह (वनस्पति) के जीवनाश में लगे रहते हैं—जैसे कंद से उगने वाले, तने से उगने वाले, पोर (जोड़) से उगने वाले, कलम से उगने वाले, और पाँचवें बीज से उगने वाले पौधे। कोई भिक्षु इस तरह के बीज और पौधों के जीवनाश से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।
  • अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, वस्तुओं का संग्रह करने में लगे रहते हैं, जैसे—अन्न का संग्रह, पान (पेय) का संग्रह, वस्त्रों का संग्रह, वाहनों का संग्रह, शय्या (बिस्तर) का संग्रह, गन्ध (इत्र) का संग्रह, और मांस (खाद्य) का संग्रह। कोई भिक्षु इस तरह के संग्रहीत वस्तुओं का भोग करने से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।
  • अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, प्रेक्षणीय (=तमाशे/मनोरंजन) देखने में लगे रहते हैं, जैसे—नृत्य, गीत, वाद्य; नाटक, आख्यान (कथा या लीला), ताली बजाना, झांझ-मंजीरा, ढोल; चित्र-प्रदर्शनी, मेले; कलाबाजी, बाँस पर नट का खेल; हाथियों की लड़ाई, घोड़ों की लड़ाई, भैंसों की लड़ाई, बैलों की लड़ाई, बकरों की लड़ाई, भेड़ों की लड़ाई, मुर्गों की लड़ाई, बटेरों की लड़ाई; लाठी-युद्ध, मुष्टि-युद्ध, कुश्ती; सैन्य-अभ्यास, सेना का व्यूह-निरीक्षण, सेना की समीक्षा इत्यादि। कोई भिक्षु इस तरह के अनुचित दर्शन से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।
  • अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, प्रमादी जुआ और खेलों में लगे रहते हैं, जैसे—आठ खानों वाला शतरंज (अष्टापद), दस खानों वाला शतरंज (दशपद), आकाश-शतरंज (बिना देखे खेलना), लंगड़ी टांग, कंचों का खेल, पासा, डंडे का खेल (गिल्ली-डंडा), हाथ से चित्र बनाना, गेंद का खेल, पत्तों की सीटी बजाना, हल चलाने का खेल, गुलाटी मारना, फिरकी चलाना, तराजू का खेल, रथ दौड़, धनुर्विद्या, अक्षरों को पहचानना (अक्षरिका), मन की बात बुझना, और दूसरों की नकल उतारना, इत्यादि। कोई भिक्षु इस तरह के व्यर्थ प्रमादी खेलों से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।
  • अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, उच्च और विलासी शय्या (बिस्तरों) के उपयोग में लगे रहते हैं, जैसे—ऊँचे आसन (सोफा), पलंग, नक्काशीदार या खाल से सजा आसन, लंबे रोएँ वाले ऊनी वस्त्र, रंगीन कसीदाकारी वाले बिछौने, सफेद ऊनी कंबल, फूलों की कढ़ाई वाले बिछौने, रुई भरे गद्दे, शेर-बाघ के चित्रों वाले आसन, लाल झालर वाले आसन, रेशमी या कढ़ाई (एंब्रोईडरी) वाला आसन, लंबा ऊनी कालीन, हाथी-घोड़े-रथ के लिए उपयुक्त गलीचे, मृगचर्म के आसन, छाता-ताना आसन, और सिरहाने तथा पायताने लाल तकिये वाले बिस्तर इत्यादि। कोई भिक्षु इस तरह के बड़े और विलासी सज्जा से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।
  • अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, प्रसाधन और सजावट में लगे रहते हैं, जैसे—सुगंधित उबटन लगाना, तेल मालिश, सुगंधित स्नान, शरीर गूंथना (मालिश), दर्पण देखना, अंजन (काजल) लगाना, माला पहनना, गन्ध-लेप, मुख-चूर्ण (पाउडर), कंगन, जूड़ा बांधना, अलंकृत छड़ी, अलंकृत नली (बोतल), खड़ग (तलवार या छुरी), छाता, कढ़ाई वाली (डिजाइनर) चप्पलें, साफा (पगड़ी), मणि, चंवर और लम्बे झालर वाले श्वेत वस्त्र इत्यादि। कोई भिक्षु इस तरह स्वयं को सजाने में, सौंदर्यीकरण से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।
  • अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, पशुवत चर्चा 3 में लगे रहते हैं, जैसे—राजाओं की बातें, चोरों की बातें, महामंत्रियों की बातें; सेना, भय और युद्ध की बातें; भोजन, पान, वस्त्र की बातें; शय्या, माला और गन्ध की बातें; रिश्तेदारों, यान (वाहन), गाँव, निगम (कस्बे), नगर और जनपद (देश) की बातें; स्त्रियों और शूरवीरों की बातें; सड़क और पनघट (कुएं) की बातें; भूत-प्रेतों की बातें; दुनिया की विविध घटनाएँ; ब्रह्मांड और समुद्र की उत्पत्ति की बातें, अथवा ‘भव-विभव’ (वस्तुओं के अस्तित्व में होने न होने) की बातें। कोई भिक्षु इस तरह की पशुवत चर्चा से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।
  • अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, वाक-युद्ध (बहस) में लगे रहते हैं, जैसे—“तुम इस धर्म-विनय को नहीं जानते।” “मैं इस धर्म-विनय को जानता हूँ।” “तुम भला इस धर्म-विनय को क्या जानोगे?” “तुम गलत रास्ते पर हो, मैं सही रास्ते पर हूँ!” “मैं धर्मानुसार (=सुसंगत) बताता हूँ। तुम उल्टा बताते हो।” “जो पहले कहना था वह तुमने बाद में कहा, जो बाद में कहना था वह पहले!” “तुम्हारी दीर्घकाल तक सोची हुई धारणा का खण्डन हुआ।” “तुम्हारी बात कट गई।” “तुम हार गए।” “जाओ, अपनी धारणा को बचाने का प्रयास करो, या उत्तर दे सको तो दो!” कोई भिक्षु इस तरह के वाद-विवाद से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।
  • अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, दूत-कर्म और संदेशवाहक बनने में लगे रहते हैं, जैसे—राजाओं, महामंत्रियों, क्षत्रियों, ब्राह्मणों, गृहस्थों, या युवाओं के लिए यह काम करना कि: “वहाँ जाओ”, “यहाँ आओ”, “यह ले जाओ”, “वहाँ से यह ले आओ”। कोई भिक्षु इस तरह लोगों के लिए संदेशवाहक या दूत बनने से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।
  • अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, ढोंग-पाखंड करते हैं, चाटुकारिता करते हैं, संकेत देते हैं, दूसरों को नीचा दिखाते हैं, लाभ से लाभ ढूँढते हैं। कोई भिक्षु इस प्रकार के छल-कपट से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।

ऊँचे शील

  • अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, पशुवत (हीन) विद्या से मिथ्या आजीविका चलाते हैं, जैसे—
    • अंग (=काया की बनावट देखकर भविष्य बताना),
    • निमित्त (=शकुन-अपशकुन / संकेत बताना),
    • उत्पात (=वज्रपात, उल्कापात, धूमकेतु इत्यादि का अर्थ बताना),
    • स्वप्न (=स्वप्न का शुभ-अशुभ अर्थ बताना),
    • लक्षण (=शशिर के चिन्ह या बर्ताव इत्यादि का अर्थ बताना),
    • मूषिक-छिद्र (=चूहे के काटे हुए कपड़े का फल बताना),
    • अग्नि-हवन (=अग्नि को चढ़ावा),
    • दर्बी-होम (=करछुल से हवन), तुष-होम (=भूसी से हवन), कण-होम (=कनी/टूटे चावल से हवन), तंडुल-होम (=चावल से हवन), सर्पि-होम (=घी से हवन), तैल-होम (=तेल से हवन), मुख-होम (=मुँह से आहुति देना), रुधिर-होम (=खून से हवन),
    • अंगविद्या (=हस्तरेखा, पादरेखा, कपालरेखा इत्यादि देखकर भविष्यवर्तन),
    • वास्तुविद्या (=निवास में शुभ-अशुभ बताना),
    • क्षेत्रविद्या (=खेत-जमीन-जायदाद में शुभ-अशुभ बताना),
    • शिवविद्या (=श्मशान-भूमि में शुभ-अशुभ बताना),
    • भूतविद्या (=भूतबाधा और मुक्तिमंत्र बताना),
    • भुरिविद्या (=घर के सुरक्षामंत्र बताना),
    • सर्पविद्या (=सर्पदंश में सुरक्षामंत्र बताना),
    • विषविद्या (=विषबाधा में सुरक्षामंत्र बताना),
    • वृश्चिकविद्या (=बिच्छूदंश में सुरक्षामंत्र बताना),
    • मूषिकविद्या (=चूहों से सुरक्षामंत्र बताना),
    • पक्षीविद्या (=पक्षीध्वनि का अर्थ बताना),
    • कौवाविद्या (=कौंवों की ध्वनि या बर्ताव का अर्थ बताना),
    • पक्षध्यान (=आयुसीमा या मृत्युकाल बताना),
    • शरपरित्राण (=बाण से सुरक्षामंत्र बताना),
    • और मृगचक्र (=हिरण इत्यादि पशुध्वनि का अर्थ बताना)।

कोई भिक्षु इस तरह की पशुवत विद्या से मिथ्या आजीविका चलाने से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।

  • अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, पशुवत विद्या से मिथ्या आजीविका चलाते हैं, जैसे—
    • मणि-लक्षण (मणि की विलक्षणता बताना),
    • वस्त्र-लक्षण (=वस्त्र पर उभरे शुभ-लक्षण बताना),
    • दण्ड-लक्षण (=छड़ी पर उभरे शुभ-लक्षण बताना),
    • शस्त्र-लक्षण (=छुरे पर उभरे शुभ-लक्षण बताना),
    • असि-लक्षण (तलवार पर उभरे शुभ-लक्षण बताना),
    • बाण-लक्षण (=बाण पर उभरे शुभ-लक्षण बताना),
    • धनुष-लक्षण (=धनुष पर उभरे शुभ-लक्षण बताना),
    • आयुध-लक्षण(=शस्त्र, औज़ार पर उभरे शुभ-लक्षण बताना),
    • स्त्री-लक्षण (=स्त्री के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
    • पुरुष-लक्षण (=पुरुष के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
    • कुमार-लक्षण (=लड़के के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
    • कुमारी-लक्षण (=लड़की के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
    • दास-लक्षण (=गुलाम/नौकर के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
    • दासी-लक्षण (=गुलाम/नौकरानी के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
    • हस्ति-लक्षण (=हाथी के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
    • अश्व-लक्षण (=घोड़े के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
    • भैस-लक्षण (=भैंस के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
    • वृषभ-लक्षण (=बैल के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
    • गाय-लक्षण (=गाय के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
    • अज-लक्षण (=बकरी के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
    • मेष-लक्षण (=भेड़ के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
    • मुर्गा-लक्षण (=मुर्गे के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
    • बत्तक-लक्षण (=बदक के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
    • गोह-लक्षण (=गोह/छिपकली के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
    • कर्णिका-लक्षण (=ख़रगोश के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
    • कच्छप-लक्षण (=कछुए के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना),
    • और मृग-लक्षण (=मृग/हिरण के विविध लक्षण, क्षमताएँ बताना)।

कोई भिक्षु इस तरह की पशुवत विद्या से मिथ्या आजीविका चलाने से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।

  • अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, पशुवत विद्या से भविष्यवर्तन कर मिथ्या आजीविका चलाते हैं, जैसे—(युद्ध के बारे में भविष्यवाणी करना कि) “राजा कूच करेंगे”, “राजा कूच नहीं करेंगे”, “भीतरी राजा हमला करेंगे”, “बाहरी राजा पीछे हटेंगे”, “बाहरी राजा हमला करेंगे”, “भीतरी राजा पीछे हटेंगे” “इस राजा की जीत होगी, उस राजा की हार होगी”। कोई भिक्षु इस तरह की पशुवत विद्या से भविष्यवर्तन कर मिथ्या आजीविका चलाने से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।
  • अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, पशुवत विद्या से भविष्यवर्तन कर मिथ्या आजीविका चलाते हैं, जैसे—
    • चंद्रग्रहण होगा, सूर्यग्रहण होगा, नक्षत्रग्रहण होगा,
    • सूर्य-चंद्रमा का मार्ग प्रशस्त (सीधा) होगा,
    • सूर्य-चंद्रमा का मार्ग विपथ (उल्टा) होगा,
    • नक्षत्र प्रशस्त होंगे,
    • नक्षत्र विपथ होंगे,
    • उल्कापात होगा,
    • क्षितिज उज्ज्वल होगा (=ऑरोरा?),
    • भूकंप होगा,
    • देवढ़ोल बजेंगे (बादल-गर्जना?),
    • सूर्य, चंद्र या नक्षत्रों का उदय, अस्त, मंद या तेजस्वी होंगे,
    • चंद्रग्रहण का परिणाम ऐसा होगा,
    • सूर्यग्रहण…, नक्षत्रग्रहण…, (और एक-एक कर इन सब का) परिणाम ऐसा होगा।

