
आटानाटिय रक्षा
सूत्र परिचय
धार्मिक साधना केवल आंतरिक संघर्ष नहीं, बल्कि एक अदृश्य टकराव भी है। इतिहास गवाह है कि जब कोई सत्य की गहराइयों में उतरता है, तो कुछ शक्तियाँ उसके विरुद्ध सक्रिय हो जाती हैं। कई गंभीर साधक खुलकर नहीं कहते, लेकिन वे जानते हैं—अचानक उठने वाला भय, असहनीय कामुकता, तीव्र क्रोध, ध्यान में बाधा, या अप्रत्याशित रोग हमेशा नैसर्गिक रूप से उत्पन्न नहीं होते, बल्कि बाहरी हस्तक्षेप का परिणाम भी हो सकते हैं। यह सत्य केवल बौद्ध धम्म तक सीमित नहीं, बल्कि हर धार्मिक परंपरा में आत्मरक्षा के लिए विशेष रक्षामंत्र या प्रार्थनाएँ रही हैं। बौद्ध संघ में, यह भूमिका आटानाटिय सुत्त निभाता है।
यह रक्षासूत्र, जिसे परित्त भी कहा जाता है, यक्षों के महाराज कुबेर ने भगवान बुद्ध को सुनाया। उन्होंने आग्रह किया कि बुद्ध इसे अपने सभी श्रावकों को धारण करने के लिए कहें, क्योंकि इस लोक में ऐसी अनेक शक्तियाँ हैं जो धम्म और नैतिकता से घृणा करती हैं और साधकों को बाधित कर सकती हैं। इस सूत्र को उन्हीं अदृश्य सत्वों को प्रसन्न करने या, कहें, उन्हें अनुशासित करने के लिए स्वयं देवताओं ने रचा था। लेकिन कुछ असभ्य सत्व ऐसे भी होते हैं, जो इस रक्षासूत्र से भी नियंत्रित नहीं होते। ऐसे में, महायक्षों को ज़ोर से पुकारना पड़ता है, जो प्रहरी या पुलिस की भाँति आकर रक्षा कर सकें।
हिन्दी
प्रथम पठन
ऐसा मैंने सुना — एक समय भगवान राजगृह के गृद्धकूट पर्वत पर विहार कर रहे थे। तब चारों देव महाराज यक्षों की विराट सेना लेकर, गंधब्बों की विराट सेना लेकर, कुंभण्डों की विराट सेना लेकर, और नागों की विराट सेना लेकर, चारों दिशाओं में रक्षकों को तैनात कर, चारों दिशाओं में टुकड़ियों को तैनात कर, चारों दिशाओं को घेरकर, अत्याधिक कान्ति से संपूर्ण गृद्धकूट पर्वत को रौशन करते हुए भगवान के पास गए, और अभिवादन कर भगवान की एक-ओर बैठ गए।
(उनके पीछे) कुछ यक्षों ने भगवान को अभिवादन किया, और एक-ओर बैठ गए। कुछ ने भगवान से नम्रतापूर्ण वार्तालाप किया, और एक-ओर बैठ गए। कुछ ने हाथ जोड़कर अंजलिबद्ध वंदन किया, और एक-ओर बैठ गए। किसी ने भगवान को अपना नाम-गोत्र बताया, और एक-ओर बैठ गए। और कोई चुपचाप ही एक-ओर बैठ गए।
एक ओर बैठकर (यक्षों के) महाराज वेस्सवण (=वैष्णव, कुबेर) ने भगवान से कहा:
“भन्ते, ऐसे कई बड़े (=ऊँचे-स्तर के, शक्तिशाली) यक्ष हैं, जिन्हें भगवान पर आस्था नहीं हैं। किन्तु, ऐसे कई बड़े यक्ष हैं, जिन्हें भगवान पर आस्था हैं। ऐसे कई मध्यम (स्तर के) यक्ष हैं, जिन्हें भगवान पर आस्था नहीं हैं। किन्तु, ऐसे कई मध्यम यक्ष हैं, जिन्हें भगवान पर आस्था हैं। और, ऐसे कई नीच (=निम्न स्तर के) यक्ष हैं, जिन्हें भगवान पर आस्था नहीं हैं। किन्तु, ऐसे कई नीच यक्ष हैं, जिन्हें भगवान पर आस्था हैं। भन्ते, ज़्यादातर यक्षों को भगवान पर आस्था नहीं हैं। ऐसा क्यों?
क्योंकि, भन्ते, भगवान जीवहत्या से विरत होने का धम्म बताते हैं, चोरी से विरत होने का धम्म बताते हैं, व्यभिचार से विरत होने का धम्म बताते हैं, झूठ बोलने से विरत होने का धम्म बताते हैं, शराब, मद्य आदि मदहोश करने वाले नशेपते से विरत होने का धम्म बताते हैं। किन्तु, भन्ते, ज़्यादातर यक्ष जीवहत्या से विरत नहीं होते, चोरी से विरत नहीं होते, व्यभिचार से विरत नहीं होते, झूठ बोलने से विरत नहीं होते, शराब, मद्य आदि मदहोश करने वाले नशेपते से विरत नहीं होते हैं। तब उनके लिए ऐसा (सुनना) अप्रिय और नापसंद होता हैं।
भन्ते, भगवान के श्रावक भीड़ से दूर, मानव-बस्ती से दूर, शोर-शराबे से दूर, जंगल या निर्जन वन में शान्त एकान्तवास लेते हैं। वहाँ ऐसे बड़े यक्ष वास करते हैं, जिन्हें भगवान के प्रवचन पर आस्था नहीं हैं। तो, भन्ते, भगवान उन भिक्षु, भिक्षुणियों, उपासक, उपासिकाओं की रक्षा के लिए, बचाव के लिए, सुरक्षा के लिए, राहत से विहार करने के लिए “आटानाटिय रक्षामंत्र” 1 से उन्हें विश्वास प्रदान करे।”
भगवान ने मौन रहकर स्वीकृति दी।
तब, भगवान की स्वीकृति जान कर, वेस्सवण महाराज ने आटानाटिय रक्षामंत्र का पठन किया:
चक्षुमान श्रीमान को।
सिखी को नमन है,
सब जीवों के प्रति दयालु को।
वेस्सभू को नमन है,
नहाए हुए तपस्वी को।
ककुसन्ध को नमन है,
मार-सेना कुचलने वाले को।
कोणागमन को नमन है,
ब्राह्मण जीवन वाले को।
कस्सप को नमन है,
सभी तरह से विमुक्त को।
अंगीरस को नमन है,
शाक्यपुत्र श्रीमान को।
जिसने ऐसा धम्म दिया,
जो खत्म करे सब दुखों को।
जो निवृत हुए इस लोक में,
यथास्वरूप देखने वाले को।
जो जनता को न धोखा दे,
ऐसे महान निर्भय को।
हितकारक देव-मानवों के,
नमन करे ऐसे गोतम को।
सम्पन्न विद्या-आचरण में,
ऐसे महान निर्भय को।
उगता जहाँ से सूरज है,
आदित्य, महामण्डल वाला।
जिसके उगने मात्र से,
मिट जाती काली रात है।
उस सूरज के उगने से,
‘दिवस हुआ’ कहा जाता हैं।
वहाँ एक गहरी झील है,
समुद्र में धाराएँ बहती है,
उसे इसी तरह जानते हैं,
‘जिस समुद्र में धाराएँ बहती’ है।
यही से है ‘पूर्व दिशा’,
ऐसा ही लोग कहते हैं।
उस दिशा का पालन करते,
जो महाराजा यशस्वी है।
स्वामी है गंधब्बों के,
‘धतरट्ठ’ है नाम के।
रमते है नृत्य गीतों में,
अगुआ हो गंधब्बों में।
पुत्र हैं उनके बहुत से,
सुना है, नाम सभी के एक ही।
अस्सी, दस और एक (=९१)
सभी ‘इन्द्र’ नाम के बाहुबली।
देखते हैं वे बुद्ध को,
बुद्ध सौर्यवंशज जो।
नमन करे वे दूर से,
ऐसे महान निर्भय को।
नमन है कुलीन पुरुष को,
नमन है पुरुषोत्तम को!
कुशल समीक्षा करते जो,
अमनुष्य करे वंदन उनको।
ऐसा अक्सर सुनायी दे,
‘क्या तुमने वंदन किया?
अजेय गोतम को वंदन करो!
अजेय गोतम को वंदन किया!
विद्या-आचरण में सम्पन्न जो,
वंदन है उस बुद्ध गोतम को।’
कहते हैं, प्रेत जहाँ जाते,
चुगली करे, धोखा देते जो,
जीवहत्या, शिकार करे,
चोरी या लूटे जनता को।
यही से है ‘दक्षिण दिशा’,
ऐसा ही लोग कहते हैं। 3
उस दिशा का पालन करते,
जो महाराजा यशस्वी है।
स्वामी है कुंभण्डों के,
‘विरूळ्ह’ है नाम के।
रमते है नृत्य गीतों में,
अगुआ हो कुंभण्डों में।
पुत्र हैं उनके बहुत से,
सुना है, नाम सभी के एक ही।
अस्सी, दस और एक,
सभी ‘इन्द्र’ नाम के बाहुबली।
देखते हैं वे बुद्ध को,
बुद्ध सौर्यवंशज जो।
नमन करे वे दूर से,
ऐसे महान निर्भय को।
नमन है कुलीन पुरुष को,
नमन है पुरुषोत्तम को!
