✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦

एकक | दुक | तिक-नवक | दसक-महा

थेरगाथा

थेरगाथा खुद्दक निकाय का एक बेहद खूबसूरत और प्रेरणादायक ग्रंथ है। इसमें बुद्ध के समय के अरहंत भिक्षुओं (थेरों) की लिखी २६४ गाथाओं का अद्भुत संग्रह है। इसकी सबसे खास बात यह है कि ये भिक्षु समाज के किसी एक वर्ग से नहीं थे। इनमें राजा भी थे और रंक भी—ब्राह्मण, व्यापारी, किसान और यहाँ तक कि अंगुलिमाल जैसे डाकू भी!

अपनी इन गाथाओं में उन्होंने बड़ी बेबाकी से अपने जीवन के संघर्षों, गहरे ध्यान के पलों और निर्वाण (परम शांति) के अकल्पनीय अनुभवों को साझा किया है। इसे पढ़ते हुए आज के साधकों को भी ऐसा लगता है, मानो ये बिल्कुल उन्हीं के मन की बात हो।

कुल मिलाकर, ये गाथाएँ हमें एक ही बात का अहसास कराती हैं: निर्वाण की राह चाहे कितनी भी पथरीली क्यों न हो, लेकिन जब अज्ञानता का अंधेरा छँटता है, तो भीतर से जो ‘मुक्ति की दहाड़’ (सिंहनाद) उठती है… वह कितनी सुकून देने वाली और शाश्वत होती है!

इन्हें छन्दों की संख्या के आधार पर २१ निपातों (अध्याय) में रखा गया है। हमने उन्हें ४ में वर्गीकृत किया—

एकक (१-१२०) | दुक (१२१-१६९) | तिक-नवक (१७०-२३२) | दसक-महा (२३३-२६४)

एकनिपात

पहले एकनिपात में कुल २६४ में से १२० थेरों की गाथाएँ संकलित हैं। इस वर्ग की विशेषता यह है कि प्रत्येक भिक्षु ने केवल एक ही छन्द (गाथा) में अपने संपूर्ण आध्यात्मिक अनुभव और अर्हत्व (पूर्ण ज्ञान) की प्राप्ति को व्यक्त कर दिया है। ये गाथाएँ संक्षिप्त हैं, लेकिन इनका प्रभाव अत्यंत गहरा है।

इस निपात (खंड) में कुल बारह वर्ग हैं:

— वग्गो —
पठम | दुतिय | ततिय | चतुत्थ | पञ्चम | छट्ठ | सत्तम | अट्ठम | नवम | दसम | एकादसम | द्वादसम

पठम वग्ग

📜 १-१. सुभूति

वर्षा ऋतु में अपनी सुरक्षित कुटिया के भीतर बैठे सुभूति भंते बादलों को बरसने की छूट देते हैं।

📜 १-२. महाकोट्ठिक

गहन प्रज्ञा वाले महाकोट्ठिक थेर पाप कर्मों से दूर रहने और मन को शांत करने का सीधा उपदेश देते हैं।

📜 १-३. कङ्खारेवत

अतीत में संशय (कङ्खा) से घिरे रहे रेवत थेर, सच्चे मुक्ति मार्ग का वर्णन करते हैं।

📜 १-४. पुण्ण मन्ताणिपुत्त

धर्मोपदेश देने में सर्वश्रेष्ठ पुण्ण मन्ताणिपुत्त प्रज्ञा का क्षीण न होने का मार्ग बताते हैं।

📜 १-५. दब्भमल्लपुत्त

केवल सात वर्ष की आयु में अर्हत्व प्राप्त करने वाले दब्ब मल्लपुत्त अपनी मुक्ति की घोषणा करते हैं।

📜 १-६. सीतवनिय

एकांत सीतवन में रहकर ध्यान करने वाले मुनि के अकेलेपन और शांति का आनंद।

📜 १-७. भल्लिय

मार और उसकी सेना को परास्त कर परम शांति प्राप्त करने वाले वीर भिक्षु का उद्घोष।

📜 १-८. वीर

अपने नाम के अनुरूप ही अजेय, जिन्होंने सभी बंधनों को काटकर अर्हत्व प्राप्त कर लिया है।

📜 १-९. पिलिन्दवच्छ

बुद्ध की शरण में आकर सर्वोत्कृष्ट धम्म पाने और कृतार्थ होने की खुशी।

📜 १-१०. पुण्णमास

पूर्णिमा के चाँद की तरह निर्मल मन और सभी आसक्तियों से पूरी तरह मुक्त होने का भाव।