कोई भिक्षु इस तरह की पशुवत विद्या से भविष्यवर्तन कर मिथ्या आजीविका चलाने से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।

  • अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, पशुवत विद्या से भविष्यवर्तन कर मिथ्या आजीविका चलाते हैं, जैसे—
    • प्रचुर वर्षा होगी,
    • अल्प वर्षा होगी,
    • सुभिक्ष (=भोजन भरपूर) होगा,
    • दुर्भिक्ष (=भोजन नहीं) होगा,
    • क्षेम (=राहत, सुरक्षा) होगा,
    • भय (=खतरा, चुनौतीपूर्ण काल) होगा,
    • रोग (=बीमारियाँ) होंगे,
    • आरोग्य (=चंगाई) होगा,
    • अथवा वे लेखांकन, गणना, आंकलन, कविताओं की रचना, भौतिकवादी कला (लोकायत) सिखाकर अपनी मिथ्या आजीविका चलाते हैं।

कोई भिक्षु इस तरह की पशुवत विद्या से मिथ्या आजीविका चलाने से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।

  • अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, पशुवत विद्या से भविष्यवर्तन कर मिथ्या आजीविका चलाते हैं, जैसे—
    • आवाह (=दुल्हन घर लाने का) मुहूर्त बताना,
    • विवाह (=कन्या भेजने का) मुहूर्त बताना,
    • संवरण (=घूँघट या संयम करने का) मुहूर्त बताना,
    • विवरण (=घूँघट हटाने या संभोग का) मुहूर्त बताना,
    • जमा-बटोरने का मुहूर्त बताना,
    • निवेश-फैलाने का मुहूर्त बताना,
    • शुभ-वरदान देना,
    • श्राप देना,
    • गर्भ-गिराने की दवाई देना,
    • जीभ बांधने का मंत्र बताना,
    • जबड़ा बांधने का मंत्र बताना,
    • हाथ उल्टेपूल्टे मुड़ने का मंत्र बताना,
    • जबड़ा बंद करने का मंत्र बताना,
    • कान बंद करने का मंत्र बताना,
    • दर्पण (के भूत) से प्रश्न पुछना,
    • भूत-बाधित कन्या से प्रश्न पुछना,
    • देवता से प्रश्न पुछना,
    • सूर्य की पुजा करना,
    • महादेव की पुजा करना,
    • मुँह से अग्नि निकालना,
    • श्रीदेवी (=सौभाग्य लानेवाली देवी) का आह्वान करना।

कोई भिक्षु इस तरह की पशुवत विद्या से मिथ्या आजीविका चलाने से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।

  • अथवा जैसे कुछ माननीय श्रमण एवं ब्राह्मण, श्रद्धापूर्वक दिए गए भोजन पर आश्रित होकर, पशुवत विद्या से भविष्यवर्तन कर मिथ्या आजीविका चलाते हैं, जैसे—
    • शान्ति-पाठ कराना,
    • इच्छापूर्ति-पाठ कराना,
    • भूतात्मा-पाठ कराना,
    • भूमि-पूजन कराना,
    • वर्ष-पाठ कराना (=नपुंसक को पौरुषत्व दिलाने के लिए),
    • वोस्स-पाठ कराना (=कामेच्छा ख़त्म कराने के लिए),
    • वास्तु-पाठ कराना (घर बनाने पूर्व),
    • वास्तु-परिकर्म कराना (=भूमि का उपयोग करने पूर्व देवताओं को बलि देना इत्यादि),
    • शुद्धजल से धुलवाना,
    • शुद्धजल से नहलाना,
    • बलि चढ़ाना,
    • वमन (=उलटी) कराना,
    • विरेचन (=जुलाब देकर) कराना,
    • ऊपर (=मुख) से विरेचन कराना,
    • नीचे से विरेचन (=दस्त) कराना,
    • शीर्ष-विरेचन कराना (=कफ निकालना?),
    • कान के लिए औषधियुक्त तेल देना,
    • आँखों की धुंधलाहट हटाने के लिए औषधि देना,
    • नाक के लिए औषधि देना,
    • मरहम देना, प्रति-मरहम देना,
    • आँखें शीतल करने की दवा देना,
    • आँख और कान की शल्यक्रिया करना,
    • शरीर की शल्यक्रिया (=छुरी से सर्जरी) करना,
    • बच्चों का वैद्य बनना,
    • जड़ीबूटी देना, जड़ीबूटी बांधना।

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कोई भिक्षु इस तरह की पशुवत विद्या से मिथ्या आजीविका चलाने से विरत रहता है। यह भी उसका शील होता है।

इस तरह, केवट्ट, कोई भिक्षु शील से संपन्न होकर, शील से सँवर कर, कही कोई खतरा नहीं देखता है।

जैसे, कोई राजतिलक हुआ क्षत्रिय राजा हो, जिसने सभी शत्रुओं को जीत लिया हो, वह कही किसी शत्रु से खतरा नहीं देखता है। उसी तरह, केवट्ट, कोई भिक्षु शील से संपन्न होकर, शील से सँवर कर, कही कोई खतरा नहीं देखता है। वह ऐसे आर्यशील-संग्रह से संपन्न होकर निष्पाप (जीवन के) सुख का अनुभव करता है। इस तरह, केवट्ट, कोई भिक्षु शील-संपन्न होता है।

इन्द्रिय सँवर

और, केवट्ट, कैसे कोई भिक्षु अपने इंद्रिय-द्वारों की रक्षा करता है?

  • जब भिक्षु आँख से किसी रूप को देखता है, तो वह न तो उसकी छाप (“निमित्त”) पकड़ता है और न ही उसके सूक्ष्म विवरणों (“अनुव्यंजन”) में उलझता है। यदि वह अपनी चक्षु-इंद्रिय को असंयमित छोड़ दे, तो लालसा या निराशा जैसे पाप-अकुशल स्वभाव उस पर हावी हो सकते हैं। अतः वह संयम का मार्ग अपनाता है, चक्षु-इंद्रिय की रक्षा करता है, और उस पर संयम बरतता है।
  • जब वह कान से किसी शब्द (या आवाज) को सुनता है…
  • जब वह नाक से किसी गंध को सूँघता है…
  • जब वह जीभ से किसी स्वाद को चखता है…
  • जब वह शरीर से किसी संस्पर्श का अनुभव करता है…
  • जब वह मन से किसी विचार को जानता है, तो वह न तो उसकी छाप पकड़ता है और न ही उसके सूक्ष्म विवरणों में उलझता है। यदि वह अपनी मन-इंद्रिय को असंयमित छोड़ दे, तो लालसा या निराशा जैसे पाप-अकुशल स्वभाव उस पर हावी हो सकते हैं। अतः वह संयम का मार्ग अपनाता है, मन-इंद्रिय की रक्षा करता है, और उस पर संयम बरतता है।

वह ऐसे आर्यसँवर से संपन्न होकर निष्पाप सुख का अनुभव करता है। इस तरह, केवट्ट, कोई भिक्षु अपने इंद्रिय-द्वारों की रक्षा करता है।

स्मृति-संप्रजन्य

और, केवट्ट, कैसे कोई भिक्षु स्मृति और सचेतता से संपन्न होता है? वह आगे बढ़ने और पीछे लौटने में सजग रहता है। वह नज़र टिकाने और नज़र हटाने में सजग रहता है। वह अपने अंगों को सिकोड़ने और पसारने में सजग रहता है। वह चीवर, संघाटी और भिक्षा-पात्र को धारण करने में सजग रहता है। वह खाते, पीते, चबाते और स्वाद लेने में सजग रहता है। वह पेशाब और शौच करते हुए भी सजग रहता है। वह चलते, खड़े रहते, बैठते, सोते, जागते, बोलते और मौन रहते हुए भी निरंतर सचेत रहता है। इस तरह, केवट्ट, कोई भिक्षु स्मृति और सचेतता से संपन्न होता है।

सन्तोष

और, केवट्ट, कैसे कोई भिक्षु संतुष्ट रहता है? कोई भिक्षु मात्र अपने शरीर को ढंकने के लिए चीवर और पेट की पूर्ति के लिए भिक्षा से संतुष्ट रहता है। वह जहाँ भी जाता है, अपनी इन अल्प सामग्रियों से साथ ही प्रस्थान करता है।

जैसे कोई पक्षी जहाँ भी उड़ता है, वह केवल अपने पंखों के भार के साथ ही उड़ता है। उसी तरह, भिक्षु भी अपने चीवर और भिक्षा-पात्र से ही संतुष्ट रहता है। वह जहाँ कहीं भी जाता है, अपनी इन अनिवार्य वस्तुओं को साथ लेकर ही गमन करता है।

इस प्रकार, केवट्ट, कोई भिक्षु संतुष्ट रहता है।

नीवरण त्याग

इस तरह वह आर्य-शीलसंग्रह से संपन्न होकर, इंद्रियों पर आर्य-सँवर से संपन्न होकर, स्मृतिमान और सचेत होकर, आर्य-संतुष्ट होकर एकांतवास ढूँढता है—जैसे जंगल, पेड़ के तले, पहाड़, सँकरी घाटी, गुफ़ा, श्मशानभूमि, उपवन, खुली-जगह या पुआल का ढ़ेर। भिक्षाटन से लौटकर भोजन के पश्चात, वह पालथी मार, काया सीधी रखकर बैठता है और स्मृति आगे लाता है।

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  • वह लोक के प्रति लालसा (“अभिज्झा”) हटाकर लालसाविहीन चित्त से रहता है। अपने चित्त से लालसा को साफ़ करता है।
  • वह भीतर से दुर्भावना और द्वेष (“ब्यापादपदोस”) हटाकर दुर्भावनाविहीन चित्त से रहता है—समस्त जीवहित के लिए करुणामयी। अपने चित्त से दुर्भावना और द्वेष को साफ़ करता है।
  • वह भीतर से सुस्ती और तंद्रा (“थिनमिद्धा”) हटाकर सुस्ती और तंद्राविहीन चित्त से रहता है—उजाला देखने वाला, स्मृतिमान और सचेत। अपने चित्त से सुस्ती और तंद्रा को साफ़ करता है।
  • वह भीतर से बेचैनी और पश्चाताप (“उद्धच्चकुक्कुच्च”) हटाकर बिना व्याकुलता के रहता है; भीतर से शान्त चित्त। अपने चित्त से बेचैनी और पश्चाताप को साफ़ करता है।
  • वह अनिश्चितता (“विचिकिच्छा”) हटाकर उलझन को लाँघता है; कुशल स्वभावों के प्रति संभ्रमता के बिना। अपने चित्त से अनिश्चितता को साफ़ करता है।

जैसे, केवट्ट, कल्पना करें कि कोई पुरुष ऋण लेकर व्यवसाय करता है और उसका व्यवसाय यशस्वी हो जाता है। तब समय बीतने पर, वह न केवल अपना पुराना ऋण चुकाता है, बल्कि अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए अतिरिक्त धन भी बचाता है। तब उसे लगता है, “मैंने ऋण लेकर व्यापार किया और मेरा व्यवसाय सफल हुआ। अब मैं ऋणमुक्त हूँ और मेरे पास अतिरिक्त धन भी है।” इस विचार से वह हर्षित और आनंदित हो उठेगा।

अब कल्पना करें, केवट्ट, कि कोई पुरुष बीमार पड़ता है—गंभीर रोग से पीड़ित। उसे भोजन में रुचि नहीं रहती और उसकी काया का बल क्षीण हो जाता है। तब समय बीतने पर, वह रोगमुक्त हो जाता है; उसे भोजन का स्वाद मिलने लगता है और शरीर में पुनः बल लौट आता है। तब उसे लगता है, “मैं पीड़ादायक रोग से ग्रस्त था, न भोजन भाता था और न शरीर में शक्ति थी। अब मैं पूर्णतः स्वस्थ हूँ।” इस विचार से वह हर्षित और आनंदित हो उठेगा।

अब कल्पना करें, केवट्ट, कि कोई पुरुष कारावास में बंदी हो। तब समय बीतने पर, वह कारावास से मुक्त हो जाता है—सुरक्षित और सही-सलामत, बिना संपत्ति की हानि हुए। तब उसे लगता है, “मैं कारावास में कैद था, किंतु अब बिना किसी क्षति के स्वतंत्र हूँ।” इस विचार से वह हर्षित और आनंदित हो उठेगा।