कुशल समीक्षा करते जो,
अमनुष्य करे वंदन उनको।
ऐसा अक्सर सुनायी दे,
‘क्या तुमने वंदन किया?
अजेय गोतम को वंदन करो!
अजेय गोतम को वंदन किया!
विद्या-आचरण में सम्पन्न जो,
वंदन है उस बुद्ध गोतम को।’
डूबता जहाँ से सूरज है,
आदित्य, महामण्डल वाला।
जिसके डूबने मात्र से,
बीत जाता दिवस है।
उस सूरज के डूबने से,
‘दिन बीता’ कहा जाता हैं।
वहाँ एक गहरी झील है,
समुद्र में धाराएँ बहती है,
उसे इसी तरह जानते हैं,
‘जिस समुद्र में धाराएँ बहती’ है।
यही से है ‘पश्चिम दिशा’,
ऐसा ही लोग कहते हैं।
उस दिशा का पालन करते,
जो महाराजा यशस्वी है।
स्वामी है वे नागों के,
‘विरूपक्ख’ है नाम के।
रमते है नृत्य गीतों में,
अगुआ होकर नागों में।
पुत्र हैं उनके बहुत से,
सुना है, नाम सभी के एक ही।
अस्सी, दस और एक,
सभी ‘इन्द्र’ नाम के बाहुबली।
देखते हैं वे बुद्ध को,
बुद्ध सौर्यवंशज जो।
नमन करे वे दूर से,
ऐसे महान निर्भय को।
नमन है कुलीन पुरुष को,
नमन है पुरुषोत्तम को!
कुशल समीक्षा करते जो,
अमनुष्य करे वंदन उनको।
ऐसा अक्सर सुनायी दे,
‘क्या तुमने वंदन किया?
अजेय गोतम को वंदन करो!
अजेय गोतम को वंदन किया!
विद्या-आचरण में सम्पन्न जो,
वंदन है उस बुद्ध गोतम को।’
और जहाँ है उत्तरकुरु, 4
सुदर्शनीय महामेरु (पर्वत) है।
वहाँ मानव जो जन्म ले,
निस्वार्थी हो, बिना-संपत्ति के। 5
नहीं वहाँ वे बीज बोते,
न ही हल चलाते हैं।
बिन-जोते जो चावल उगते,
उसी को मानव खाते हैं। 6
शुद्ध, बिना कण-भूसी के,
सुगंधित दाने चावल के।
पका लेने पर तंदूर में,
वही भोजन वो खाते हैं।
गाय को बिना खुर बांधे,
ले जाते सभी दिशाओं में।
पशुओं को बिना खुर बाँधें,
ले जाते सभी दिशाओं में।
स्त्री खींचते रिक्शे को,
ले जाते सभी दिशाओं में।
पुरुष खींचते रिक्शे को,
ले जाते सभी दिशाओं में।
लड़की खींचते रिक्शे को,
ले जाते सभी दिशाओं में।
लड़का खींचते रिक्शे को,
ले जाते सभी दिशाओं में।
अपनी सवारी पर चढ़ कर,
टहलते सभी दिशाओं में।
सेवक हो जो राजा के।
हाथी-रथ और अश्व-रथ,
सेवित हो दिव्य-रथ से।
पालकी हो और महल भी,
महाराज यशस्वी के लिए।
कई नगर उनके पास हैं,
जो बने हैं अन्तरिक्ष में,
आटानाटा कुसिनाटा परकुसिनाटा,
नाटसुरिया परकुसिटनाटा।
उत्तर में है कपीवन्त,
जनोघ उसके आगे है।
नवनवुतिय, अम्बरअम्बरवतिय भी,
आळकमन्दा नामक राजधानी है।
महाशय, कुवेर महाराज है,
‘विसाणा’ नामक राजधानी है।
कुवेर महाराज को इसलिए,
‘वेस्सवण’ भी कहते हैं।
उन्हें हर कोई सूचित करे,
ततोला, तत्तला, ततोतला
ओजसि, तेजसि, ततोजसी,
सूर, राजा, अरिट्ठो, नेमि।
वहाँ धरणी नामक झील है,
जब वर्षा मेघ कराते हैं,
वर्षा भेजी जाती यही से,
वहाँ है सालवती नामक सभा भी।
जहाँ भी यक्ष टहलते हो,
वही वृक्षों को फल लगते।
पक्षी झुंड नाना प्रकार के,
वहाँ मोर और बगले चीखते,
कोयल की मधुर कुंजन हो।
एक “जीयों जीयों!” का चीख करें,
दूसरा चित्त को है उठाता।
मुर्गी और कुळीरक भी,
और वन में कठफोडवा।
तोते और मैना बोले,
दंड-माणवक पक्षी भी।
सदा सर्वकाल शोभित रहती,
कुवेर की सुंदर झील भी।
यही से है ‘उत्तर दिशा’,
ऐसा ही लोग कहते हैं।
उस दिशा का पालन करते,
जो महाराजा यशस्वी है।
स्वामी हैं वे यक्षों के,
‘कुवेर’ हैं नाम के।
रमते हैं नृत्य गीतों में,
अगुआ होकर यक्षों में।
पुत्र हैं उनके बहुत से,
सुना है, नाम सभी के एक ही।
अस्सी, दस और एक,
सभी ‘इन्द्र’ नाम के बाहुबली।
देखते हैं वे बुद्ध को,
बुद्ध सौर्यवंशज जो।
नमन करे वे दूर से,
ऐसे महान निर्भय को।
नमन है कुलीन पुरुष को,
नमन है पुरुषोत्तम को!
कुशल समीक्षा करते जो,
अमनुष्य करे वंदन उनको।
ऐसा अक्सर सुनायी दे,
‘क्या तुमने वंदन किया?
अजेय गोतम को वंदन करो!
अजेय गोतम को वंदन किया!
विद्या-आचरण में सम्पन्न जो,
वंदन है उस बुद्ध गोतम को।’”
“यही “आटानाटिय रक्षामंत्र” है, महाशय, भिक्षु, भिक्षुणियों, उपासक, उपासिकाओं की रक्षा के लिए, बचाव के लिए, सुरक्षा के लिए, राहत से विहार करने के लिए। इसी आटानाटिय रक्षामंत्र को भिक्षु, भिक्षुणियों, उपासक, उपासिकाओं ने अच्छे से ग्रहण करना चाहिए और पूरी तरह याद करना चाहिए।
कोई भी अमनुष्य, चाहे वह यक्ष, यक्षिणी, यक्ष पुत्र, यक्ष पुत्री, यक्ष महामंत्री, यक्ष सभासद, या यक्ष सेवक हो; अथवा गंधब्ब, गंधब्बी, गंधब्ब पुत्र, गंधब्ब पुत्री, गंधब्ब महामंत्री, गंधब्ब सभासद, या गंधब्ब सेवक हो; अथवा कुंभण्ड, कुंभण्डी, कुंभण्ड पुत्र, कुंभण्ड पुत्री, कुंभण्ड महामंत्री, कुंभण्ड सभासद, या कुंभण्ड सेवक हो; अथवा नाग, नागिन, नाग पुत्र, नाग पुत्री, नाग महामंत्री, नाग सभासद, या नाग सेवक हो—यदि वह दूषित चित्त से किसी भिक्षु, भिक्षुणी, उपासक, या उपासिका के चलते हुए, खड़े रहते, बैठते, या लेटे हुए, उनके पास आएगा, तो वह अमनुष्य गाँव या निगम में आदर-सत्कार नहीं पाएगा। न ही वह अमनुष्य मेरी आळकमन्दा राजधानी में आधार या निवास पाएगा। न ही वह अमनुष्य यक्षों की बैठक में जा पाएगा। ऊपर से, महाशय, बाकी अमनुष्य उसके साथ आवाह-विवाह नहीं करेंगे। ऊपर से, बाकी अमनुष्य उसे निजी तौर पर अच्छे से गाली-गलौच करेंगे। ऊपर से, बाकी अमनुष्य उसके सिर को खाली बर्तन से ढ़क देंगे। और ऊपर से, बाकी अमनुष्य उसके सिर को सात टुकड़ों में फाड़ देंगे।
ऐसे अमनुष्य हैं, महाशय, जो चण्ड, क्रूर, और हिंसक स्वभाव के हैं । वे न तो महाराजाओं की आज्ञा मानते हैं, न महाराजाओं के अधिकारियों की आज्ञा मानते हैं, और न महाराजाओं के अधिकारियों के अधिकारियों की बात ही मानते हैं। महाशय, उन अमनुष्यों को महाराजाओं के बागी कहा जाता हैं। जैसे मगध के राज्य में डाकू होते हैं, जो न मगधराज की आज्ञा मानते हैं, न मगधराज के अधिकारियों की आज्ञा मानते हैं, और न मगधराज के अधिकारियों के अधिकारियों की बात ही मानते हैं। उन डाकुओं को मगधराज के बागी कहा जाता हैं। ठीक उसी तरह, महाशय, ऐसे अमनुष्य हैं, जो चण्ड, क्रूर, और हिंसक स्वभाव के हैं… (जिन्हें) बागी कहा जाता हैं।
यदि कोई भी अमनुष्य, चाहे वह यक्ष, यक्षिणी… गंधब्ब, गंधब्बी… कुंभण्ड, कुंभण्डी… या नाग, नागिन हो—दूषित चित्त से किसी भिक्षु, भिक्षुणी, उपासक, या उपासिका के चलते हुए, खड़े रहते, बैठते, या लेटे हुए, उनके पास आए, तो पुकार कर, चीख कर, चिल्ला कर यक्षों, महायक्षों, सेनापतियों और महासेनापतियों को बुलाएँ, “ये यक्ष मुझे पकड़ता है… ये यक्ष मेरे भीतर प्रवेश करता है… ये यक्ष मुझे सताता है… ये यक्ष मुझे परेशान करता है… ये यक्ष मेरे पर हिंसा करता है… ये यक्ष मुझे आघात करता है… ये यक्ष मुझे छोड़ता नहीं है!”