दुतिय वग्ग

📜 १-११. चूळवच्छ

धम्म में रमण करते हुए प्रचुर आनंद के साथ तृष्णा से पूर्णतः मुक्त होने का उपदेश।

📜 १-१२. महावच्छ

गहरी प्रज्ञा के धनी भिक्षु का सभी सांसारिक बंधनों को त्याग कर ध्यान-मग्न होने का वर्णन।

📜 १-१३. वनवच्छ

नीले बादलों और रमणीय पहाड़ों के बीच वन में एकांतवास से मिलने वाले गहरे सुख की अनुभूति।

📜 १-१४. सीवक

शरीर की नश्वरता को जानकर सांसारिक बंधनों को हमेशा के लिए काट देने का दृढ़ संकल्प।

📜 १-१५. कुण्डधान

जन्म-मरण के लंबे चक्र (संसार) को समाप्त कर परम निर्वाण पाने का सिंहनाद।

📜 १-१६. बेल्लट्ठसीस

आलस्य और तंद्रा को त्यागकर, निर्वाण के सुख को पा लेने वाले भिक्षु की गाथा।

📜 १-१७. दासक

अत्यधिक नींद और आलस्य से बाहर निकलकर, अंततः अर्हत्व प्राप्त करने की प्रेरणादायक कथा।

📜 १-१८. सिङ्गालपिता

बुद्ध के उपदेशों से प्रेरित होकर पारिवारिक मोह को त्यागने और वन में विचरने वाले मुनि।

📜 १-१९. कुल

सभी क्लेशों और मलिनताओं को धोकर पूर्ण रूप से शुद्ध और मुक्त होने का भाव।

📜 १-२०. अजित

‘न मुझे मरने का दुख है, न जीने की चाह’—पूरी तरह सचेत होकर समय की प्रतीक्षा करने वाले भिक्षु।

ततिय वग्ग

📜 १-२१. निग्रोध

भय से मुक्त होकर, एक सच्चे भिक्षु की तरह एकांत और ध्यान के आनंद का वर्णन।

📜 १-२२. चित्तक

वन में मोरों की मधुर ध्वनि के बीच मन को एकाग्र कर समाधि प्राप्त करने की अनुभूति।

📜 १-२३. गोसाल

बांस के शांत वन में बैठकर अविद्या को नष्ट करने और अमृत-पद (निर्वाण) पाने का उदान।

📜 १-२४. सुगन्ध

बुद्ध के उपदेशों को धारण कर, वर्ष भर में ही सभी आसक्तियों को जड़ से उखाड़ फेंकने की घोषणा।

📜 १-२५. नन्दिय

मार (बुराइयों) के हमलों को विफल कर, निर्मल चित्त के साथ प्रकाशवान होने का भाव।

📜 १-२६. अभय

भगवान बुद्ध के एक ही उपदेश से आसक्ति रहित होकर पूर्ण मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करना।