अब कल्पना करें, केवट्ट, कि कोई पुरुष दास (गुलाम) हो—वह स्वयं के अधीन न होकर दूसरों के अधीन हो और अपनी इच्छा से कहीं आ-जा न सके। तब समय बीतने पर, वह उस दासत्व से मुक्त हो जाता है—स्वयं का स्वामी। अब वह जहाँ चाहे, जा सके। तब उसे लगता है, “पहले मैं परतंत्र था, किंतु अब स्वतंत्र हूँ और अपनी इच्छा से विचरण कर सकता हूँ।” इस विचार से वह हर्षित और आनंदित हो उठेगा।

अब कल्पना करें, केवट्ट, कि कोई पुरुष धन और माल लेकर रेगिस्तान से यात्रा कर रहा हो, जहाँ भोजन अल्प हो, और खतरे अधिक। तब समय बीतने पर, वह उस रेगिस्तान पार कर किसी गाँव में पहुँच जाता है—सुरक्षित और सही-सलामत, बिना संपत्ति की हानि हुए। तब उसे लगता है, “मैं उस खतरनाक रेगिस्तान में था जहाँ जीवन संकट में था, किंतु अब मैं सुरक्षित हूँ।” इस विचार से वह हर्षित और आनंदित हो उठेगा।

उसी तरह, केवट्ट, जब तक ये पाँच अवरोध भीतर से छूटते नहीं हैं, तब तक भिक्षु उन्हें ऋण, रोग, कारावास, गुलामी और रेगिस्तान की तरह देखता है।

किंतु जब ये पाँच अवरोध भीतर से छूट जाते हैं, तब भिक्षु उन्हें ऋणमुक्ति, आरोग्य, बन्धनमुक्ति, स्वतंत्रता और राहतस्थल की तरह देखता है।

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इन पाँच अवरोधों (“पञ्चनीवरण”) के दूर हो जाने पर, उसके भीतर प्रसन्नता का उदय होता है। प्रसन्नता होने से प्रीति जागती है। मन में प्रीति होने से काया प्रशान्त हो जाती है। प्रशान्त काया को सुख की अनुभूति होती है; और सुखी होने पर चित्त समाहित (एकाग्र+स्थिर) हो जाता है।

ध्यान अवस्थाएँ

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प्रथम-ध्यान

वह कामुकता से विलग, अकुशल-स्वभाव से विलग होकर—वितर्क और विचार सहित, विलगता से जन्मे प्रीति और सुख वाले प्रथम-ध्यान में प्रवेश कर विहार करता है।

तब वह उस विलगता से जन्मे प्रीति और सुख से अपनी काया को इस प्रकार सींचता है, भिगोता है, फैलाता है और पूर्णतः व्याप्त करता है कि उसका पूरा शरीर उस सुख से ओत-प्रोत हो जाए। उसकी काया का कोई भी अंश उस विलगता से जन्मे प्रीति और सुख से अछूता (अव्याप्त) न रहे।

जैसे, केवट्ट, कोई कुशल स्नान-सेवक काँस की थाली में स्नान-चूर्ण (उबटन) डाले और उसमें धीरे-धीरे जल छिड़ककर उसे गूँथे, ताकि वह चूर्ण-पिंड भीतर और बाहर से पूरी तरह जल से व्याप्त हो जाए, किंतु जल बाहर न टपके।

उसी तरह, वह उस विलगता से जन्मे प्रीति और सुख से अपनी काया को इस प्रकार सींचता है, भिगोता है, फैलाता है और पूर्णतः व्याप्त करता है कि उसका पूरा शरीर उस सुख से ओत-प्रोत हो जाए। उसकी काया का कोई भी अंश उस विलगता से जन्मे प्रीति और सुख से अछूता (अव्याप्त) न रहे। इसे, केवट्ट, निर्देश-चमत्कार कहते हैं।

द्वितीय-ध्यान

तब आगे, केवट्ट, भिक्षु वितर्क और विचार के थमने पर, भीतर से आश्वस्त हुआ मानस एकरस होकर—बिना-वितर्क बिना-विचार के, समाधि से जन्मे प्रीति और सुख वाले द्वितीय-ध्यान में प्रवेश कर विहार करता है।

तब वह उस समाधि से जन्मे प्रीति और सुख से अपनी काया को इस प्रकार सींचता है, भिगोता है, फैलाता है और पूर्णतः व्याप्त करता है कि उसका पूरा शरीर उस सुख से ओत-प्रोत हो जाए। उसकी काया का कोई भी अंश उस समाधि से जन्मे प्रीति और सुख से अछूता (अव्याप्त) न रहे।

जैसे, केवट्ट, कोई गहरी झील हो, जिसमें नीचे तल से जल का स्रोत फूटता हो। उस झील में न तो पूर्व, पश्चिम, उत्तर या दक्षिण दिशा से पानी की कोई धारा आती हो, और न ही समय-समय पर देवता वर्षा कराते हो। तब उस झील की गहराई से निकलने वाला वह शीतल जल-स्रोत ही पूरी झील को ठंडे पानी से सींचता है, भिगोता है, फैलाता है और पूर्णतः व्याप्त करता है कि झील का पूरा जल उस शीतल जल से ओत-प्रोत हो जाए। उसके जल का कोई भी अंश उस शीतल जल से अव्याप्त न रहे।

उसी तरह वह उस समाधि से उपजे प्रीति और सुख से काया को सींचता है, भिगोता है, फैलाता है, पूर्णतः व्याप्त करता है। ताकि उसके शरीर का कोई भी हिस्सा उस समाधि से उपजे प्रीति और सुख से अव्याप्त न रह जाए। इसे, केवट्ट, निर्देश-चमत्कार कहते हैं।

तृतीय-ध्यान

तब आगे, केवट्ट, भिक्षु प्रीति से विरक्त हो जाता है, और उपेक्षा के साथ स्मृतिवान और सचेत होकर शरीर से सुख महसूस करता है। जिसे आर्यजन ‘उपेक्षक, स्मृतिमान, सुखविहारी’ कहते हैं—उस तृतीय-ध्यान में प्रवेश कर वह विहार करता है।

तब वह उस प्रीति-रहित सुख से अपनी काया को इस प्रकार सींचता है, भिगोता है, फैलाता है और पूर्णतः व्याप्त करता है कि उसका पूरा शरीर उस सुख से ओत-प्रोत हो जाए। उसकी काया का कोई भी अंश उस प्रीति-रहित सुख से अछूता (अव्याप्त) न रहे।

जैसे, केवट्ट, किसी तालाब में नीलकमल, लाल कमल या श्वेत कमल खिले हों। वे फूल पानी से बाहर नहीं निकलते, बल्कि पानी के भीतर ही जन्म लेते हैं, भीतर ही बढ़ते हैं और भीतर ही डूबे रहते हैं। वे अपनी जड़ से लेकर पंखुड़ियों तक उसी शीतल जल से सींचे जाते हैं, भिगोए जाते हैं, फैलाए जाते हैं, पूर्णतः व्याप्त किए जाते हैं। उन कमलों का कोई भी अंश उस शीतल जल से अछूता नहीं रहता। उसी तरह वह उस प्रीति-रहित सुख से अपनी काया को इस प्रकार सींचता है, भिगोता है, फैलाता है और पूर्णतः व्याप्त करता है कि उसका पूरा शरीर उस सुख से ओत-प्रोत हो जाए। उसकी काया का कोई भी अंश उस प्रीति-रहित सुख से अछूता (अव्याप्त) न रहे। इसे, केवट्ट, निर्देश-चमत्कार कहते हैं।

चतुर्थ-ध्यान

तब आगे, केवट्ट, भिक्षु सुख और दुःख के त्याग से, तथा सौमनस्य और दौमनस्य के पहले ही मिट जाने के कारण—वह न सुख, न दुःख वाली, तथा उपेक्षा और स्मृति की शुद्धता से युक्त चतुर्थ-ध्यान में प्रवेश कर विहार करता है।

तब वह अपनी काया को उस परिशुद्ध और उज्ज्वल चित्त से व्याप्त करके बैठता है। उसके शरीर का कोई भी हिस्सा उस परिशुद्ध और उजालेदार चित्त से अछूता नहीं रहता।

जैसे, केवट्ट, कोई पुरुष सिर से पैर तक सफ़ेद उज्ज्वल चादर ओढ़कर बैठा हो, जिससे उसके शरीर का कोई भी हिस्सा उस सफ़ेद वस्त्र से बिना ढका न रह जाए। उसी तरह वह काया में उस परिशुद्ध उजालेदार चित्त को फैलाकर बैठता है, ताकि उसके शरीर का कोई भी हिस्सा उस परिशुद्ध उजालेदार चित्त से अव्याप्त न रह जाए।

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इसे, केवट्ट, निर्देश-चमत्कार कहते हैं।

विपश्यना ज्ञान

“आगे, केवट्ट, जब उसका चित्त इस तरह समाहित, परिशुद्ध, उज्ज्वल, बेदाग, निर्मल, मृदुल, काम करने-योग्य, स्थिर और अविचल हो जाता है, तब वह उस चित्त को ज्ञानदर्शन की ओर झुकाता है।

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तब उसे पता चलता है, ‘मेरी रूपयुक्त काया—जो चार महाभूत से बनी है, माता-पिता द्वारा जन्मी है, दाल-चावल द्वारा पोषित है—वह अनित्य, रगड़न, छेदन, विघटन और विध्वंस स्वभाव की है। और मेरा यह विज्ञान (विज्ञान) इसका आधार लेकर इसी में बँध गया है।’

जैसे, केवट्ट, कोई ऊँची जाति का शुभ मणि हो—अष्टपहलु, सुपरिष्कृत, स्वच्छ, पारदर्शी, निर्मल, सभी गुणों से समृद्ध। और उसमें से एक नीला, पीला, लाल, सफ़ेद या भूरे रंग का धागा पिरोया हो। कोई अच्छी-आँखों वाला पुरुष उसे अपने हाथ में लेकर देखेगा, तो उसे लगेगा, ‘यह कोई ऊँची जाति का शुभ मणि है—जो अष्टपहलु, सुपरिष्कृत, स्वच्छ, पारदर्शी, निर्मल, सभी गुणों से समृद्ध है। और उसमें से यह नीला, पीला, लाल, सफ़ेद या भूरे रंग का धागा पिरोया है।’

उसी तरह, जब उसका चित्त इस तरह समाहित, परिशुद्ध… चित्त को ज्ञानदर्शन की ओर झुकाता है। तब उसे पता चलता है, ‘मेरी रूपयुक्त काया—जो चार महाभूत से बनी… मेरा यह विज्ञान इसका आधार लेकर इसी में बँध गया है।’ और इसे भी, केवट्ट, निर्देश-चमत्कार कहते हैं।

मनोमय-ऋद्धि ज्ञान

जब उसका चित्त इस तरह समाहित, परिशुद्ध, उज्ज्वल, बेदाग, निर्मल, मृदुल, काम करने-योग्य, स्थिर और अविचल हो जाता है, तब वह उस चित्त को मनोमय काया का निर्माण करने की ओर झुकाता है।

तब वह अपनी इस काया से दूसरी काया का निर्माण करता है—रूपयुक्त, मन से रची हुई, सभी अंग-प्रत्यंगों से युक्त, हीन इंद्रियों वाली नहीं।

जैसे, केवट्ट, कोई पुरुष मूँज से सरकंडा निकाले। उसे लगेगा, ‘यह मूँज है, और वह सरकंडा। मूँज एक वस्तु है, और सरकंडा दूसरी वस्तु। किंतु मूँज से सरकंडा निकाला गया है।’ अथवा जैसे कोई पुरुष म्यान से तलवार निकाले। उसे लगेगा, ‘यह म्यान है, और वह तलवार। म्यान एक वस्तु है, और तलवार दूसरी वस्तु। किंतु म्यान से तलवार निकाली गई है।’ अथवा जैसे कोई पुरुष पिटारे से साँप निकाले। उसे लगेगा, ‘यह साँप है, और वह पिटारा। साँप एक वस्तु है, और पिटारा दूसरी वस्तु। किंतु पिटारे से साँप निकाला गया है।’

उसी तरह, जब उसका चित्त इस तरह समाहित, परिशुद्ध… चित्त को मनोमय काया का निर्माण करने की ओर झुकाता है। तब वह अपनी इस काया से दूसरी काया का निर्माण करता है—रूपयुक्त, मन से रची हुई, सभी अंग-प्रत्यंगों से युक्त, हीन इंद्रियों वाली नहीं। और इसे भी, केवट्ट, निर्देश-चमत्कार कहते हैं।

विविध ऋद्धियाँ ज्ञान

जब उसका चित्त इस तरह समाहित, परिशुद्ध, उज्ज्वल, बेदाग, निर्मल, मृदुल, काम करने-योग्य, स्थिर और अविचल हो जाता है, तब वह उस चित्त को विविध ऋद्धियाँ पाने की ओर झुकाता है।