कौन से यक्षों, महायक्षों, सेनापतियों और महासेनापतियों को बुलाएँ?
भारद्वाज प्रजापति।
चन्दन और कामसेट्ठ,
किन्नुघण्डु और निघण्डु भी।
पनाद और ओपमञ्ञ,
देव-सारथी मातलि।
चित्तसेन गन्धब्ब,
नळ राजा और जनेसभ।
सातागिर और हेमवत,
पुण्णक, करतिय और गुळ।
सिवक और मुचलिन्द,
वेस्सामित्त और युगन्धर।
गोपाल और सुप्परोध,
हिरि, नेत्ति और मन्दिय।
पञ्चालचण्ड और आळवक,
पज्जुन्न, सुमन और सुमुख।
दधिमुख, मणि, माणिवर, दीघ,
सेरीसक के साथ।’
इन यक्षों, महायक्षों, सेनापतियों और महासेनापतियों को पुकार कर, चीख कर, चिल्ला कर बुलाएँ, “ये यक्ष मुझे पकड़ता है… ये यक्ष मेरे भीतर प्रवेश करता है… ये यक्ष मुझे सताता है… ये यक्ष मुझे परेशान करता है… ये यक्ष मेरे पर हिंसा करता है… ये यक्ष मुझे आघात करता है… ये यक्ष मुझे छोड़ता नहीं है!”
महाशय, यही आटानाटिय रक्षामंत्र भिक्षु, भिक्षुणियों, उपासक, उपासिकाओं की रक्षा के लिए, बचाव के लिए, सुरक्षा के लिए, राहत से विहार करने के लिए है।
तब ठीक है, महाशय! तब आपकी अनुमति चाहता हूँ। बहुत कर्तव्य हैं हमारे। बहुत जिम्मेदारियाँ हैं।”
“तब, महाराजाओं, जिसका उचित समय समझें!”
तब चारों महाराज देवता आसन से उठ, भगवान को अभिवादन कर प्रदक्षिणा करते हुए विलुप्त हुए। उनके पीछे कुछ यक्षों ने भगवान को अभिवादन किया, और प्रदक्षिणा करते हुए विलुप्त हुए। कुछ ने भगवान से नम्रतापूर्ण वार्तालाप कर विलुप्त हुए। कुछ ने भगवान को हाथ जोड़कर अंजलिबद्ध वंदन कर विलुप्त हुए। किसी ने भगवान को अपना नाम-गोत्र बताकर विलुप्त हुए। और कोई चुपचाप ही विलुप्त हुए।
द्वितीय पठन
तब भगवान ने रात बीतने पर भिक्षुओं को आमंत्रित किया, (और सब कुछ ज्यों-का-त्यों सुना दिया), “भिक्षुओं, रात में चारों देव महाराज यक्षों की विराट सेना लेकर, गंधब्बों की विराट सेना लेकर… मेरे पास आए, और अभिवादन कर एक-ओर बैठ गए। कुछ यक्षों ने मुझे अभिवादन किया… तो कोई चुपचाप ही एक-ओर बैठ गए।
एक ओर बैठकर महाराज वेस्सवण ने मुझे कहा, “भन्ते, ऐसे कई बड़े यक्ष हैं, जिन्हें भगवान पर आस्था नहीं हैं। किन्तु, ऐसे कई बड़े यक्ष हैं, जिन्हें भगवान पर आस्था हैं…”
…
तब मैंने मौन रहकर स्वीकृति दी।
तब, मेरी स्वीकृति जान कर, वेस्सवण महाराज ने आटानाटिय रक्षामंत्र का पठन किया:
चक्षुमान श्रीमान को...
…
कौन से यक्षों, महायक्षों, सेनापतियों और महासेनापतियों को बुलाएँ?
भारद्वाज प्रजापति...
महाशय, यही आटानाटिय रक्षामंत्र भिक्षु, भिक्षुणियों, उपासक, उपासिकाओं की रक्षा के लिए, बचाव के लिए, सुरक्षा के लिए, राहत से विहार करने के लिए है।
तब ठीक है, महाशय! तब आपकी अनुमति चाहता हूँ। बहुत कर्तव्य हैं हमारे। बहुत जिम्मेदारियाँ हैं।”
“तब, महाराजाओं, जिसका उचित समय समझें!”
तब चारों महाराज देवता आसन से उठ, मुझे अभिवादन कर प्रदक्षिणा करते हुए विलुप्त हुए… और कोई चुपचाप ही विलुप्त हुए।
भिक्षुओं, आटानाटिय रक्षामंत्र को अच्छे से ग्रहण करो। आटानाटिय रक्षामंत्र को अच्छे से याद करो। आटानाटिय रक्षामंत्र को अच्छे से धारण करो। यह आटानाटिय रक्षामंत्र भिक्षु, भिक्षुणियों, उपासक, उपासिकाओं की रक्षा के लिए, बचाव के लिए, सुरक्षा के लिए, राहत से विहार करने के लिए है।”
भगवान ने ऐसा कहा। हर्षित होकर भिक्षुओं ने भगवान की बात का अभिनंदन किया।
सुत्त समाप्त।
“रक्षामंत्र” शब्द परित्त का ही समानार्थी है। ↩︎
यहाँ शुरुआत सात सम्यक-सम्बुद्धों की वंदना से होती है। मुझे लगता है कि इसके पीछे एक कारण है। आज भी इस अनंत ब्रह्मांड में, सर्वोच्च शुद्धावास ब्रह्मलोक तक जितने भी आर्य देव-सत्व निवास करते हैं, वे सभी भगवान विपस्सी से लेकर वर्तमान भगवान गोतम तक, इन्हीं सात बुद्धों में से किसी न किसी के शिष्य हैं। सातों सम्यक-सम्बुद्धों को एक साथ नमन करने का सीधा अर्थ यह है कि इस विस्तृत लोक का कोई भी देव या मनुष्य शिष्य अपने शास्ता को लेकर उपेक्षित महसूस न करे। यह केवल एक वंदना नहीं, बल्कि संपूर्ण आर्य-संघ को बिना किसी भेदभाव के एक सूत्र में पिरोने का तरीका है।
भगवान विपस्सी और अतीत के अन्य सम्यक-सम्बुद्धों के बारे में विस्तार से जानने के लिए महापदान सुत्त पढ़ें। इसी सुत्त में यह अद्भुत प्रसंग आता है जहाँ स्वयं भगवान गोतम बुद्ध शुद्धावास ब्रह्मलोक की यात्रा करते हैं और अतीत के उन छह बुद्धों के अनगिनत देव-शिष्यों से साक्षात भेंट करते हैं। ↩︎
यहाँ दक्षिण दिशा के वर्णन पर गौर करें। इसे प्रेत इत्यादि से जोड़ कर असभ्य और अमंगलकारी जैसा वर्णन किया गया। यह महज़ एक संयोग नहीं है; बल्कि यह उस समय के उत्तर भारतीयों की उसी संकीर्ण सोच को उजागर करता है जिसके अनुसार दक्षिण भारत को आर्यावर्त जैसे ‘सभ्य’ समाज का हिस्सा ही नहीं माना जाता था। भारतीय समाज में भी सभी बुरी बातें, जैसे शूद्रों और अस्पृष्यों के घरों से लेकर तो किसी को मृत्युदंड देना हो तो दक्षिण दिशा में ही दिया जाता था। ↩︎
इसके ठीक विपरीत, यहाँ उत्तर दिशा का वर्णन सबसे विस्तृत और भव्य है। इस सूत्र में वर्णित ‘उत्तरकुरु’ का उल्लेख न केवल संस्कृत भाषा में भी, बल्कि यूनानी साहित्य में भी मिलता है। इसे कभी एक वास्तविक भौगोलिक क्षेत्र के रूप में पेश किया गया, तो कभी एक जादुई और स्वर्ग समान काल्पनिक लोक के रूप में। आज तक इतिहासकार हिमालय या उसके पार के किसी सटीक स्थान पर इसकी पहचान नहीं कर पाए हैं।