📜 १-२७. लोमसकङ्गिय

कठोर तप और ध्यान के माध्यम से मन के सभी मैल को साफ कर अर्हत्व प्राप्त करना।

📜 १-२८. जम्बुगामिकपुत्त

संसार के दुखों को देखकर वैराग्य उत्पन्न होना और अंतिम सत्य का साक्षात्कार करना।

📜 १-२९. हारित

अपने मन को सीधा और लक्ष्य पर केंद्रित कर, अज्ञान के अंधकार को चीरने वाले भिक्षु।

📜 १-३०. उत्तिय

रोग और मृत्यु के भय को त्यागकर, पूरी तरह सचेत होकर निर्वाण की अवस्था में रमण।

चतुत्थ वग्ग

📜 १-३१. गह्वरतीरिय

पहाड़ की गुफा में एकांतवास कर, बिना किसी भय के धम्म का आचरण करने का सुख।

📜 १-३२. सुप्पिय

अपनी ही अशुद्धियों से लड़कर उन्हें हमेशा के लिए समाप्त कर देने का दृढ़ संकल्प।

📜 १-३३. सोपाक

युवावस्था में ही ध्यान की उच्च अवस्था को पाकर परम सत्य का अनुभव करना।

📜 १-३४. पोसिय

भीड़ और कोलाहल से दूर, जंगल की शांति में अपने मन को वश में करने वाले मुनि।

📜 १-३५. सामञ्ञकानि

सुख और दुःख को समभाव से देखकर परम शांति प्राप्त करने वाले भिक्षु।

📜 १-३६. कुमापुत्त

धर्म श्रवण के पश्चात एकांत में अपनी मुक्ति साधना का आनंद।

📜 १-३७. कुमापुत्तसहाय

कल्याणमित्र के साथ रहकर सद्धर्म का पालन और अर्हत्व की प्राप्ति।

📜 १-३८. गवम्पति

ऋद्धिबल के धनी और सांसारिक बंधनों से पूरी तरह मुक्त भिक्षु का उदान।

📜 १-३९. तिस्स

मान-सम्मान की परवाह किए बिना भिक्षाटन से सुखी और संतुष्ट जीवन।

📜 १-४०. वड्ढमान

प्रमाद को छोड़कर हमेशा कुशल धर्मों में वृद्धि करने का संकल्प।

पञ्चम वग्ग

📜 १-४१. सिरिवड्ढ

बिजली कड़कने और वर्षा के बीच कुटिया में सुरक्षित बैठकर ध्यान की गहराई में उतरने का अनुभव।

📜 १-४२. खदिरवनिय

एकांत वन में स्मृति और एकाग्रता के साथ धम्म का अभ्यास करने की प्रेरणा।

📜 १-४३. सुमङ्गल

खेतों के कठिन काम (हँसिया, कुदाल) से मुक्त होकर धम्म में परम मुक्ति पाने की खुशी।

📜 १-४४. सानु

मृत्यु पर शोक मनाने वालों को सचेत करना और जीवित रहते हुए वैराग्य अपनाने का संदेश।

📜 १-४५. रमणीयविहारि

जैसे एक उत्तम घोड़ा ठोकर खाकर भी संभल जाता है, वैसे ही धम्म मार्ग पर अडिग रहने का भाव।

📜 १-४६. समिद्धि

मार की डरावनी सेनाओं और प्रलोभनों के सामने पूरी तरह शांत और अविचलित रहना।

📜 १-४७. उज्जय

सभी बंधनों को काटकर भगवान बुद्ध को पूर्ण वंदना और कृतज्ञता अर्पित करना।

📜 १-४८. सञ्जय

सांसारिक जीवन को व्यर्थ जानकर पूरी तरह से वैराग्य और निर्वाण में रमण।

📜 १-४९. रामणेय्यक

पक्षियों के कोलाहल के बीच भी मन को एकाग्र कर शून्यता का अनुभव करना।

📜 १-५०. विमल

आकाश में चमकती बिजली और गरजते बादलों के बीच भी चित्त को निर्मल और शांत रखना।

छट्ठ वग्ग

📜 १-५१. गोधिक

सुंदर कुटिया की बजाय मन की सुंदरता और वैराग्य को ही सच्चा सौंदर्य मानना।

📜 १-५२. सुबाहु

अपने मन रूपी हाथी को संयम के अंकुश से वश में कर पूर्ण शांति पाना।

📜 १-५३. वल्लिय

पराक्रम और वीर्य के द्वारा आलस्य रूपी अज्ञान को हराकर अर्हत्व का मार्ग प्रशस्त करना।

📜 १-५४. उत्तिय

रोग और मृत्यु के भय को त्यागकर पूरी तरह सचेत होकर निर्वाण में रमना।

📜 १-५५. अञ्जनवनिय

वन में निवास करते हुए अज्ञान के आवरण को झाड़कर परम सत्य को देखना।

📜 १-५६. कुटिविहारि (पठम)

छोटी सी कुटिया में असीम मुक्ति का अनुभव करने वाले विरक्त संन्यासी का उदान।

📜 १-५७. कुटिविहारि (दुतिय)

पुरानी कुटिया (शरीर) के प्रति आसक्ति छोड़ कर नई कुटिया (पुनर्जन्म) की इच्छा को नष्ट करना।

📜 १-५८. रमणीयकुटिविहारि

रमणीय कुटिया में सुखपूर्वक ध्यान करते हुए परम आनंद का साक्षात्कार।

📜 १-५९. कोसलविहारि

कोसल के वनों में एकांतवास कर अपने भीतर के सभी क्लेशों का नाश करना।

📜 १-६०. सीवलि

अपने संकल्प और उद्देश्य को पूरा करते हुए अहंकार की प्रवृत्ति को त्याग देना।

सत्तम वग्ग

📜 १-६१. वप्प

केवल धम्म-चक्षु (ज्ञान की आँख) से ही श्रेष्ठ और अश्रेष्ठ की सच्ची पहचान होना।

📜 १-६२. वज्जिपुत्त

वन में अकेले रहकर धम्म-ध्यान में मग्न होने और वैराग्य से मिलने वाले असीम सुख का अनुभव।