तब वह विविध ऋद्धियों को प्राप्त करता है—जैसे, वह एक होकर अनेक बनता है, अनेक होकर फिर एक बनता है। प्रकट होता है, विलुप्त होता है। दीवार, परकोटे और पर्वतों से बिना टकराए आर-पार चला जाता है, मानो आकाश में हो। ज़मीन पर गोते लगाता है, मानो जल में हो। जल-सतह पर बिना डूबे चलता है, मानो ज़मीन पर हो। पालथी मारकर आकाश में उड़ता है, मानो पक्षी हो। महातेजस्वी सूर्य और चाँद को भी अपने हाथ से छूता और मलता है। अपनी काया से ब्रह्मलोक तक को वश कर लेता है।

जैसे, केवट्ट, कोई निपुण कुम्हार भली तैयार मिट्टी से जो बर्तन चाहे, गढ़ लेता है। जैसे कोई निपुण दंतकार भले तैयार हस्तिदंत से जो कलाकृति चाहे, रच लेता है। जैसे कोई निपुण सुनार अच्छे तैयार स्वर्ण से जो आभूषण चाहे, रच लेता है।

उसी तरह जब उसका चित्त इस तरह समाहित, परिशुद्ध… चित्त को विविध ऋद्धियाँ पाने की ओर झुकाता है। तब वह विविध ऋद्धियों को प्राप्त करता है—जैसे, वह एक होकर अनेक बनता है… ब्रह्मलोक तक को वश कर लेता है। और इसे भी, केवट्ट, निर्देश-चमत्कार कहते हैं।

दिव्यश्रोत ज्ञान

जब उसका चित्त इस तरह समाहित, परिशुद्ध, उज्ज्वल, बेदाग, निर्मल, मृदुल, काम करने-योग्य, स्थिर और अविचल हो जाता है, तब वह उस चित्त को दिव्यश्रोत-धातु की ओर झुकाता है।

तब वह विशुद्ध हो चुके अलौकिक दिव्यश्रोत-धातु से दोनों तरह की आवाज़ें सुनता है—चाहे दिव्य हो या मनुष्यों की हो, दूर की हो या पास की हो।

जैसे, केवट्ट, रास्ते से यात्रा करता कोई पुरुष नगाड़ा, ढोल, शंख, मंजीरे की आवाज़ सुनता है, तो उसे लगता है, ‘यह नगाड़े की आवाज़ है। वह ढोल की आवाज़ है। यह शंखनाद है। और वह मंजीरे की आवाज़ है।’

उसी तरह जब उसका चित्त इस तरह समाहित, परिशुद्ध… चित्त को दिव्यश्रोत-धातु की ओर झुकाता है। तब वह विशुद्ध हो चुके अलौकिक दिव्यश्रोत-धातु से दोनों तरह की आवाज़ें सुनता है—चाहे दिव्य हो या मनुष्यों की हो, दूर की हो या पास की हो। और इसे भी, केवट्ट, निर्देश-चमत्कार कहते हैं।

परचित्त ज्ञान

जब उसका चित्त इस तरह समाहित, परिशुद्ध, उज्ज्वल, बेदाग, निर्मल, मृदुल, काम करने-योग्य, स्थिर और अविचल हो जाता है, तब वह उस चित्त को पराए सत्वों का मानस जानने की ओर झुकाता है।

तब वह अपना मानस फैलाकर पराए सत्वों का, अन्य लोगों का मानस जान लेता है।

उसे रागपूर्ण चित्त पता चलता है कि ‘रागपूर्ण चित्त है।’ वीतराग चित्त पता चलता है कि ‘वीतराग चित्त है।’ द्वेषपूर्ण चित्त पता चलता है कि ‘द्वेषपूर्ण चित्त है।’ द्वेषविहीन चित्त पता चलता है कि ‘द्वेषविहीन चित्त है।’ मोहपूर्ण चित्त पता चलता है कि ‘मोहपूर्ण चित्त है।’ मोहविहीन चित्त पता चलता है कि ‘मोहविहीन चित्त है।’ संक्षिप्त चित्त पता चलता है कि ‘संक्षिप्त चित्त है।’ बिखरा चित्त पता चलता है कि ‘बिखरा चित्त है।’

उसे विस्तारित चित्त पता चलता है कि ‘विस्तारित चित्त है।’ अविस्तारित चित्त पता चलता है कि ‘अविस्तारित चित्त है।’ बेहतर चित्त पता चलता है कि ‘बेहतर चित्त है।’ सर्वोत्तर चित्त पता चलता है कि ‘सर्वोत्तर चित्त है।’ समाहित चित्त पता चलता है कि ‘समाहित चित्त है।’ असमाहित चित्त पता चलता है कि ‘असमाहित चित्त है।’ विमुक्त चित्त पता चलता है कि ‘विमुक्त चित्त है।’ अविमुक्त चित्त पता चलता है कि ‘अविमुक्त चित्त है।’

जैसे, केवट्ट, साज-शृंगार में लगी युवती अथवा युवक, अपना चेहरा चमकीले दर्पण या स्वच्छ जलपात्र में देखें। तब धब्बा हो, तो पता चलता है ‘धब्बा है।’ धब्बा न हो, तो पता चलता है ‘धब्बा नही है।’

उसी तरह, जब उसका चित्त इस तरह समाहित, परिशुद्ध… चित्त को पराए सत्वों का मानस जानने की ओर झुकाता है। तब वह अपना मानस फैलाकर पराए सत्वों का, अन्य लोगों का मानस जान लेता है। उसे रागपूर्ण चित्त पता चलता है कि ‘रागपूर्ण चित्त है’… अविमुक्त चित्त पता चलता है कि ‘अविमुक्त चित्त है।’ और इसे भी, केवट्ट, निर्देश-चमत्कार कहते हैं।

पूर्वजन्म अनुस्मरण ज्ञान

जब उसका चित्त इस तरह समाहित, परिशुद्ध, उज्ज्वल, बेदाग, निर्मल, मृदुल, काम करने-योग्य, स्थिर और अविचल हो जाता है, तब वह उस चित्त को पूर्वजन्मों का अनुस्मरण करने की ओर झुकाता है।

तब उसे विविध प्रकार के पूर्वजन्म स्मरण होने लगते है—जैसे एक जन्म, दो जन्म, तीन जन्म, चार, पाँच, दस जन्म, बीस, तीस, चालीस, पचास जन्म, सौ जन्म, हज़ार जन्म, लाख जन्म, कई कल्पों का लोक-संवर्त, कई कल्पों का लोक-विवर्त, कई कल्पों का संवर्त-विवर्त—‘वहाँ मेरा ऐसा नाम था, ऐसा गोत्र था, ऐसा दिखता था। ऐसा भोज था, ऐसा सुख-दुःख महसूस हुआ, ऐसा जीवन अंत हुआ। उस लोक से च्युत होकर मैं वहाँ उत्पन्न हुआ। वहाँ मेरा वैसा नाम था, वैसा गोत्र था, वैसा दिखता था। वैसा भोज था, वैसा सुख-दुःख महसूस हुआ, वैसे जीवन अंत हुआ। उस लोक से च्युत होकर मैं यहाँ उत्पन्न हुआ।’ इस तरह वह अपने विविध प्रकार के पूर्वजन्म शैली एवं विवरण के साथ स्मरण करता है।

जैसे, केवट्ट, कोई पुरुष अपने गाँव से किसी दूसरे गाँव में जाए। फिर दूसरे गाँव से किसी तीसरे गाँव में। और फिर तीसरे गाँव से वह अपने गाँव लौट आए। तब उसे लगेगा, “मैं अपने गाँव से इस दूसरे गाँव गया। वहाँ मैं ऐसे खड़ा हुआ, ऐसे बैठा, ऐसे बात किया, ऐसे चुप रहा। फ़िर उस दूसरे गाँव से मैं उस तीसरे गाँव गया। वहाँ वैसे खड़ा हुआ, वैसे बैठा, वैसे बात किया, वैसे चुप रहा। तब उस तीसरे गाँव से मैं अपने गाँव लौट आया।”

उसी तरह जब उसका चित्त इस तरह समाहित, परिशुद्ध… चित्त को पूर्वजन्मों का अनुस्मरण करने की ओर झुकाता है। तब उसे विविध प्रकार के पूर्वजन्म स्मरण होने लगते है—जैसे एक जन्म, दो जन्म… कई कल्पों का संवर्त-विवर्त—‘वहाँ मेरा ऐसा नाम था… च्युत होकर मैं यहाँ उत्पन्न हुआ।’ इस तरह वह अपने विविध प्रकार के पूर्वजन्म शैली एवं विवरण के साथ स्मरण करता है। और इसे भी, केवट्ट, निर्देश-चमत्कार कहते हैं।

दिव्यचक्षु ज्ञान

जब उसका चित्त इस तरह समाहित, परिशुद्ध, उज्ज्वल, बेदाग, निर्मल, मृदुल, काम करने-योग्य, स्थिर और अविचल हो जाता है, तब वह उस चित्त को सत्वों की गति जानने (“चुतूपपात ञाण”) की ओर झुकाता है।

तब उसे अपने विशुद्ध हुए अलौकिक दिव्यचक्षु से दूसरे सत्वों की मौत और पुनर्जन्म होते हुए दिखायी देता है। और उसे पता चलता है कि वे कर्मानुसार ही कैसे हीन अथवा उच्च हैं, सुंदर अथवा कुरूप हैं, सद्गति अथवा दुर्गति पाते हैं।

कैसे ये सत्व—शारीरिक दुराचार से युक्त, शाब्दिक दुराचार से युक्त, मानसिक दुराचार से युक्त थे। कैसे उन्होंने आर्यजनों का अनादर किया, मिथ्यादृष्टि धारण की, और मिथ्यादृष्टि के प्रभाव में दुष्कृत्य किए—वे मरणोपरांत काया छूटने पर दुर्गति पाकर यातनालोक नर्क में उपजे।’

जबकि ये सत्व—कायिक सदाचार से संपन्न, शाब्दिक सदाचार से संपन्न, मानसिक सदाचार से संपन्न थे। उन्होंने आर्यजनों का अनादर नहीं किया, बल्कि सम्यकदृष्टि धारण की, और सम्यकदृष्टि के प्रभाव में सुकृत्य किए—वे मरणोपरांत सद्गति पाकर स्वर्ग में उपजे।

इस तरह वह अपने विशुद्ध हुए अलौकिक दिव्यचक्षु से दूसरे सत्वों की मौत और पुनर्जन्म होते हुए दिखायी देता है। और उसे पता चलता है कि वे कर्मानुसार ही कैसे हीन अथवा उच्च हैं, सुंदर अथवा कुरूप हैं, सद्गति अथवा दुर्गति पाते हैं।

जैसे, केवट्ट, किसी चौराहे के मध्य एक इमारत हो। उसके ऊपर खड़ा कोई तेज आँखों वाला पुरुष नीचे देखें, तो उसे लोग घर में घुसते, घर से निकलते, रास्ते पर चलते, चौराहे पर बैठे हुए दिखेंगे। तब उसे लगेगा, “वहाँ कुछ लोग घर में घुस रहे हैं। वहाँ कुछ लोग निकल रहे हैं। वहाँ कुछ लोग रास्ते पर चल रहे हैं। यहाँ कुछ लोग चौराहे पर बैठे हुए हैं।”

उसी तरह जब उसका चित्त इस तरह समाहित, परिशुद्ध… चित्त को सत्वों की गति जानने की ओर झुकाता है। तब उसे अपने विशुद्ध हुए अलौकिक दिव्यचक्षु से दूसरे सत्वों की मौत और पुनर्जन्म होते हुए दिखता है। और उसे पता चलता है कि कर्मानुसार ही वे कैसे हीन अथवा उच्च हैं… सद्गति होते अथवा दुर्गति होते हैं। और इसे भी, केवट्ट, निर्देश-चमत्कार कहते हैं।

आस्रवक्षय ज्ञान

जब उसका चित्त इस तरह समाहित, परिशुद्ध, उज्ज्वल, बेदाग, निर्मल, मृदुल, काम करने-योग्य, स्थिर और अविचल हो जाता है, तब वह उस चित्त को आस्रव का क्षय जानने की ओर झुकाता है।

तब ‘दुःख ऐसा है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है। ‘दुःख की उत्पत्ति ऐसी है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है। ‘दुःख का निरोध ऐसा है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है। ‘दुःख का निरोध-मार्ग ऐसा है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है।

‘आस्रव ऐसा है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है। ‘आस्रव की उत्पत्ति ऐसी है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है। ‘आस्रव का निरोध ऐसा है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है। ‘आस्रव का निरोध-मार्ग ऐसा है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है।

इस तरह जानने से, देखने से, उसका चित्त कामुक-आस्रव से विमुक्त हो जाता है, भव-आस्रव से विमुक्त हो जाता है, अविद्या-बहाव से विमुक्त हो जाता है। विमुक्ति के साथ ज्ञान उत्पन्न होता है, ‘विमुक्त हुआ!’ उसे पता चलता है, ‘जन्म क्षीण हुए, ब्रह्मचर्य पूर्ण हुआ, काम समाप्त हुआ, आगे कोई काम बचा नहीं।’