यह दरअसल तत्कालीन समाज की उसी सांस्कृतिक ग्रंथि का दूसरा पहलू है। जिस तरह दक्षिण दिशा को असभ्य और अमंगलकारी मानकर नकारा गया, ठीक उसी तरह उत्तर दिशा को हमेशा एक रहस्यमयी, पवित्र और आदर्श देवलोक की तरह महिमामंडित किया गया। ‘आर्यावर्त’ के निवासियों के लिए उत्तर दिशा (हिमालय की ओर) हमेशा से शुभ और श्रेष्ठता का शिखर रही है। इसीलिए अपने भौगोलिक और सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों के चलते उन्होंने उत्तर के वर्णन में इतने सारे मिथक, अतिशयोक्तियाँ और भव्यता गढ़ दी। ↩︎
अंगुत्तरनिकाय ९.२१ (तिठानसुत्त) में भगवान बुद्ध स्पष्ट करते हैं कि ‘उत्तरकुरु’ में जन्म लेने वाले मनुष्य न केवल हमारे इस जम्बूद्वीप के मनुष्यों से, बल्कि तावतिंस (तैंतीस) देवलोक के देवताओं से भी तीन विशेष बातों में श्रेष्ठ हैं:
- १. अममा, अपरिग्गहा: वे पूरी तरह निस्वार्थी और परिग्रह-रहित (बिना बटोरू प्रवृत्ति के) होते हैं। अर्थात्, वहाँ निजी संपत्ति या ‘मेरा-तेरा’ जैसी कोई अवधारणा ही नहीं है।
- २. नियतायुका: उनकी आयु निश्चित होती है (उन्हें अकाल मृत्यु का भय नहीं होता)।
- ३. विसेसगुणा: वे विशेष और श्रेष्ठ गुणों से युक्त होते हैं।
‘उत्तरकुरु’ में जन्म लेने वाले मनुष्यों के लिए सृष्टि स्वयं ‘बिना जोते चावल’ की व्यवस्था करती है—ठीक वही सहज भोजन, जिसे यहाँ जम्बूद्वीप के हम मनुष्यों ने अपने लालच और जमाखोरी के कारण सदियों पहले ही गँवा दिया था (जैसा कि अग्गञ्ञ सुत्त में वर्णित है)। ↩︎
पालि
पठमभाणवारो
२७५. एवं मे सुतं – एकं समयं भगवा राजगहे विहरति गिज्झकूटे पब्बते। अथ खो चत्तारो महाराजा (महाराजानो (क॰)) महतिया च यक्खसेनाय महतिया च गन्धब्बसेनाय महतिया च कुम्भण्डसेनाय महतिया च नागसेनाय चतुद्दिसं रक्खं ठपेत्वा चतुद्दिसं गुम्बं ठपेत्वा चतुद्दिसं ओवरणं ठपेत्वा अभिक्कन्ताय रत्तिया अभिक्कन्तवण्णा केवलकप्पं गिज्झकूटं पब्बतं ओभासेत्वा (गिज्झकूटं ओभासेत्वा (सी॰ स्या॰ पी॰)) येन भगवा तेनुपसङ्कमिंसु; उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदिंसु। तेपि खो यक्खा अप्पेकच्चे भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदिंसु, अप्पेकच्चे भगवता सद्धिं सम्मोदिंसु, सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा एकमन्तं निसीदिंसु, अप्पेकच्चे येन भगवा तेनञ्जलिं पणामेत्वा एकमन्तं निसीदिंसु, अप्पेकच्चे नामगोत्तं सावेत्वा एकमन्तं निसीदिंसु, अप्पेकच्चे तुण्हीभूता एकमन्तं निसीदिंसु।
२७६. एकमन्तं निसिन्नो खो वेस्सवणो महाराजा भगवन्तं एतदवोच – ‘‘सन्ति हि, भन्ते, उळारा यक्खा भगवतो अप्पसन्ना। सन्ति हि, भन्ते, उळारा यक्खा भगवतो पसन्ना। सन्ति हि, भन्ते, मज्झिमा यक्खा भगवतो अप्पसन्ना। सन्ति हि, भन्ते, मज्झिमा यक्खा भगवतो पसन्ना। सन्ति हि, भन्ते, नीचा यक्खा भगवतो अप्पसन्ना। सन्ति हि, भन्ते, नीचा यक्खा भगवतो पसन्ना। येभुय्येन खो पन, भन्ते, यक्खा अप्पसन्नायेव भगवतो। तं किस्स हेतु? भगवा हि, भन्ते, पाणातिपाता वेरमणिया धम्मं देसेति, अदिन्नादाना वेरमणिया धम्मं देसेति, कामेसुमिच्छाचारा वेरमणिया धम्मं देसेति, मुसावादा वेरमणिया धम्मं देसेति, सुरामेरयमज्जप्पमादट्ठाना वेरमणिया धम्मं देसेति। येभुय्येन खो पन, भन्ते, यक्खा अप्पटिविरतायेव पाणातिपाता, अप्पटिविरता अदिन्नादाना, अप्पटिविरता कामेसुमिच्छाचारा, अप्पटिविरता मुसावादा, अप्पटिविरता सुरामेरयमज्जप्पमादट्ठाना। तेसं तं होति अप्पियं अमनापं। सन्ति हि, भन्ते, भगवतो सावका अरञ्ञवनपत्थानि पन्तानि सेनासनानि पटिसेवन्ति अप्पसद्दानि अप्पनिग्घोसानि विजनवातानि मनुस्सराहस्सेय्यकानि (मनुस्सराहसेय्यकानि (सी॰ स्या॰ पी॰)) पटिसल्लानसारुप्पानि। तत्थ सन्ति उळारा यक्खा निवासिनो, ये इमस्मिं भगवतो पावचने अप्पसन्ना। तेसं पसादाय उग्गण्हातु, भन्ते, भगवा आटानाटियं रक्खं भिक्खूनं भिक्खुनीनं उपासकानं उपासिकानं गुत्तिया रक्खाय अविहिंसाय फासुविहाराया’’ति। अधिवासेसि भगवा तुण्हीभावेन।
अथ खो वेस्सवणो महाराजा भगवतो अधिवासनं विदित्वा तायं वेलायं इमं आटानाटियं रक्खं अभासि –
२७७. ‘‘विपस्सिस्स च (इमे चकारा पोराणपोत्थकेसु नत्थि) नमत्थु, चक्खुमन्तस्स सिरीमतो।
सिखिस्सपि च (इमे चकारा पोराणपोत्थकेसु नत्थि) नमत्थु, सब्बभूतानुकम्पिनो॥
‘‘वेस्सभुस्स च (इमे चकारा पोराणपोत्थकेसु नत्थि) नमत्थु, न्हातकस्स तपस्सिनो।
नमत्थु ककुसन्धस्स, मारसेनापमद्दिनो॥
‘‘कोणागमनस्स नमत्थु, ब्राह्मणस्स वुसीमतो।
कस्सपस्स च (इमे चकारा पोराणपोत्थकेसु नत्थि) नमत्थु, विप्पमुत्तस्स सब्बधि॥
‘‘अङ्गीरसस्स नमत्थु, सक्यपुत्तस्स सिरीमतो।
यो इमं धम्मं देसेसि (धम्ममदेसेसि (सी॰ स्या॰ पी॰), धम्मं देसेति (?)), सब्बदुक्खापनूदनं॥
‘‘ये चापि निब्बुता लोके, यथाभूतं विपस्सिसुं।
ते जना अपिसुणाथ (अपिसुणा (सी॰ स्या॰ पी॰)), महन्ता वीतसारदा॥
‘‘हितं देवमनुस्सानं, यं नमस्सन्ति गोतमं।
विज्जाचरणसम्पन्नं, महन्तं वीतसारदं॥
२७८. ‘‘यतो उग्गच्छति सूरियो (सुरियो (सी॰ स्या॰ पी॰)), आदिच्चो मण्डली महा।
यस्स चुग्गच्छमानस्स, संवरीपि निरुज्झति।
यस्स चुग्गते सूरिये, ‘दिवसो’ति पवुच्चति॥
‘‘रहदोपि तत्थ गम्भीरो, समुद्दो सरितोदको।
एवं तं तत्थ जानन्ति, ‘समुद्दो सरितोदको’॥
‘‘इतो ‘सा पुरिमा दिसा’, इति नं आचिक्खती जनो।
यं दिसं अभिपालेति, महाराजा यसस्सि सो॥