📜 १-६३. पक्ख

गिद्ध की तरह संसार के मांस (काम-भोगों) को त्यागने की प्रेरणा।

📜 १-६४. विमलकोण्डञ्ञ

अज्ञानता के अंधेरे को चीरकर निर्मल ज्ञान से प्रकाशमान होने की घोषणा।

📜 १-६५. उक्खेपकवच्छ

ध्यान और एकाग्रता के बल पर भीतर उठने वाले क्लेशों को जड़ से उखाड़ फेंकना।

📜 १-६६. मेघिय

भगवान के मार्गदर्शन से अपने चंचल मन को वश में कर सच्ची शांति पाना।

📜 १-६७. एकधम्मसवनीय

केवल एक बार गहराई से धम्म सुनकर ही सारे बंधनों को तोड़कर परम सत्य को जानना।

📜 १-६८. एकुदानिय

शोक-रहित होकर, आनंद से भरकर एक ही ‘उदान’ (हर्ष-वाक्य) में अपनी मुक्ति गाना।

📜 १-६९. छन्न

अपने मन को भली-भांति प्रशिक्षित कर सभी प्रकार के दुखों से आज़ादी पाना।

📜 १-७०. पुण्ण (दुतिय)

शील और प्रज्ञा के बल पर देवों और मनुष्यों के बीच सर्वोत्तम विजय पाना।

अट्ठम वग्ग

📜 १-७१. वच्छपाल

सत्पुरुषों (कल्याण मित्रों) की संगति से अविद्या को दूर कर चित्त को शुद्ध करना।

📜 १-७२. आतुम

बाँस के कोमल वृक्ष की तरह संसार के उलझे बंधनों को काटकर मुक्त होना।

📜 १-७३. माणव

बुढ़ापे और मृत्यु के दुख को देखकर वैराग्य जगाने वाले भिक्षु का उदान।

📜 १-७४. सुयामन

काम-भोगों में कोई सार न देखकर पूर्णतः विरक्त होकर समाधि में रमना।

📜 १-७५. सुसारद

अज्ञान के आवरण को झाड़कर निर्मल दृष्टि से आर्य सत्यों को देखने की खुशी।

📜 १-७६. पियञ्जह

सभी प्रिय और अप्रिय भावनाओं को त्यागकर परम वैराग्य का आनंद।

📜 १-७७. हत्थारोहपुत्त

जैसे महावत हाथी को वश में करता है, वैसे ही प्रज्ञा से अपने चित्त को साधना।

📜 १-७८. मेण्डसिर

सारे बाहरी आडंबरों को छोड़कर एक सच्चे भिक्षु की तरह भीतर की शांति को साधना।

📜 १-७९. रक्खित

निरंतर स्मृति (सति) का अभ्यास कर अपनी प्रज्ञा को बढ़ाते हुए परम सत्य का साक्षात्कार।

📜 १-८०. उग्ग

सभी छोटे-बड़े कर्मों का पूरी तरह क्षय कर अंतिम शरीर प्राप्त करने का घोष।

नवम वग्ग

📜 १-८१. समितिगत्त

पूर्व जन्मों के कर्मफलों को इस जीवन में भोगकर, भविष्य के सभी जन्मों को नष्ट करना।

📜 १-८२. कस्सप

पिंडपात से जीवन निर्वाह करते हुए बिना किसी संग्रह के पूर्ण स्वतंत्र होने का भाव।

📜 १-८३. सीह

सिंह के समान निडर होकर ध्यान और प्रज्ञा के बल पर अर्हत्व प्राप्त करना।

📜 १-८४. नीत

नींद और आलस्य पर विजय प्राप्त कर दिन-रात पूर्ण प्रज्ञा के साथ जागृत रहने का उपदेश।

📜 १-८५. सुनाग

सांसारिक सुखों को भ्रम मानकर केवल धम्म की शरण में सच्ची शांति पाना।

📜 १-८६. नगित

दूसरों की निंदा या प्रशंसा से अप्रभावित रहकर अपने मार्ग पर अडिग रहने का संदेश।

📜 १-८७. पविट्ठ

जन्म और मृत्यु के अंतहीन चक्र को तोड़कर संसार के पार चले जाने की खुशी।

📜 १-८८. अज्जुन

ज्ञान के बाण से अविद्या को भेदकर अर्हत्व के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचने का वर्णन।