जैसे, केवट्ट, किसी पहाड़ के ऊपर स्वच्छ, पारदर्शी और निर्मल सरोवर हो। उसके तट पर खड़ा, कोई तेज आँखों वाला पुरुष, उसमें देखें तो उसे सीप, घोघा और बजरी दिखेंगे, जलजंतु और मछलियों का झुंड तैरता हुआ या खड़ा दिखेगा। तब उसे लगेगा, ‘यह सरोवर स्वच्छ, पारदर्शी और निर्मल है। यहाँ सीप, घोघा और बजरी हैं। जलजंतु और मछलियों का झुंड तैर रहा या खड़ा है।’

उसी तरह, जब उसका चित्त इस तरह समाहित, परिशुद्ध… चित्त को आस्रव का क्षय जानने की ओर झुकाता है। तब ‘दुःख ऐसा है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है… ‘आस्रव ऐसा है’, उसे यथास्वरूप पता चलता है… इस तरह जानने से, देखने से, उसका चित्त कामुक-आस्रव से विमुक्त हो जाता है… आगे कोई काम बचा नहीं।’

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और इसे भी, केवट्ट, निर्देश-चमत्कार कहते हैं। और केवट्ट, मैंने यही तीन चमत्कार बताए है, जिनका मैंने स्वयं प्रत्यक्ष-ज्ञान से साक्षात्कार किया है।

अस्तित्व का निरोध खोजता भिक्षु

बहुत समय पूर्व, केवट्ट, इसी भिक्षुसंघ के एक भिक्षु को ऐसा विचार आया, “ये चार महाभूत—पृथ्वीधातु, जलधातु, अग्निधातु और वायुधातु—बिना शेष रहे, कहाँ खत्म होते हैं?” तब उस भिक्षु ने ऐसी समाधि को प्राप्त किया, जिस समाहित चित्त में देवताओं की ओर जाने वाला मार्ग प्रकट होता है। तब, केवट्ट, वह भिक्षु चार-महाराज के देवतागण (=गन्धर्व, कुंभण्ड, नाग, और यक्ष देवतागण) के पास गया, और जाकर चार-महाराज के देवताओं से कहा, “मित्रों, ये चारों महाभूत—पृथ्वीधातु, जलधातु, अग्निधातु और वायुधातु—बिना शेष रहे, कहाँ खत्म होते हैं?”

जब ऐसा कहा गया, केवट्ट, तब उन चार-महाराज के देवताओं ने उस भिक्षु से कहा, “हम तो, भिक्षु, यह नहीं जानते हैं कि ये चारों महाभूत—पृथ्वीधातु, जलधातु, अग्निधातु और वायुधातु—बिना शेष रहे, कहाँ खत्म होते हैं? किन्तु हमारे चार महाराज (=धृतराष्ट्र, विरूल्हक, विरूपाक्ष, और कुबेर महाराज) अधिक उत्तम और उत्कृष्टतम हैं। शायद वे जानते हों कि ये चारों महाभूत—पृथ्वीधातु, जलधातु, अग्निधातु और वायुधातु—बिना शेष रहे, कहाँ खत्म होते हैं?”

तब, केवट्ट, वह भिक्षु चार महाराज के पास गया, और जाकर चार महाराज से कहा, “मित्रों, ये चारों महाभूत—पृथ्वीधातु, जलधातु, अग्निधातु और वायुधातु—बिना शेष रहे, कहाँ खत्म होते हैं?”

जब ऐसा कहा गया, केवट्ट, तब उन चार महाराजाओं ने भी उस भिक्षु से कहा, “हम तो, भिक्षु, यह नहीं जानते हैं कि ये चारों महाभूत—पृथ्वीधातु, जलधातु, अग्निधातु और वायुधातु—बिना शेष रहे, कहाँ खत्म होते हैं? किन्तु तैतीस देवतागण हमसे अधिक उत्तम और उत्कृष्टतम हैं। शायद वे जानते हों कि ये चारों महाभूत—पृथ्वीधातु, जलधातु, अग्निधातु और वायुधातु—बिना शेष रहे, कहाँ खत्म होते हैं?”

तब, केवट्ट, वह भिक्षु तैतीस देवताओं के पास गया, और जाकर तैतीस देवताओं से कहा, “मित्रों, ये चारों महाभूत—पृथ्वीधातु, जलधातु, अग्निधातु और वायुधातु—बिना शेष रहे, कहाँ खत्म होते हैं?”

जब ऐसा कहा गया, केवट्ट, तब उन तैतीस देवताओं ने भी उस भिक्षु से कहा, “हम तो, भिक्षु, यह नहीं जानते हैं कि ये चारों महाभूत—पृथ्वीधातु, जलधातु, अग्निधातु और वायुधातु—बिना शेष रहे, कहाँ खत्म होते हैं? किन्तु देवराज इंद्र सक्क हमसे अधिक उत्तम और उत्कृष्टतम है। शायद वह जानते हो कि ये चारों महाभूत—पृथ्वीधातु, जलधातु, अग्निधातु और वायुधातु—बिना शेष रहे, कहाँ खत्म होते हैं?”

तब, केवट्ट, वह भिक्षु सक्षम देवराज इंद्र के पास गया, और जाकर देवराज इंद्र से कहा, “मित्र, ये चारों महाभूत—पृथ्वीधातु, जलधातु, अग्निधातु और वायुधातु—बिना शेष रहे, कहाँ खत्म होते हैं?”

जब ऐसा कहा गया, केवट्ट, तब सक्षम देवराज इंद्र ने भी उस भिक्षु से कहा, “मैं तो, भिक्षु, यह नहीं जानता हूँ कि ये चारों महाभूत—पृथ्वीधातु, जलधातु, अग्निधातु और वायुधातु—बिना शेष रहे, कहाँ खत्म होते हैं? किन्तु याम देवतागण मुझसे अधिक उत्तम और उत्कृष्टतम हैं। शायद वे जानते हों…

देवपुत्र सुयाम (=याम देवताओं का महाराज) अधिक उत्तम और उत्कृष्टतम है। शायद वह जानते हो…

तुषित देवतागण मुझसे अधिक उत्तम और उत्कृष्टतम हैं। शायद वे जानते हों…

देवपुत्र संतुषित (=तुषित देवताओं का महाराज) अधिक उत्तम और उत्कृष्टतम है। शायद वह जानते हो…

निर्माणरति देवतागण मुझसे अधिक उत्तम और उत्कृष्टतम हैं। शायद वे जानते हों…

देवपुत्र सुनिर्मित (=निर्माणरति देवताओं का महाराज) अधिक उत्तम और उत्कृष्टतम है। शायद वह जानते हो…

परनिर्मित वशवर्ती देवतागण मुझसे अधिक उत्तम और उत्कृष्टतम हैं। शायद वे जानते हों…

देवपुत्र वशवर्ती (=परनिर्मित वशवर्ती देवताओं का महाराज) अधिक उत्तम और उत्कृष्टतम है। शायद वह जानते हो…

ब्रह्मकायिक देवतागण मुझसे अधिक उत्तम और उत्कृष्टतम हैं। शायद वे जानते हों कि ये चारों महाभूत—पृथ्वीधातु, जलधातु, अग्निधातु और वायुधातु—बिना शेष रहे, कहाँ खत्म होते हैं?”

तब, केवट्ट, उस भिक्षु ने ऐसी समाधि को प्राप्त किया, जिस समाहित चित्त में ब्रह्म की ओर जाने वाला मार्ग प्रकट होता है। और तब वह भिक्षु ब्रह्मकाया वाले देवताओं के पास गया, और जाकर ब्रह्मकाया वाले देवताओं से कहा, “मित्रों, ये चारों महाभूत—पृथ्वीधातु, जलधातु, अग्निधातु और वायुधातु—बिना शेष रहे, कहाँ खत्म होते हैं?”

जब ऐसा कहा गया, केवट्ट, तब उन ब्रह्मकायिक देवताओं ने उस भिक्षु से कहा, “हम तो, भिक्षु, यह नहीं जानते हैं कि ये चारों महाभूत—पृथ्वीधातु, जलधातु, अग्निधातु और वायुधातु—बिना शेष रहे, कहाँ खत्म होते हैं? किन्तु जो ब्रह्मा है—महाब्रह्मा है, विजेता है, अजेय है, सर्वदृष्टा है, वशवर्ती है, ईश्वर है, (असली) कर्ता है, निर्माता है, श्रेष्ठ है, नियुक्तकर्ता है, शासक है, आ चुके या आने वाले सभी का पिता है, उसी ने सभी सत्व निर्मित किये है—वह हमसे अधिक उत्तम और उत्कृष्टतम है। शायद वह जानते हो कि ये चारों महाभूत—पृथ्वीधातु, जलधातु, अग्निधातु और वायुधातु—बिना शेष रहे, कहाँ खत्म होते हैं?”

“किन्तु मित्रों, वह महाब्रह्मा कहाँ है?”

“भिक्षु, हम भी नहीं जानते हैं कि वह ब्रह्मा कहाँ है, या वह ब्रह्मा कैसा है, या वह ब्रह्मा किस तरह का है? किन्तु जब संकेत दिखते हैं—प्रकाश होता है, उजाला होता है, तब ब्रह्मा प्रकट होता है। चूँकि ये ही ब्रह्मा के प्रकट होने के पूर्व-संकेत हैं—प्रकाश होना, उजाला होना, तब ब्रह्मा प्रकट होना!”

महाब्रह्मा से भेंट

तब, केवट्ट, (भिक्षु का) ज्यादा समय नहीं बीता, जब ब्रह्मा प्रकट हुआ।

तब वह भिक्षु उस महाब्रह्मा के पास गया, और जाकर महाब्रह्मा से कहा, “मित्र, ये चारों महाभूत—पृथ्वीधातु, जलधातु, अग्निधातु और वायुधातु—बिना शेष रहे, कहाँ खत्म होते हैं?”

जब ऐसा कहा गया, केवट्ट, तब उस महाब्रह्मा ने उस भिक्षु से कहा, “मैं ही, भिक्षु, ब्रह्मा हूँ, महाब्रह्मा हूँ, विजेता हूँ, अजेय हूँ, सर्वदृष्टा हूँ, वशवर्ती हूँ, ईश्वर हूँ, कर्ता हूँ, निर्माता हूँ, श्रेष्ठ हूँ, नियुक्तकर्ता हूँ, शासक हूँ, आ चुके या आने वाले सभी का पिता हूँ, मैंने ही सभी सत्व निर्मित किये हैं।”

तब उस भिक्षु ने दुबारा महाब्रह्मा से कहा, “मित्र, मैंने तुमसे यह नहीं पूछा कि ‘क्या तुम ब्रह्मा हो, महाब्रह्मा हो, विजेता हो, अजेय हो, सर्वदृष्टा हो, वशवर्ती हो, ईश्वर हो, कर्ता हो, निर्माता हो, श्रेष्ठ हो, नियुक्तकर्ता हो, शासक हो, आ चुके या आने वाले सभी के पिता हो, तुमने ही सभी सत्व निर्मित किये है? बल्कि मैंने तुमसे यह पूछा कि ‘ये चारों महाभूत—पृथ्वीधातु, जलधातु, अग्निधातु और वायुधातु—बिना शेष रहे, कहाँ खत्म होते हैं?’”

दुबारा उस महाब्रह्मा ने उस भिक्षु से कहा, “भिक्षु! मैं ही ब्रह्मा हूँ, महाब्रह्मा हूँ, विजेता हूँ, अजेय हूँ, सर्वदृष्टा हूँ, वशवर्ती हूँ, ईश्वर हूँ, कर्ता हूँ, निर्माता हूँ, श्रेष्ठ हूँ, नियुक्तकर्ता हूँ, शासक हूँ, आ चुके या आने वाले सभी का पिता हूँ, मैंने ही सभी सत्व निर्मित किये हैं।”

तब उस भिक्षु ने तीसरी बार महाब्रह्मा से कहा, “मित्र, मैंने तुमसे यह नहीं पूछा है कि ‘क्या तुम ब्रह्मा हो, महाब्रह्मा हो, विजेता हो, अजेय हो, सर्वदृष्टा हो, वशवर्ती हो, ईश्वर हो, कर्ता हो, निर्माता हो, श्रेष्ठ हो, नियुक्तकर्ता हो, शासक हो, आ चुके या आने वाले सभी के पिता हो, तुमने ही सभी सत्व निर्मित किये है? बल्कि मैंने तुमसे यह पूछा है कि ‘ये चारों महाभूत—पृथ्वीधातु, जलधातु, अग्निधातु और वायुधातु—बिना शेष रहे, कहाँ खत्म होते हैं?’”