‘‘गन्धब्बानं अधिपति (आधिपति (सी॰ स्या॰ पी॰) एवमुपरिपि), ‘धतरट्ठो’ति नामसो।
रमती नच्चगीतेहि, गन्धब्बेहि पुरक्खतो॥
‘‘पुत्तापि तस्स बहवो, एकनामाति मे सुतं।
असीति दस एको च, इन्दनामा महब्बला॥
ते चापि बुद्धं दिस्वान, बुद्धं आदिच्चबन्धुनं।
दूरतोव नमस्सन्ति, महन्तं वीतसारदं॥
‘‘नमो ते पुरिसाजञ्ञ, नमो ते पुरिसुत्तम।
कुसलेन समेक्खसि, अमनुस्सापि तं वन्दन्ति।
सुतं नेतं अभिण्हसो, तस्मा एवं वदेमसे॥
‘‘‘जिनं वन्दथ गोतमं, जिनं वन्दाम गोतमं।
विज्जाचरणसम्पन्नं, बुद्धं वन्दाम गोतमं’॥
२७९. ‘‘येन पेता पवुच्चन्ति, पिसुणा पिट्ठिमंसिका।
पाणातिपातिनो लुद्दा (लुद्धा (पी॰ क॰)), चोरा नेकतिका जना॥
‘‘इतो ‘सा दक्खिणा दिसा’, इति नं आचिक्खती जनो।
यं दिसं अभिपालेति, महाराजा यसस्सि सो॥
‘‘कुम्भण्डानं अधिपति, ‘विरूळ्हो’ इति नामसो।
रमती नच्चगीतेहि, कुम्भण्डेहि पुरक्खतो॥
‘‘पुत्तापि तस्स बहवो, एकनामाति मे सुतं।
असीति दस एको च, इन्दनामा महब्बला॥
ते चापि बुद्धं दिस्वान, बुद्धं आदिच्चबन्धुनं।
दूरतोव नमस्सन्ति, महन्तं वीतसारदं॥
‘‘नमो ते पुरिसाजञ्ञ, नमो ते पुरिसुत्तम।
कुसलेन समेक्खसि, अमनुस्सापि तं वन्दन्ति।
सुतं नेतं अभिण्हसो, तस्मा एवं वदेमसे॥
‘‘‘जिनं वन्दथ गोतमं, जिनं वन्दाम गोतमं।
विज्जाचरणसम्पन्नं, बुद्धं वन्दाम गोतमं’॥
२८०. ‘‘यत्थ चोग्गच्छति सूरियो, आदिच्चो मण्डली महा।
यस्स चोग्गच्छमानस्स, दिवसोपि निरुज्झति।
यस्स चोग्गते सूरिये, ‘संवरी’ति पवुच्चति॥
‘‘रहदोपि तत्थ गम्भीरो, समुद्दो सरितोदको।
एवं तं तत्थ जानन्ति, ‘समुद्दो सरितोदको’॥
‘‘इतो ‘सा पच्छिमा दिसा’, इति नं आचिक्खती जनो।
यं दिसं अभिपालेति, महाराजा यसस्सि सो॥
‘‘नागानञ्च अधिपति, ‘विरूपक्खो’ति नामसो।
रमती नच्चगीतेहि, नागेहेव पुरक्खतो॥
‘‘पुत्तापि तस्स बहवो, एकनामाति मे सुतं।
असीति दस एको च, इन्दनामा महब्बला॥
ते चापि बुद्धं दिस्वान, बुद्धं आदिच्चबन्धुनं।
दूरतोव नमस्सन्ति, महन्तं वीतसारदं॥
‘‘नमो ते पुरिसाजञ्ञ, नमो ते पुरिसुत्तम।
कुसलेन समेक्खसि, अमनुस्सापि तं वन्दन्ति।
सुतं नेतं अभिण्हसो, तस्मा एवं वदेमसे॥
‘‘‘जिनं वन्दथ गोतमं, जिनं वन्दाम गोतमं।
विज्जाचरणसम्पन्नं, बुद्धं वन्दाम गोतमं’॥
२८१. ‘‘येन उत्तरकुरुव्हो (उत्तरकुरू रम्मा (सी॰ स्या॰ पी॰)), महानेरु सुदस्सनो।
मनुस्सा तत्थ जायन्ति, अममा अपरिग्गहा॥
‘‘न ते बीजं पवपन्ति, नपि नीयन्ति नङ्गला।
अकट्ठपाकिमं सालिं, परिभुञ्जन्ति मानुसा॥
‘‘अकणं अथुसं सुद्धं, सुगन्धं तण्डुलप्फलं।
तुण्डिकीरे पचित्वान, ततो भुञ्जन्ति भोजनं॥
‘‘गाविं एकखुरं कत्वा, अनुयन्ति दिसोदिसं।
पसुं एकखुरं कत्वा, अनुयन्ति दिसोदिसं॥
‘‘इत्थिं वा वाहनं (इत्थी-वाहनं (सी॰ पी॰), इत्थीं वाहनं (स्या॰)) कत्वा, अनुयन्ति दिसोदिसं।
पुरिसं वाहनं कत्वा, अनुयन्ति दिसोदिसं॥
‘‘कुमारिं वाहनं कत्वा, अनुयन्ति दिसोदिसं।
कुमारं वाहनं कत्वा, अनुयन्ति दिसोदिसं॥
‘‘ते याने अभिरुहित्वा,
सब्बा दिसा अनुपरियायन्ति (अनुपरियन्ति (स्या॰))।
पचारा तस्स राजिनो॥
‘‘हत्थियानं अस्सयानं, दिब्बं यानं उपट्ठितं।
पासादा सिविका चेव, महाराजस्स यसस्सिनो॥
‘‘तस्स च नगरा अहु,
अन्तलिक्खे सुमापिता।
आटानाटा कुसिनाटा परकुसिनाटा,
नाटसुरिया (नाटपुरिया (सी॰ पी॰), नाटपरिया (स्या॰)) परकुसिटनाटा॥
‘‘उत्तरेन कसिवन्तो (कपिवन्तो (सी॰ स्या॰ पी)),
जनोघमपरेन च।
नवनवुतियो अम्बरअम्बरवतियो,
आळकमन्दा नाम राजधानी॥
‘‘कुवेरस्स खो पन, मारिस, महाराजस्स विसाणा नाम राजधानी।
तस्मा कुवेरो महाराजा, ‘वेस्सवणो’ति पवुच्चति॥
‘‘पच्चेसन्तो पकासेन्ति, ततोला तत्तला ततोतला।
ओजसि तेजसि ततोजसी, सूरो राजा अरिट्ठो नेमि॥
‘‘रहदोपि तत्थ धरणी नाम, यतो मेघा पवस्सन्ति।
वस्सा यतो पतायन्ति, सभापि तत्थ सालवती (भगलवती (सी॰ स्या॰ पी॰)) नाम॥
‘‘यत्थ यक्खा पयिरुपासन्ति, तत्थ निच्चफला रुक्खा।
नाना दिजगणा युता, मयूरकोञ्चाभिरुदा।
कोकिलादीहि वग्गुहि॥
‘‘जीवञ्जीवकसद्देत्थ, अथो ओट्ठवचित्तका।
कुक्कुटका (कुकुत्थका (सी॰ पी॰)) कुळीरका, वने पोक्खरसातका॥
‘‘सुकसाळिकसद्देत्थ, दण्डमाणवकानि च।
सोभति सब्बकालं सा, कुवेरनळिनी सदा॥
‘‘इतो ‘सा उत्तरा दिसा’, इति नं आचिक्खती जनो।
यं दिसं अभिपालेति, महाराजा यसस्सि सो॥
‘‘यक्खानञ्च अधिपति, ‘कुवेरो’ इति नामसो।
रमती नच्चगीतेहि, यक्खेहेव पुरक्खतो॥
‘‘पुत्तापि तस्स बहवो, एकनामाति मे सुतं।
असीति दस एको च, इन्दनामा महब्बला॥
‘‘ते चापि बुद्धं दिस्वान, बुद्धं आदिच्चबन्धुनं।
दूरतोव नमस्सन्ति, महन्तं वीतसारदं॥
‘‘नमो ते पुरिसाजञ्ञ, नमो ते पुरिसुत्तम।
कुसलेन समेक्खसि, अमनुस्सापि तं वन्दन्ति।
सुतं नेतं अभिण्हसो, तस्मा एवं वदेमसे॥
‘‘‘जिनं वन्दथ गोतमं, जिनं वन्दाम गोतमं।
विज्जाचरणसम्पन्नं, बुद्धं वन्दाम गोतम’’’न्ति॥
‘‘अयं खो सा, मारिस, आटानाटिया रक्खा भिक्खूनं भिक्खुनीनं उपासकानं उपासिकानं गुत्तिया रक्खाय अविहिंसाय फासुविहाराय।