तब, केवट्ट, उस महाब्रह्मा ने उस भिक्षु की बाह पकड़कर एक-ओर ले जाते हुए उससे कहा, “भिक्षु, ये जो ब्रह्मकायिक देवता हैं न, उन्हें लगता हैं कि—“ऐसा कुछ नहीं जो मैं ‘ब्रह्मा’ नहीं जानता! ऐसा कुछ नहीं जो मैं ‘ब्रह्मा’ नहीं देखता! ऐसा कुछ नहीं जो मैं ‘ब्रह्मा’ नहीं समझता! ऐसा कुछ नहीं जिसका मैं ‘ब्रह्मा’ ने साक्षात्कार न किया हो!” इसलिए मैंने उनके आगे उत्तर नहीं दिया। किन्तु, भिक्षु, यह तो मैं भी नहीं जानता हूँ कि ‘ये चारों महाभूत—पृथ्वीधातु, जलधातु, अग्निधातु और वायुधातु—बिना शेष रहे, कहाँ खत्म होते हैं?’

इसलिए, भिक्षु, यह तुम्हारी ही गलती है, तुम्हारा ही अपराध है, जो तुमने भगवान को पीछे छोड़ कर, प्रश्न का उत्तर बाहर ढूँढते हुए, इधर-उधर घूम रहे हो! जाओ, भिक्षु, उस भगवान के पास जाओ, और भगवान से यह प्रश्न पुछो! और जैसे भगवान उत्तर दे, उसी तरह धारण करो!”

तब, केवट्ट, जैसे कोई बलवान पुरुष अपनी सिकोड़ी बाँह को पसारता है, या पसारी बाँह को सिकोड़ता है, उसी तरह वह भिक्षु ब्रह्मलोक से गायब हुआ और मेरे आगे प्रकट हुआ। तब उस भिक्षु ने मुझे अभिवादन किया और एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठकर उस भिक्षु ने मुझे कहा, “भन्ते, ये चारों महाभूत—पृथ्वीधातु, जलधातु, अग्निधातु और वायुधातु—बिना शेष रहे, कहाँ खत्म होते हैं?”

जहाज के पक्षी की उपमा

ऐसा कहा जाने पर मैंने उस भिक्षु से कहा:

“बहुत समय पूर्व, भिक्षु, कुछ समुद्रयात्री व्यापारी किनारा ढूँढने वाले एक पक्षी को साथ ले, नाँव पर सवार होकर गहरे समुद्र के बीच से गए।

जब उन्हें नाँव से किनारा नहीं दिखता था, तब वे किनारा ढूँढने वाले उस पक्षी को छोड़ते थे। वह पक्षी पूर्व दिशा में उड़ता; कभी दक्षिण दिशा में उड़ता; कभी पश्चिम दिशा में उड़ता; कभी उत्तर दिशा में उड़ता; कभी सीधा ऊपर उड़ता; कभी आड़ा-तिरछा उड़ता। जब उसे किसी दिशा में किनारा दिखता, तो वह उस दिशा में उड़कर चला जाता। यदि उसे किसी भी दिशा में किनारा न दिखता, तो वह लौटकर नाँव पर आ जाता।

उसी तरह, भिक्षु, तुम अपने प्रश्न का उत्तर ढूँढते हुए ब्रह्मलोक तक चले गए, और वहाँ भी प्रश्न का उत्तर न पाकर, मेरे आगे यही लौटकर आ आए।

और, भिक्षु, इस प्रश्न को इस तरह नहीं पूछा जाना चाहिए कि ‘ये चारों महाभूत—पृथ्वीधातु, जलधातु, अग्निधातु और वायुधातु—बिना शेष रहे (=अशेष), कहाँ खत्म होते हैं?’ बल्कि उसे इस तरह पूछा जाना चाहिए —

“जल पृथ्वी अग्नि वायु,
कहाँ स्थित नहीं होते?
बड़े छोटे अणु स्थूल हो,
सुंदर या कुरूप हो,
नाम हो या रूप हो,
कहाँ अशेष खत्म होते?”

और उसका उत्तर है —

“विज्ञान अनिदर्शन” 4
— असीम और सर्वत्र उजला,
जल पृथ्वी अग्नि वायु,
यहाँ स्थित नहीं होते।
बड़े छोटे अणु स्थूल हो,
सुंदर या कुरूप हो
नाम हो या रूप हो,
यहाँ अशेष खत्म होते।
विज्ञान के निरोध से,
यही पर खत्म होते।”


भगवान ने ऐसा कहा। हर्षित होकर गृहस्थ केवट्ट ने भगवान की बातों का अभिनंदन किया।

सुत्त समाप्त।


  1. ग्रामधर्म का शाब्दिक अर्थ है ‘गाँव का आचरण’। विनय और सूत्रों में इसका प्रयोग ‘मैथुन’ या ‘संभोग’ के लिए किया गया है, जो गृहस्थों का आचरण है, भिक्षुओं का नहीं। ↩︎

  2. विकालभोज: भिक्षु नियमों के अनुसार, मध्यान्ह (दोपहर) के बाद भोजन ग्रहण करना वर्जित है। ↩︎

  3. तिरच्छान कथा का शाब्दिक अर्थ है ‘पशुवत’ या ‘आड़ी-तिरछी’ बातें। जिस प्रकार अशिष्ट जानवर जमीन पर आड़े-तिरछे कुचलते हुए चलते हैं, वैसे ही ये अशिष्ट बातें केवल सांसारिक जीवन के इर्द-गिर्द ही व्यर्थ विषयों को कुचलते हुए घूमती रहती हैं और शिष्ट आर्य दिशा में अग्रसर नहीं होतीं। ↩︎

  4. विञ्ञाणं अनिदस्सनं—इस शब्द का पालि साहित्य में कहीं भी स्पष्ट विवरण नहीं दिया गया है। “अनिदस्सनं” को संयुत्तनिकाय ४३ में ‘निर्वाण’ का पर्यायवाचक शब्द बताया गया है। यह संभवतः संयुत्तनिकाय १२:६४ में उल्लेख हुई प्रकाश की किरण से संबंधित है, जो किसी भी सतह पर जाकर ठहरती नहीं है, टकराती नहीं है, या स्थापित नहीं होती। यह उस विज्ञान का प्रतीक है, जो कहीं भी “आहार” नहीं लेता। मज्झिमनिकाय ४९ में कहा गया है कि इस विज्ञान अनिदर्शन को “सब की संपूर्णता से भी अनुभव नहीं किया जा सकता।” वहाँ “सब” का अर्थ है छह भीतरी और छह बाहरी इंद्रिय आयाम। (संयुत्तनिकाय ३५:२३ देखें।)

    याद रखें, यह उस विज्ञान से भिन्न है जो पटिच्चसमुप्पाद में शामिल है और जिसे छह इंद्रिय आयामों में परिभाषित किया गया है। और जो विज्ञान ‘झान’ और ‘अरूप समाधि’ में होता हैं, उनसे परे है। इस तरह का विज्ञान स्थान और काल से परे है, जिसे विज्ञान स्कन्ध में शामिल नहीं किया जा सकता। क्योंकि ‘विज्ञान स्कन्ध’ सभी प्रकार के विज्ञान को—चाहे वह समीप हो या दूर, भूतकालीन हो, वर्तमान हो, या भविष्यकालीन—समेटे हुए है। लेकिन, यह विज्ञान एक ऐसी अवस्था है, जहाँ “यहाँ,” “वहाँ,” या “बीच में” कुछ भी नहीं है (उदान १:१० देखें); जहाँ न कोई आना है, न जाना है, न ही ठहरना है (उदान ८:१ देखें)। इसका अर्थ है कि इसे “शाश्वत” या “सर्वव्यापी” नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ये शब्द केवल काल और स्थान के संदर्भ में ही अर्थ रखते हैं।

    निर्वाण के पश्चात की अवस्था का वर्णन करते हुए यह विवरण आता है, “जो कुछ भी महसूस किया गया, जब उसका आस्वादन नहीं किया जाता, तो वह यहीं ठंडा पड़ जाता है।” (मज्झिमनिकाय १४० और इतिवुत्तक ४४ देखें।) चूँकि “सब” का अर्थ इंद्रिय आयामों से है, इसलिए तब प्रश्न उठता है कि क्या “विञ्ञाणं अनिदस्सनं” उस “सब” की परिभाषा में अंतर्निहित है? लेकिन, अङ्गुत्तरनिकाय ४:१७३ में चेतावनी दी गई है कि छह इंद्रियायतनों के अवशेषरहित समाप्त हो जाने के पश्चात “कुछ शेष है या नहीं” जैसी किसी अटकल का अर्थ होगा “अविषय को विषय बनाना।” यह प्रक्रिया “अविषय” की उपलब्धि के मार्ग में बाधा बनती है। अतः यह एक ऐसा प्रश्न है, जिसे बेहतर होगा कि पूरी तरह छोड़ दिया जाए। ↩︎

पालि

केवट्टगहपतिपुत्तवत्थु

४८१. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा नाळन्दायं विहरति पावारिकम्बवने। अथ खो केवट्टो गहपतिपुत्तो येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदि। एकमन्तं निसिन्नो खो केवट्टो गहपतिपुत्तो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘अयं, भन्ते, नाळन्दा इद्धा चेव फीता च बहुजना आकिण्णमनुस्सा भगवति अभिप्पसन्ना। भिक्षु, भन्ते, भगवा एकं भिक्खुं समादिसतु, यो उत्तरिमनुस्सधम्मा, इद्धिपाटिहारियं करिस्सति; एवायं नाळन्दा भिय्योसो मत्ताय भगवति अभिप्पसीदिस्सती’’ति। एवं वुत्ते, भगवा केवट्टं गहपतिपुत्तं एतदवोच – ‘‘न खो अहं, केवट्ट, भिक्खूनं एवं धम्मं देसेमि – एथ तुम्हे, भिक्खवे, गिहीनं ओदातवसनानं उत्तरिमनुस्सधम्मा इद्धिपाटिहारियं करोथा’’ति।

४८२. दुतियम्पि खो केवट्टो गहपतिपुत्तो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘नाहं, भन्ते, भगवन्तं धंसेमि; अपि च, एवं वदामि – ‘अयं, भन्ते, नाळन्दा इद्धा चेव फीता च बहुजना आकिण्णमनुस्सा भगवति अभिप्पसन्ना। भिक्षु, भन्ते, भगवा एकं भिक्खुं समादिसतु, यो उत्तरिमनुस्सधम्मा इद्धिपाटिहारियं करिस्सति; एवायं नाळन्दा भिय्योसो मत्ताय भगवति अभिप्पसीदिस्सती’’’ति। दुतियम्पि खो भगवा केवट्टं गहपतिपुत्तं एतदवोच – ‘‘न खो अहं, केवट्ट, भिक्खूनं एवं धम्मं देसेमि – एथ तुम्हे, भिक्खवे, गिहीनं ओदातवसनानं उत्तरिमनुस्सधम्मा इद्धिपाटिहारियं करोथा’’’ति।

ततियम्पि खो केवट्टो गहपतिपुत्तो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘नाहं, भन्ते, भगवन्तं धंसेमि; अपि च, एवं वदामि – ‘अयं, भन्ते, नाळन्दा इद्धा चेव फीता च बहुजना आकिण्णमनुस्सा भगवति अभिप्पसन्ना। भिक्षु, भन्ते, भगवा एकं भिक्खुं समादिसतु, यो उत्तरिमनुस्सधम्मा इद्धिपाटिहारियं करिस्सति। एवायं नाळन्दा भिय्योसो मत्ताय भगवति अभिप्पसीदिस्सती’ति।

इद्धिपाटिहारियं

४८३. ‘‘तीणि खो इमानि, केवट्ट, पाटिहारियानि मया सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा पवेदितानि। कतमानि तीणि? इद्धिपाटिहारियं, आदेसनापाटिहारियं, अनुसासनीपाटिहारियं।

४८४. ‘‘कतमञ्च, केवट्ट, इद्धिपाटिहारियं? इध, केवट्ट, भिक्खु अनेकविहितं इद्धिविधं पच्चनुभोति। एकोपि हुत्वा बहुधा होति, बहुधापि हुत्वा एको होति; आविभावं तिरोभावं तिरोकुट्टं तिरोपाकारं तिरोपब्बतं असज्जमानो गच्छति सेय्यथापि आकासे; पथवियापि उम्मुज्जनिमुज्जं करोति सेय्यथापि उदके; उदकेपि अभिज्जमाने गच्छति सेय्यथापि पथवियं; आकासेपि पल्लङ्केन कमति सेय्यथापि पक्खी सकुणो; इमेपि चन्दिमसूरिये एवं महिद्धिके एवं महानुभावे पाणिना परामसति परिमज्जति; याव ब्रह्मलोकापि कायेन वसं वत्तेति।

‘‘तमेनं अञ्ञतरो सद्धो पसन्नो पस्सति तं भिक्खुं अनेकविहितं इद्धिविधं पच्चनुभोन्तं – एकोपि हुत्वा बहुधा होन्तं, बहुधापि हुत्वा एको होन्तं; आविभावं तिरोभावं; तिरोकुट्टं तिरोपाकारं तिरोपब्बतं असज्जमानं गच्छन्तं सेय्यथापि आकासे; पथवियापि उम्मुज्जनिमुज्जं करोन्तं सेय्यथापि उदके; उदकेपि अभिज्जमाने गच्छन्तं सेय्यथापि पथवियं; आकासेपि पल्लङ्केन कमन्तं सेय्यथापि पक्खी सकुणो; इमेपि चन्दिमसूरिये एवं महिद्धिके एवं महानुभावे पाणिना परामसन्तं परिमज्जन्तं याव ब्रह्मलोकापि कायेन वसं वत्तेन्तं।

‘‘तमेनं सो सद्धो पसन्नो अञ्ञतरस्स अस्सद्धस्स अप्पसन्नस्स आरोचेति – ‘अच्छरियं वत, भो, अब्भुतं वत, भो, समणस्स महिद्धिकता महानुभावता। अमाहं भिक्खुं अद्दसं अनेकविहितं इद्धिविधं पच्चनुभोन्तं – एकोपि हुत्वा बहुधा होन्तं, बहुधापि हुत्वा एको होन्तं…पे॰… याव ब्रह्मलोकापि कायेन वसं वत्तेन्त’न्ति।

‘‘तमेनं सो अस्सद्धो अप्पसन्नो तं सद्धं पसन्नं एवं वदेय्य – ‘अत्थि खो, भो, गन्धारी नाम विज्जा। ताय सो भिक्खु अनेकविहितं इद्धिविधं पच्चनुभोति – एकोपि हुत्वा बहुधा होति, बहुधापि हुत्वा एको होति…पे॰… याव ब्रह्मलोकापि कायेन वसं वत्तेती’ति।

‘‘तं किं मञ्ञसि, केवट्ट, अपि नु सो अस्सद्धो अप्पसन्नो तं सद्धं पसन्नं एवं वदेय्या’’ति? ‘‘वदेय्य, भन्ते’’ति। ‘‘इमं खो अहं, केवट्ट, इद्धिपाटिहारिये आदीनवं सम्पस्समानो इद्धिपाटिहारियेन अट्टीयामि हरायामि जिगुच्छामि’’।

आदेसनापाटिहारियं

४८५. ‘‘कतमञ्च, केवट्ट, आदेसनापाटिहारियं? इध, केवट्ट, भिक्खु परसत्तानं परपुग्गलानं चित्तम्पि आदिसति, चेतसिकम्पि आदिसति, वितक्कितम्पि आदिसति, विचारितम्पि आदिसति – ‘एवम्पि ते मनो, इत्थम्पि ते मनो, इतिपि ते चित्त’न्ति।

‘‘तमेनं अञ्ञतरो सद्धो पसन्नो पस्सति तं भिक्खुं परसत्तानं परपुग्गलानं चित्तम्पि आदिसन्तं, चेतसिकम्पि आदिसन्तं, वितक्कितम्पि आदिसन्तं, विचारितम्पि आदिसन्तं – ‘एवम्पि ते मनो, इत्थम्पि ते मनो, इतिपि ते चित्त’न्ति। तमेनं सो सद्धो पसन्नो अञ्ञतरस्स अस्सद्धस्स अप्पसन्नस्स आरोचेति – ‘अच्छरियं वत, भो, अब्भुतं वत, भो, समणस्स महिद्धिकता महानुभावता। अमाहं भिक्खुं अद्दसं परसत्तानं परपुग्गलानं चित्तम्पि आदिसन्तं, चेतसिकम्पि आदिसन्तं, वितक्कितम्पि आदिसन्तं, विचारितम्पि आदिसन्तं – ‘‘एवम्पि ते मनो, इत्थम्पि ते मनो, इतिपि ते चित्त’’’न्ति।

‘‘तमेनं सो अस्सद्धो अप्पसन्नो तं सद्धं पसन्नं एवं वदेय्य – ‘अत्थि खो, भो, मणिका नाम विज्जा; ताय सो भिक्खु परसत्तानं परपुग्गलानं चित्तम्पि आदिसति, चेतसिकम्पि आदिसति, वितक्कितम्पि आदिसति, विचारितम्पि आदिसति – ‘एवम्पि ते मनो, इत्थम्पि ते मनो, इतिपि ते चित्त’’’न्ति।

‘‘तं किं मञ्ञसि, केवट्ट, अपि नु सो अस्सद्धो अप्पसन्नो तं सद्धं पसन्नं एवं वदेय्या’’ति? ‘‘वदेय्य, भन्ते’’ति। ‘‘इमं खो अहं, केवट्ट, आदेसनापाटिहारिये आदीनवं सम्पस्समानो आदेसनापाटिहारियेन अट्टीयामि हरायामि जिगुच्छामि’’।

अनुसासनीपाटिहारियं

४८६. ‘‘कतमञ्च, केवट्ट, अनुसासनीपाटिहारियं? इध, केवट्ट, भिक्खु एवमनुसासति – ‘एवं वितक्केथ, मा एवं वितक्कयित्थ, एवं मनसिकरोथ, मा एवं मनसाकत्थ, इदं पजहथ, इदं उपसम्पज्ज विहरथा’ति। इदं वुच्चति, केवट्ट, अनुसासनीपाटिहारियं।

‘‘पुन चपरं, केवट्ट, इध तथागतो लोके उप्पज्जति अरहं सम्मासम्बुद्धो …पे॰… (यथा १९०-२१२ अनुच्छेदेसु एवं वित्थारेतब्बं)। एवं खो, केवट्ट, भिक्खु सीलसम्पन्नो होति…पे॰… पठमं झानं उपसम्पज्ज विहरति। इदम्पि वुच्चति, केवट्ट, अनुसासनीपाटिहारियं…पे॰… दुतियं झानं…पे॰… ततियं झानं…पे॰… चतुत्थं झानं उपसम्पज्ज विहरति। इदम्पि वुच्चति, केवट्ट, अनुसासनीपाटिहारियं…पे॰… ञाणदस्सनाय चित्तं अभिनीहरति अभिनिन्नामेति…पे॰… इदम्पि वुच्चति, केवट्ट, अनुसासनीपाटिहारियं…पे॰… नापरं इत्थत्तायाति पजानाति…पे॰… इदम्पि वुच्चति, केवट्ट, अनुसासनीपाटिहारियं।

‘‘इमानि खो, केवट्ट, तीणि पाटिहारियानि मया सयं अभिञ्ञा सच्छिकत्वा पवेदितानि’’।

भूतनिरोधेसकभिक्खुवत्थु

४८७. ‘‘भूतपुब्बं, केवट्ट, इमस्मिञ्ञेव भिक्खुसङ्घे अञ्ञतरस्स भिक्खुनो एवं चेतसो परिवितक्को उदपादि – ‘कत्थ नु खो इमे चत्तारो महाभूता अपरिसेसा निरुज्झन्ति, सेय्यथिदं – पथवीधातु आपोधातु तेजोधातु वायोधातू’ति?

४८८. ‘‘अथ खो सो, केवट्ट, भिक्खु तथारूपं समाधिं समापज्जि, यथासमाहिते चित्ते देवयानियो मग्गो पातुरहोसि। अथ खो सो, केवट्ट, भिक्खु येन चातुमहाराजिका देवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा चातुमहाराजिके देवे एतदवोच – ‘कत्थ नु खो, आवुसो, इमे चत्तारो महाभूता अपरिसेसा निरुज्झन्ति, सेय्यथिदं – पथवीधातु आपोधातु तेजोधातु वायोधातू’ति?

‘‘एवं वुत्ते, केवट्ट, चातुमहाराजिका देवा तं भिक्खुं एतदवोचुं – ‘मयम्पि खो, भिक्खु, न जानाम, यत्थिमे चत्तारो महाभूता अपरिसेसा निरुज्झन्ति, सेय्यथिदं – पथवीधातु आपोधातु तेजोधातु वायोधातूति (वायोधातु। अत्थि खो (पी॰ एवमुपरिपि))। अत्थि खो (वायोधातु। अत्थि खो (पी॰ एवमुपरिपि)), भिक्खु, चत्तारो महाराजानो अम्हेहि अभिक्कन्ततरा च पणीततरा च। ते खो एतं जानेय्युं, यत्थिमे चत्तारो महाभूता अपरिसेसा निरुज्झन्ति, सेय्यथिदं – पथवीधातु आपोधातु तेजोधातु वायोधातू’ति।

४८९. ‘‘अथ खो सो, केवट्ट, भिक्खु येन चत्तारो महाराजानो तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा चत्तारो महाराजे एतदवोच – ‘कत्थ नु खो, आवुसो, इमे चत्तारो महाभूता अपरिसेसा निरुज्झन्ति, सेय्यथिदं – पथवीधातु आपोधातु तेजोधातु वायोधातू’ति? एवं वुत्ते, केवट्ट, चत्तारो महाराजानो तं भिक्खुं एतदवोचुं – ‘मयम्पि खो, भिक्खु, न जानाम, यत्थिमे चत्तारो महाभूता अपरिसेसा निरुज्झन्ति, सेय्यथिदं – पथवीधातु, आपोधातु तेजोधातु वायोधातूति। अत्थि खो, भिक्खु, तावतिंसा नाम देवा अम्हेहि अभिक्कन्ततरा च पणीततरा च। ते खो एतं जानेय्युं, यत्थिमे चत्तारो महाभूता अपरिसेसा निरुज्झन्ति, सेय्यथिदं – पथवीधातु आपोधातु तेजोधातु वायोधातू’ति।

४९०. ‘‘अथ खो सो, केवट्ट, भिक्खु येन तावतिंसा देवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा तावतिंसे देवे एतदवोच – ‘कत्थ नु खो, आवुसो, इमे चत्तारो महाभूता अपरिसेसा निरुज्झन्ति, सेय्यथिदं – पथवीधातु आपोधातु तेजोधातु वायोधातू’ति? एवं वुत्ते, केवट्ट, तावतिंसा देवा तं भिक्खुं एतदवोचुं – ‘मयम्पि खो, भिक्खु, न जानाम, यत्थिमे चत्तारो महाभूता अपरिसेसा निरुज्झन्ति, सेय्यथिदं – पथवीधातु आपोधातु तेजोधातु वायोधातूति। अत्थि खो, भिक्खु, सक्को नाम देवानमिन्दो अम्हेहि अभिक्कन्ततरो च पणीततरो च। सो खो एतं जानेय्य, यत्थिमे चत्तारो महाभूता अपरिसेसा निरुज्झन्ति, सेय्यथिदं – पथवीधातु आपोधातु तेजोधातु वायोधातू’ति।

४९१. ‘‘अथ खो सो, केवट्ट, भिक्खु येन सक्को देवानमिन्दो तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा सक्कं देवानमिन्दं एतदवोच – ‘कत्थ नु खो, आवुसो, इमे चत्तारो महाभूता अपरिसेसा निरुज्झन्ति, सेय्यथिदं – पथवीधातु आपोधातु तेजोधातु वायोधातू’ति? एवं वुत्ते, केवट्ट, सक्को देवानमिन्दो तं भिक्खुं एतदवोच – ‘अहम्पि खो, भिक्खु, न जानामि, यत्थिमे चत्तारो महाभूता अपरिसेसा निरुज्झन्ति, सेय्यथिदं – पथवीधातु आपोधातु तेजोधातु वायोधातूति। अत्थि खो, भिक्खु, यामा नाम देवा…पे॰… सुयामो नाम देवपुत्तो… तुसिता नाम देवा… सन्तुस्सितो नाम देवपुत्तो… निम्मानरती नाम देवा … सुनिम्मितो नाम देवपुत्तो… परनिम्मितवसवत्ती नाम देवा… वसवत्ती नाम देवपुत्तो अम्हेहि अभिक्कन्ततरो च पणीततरो च। सो खो एतं जानेय्य, यत्थिमे चत्तारो महाभूता अपरिसेसा निरुज्झन्ति, सेय्यथिदं – पथवीधातु आपोधातु तेजोधातु वायोधातू’ति।

४९२. ‘‘अथ खो सो, केवट्ट, भिक्खु येन वसवत्ती देवपुत्तो तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा वसवत्तिं देवपुत्तं एतदवोच – ‘कत्थ नु खो, आवुसो, इमे चत्तारो महाभूता अपरिसेसा निरुज्झन्ति, सेय्यथिदं – पथवीधातु आपोधातु तेजोधातु वायोधातू’ति? एवं वुत्ते, केवट्ट, वसवत्ती देवपुत्तो तं भिक्खुं एतदवोच – ‘अहम्पि खो, भिक्खु, न जानामि यत्थिमे चत्तारो महाभूता अपरिसेसा निरुज्झन्ति, सेय्यथिदं – पथवीधातु आपोधातु तेजोधातु वायोधातूति। अत्थि खो, भिक्खु, ब्रह्मकायिका नाम देवा अम्हेहि अभिक्कन्ततरा च पणीततरा च। ते खो एतं जानेय्युं, यत्थिमे चत्तारो महाभूता अपरिसेसा निरुज्झन्ति, सेय्यथिदं – पथवीधातु आपोधातु तेजोधातु वायोधातू’ति।