२८२. ‘‘यस्स कस्सचि, मारिस, भिक्खुस्स वा भिक्खुनिया वा उपासकस्स वा उपासिकाय वा अयं आटानाटिया रक्खा सुग्गहिता भविस्सति समत्ता परियापुता (परियापुटा (क॰))। तं चे अमनुस्सो यक्खो वा यक्खिनी वा यक्खपोतको वा यक्खपोतिका वा यक्खमहामत्तो वा यक्खपारिसज्जो वा यक्खपचारो वा, गन्धब्बो वा गन्धब्बी वा गन्धब्बपोतको वा गन्धब्बपोतिका वा गन्धब्बमहामत्तो वा गन्धब्बपारिसज्जो वा गन्धब्बपचारो वा, कुम्भण्डो वा कुम्भण्डी वा कुम्भण्डपोतको वा कुम्भण्डपोतिका वा कुम्भण्डमहामत्तो वा कुम्भण्डपारिसज्जो वा कुम्भण्डपचारो वा, नागो वा नागी वा नागपोतको वा नागपोतिका वा नागमहामत्तो वा नागपारिसज्जो वा नागपचारो वा, पदुट्ठचित्तो भिक्खुं वा भिक्खुनिं वा उपासकं वा उपासिकं वा गच्छन्तं वा अनुगच्छेय्य, ठितं वा उपतिट्ठेय्य, निसिन्नं वा उपनिसीदेय्य, निपन्नं वा उपनिपज्जेय्य। न मे सो, मारिस, अमनुस्सो लभेय्य गामेसु वा निगमेसु वा सक्कारं वा गरुकारं वा। न मे सो, मारिस, अमनुस्सो लभेय्य आळकमन्दाय नाम राजधानिया वत्थुं वा वासं वा। न मे सो, मारिस, अमनुस्सो लभेय्य यक्खानं समितिं गन्तुं। अपिस्सु नं, मारिस, अमनुस्सा अनावय्हम्पि नं करेय्युं अविवय्हं। अपिस्सु नं, मारिस, अमनुस्सा अत्ताहिपि परिपुण्णाहि परिभासाहि परिभासेय्युं। अपिस्सु नं, मारिस, अमनुस्सा रित्तंपिस्स पत्तं सीसे निक्कुज्जेय्युं। अपिस्सु नं, मारिस, अमनुस्सा सत्तधापिस्स मुद्धं फालेय्युं।
‘‘सन्ति हि, मारिस, अमनुस्सा चण्डा रुद्धा (रुद्दा (सी॰ पी॰)) रभसा, ते नेव महाराजानं आदियन्ति, न महाराजानं पुरिसकानं आदियन्ति, न महाराजानं पुरिसकानं पुरिसकानं आदियन्ति। ते खो ते, मारिस, अमनुस्सा महाराजानं अवरुद्धा नाम वुच्चन्ति। सेय्यथापि, मारिस, रञ्ञो मागधस्स विजिते महाचोरा। ते नेव रञ्ञो मागधस्स आदियन्ति, न रञ्ञो मागधस्स पुरिसकानं आदियन्ति, न रञ्ञो मागधस्स पुरिसकानं पुरिसकानं आदियन्ति। ते खो ते, मारिस, महाचोरा रञ्ञो मागधस्स अवरुद्धा नाम वुच्चन्ति। एवमेव खो, मारिस, सन्ति अमनुस्सा चण्डा रुद्धा रभसा, ते नेव महाराजानं आदियन्ति, न महाराजानं पुरिसकानं आदियन्ति, न महाराजानं पुरिसकानं पुरिसकानं आदियन्ति। ते खो ते, मारिस, अमनुस्सा महाराजानं अवरुद्धा नाम वुच्चन्ति। यो हि कोचि, मारिस, अमनुस्सो यक्खो वा यक्खिनी वा…पे॰… गन्धब्बो वा गन्धब्बी वा … कुम्भण्डो वा कुम्भण्डी वा… नागो वा नागी वा नागपोतको वा नागपोतिका वा नागमहामत्तो वा नागपारिसज्जो वा नागपचारो वा पदुट्ठचित्तो भिक्खुं वा भिक्खुनिं वा उपासकं वा उपासिकं वा गच्छन्तं वा अनुगच्छेय्य, ठितं वा उपतिट्ठेय्य, निसिन्नं वा उपनिसीदेय्य, निपन्नं वा उपनिपज्जेय्य। इमेसं यक्खानं महायक्खानं सेनापतीनं महासेनापतीनं उज्झापेतब्बं विक्कन्दितब्बं विरवितब्बं – ‘अयं यक्खो गण्हाति, अयं यक्खो आविसति, अयं यक्खो हेठेति, अयं यक्खो विहेठेति, अयं यक्खो हिंसति, अयं यक्खो विहिंसति, अयं यक्खो न मुञ्चती’ति।
२८३. ‘‘कतमेसं यक्खानं महायक्खानं सेनापतीनं महासेनापतीनं?
‘‘इन्दो सोमो वरुणो च, भारद्वाजो पजापति।
चन्दनो कामसेट्ठो च, किन्नुघण्डु निघण्डु च॥
‘‘पनादो ओपमञ्ञो च, देवसूतो च मातलि।
चित्तसेनो च गन्धब्बो, नळो राजा जनेसभो (जनोसभो (स्या॰))॥
‘‘सातागिरो हेमवतो, पुण्णको करतियो गुळो।
सिवको मुचलिन्दो च, वेस्सामित्तो युगन्धरो॥
‘‘गोपालो सुप्परोधो च (सुप्पगेधो च (सी॰ स्या॰ पी॰)), हिरि नेत्ति (हिरी नेत्ती (सी॰ पी॰)) च मन्दियो।
पञ्चालचण्डो आळवको, पज्जुन्नो सुमनो सुमुखो।
दधिमुखो मणि माणिवरो (मणि मानिचरो (स्या॰ पी॰)) दीघो, अथो सेरीसको सह॥
‘‘इमेसं यक्खानं महायक्खानं सेनापतीनं महासेनापतीनं उज्झापेतब्बं विक्कन्दितब्बं विरवितब्बं – ‘अयं यक्खो गण्हाति, अयं यक्खो आविसति, अयं यक्खो हेठेति, अयं यक्खो विहेठेति, अयं यक्खो हिंसति, अयं यक्खो विहिंसति, अयं यक्खो न मुञ्चती’ति।
‘‘अयं खो सा, मारिस, आटानाटिया रक्खा भिक्खूनं भिक्खुनीनं उपासकानं उपासिकानं गुत्तिया रक्खाय अविहिंसाय फासुविहाराय। हन्द च दानि मयं, मारिस, गच्छाम बहुकिच्चा मयं बहुकरणीया’’ति। ‘‘यस्सदानि तुम्हे महाराजानो कालं मञ्ञथा’’ति।
२८४. अथ खो चत्तारो महाराजा उट्ठायासना भगवन्तं अभिवादेत्वा पदक्खिणं कत्वा तत्थेवन्तरधायिंसु। तेपि खो यक्खा उट्ठायासना अप्पेकच्चे भगवन्तं अभिवादेत्वा पदक्खिणं कत्वा तत्थेवन्तरधायिंसु। अप्पेकच्चे भगवता सद्धिं सम्मोदिंसु, सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा तत्थेवन्तरधायिंसु। अप्पेकच्चे येन भगवा तेनञ्जलिं पणामेत्वा तत्थेवन्तरधायिंसु। अप्पेकच्चे नामगोत्तं सावेत्वा तत्थेवन्तरधायिंसु। अप्पेकच्चे तुण्हीभूता तत्थेवन्तरधायिंसूति।
पठमभाणवारो निट्ठितो।
दुतियभाणवारो
२८५. अथ खो भगवा तस्सा रत्तिया अच्चयेन भिक्खू आमन्तेसि – ‘‘इमं, भिक्खवे, रत्तिं चत्तारो महाराजा महतिया च यक्खसेनाय महतिया च गन्धब्बसेनाय महतिया च कुम्भण्डसेनाय महतिया च नागसेनाय चतुद्दिसं रक्खं ठपेत्वा चतुद्दिसं गुम्बं ठपेत्वा चतुद्दिसं ओवरणं ठपेत्वा अभिक्कन्ताय रत्तिया अभिक्कन्तवण्णा केवलकप्पं गिज्झकूटं पब्बतं ओभासेत्वा येनाहं तेनुपसङ्कमिंसु; उपसङ्कमित्वा मं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदिंसु। तेपि खो, भिक्खवे, यक्खा अप्पेकच्चे मं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदिंसु। अप्पेकच्चे मया सद्धिं सम्मोदिंसु, सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा एकमन्तं निसीदिंसु। अप्पेकच्चे येनाहं तेनञ्जलिं पणामेत्वा एकमन्तं निसीदिंसु। अप्पेकच्चे नामगोत्तं सावेत्वा एकमन्तं निसीदिंसु। अप्पेकच्चे तुण्हीभूता एकमन्तं निसीदिंसु।