४९३. ‘‘अथ खो सो, केवट्ट, भिक्खु तथारूपं समाधिं समापज्जि, यथासमाहिते चित्ते ब्रह्मयानियो मग्गो पातुरहोसि। अथ खो सो, केवट्ट, भिक्खु येन ब्रह्मकायिका देवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा ब्रह्मकायिके देवे एतदवोच – ‘कत्थ नु खो, आवुसो, इमे चत्तारो महाभूता अपरिसेसा निरुज्झन्ति, सेय्यथिदं – पथवीधातु आपोधातु तेजोधातु वायोधातू’ति? एवं वुत्ते, केवट्ट, ब्रह्मकायिका देवा तं भिक्खुं एतदवोचुं – ‘मयम्पि खो, भिक्खु, न जानाम, यत्थिमे चत्तारो महाभूता अपरिसेसा निरुज्झन्ति, सेय्यथिदं – पथवीधातु आपोधातु तेजोधातु वायोधातूति। अत्थि खो, भिक्खु, ब्रह्मा महाब्रह्मा अभिभू अनभिभूतो अञ्ञदत्थुदसो वसवत्ती इस्सरो कत्ता निम्माता सेट्ठो सजिता वसी पिता भूतभब्यानं अम्हेहि अभिक्कन्ततरो च पणीततरो च। सो खो एतं जानेय्य, यत्थिमे चत्तारो महाभूता अपरिसेसा निरुज्झन्ति, सेय्यथिदं – पथवीधातु आपोधातु तेजोधातु वायोधातू’’ति।

‘‘‘कहं पनावुसो, एतरहि सो महाब्रह्मा’ति? ‘मयम्पि खो, भिक्खु, न जानाम, यत्थ वा ब्रह्मा येन वा ब्रह्मा यहिं वा ब्रह्मा; अपि च, भिक्खु, यथा निमित्ता दिस्सन्ति, आलोको सञ्जायति, ओभासो पातुभवति, ब्रह्मा पातुभविस्सति, ब्रह्मुनो हेतं पुब्बनिमित्तं पातुभावाय, यदिदं आलोको सञ्जायति, ओभासो पातुभवती’ति। अथ खो सो, केवट्ट, महाब्रह्मा नचिरस्सेव पातुरहोसि।

४९४. ‘‘अथ खो सो, केवट्ट, भिक्खु येन सो महाब्रह्मा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा तं महाब्रह्मानं एतदवोच – ‘कत्थ नु खो, आवुसो, इमे चत्तारो महाभूता अपरिसेसा निरुज्झन्ति, सेय्यथिदं – पथवीधातु आपोधातु तेजोधातु वायोधातू’’ति? एवं वुत्ते, केवट्ट, सो महाब्रह्मा तं भिक्खुं एतदवोच – ‘अहमस्मि, भिक्खु, ब्रह्मा महाब्रह्मा अभिभू अनभिभूतो अञ्ञदत्थुदसो वसवत्ती इस्सरो कत्ता निम्माता सेट्ठो सजिता वसी पिता भूतभब्यान’न्ति।

‘‘दुतियम्पि खो सो, केवट्ट, भिक्खु तं महाब्रह्मानं एतदवोच – ‘न खोहं तं, आवुसो, एवं पुच्छामि – ‘‘त्वमसि ब्रह्मा महाब्रह्मा अभिभू अनभिभूतो अञ्ञदत्थुदसो वसवत्ती इस्सरो कत्ता निम्माता सेट्ठो सजिता वसी पिता भूतभब्यान’’न्ति। एवञ्च खो अहं तं, आवुसो, पुच्छामि – ‘‘कत्थ नु खो, आवुसो, इमे चत्तारो महाभूता अपरिसेसा निरुज्झन्ति, सेय्यथिदं – पथवीधातु आपोधातु तेजोधातु वायोधातू’’’ति?

‘‘दुतियम्पि खो सो, केवट्ट, महाब्रह्मा तं भिक्खुं एतदवोच – ‘अहमस्मि, भिक्खु, ब्रह्मा महाब्रह्मा अभिभू अनभिभूतो अञ्ञदत्थुदसो वसवत्ती इस्सरो कत्ता निम्माता सेट्ठो सजिता वसी पिता भूतभब्यान’न्ति। ततियम्पि खो सो, केवट्ट, भिक्खु तं महाब्रह्मानं एतदवोच – ‘न खोहं तं, आवुसो, एवं पुच्छामि – ‘‘त्वमसि ब्रह्मा महाब्रह्मा अभिभू अनभिभूतो अञ्ञदत्थुदसो वसवत्ती इस्सरो कत्ता निम्माता सेट्ठो सजिता वसी पिता भूतभब्यान’’न्ति। एवञ्च खो अहं तं, आवुसो, पुच्छामि – ‘‘कत्थ नु खो, आवुसो, इमे चत्तारो महाभूता अपरिसेसा निरुज्झन्ति, सेय्यथिदं – पथवीधातु आपोधातु तेजोधातु वायोधातू’’’ति?

४९५. ‘‘अथ खो सो, केवट्ट, महाब्रह्मा तं भिक्खुं बाहायं गहेत्वा एकमन्तं अपनेत्वा तं भिक्खुं एतदवोच – ‘इमे खो मं, भिक्खु, ब्रह्मकायिका देवा एवं जानन्ति, ‘‘नत्थि किञ्चि ब्रह्मुनो अञ्ञातं, नत्थि किञ्चि ब्रह्मुनो अदिट्ठं, नत्थि किञ्चि ब्रह्मुनो अविदितं, नत्थि किञ्चि ब्रह्मुनो असच्छिकत’’न्ति। तस्माहं तेसं सम्मुखा न ब्याकासिं। अहम्पि खो, भिक्खु, न जानामि यत्थिमे चत्तारो महाभूता अपरिसेसा निरुज्झन्ति, सेय्यथिदं – पथवीधातु आपोधातु तेजोधातु वायोधातूति। तस्मातिह, भिक्खु, तुय्हेवेतं दुक्कटं, तुय्हेवेतं अपरद्धं, यं त्वं तं भगवन्तं अतिधावित्वा बहिद्धा परियेट्ठिं आपज्जसि इमस्स पञ्हस्स वेय्याकरणाय। गच्छ त्वं, भिक्खु, तमेव भगवन्तं उपसङ्कमित्वा इमं पञ्हं पुच्छ, यथा च ते भगवा ब्याकरोति, तथा नं धारेय्यासी’ति।

४९६. ‘‘अथ खो सो, केवट्ट, भिक्खु – सेय्यथापि नाम बलवा पुरिसो समिञ्जितं वा बाहं पसारेय्य, पसारितं वा बाहं समिञ्जेय्य एवमेव ब्रह्मलोके अन्तरहितो मम पुरतो पातुरहोसि। अथ खो सो, केवट्ट, भिक्खु मं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदि, एकमन्तं निसिन्नो खो, केवट्ट, सो भिक्खु मं एतदवोच – ‘कत्थ नु खो, भन्ते, इमे चत्तारो महाभूता अपरिसेसा निरुज्झन्ति, सेय्यथिदं – पथवीधातु आपोधातु तेजोधातु वायोधातू’ति?

तीरदस्सिसकुणुपमा

४९७. ‘‘एवं वुत्ते, अहं, केवट्ट, तं भिक्खुं एतदवोचं – ‘भूतपुब्बं, भिक्खु, सामुद्दिका वाणिजा तीरदस्सिं सकुणं गहेत्वा नावाय समुद्दं अज्झोगाहन्ति। ते अतीरदक्खिनिया नावाय तीरदस्सिं सकुणं मुञ्चन्ति। सो गच्छतेव पुरत्थिमं दिसं, गच्छति दक्खिणं दिसं, गच्छति पच्छिमं दिसं, गच्छति उत्तरं दिसं, गच्छति उद्धं दिसं, गच्छति अनुदिसं। सचे सो समन्ता तीरं पस्सति, तथागतकोव (तथापक्कन्तोव (स्या॰)) होति। सचे पन सो समन्ता तीरं न पस्सति, तमेव नावं पच्चागच्छति। एवमेव खो त्वं, भिक्खु, यतो याव ब्रह्मलोका परियेसमानो इमस्स पञ्हस्स वेय्याकरणं नाज्झगा, अथ ममञ्ञेव सन्तिके पच्चागतो। न खो एसो, भिक्खु, पञ्हो एवं पुच्छितब्बो – ‘कत्थ नु खो, भन्ते, इमे चत्तारो महाभूता अपरिसेसा निरुज्झन्ति, सेय्यथिदं – पथवीधातु आपोधातु तेजोधातु वायोधातू’ति?

४९८. ‘‘एवञ्च खो एसो, भिक्खु, पञ्हो पुच्छितब्बो –

‘कत्थ आपो च पथवी, तेजो वायो न गाधति।

कत्थ दीघञ्च रस्सञ्च, अणुं थूलं सुभासुभं।

कत्थ नामञ्च रूपञ्च, असेसं उपरुज्झती’ति॥

४९९. ‘‘तत्र वेय्याकरणं भवति –

‘विञ्ञाणं अनिदस्सनं, अनन्तं सब्बतोपभं।

एत्थ आपो च पथवी, तेजो वायो न गाधति॥

एत्थ दीघञ्च रस्सञ्च, अणुं थूलं सुभासुभं।

एत्थ नामञ्च रूपञ्च, असेसं उपरुज्झति।

विञ्ञाणस्स निरोधेन, एत्थेतं उपरुज्झती’ति॥

५००. इदमवोच भगवा। अत्तमनो केवट्टो गहपतिपुत्तो भगवतो भासितं अभिनन्दीति।

केवट्टसुत्तं निट्ठितं एकादसमं।

सार

✔️ केवट्ट गृहस्थ का प्रस्ताव
नालंदा के एक गृहस्थ केवट्ट ने भगवान बुद्ध से अनुरोध किया कि भिक्षु चमत्कार दिखाएं ताकि जनता में भगवान और धम्म के प्रति श्रद्धा बढ़े।

✔️ चमत्कारों पर बुद्ध का दृष्टिकोण
भगवान ने तीन प्रकार के चमत्कारों का उल्लेख किया, लेकिन उनके प्रदर्शन से जुड़ी ख़ामियों को लेकर लज्जा और संकोच व्यक्त किया।

  1. ऋद्धि-चमत्कार – भौतिक क्षमताएँ जैसे जल पर चलना, आकाश में उड़ना, और ब्रह्मलोक तक पहुँचना।
  2. खुलासा-चमत्कार – दूसरों के विचारों और चित्त का खुलासा करना।
  3. निर्देश-चमत्कार – व्यवहार और ध्यान के सटीक निर्देश देना।
    बुद्ध ने विशेष रूप से बताया कि भौतिक चमत्कार और चित्त का खुलासा करने वाले चमत्कार लोगों को भ्रम में डाल सकते हैं और उनकी धम्म के प्रति सच्ची समझ में बाधा बन सकते हैं।

✔️ निर्देश-चमत्कार की श्रेष्ठता
बुद्ध ने निर्देश-चमत्कार को प्राथमिकता दी, जिसमें लोगों को सिखाया जाता है कि क्या विचार करें, क्या त्यागें और किस पर ध्यान केंद्रित करें। यह चमत्कार धम्म के सच्चे उद्देश्य की ओर मार्गदर्शन करता है।

✔️ ऋद्धिमान भिक्षु की कहानी
भगवान ने एक ऋद्धिमान भिक्षु की कहानी सुनाई, जिसने अलौकिक क्षमताओं से देवताओं तक यात्रा की, लेकिन उसे महाब्रह्मा तक पहुँचने पर भी सृष्टि के रहस्य का उत्तर नहीं मिला। यह कहानी चमत्कारों की सीमाओं और सच्चे ज्ञान की आवश्यकता को दर्शाती है।

✔️ धर्म का सार और विज्ञान
भगवान ने इस सूत्र में ज्ञान के गहरे विज्ञान को प्रस्तुत किया, जो चमत्कारों से परे जाकर धम्म और ब्रह्मचर्य के सच्चे अभ्यास पर आधारित है। उन्होंने सिखाया कि धम्म का उद्देश्य आंतरिक विकास और मुक्ति प्राप्त करना है।

✔️ समाज और धम्म पर प्रभाव
इस सूत्र का मुख्य संदेश यह है कि धम्म के प्रति लोगों की श्रद्धा भौतिक चमत्कारों पर नहीं, बल्कि सत्य, शील, और मानसिक शांति पर आधारित होनी चाहिए। यह दृष्टिकोण समाज में धम्म की सही समझ और स्थिरता को बढ़ावा देता है।