२८६. ‘‘एकमन्तं निसिन्नो खो, भिक्खवे, वेस्सवणो महाराजा मं एतदवोच – ‘सन्ति हि, भन्ते, उळारा यक्खा भगवतो अप्पसन्ना…पे॰… सन्ति हि, भन्ते नीचा यक्खा भगवतो पसन्ना। येभुय्येन खो पन, भन्ते, यक्खा अप्पसन्नायेव भगवतो। तं किस्स हेतु? भगवा हि, भन्ते, पाणातिपाता वेरमणिया धम्मं देसेति… सुरामेरयमज्जप्पमादट्ठाना वेरमणिया धम्मं देसेति। येभुय्येन खो पन, भन्ते, यक्खा अप्पटिविरतायेव पाणातिपाता… अप्पटिविरता सुरामेरयमज्जप्पमादट्ठाना। तेसं तं होति अप्पियं अमनापं। सन्ति हि, भन्ते, भगवतो सावका अरञ्ञवनपत्थानि पन्तानि सेनासनानि पटिसेवन्ति अप्पसद्दानि अप्पनिग्घोसानि विजनवातानि मनुस्सराहस्सेय्यकानि पटिसल्लानसारुप्पानि। तत्थ सन्ति उळारा यक्खा निवासिनो, ये इमस्मिं भगवतो पावचने अप्पसन्ना, तेसं पसादाय उग्गण्हातु, भन्ते, भगवा आटानाटियं रक्खं भिक्खूनं भिक्खुनीनं उपासकानं उपासिकानं गुत्तिया रक्खाय अविहिंसाय फासुविहाराया’ति। अधिवासेसिं खो अहं, भिक्खवे, तुण्हीभावेन। अथ खो, भिक्खवे, वेस्सवणो महाराजा मे अधिवासनं विदित्वा तायं वेलायं इमं आटानाटियं रक्खं अभासि –
२८७. ‘विपस्सिस्स च नमत्थु, चक्खुमन्तस्स सिरीमतो।
सिखिस्सपि च नमत्थु, सब्बभूतानुकम्पिनो॥
‘वेस्सभुस्स च नमत्थु, न्हातकस्स तपस्सिनो।
नमत्थु ककुसन्धस्स, मारसेनापमद्दिनो॥
‘कोणागमनस्स नमत्थु, ब्राह्मणस्स वुसीमतो।
कस्सपस्स च नमत्थु, विप्पमुत्तस्स सब्बधि॥
‘अङ्गीरसस्स नमत्थु, सक्यपुत्तस्स सिरीमतो।
यो इमं धम्मं देसेसि, सब्बदुक्खापनूदनं॥
‘ये चापि निब्बुता लोके, यथाभूतं विपस्सिसुं।
ते जना अपिसुणाथ, महन्ता वीतसारदा॥
‘हितं देवमनुस्सानं, यं नमस्सन्ति गोतमं।
विज्जाचरणसम्पन्नं, महन्तं वीतसारदं॥
२८८. ‘यतो उग्गच्छति सूरियो, आदिच्चो मण्डली महा।
यस्स चुग्गच्छमानस्स, संवरीपि निरुज्झति।
यस्स चुग्गते सूरिये, ‘‘दिवसो’’ति पवुच्चति॥
‘रहदोपि तत्थ गम्भीरो, समुद्दो सरितोदको।
एवं तं तत्थ जानन्ति, ‘‘समुद्दो सरितोदको’’॥
‘इतो ‘‘सा पुरिमा दिसा’’, इति नं आचिक्खती जनो।
यं दिसं अभिपालेति, महाराजा यसस्सि सो॥
‘गन्धब्बानं अधिपति, ‘‘धतरट्ठो’’ति नामसो।
रमती नच्चगीतेहि, गन्धब्बेहि पुरक्खतो॥
‘पुत्तापि तस्स बहवो, एकनामाति मे सुतं।
असीति दस एको च, इन्दनामा महब्बला॥
‘ते चापि बुद्धं दिस्वान, बुद्धं आदिच्चबन्धुनं।
दूरतोव नमस्सन्ति, महन्तं वीतसारदं॥
‘नमो ते पुरिसाजञ्ञ, नमो ते पुरिसुत्तम।
कुसलेन समेक्खसि, अमनुस्सापि तं वन्दन्ति।
सुतं नेतं अभिण्हसो, तस्सा एवं वदेमसे॥
‘‘जिनं वन्दथ गोतमं, जिनं वन्दाम गोतमं।
विज्जाचरणसम्पन्नं, बुद्धं वन्दाम गोतमं’’॥
२८९. ‘येन पेता पवुच्चन्ति, पिसुणा पिट्ठिमंसिका।
पाणातिपातिनो लुद्दा, चोरा नेकतिका जना॥
‘इतो ‘‘सा दक्खिणा दिसा’’, इति नं आचिक्खती जनो।
यं दिसं अभिपालेति, महाराजा यसस्सि सो॥
‘कुम्भण्डानं अधिपति, ‘‘विरूळ्हो’’ इति नामसो।
रमती नच्चगीतेहि, कुम्भण्डेहि पुरक्खतो॥
‘पुत्तापि तस्स बहवो, एकनामाति मे सुतं।
असीति दस एको च, इन्दनामा महब्बला॥
‘ते चापि बुद्धं दिस्वान, बुद्धं आदिच्चबन्धुनं।
दूरतोव नमस्सन्ति, महन्तं वीतसारदं॥
‘नमो ते पुरिसाजञ्ञ, नमो ते पुरिसुत्तम।
कुसलेन समेक्खसि, अमनुस्सापि तं वन्दन्ति।
सुतं नेतं अभिण्हसो, तस्मा एवं वदेमसे॥
‘‘जिनं वन्दथ गोतमं, जिनं वन्दाम गोतमं।
विज्जाचरणसम्पन्नं, बुद्धं वन्दाम गोतमं’’॥
२९०. ‘यत्थ चोग्गच्छति सूरियो, आदिच्चो मण्डली महा।
यस्स चोग्गच्छमानस्स, दिवसोपि निरुज्झति।
यस्स चोग्गते सूरिये, ‘‘संवरी’’ति पवुच्चति॥
‘रहदोपि तत्थ गम्भीरो, समुद्दो सरितोदको।
एवं तं तत्थ जानन्ति, समुद्दो सरितोदको॥
‘इतो ‘‘सा पच्छिमा दिसा’’, इति नं आचिक्खती जनो।
यं दिसं अभिपालेति, महाराजा यसस्सि सो॥
‘नागानञ्च अधिपति, ‘‘विरूपक्खो’’ति नामसो।
रमती नच्चगीतेहि, नागेहेव पुरक्खतो॥
‘पुत्तापि तस्स बहवो, एकनामाति मे सुतं।
असीति दस एको च, इन्दनामा महब्बला॥
‘ते चापि बुद्धं दिस्वान, बुद्धं आदिच्चबन्धुनं।
दूरतोव नमस्सन्ति, महन्तं वीतसारदं॥
‘नमो ते पुरिसाजञ्ञ, नमो ते पुरिसुत्तम।
कुसलेन समेक्खसि, अमनुस्सापि तं वन्दन्ति।
सुतं नेतं अभिण्हसो, तस्मा एवं वदेमसे॥
‘‘जिनं वन्दथ गोतमं, जिनं वन्दाम गोतमं।
विज्जाचरणसम्पन्नं, बुद्धं वन्दाम गोतमं’’॥
२९१. ‘येन उत्तरकुरुव्हो, महानेरु सुदस्सनो।
मनुस्सा तत्थ जायन्ति, अममा अपरिग्गहा॥
‘न ते बीजं पवपन्ति, नापि नीयन्ति नङ्गला।
अकट्ठपाकिमं सालिं, परिभुञ्जन्ति मानुसा॥
‘अकणं अथुसं सुद्धं, सुगन्धं तण्डुलप्फलं।
तुण्डिकीरे पचित्वान, ततो भुञ्जन्ति भोजनं॥
‘गाविं एकखुरं कत्वा, अनुयन्ति दिसोदिसं।
पसुं एकखुरं कत्वा, अनुयन्ति दिसोदिसं॥
‘इत्थिं वा वाहनं कत्वा, अनुयन्ति दिसोदिसं।
पुरिसं वाहनं कत्वा, अनुयन्ति दिसोदिसं॥
‘कुमारिं वाहनं कत्वा, अनुयन्ति दिसोदिसं।
कुमारं वाहनं कत्वा, अनुयन्ति दिसोदिसं॥
‘ते याने अभिरुहित्वा,
सब्बा दिसा अनुपरियायन्ति।
पचारा तस्स राजिनो॥
‘हत्थियानं अस्सयानं,
दिब्बं यानं उपट्ठितं।
पासादा सिविका चेव,
महाराजस्स यसस्सिनो॥
‘तस्स च नगरा अहु,
अन्तलिक्खे सुमापिता।
आटानाटा कुसिनाटा परकुसिनाटा,
नाटसुरिया परकुसिटनाटा॥
‘उत्तरेन कसिवन्तो,
जनोघमपरेन च।
नवनवुतियो अम्बरअम्बरवतियो,
आळकमन्दा नाम राजधानी॥
‘कुवेरस्स खो पन, मारिस, महाराजस्स विसाणा नाम राजधानी।
तस्मा कुवेरो महाराजा, ‘‘वेस्सवणो’’ति पवुच्चति॥
‘पच्चेसन्तो पकासेन्ति, ततोला तत्तला ततोतला।
ओजसि तेजसि ततोजसी, सूरो राजा अरिट्ठो नेमि॥
‘रहदोपि तत्थ धरणी नाम, यतो मेघा पवस्सन्ति।
वस्सा यतो पतायन्ति, सभापि तत्थ सालवती नाम॥
‘यत्थ यक्खा पयिरुपासन्ति, तत्थ निच्चफला रुक्खा।
नाना दिजगणा युता, मयूरकोञ्चाभिरुदा।
कोकिलादीहि वग्गुहि॥
‘जीवञ्जीवकसद्देत्थ, अथो ओट्ठवचित्तका।
कुक्कुटका कुळीरका, वने पोक्खरसातका॥
‘सुकसाळिक सद्देत्थ, दण्डमाणवकानि च।
सोभति सब्बकालं सा, कुवेरनळिनी सदा॥
‘इतो ‘‘सा उत्तरा दिसा’’, इति नं आचिक्खती जनो।
यं दिसं अभिपालेति, महाराजा यसस्सि सो॥
‘यक्खानञ्च अधिपति, ‘‘कुवेरो’’ इति नामसो।
रमती नच्चगीतेहि, यक्खेहेव पुरक्खतो॥
‘पुत्तापि तस्स बहवो, एकनामाति मे सुतं।
असीति दस एको च, इन्दनामा महब्बला॥
‘ते चापि बुद्धं दिस्वान, बुद्धं आदिच्चबन्धुनं।
दूरतोव नमस्सन्ति, महन्तं वीतसारदं॥
‘नमो ते पुरिसाजञ्ञ, नमो ते पुरिसुत्तम।
कुसलेन समेक्खसि, अमनुस्सापि तं वन्दन्ति।
सुतं नेतं अभिण्हसो, तस्मा एवं वदेमसे॥
‘‘जिनं वन्दथ गोतमं, जिनं वन्दाम गोतमं।
विज्जाचरणसम्पन्नं, बुद्धं वन्दाम गोतम’’न्ति॥
२९२. ‘अयं खो सा, मारिस, आटानाटिया रक्खा भिक्खूनं भिक्खुनीनं उपासकानं उपासिकानं गुत्तिया रक्खाय अविहिंसाय फासुविहाराय। यस्स कस्सचि, मारिस, भिक्खुस्स वा भिक्खुनिया वा उपासकस्स वा उपासिकाय वा अयं आटानाटिया रक्खा सुग्गहिता भविस्सति समत्ता परियापुता तं चे अमनुस्सो यक्खो वा यक्खिनी वा…पे॰… गन्धब्बो वा गन्धब्बी वा…पे॰… कुम्भण्डो वा कुम्भण्डी वा…पे॰… नागो वा नागी वा नागपोतको वा नागपोतिका वा नागमहामत्तो वा नागपारिसज्जो वा नागपचारो वा, पदुट्ठचित्तो भिक्खुं वा भिक्खुनिं वा उपासकं वा उपासिकं वा गच्छन्तं वा अनुगच्छेय्य, ठितं वा उपतिट्ठेय्य, निसिन्नं वा उपनिसीदेय्य, निपन्नं वा उपनिपज्जेय्य। न मे सो, मारिस, अमनुस्सो लभेय्य गामेसु वा निगमेसु वा सक्कारं वा गरुकारं वा। न मे सो, मारिस, अमनुस्सो लभेय्य आळकमन्दाय नाम राजधानिया वत्थुं वा वासं वा। न मे सो, मारिस, अमनुस्सो लभेय्य यक्खानं समितिं गन्तुं। अपिस्सु नं, मारिस, अमनुस्सा अनावय्हम्पि नं करेय्युं अविवय्हं। अपिस्सु नं, मारिस, अमनुस्सा अत्ताहि परिपुण्णाहि परिभासाहि परिभासेय्युं। अपिस्सु नं, मारिस, अमनुस्सा रित्तंपिस्स पत्तं सीसे निक्कुज्जेय्युं। अपिस्सु नं, मारिस, अमनुस्सा सत्तधापिस्स मुद्धं फालेय्युं। सन्ति हि, मारिस, अमनुस्सा चण्डा रुद्धा रभसा, ते नेव महाराजानं आदियन्ति, न महाराजानं पुरिसकानं आदियन्ति, न महाराजानं पुरिसकानं पुरिसकानं आदियन्ति। ते खो ते, मारिस, अमनुस्सा महाराजानं अवरुद्धा नाम वुच्चन्ति। सेय्यथापि, मारिस, रञ्ञो मागधस्स विजिते महाचोरा। ते नेव रञ्ञो मागधस्स आदियन्ति, न रञ्ञो मागधस्स पुरिसकानं आदियन्ति, न रञ्ञो मागधस्स पुरिसकानं पुरिसकानं आदियन्ति। ते खो ते, मारिस, महाचोरा रञ्ञो मागधस्स अवरुद्धा नाम वुच्चन्ति। एवमेव खो, मारिस, सन्ति अमनुस्सा चण्डा रुद्धा रभसा, ते नेव महाराजानं आदियन्ति, न महाराजानं पुरिसकानं आदियन्ति, न महाराजानं पुरिसकानं पुरिसकानं आदियन्ति। ते खो ते, मारिस, अमनुस्सा महाराजानं अवरुद्धा नाम वुच्चन्ति। यो हि कोचि, मारिस, अमनुस्सो यक्खो वा यक्खिनी वा…पे॰… गन्धब्बो वा गन्धब्बी वा…पे॰… कुम्भण्डो वा कुम्भण्डी वा…पे॰… नागो वा नागी वा…पे॰… पदुट्ठचित्तो भिक्खुं वा भिक्खुनिं वा उपासकं वा उपासिकं वा गच्छन्तं वा उपगच्छेय्य, ठितं वा उपतिट्ठेय्य, निसिन्नं वा उपनिसीदेय्य, निपन्नं वा उपनिपज्जेय्य। इमेसं यक्खानं महायक्खानं सेनापतीनं महासेनापतीनं उज्झापेतब्बं विक्कन्दितब्बं विरवितब्बं – ‘अयं यक्खो गण्हाति, अयं यक्खो आविसति, अयं यक्खो हेठेति, अयं यक्खो विहेठेति, अयं यक्खो हिंसति, अयं यक्खो विहिंसति, अयं यक्खो न मुञ्चती’ति।
२९३. ‘कतमेसं यक्खानं महायक्खानं सेनापतीनं महासेनापतीनं?
‘इन्दो सोमो वरुणो च, भारद्वाजो पजापति।
चन्दनो कामसेट्ठो च, किन्नुघण्डु निघण्डु च॥
‘पनादो ओपमञ्ञो च, देवसूतो च मातलि।
चित्तसेनो च गन्धब्बो, नळो राजा जनेसभो॥
‘सातागिरो हेवमतो, पुण्णको करतियो गुळो।
सिवको मुचलिन्दो च, वेस्सामित्तो युगन्धरो॥
‘गोपालो सुप्परोधो च, हिरि नेत्ति च मन्दियो।
पञ्चालचण्डो आळवको, पज्जुन्नो सुमनो सुमुखो।
दधिमुखो मणि माणिवरो दीघो, अथो सेरीसको सह॥
‘इमेसं यक्खानं महायक्खानं सेनापतीनं महासेनापतीनं उज्झापेतब्बं विक्कन्दितब्बं विरवितब्बं – ‘‘अयं यक्खो गण्हाति, अयं यक्खो आविसति, अयं यक्खो हेठेति, अयं यक्खो विहेठेति, अयं यक्खो हिंसति, अयं यक्खो विहिंसति, अयं यक्खो न मुञ्चती’’ति। अयं खो, मारिस, आटानाटिया रक्खा भिक्खूनं भिक्खुनीनं उपासकानं उपासिकानं गुत्तिया रक्खाय अविहिंसाय फासुविहाराय। हन्द च दानि मयं, मारिस, गच्छाम, बहुकिच्चा मयं बहुकरणीया’’’ति। ‘‘‘यस्स दानि तुम्हे महाराजानो कालं मञ्ञथा’’’ति।
२९४. ‘‘अथ खो, भिक्खवे, चत्तारो महाराजा उट्ठायासना मं अभिवादेत्वा पदक्खिणं कत्वा तत्थेवन्तरधायिंसु। तेपि खो, भिक्खवे, यक्खा उट्ठायासना अप्पेकच्चे मं अभिवादेत्वा पदक्खिणं कत्वा तत्थेवन्तरधायिंसु। अप्पेकच्चे मया सद्धिं सम्मोदिंसु, सम्मोदनीयं कथं सारणीयं वीतिसारेत्वा तत्थेवन्तरधायिंसु। अप्पेकच्चे येनाहं तेनञ्जलिं पणामेत्वा तत्थेवन्तरधायिंसु। अप्पेकच्चे नामगोत्तं सावेत्वा तत्थेवन्तरधायिंसु। अप्पेकच्चे तुण्हीभूता तत्थेवन्तरधायिंसु।
२९५. ‘‘उग्गण्हाथ, भिक्खवे, आटानाटियं रक्खं। परियापुणाथ, भिक्खवे, आटानाटियं रक्खं। धारेथ, भिक्खवे, आटानाटियं रक्खं। अत्थसंहिता (अत्थसंहितायं (स्या॰)), भिक्खवे, आटानाटिया रक्खा भिक्खूनं भिक्खुनीनं उपासकानं उपासिकानं गुत्तिया रक्खाय अविहिंसाय फासुविहाराया’’ति। इदमवोच भगवा। अत्तमना ते भिक्खू भगवतो भासितं अभिनन्दुन्ति।
आटानाटियसुत्तं निट्ठितं नवमं।