📜 १-८९. देवसभ

राग और द्वेष को पूरी तरह से जीतकर शांत और अडिग मन से विचरना।

📜 १-९०. सामिदत्त

सारे दुखों का कारण जानकर उन्हें समूल नष्ट कर एक अर्हत के रूप में जीना।

दसम वग्ग

📜 १-९१. परिपुण्णक

अमृत भोजन (धम्म) ग्रहण कर तृष्णा की भूख को हमेशा के लिए शांत कर लेना।

📜 १-९२. विजय

ध्यान की शक्तियों से मार की सेना पर ‘विजय’ प्राप्त करने का शंखनाद।

📜 १-९३. एरका

इंद्रियों के सुखों को दुख का कारण मानकर उनसे पूरी तरह विरक्त होने का संदेश।

📜 १-९४. मेत्तजी

सभी प्राणियों के प्रति अपार मैत्री भाव रखते हुए निर्वाण के सुख का अनुभव।

📜 १-९५. चक्खुपल

शारीरिक दृष्टि खोने के बाद भी प्रज्ञा की आँख (ज्ञान-चक्षु) से परम सत्य को देखना।

📜 १-९६. खण्डसुमन

सुगंधित पुष्पों की तरह अपने शील की सुगंध से पूरे वन को महकाने वाले भिक्षु।

📜 १-९७. तिस्स (दुतिय)

अहंकार और मान को त्यागकर साधारण और विनीत जीवन जीने का सुंदर उपदेश।

📜 १-९८. अभय

मृत्यु के समय भी बिना किसी भय के स्मृति और प्रज्ञा के साथ शरीर का त्याग।

📜 १-९९. उत्तिय (दुतिय)

सारे संशयों और भ्रमों को दूर कर स्पष्ट ज्ञान के साथ जीवन मुक्त होने का भाव।

📜 १-१००. देवसभ (दुतिय)

स्मृति-प्रस्थान की साधना से स्वयं को विमुक्ति के फूलों से सुसज्जित कर लेना।

एकादसम वग्ग

📜 १-१०१. बेलट्ठकानि

आलसी और पेटू भिक्षु की निंदा कर, वीर्य और तप का मार्ग चुनने की प्रेरणा।

📜 १-१०२. सेतुच्छ

अहंकार की दीवार गिराकर समता भाव और शांति की अवस्था में जीने का आनंद।

📜 १-१०३. बन्धुर

सारे बंधनों को काटकर मुक्त पक्षी की तरह जीवन व्यतीत करने का उदान।

📜 १-१०४. खितक

ध्यान के आनंद (पीति) से शरीर का इस तरह हल्का हो जाना जैसे हवा में उड़ रहे हों।

📜 १-१०५. मलितवम्भ

अज्ञान के जाले को साफ कर प्रज्ञा की निर्मल चमक बिखेरने वाले भिक्षु।

📜 १-१०६. सुहेमन्त

शीत ऋतु हो या ग्रीष्म, हर मौसम में मन को शांत और सम रखने का अभ्यास।

📜 १-१०७. धम्मसव

सद्धर्म को सुनकर उसे जीवन में उतारने और जन्म-मरण से पार जाने की कथा।

📜 १-१०८. धम्मसवपितु

वृद्धावस्था में भी धर्म का श्रवण कर ज्ञान की प्राप्ति करने का प्रेरक प्रसंग।

📜 १-१०९. सङ्घरक्खित

इंद्रियों को असंयमित रखने पर आने वाले खतरों के प्रति सचेत करना।

📜 १-११०. उसभ

जंगल की सुंदरता और ‘एकांत की संज्ञा’ को जगाकर मन को शांति में स्थिर करना।

द्वादसम वग्ग

📜 १-१११. जेन्त

प्रव्रज्या का मार्ग कठिन है, इसलिए हमेशा अनित्यता का चिंतन करते रहने का उपदेश।

📜 १-११२. वच्छगोत्त

सारे दार्शनिक संशयों को त्यागकर केवल ध्यान-भावना के द्वारा त्रिविद्या की प्राप्ति।

📜 १-११३. वनवच्छ

पत्थरों और चट्टानों के बीच वन में निवास कर अपनी मुक्ति का आनंद मनाते मुनि।

📜 १-११४. अधिमुत्त

मांस और शरीर (कलेवर) के प्रति आसक्ति को मूर्खता बताकर विरक्ति का संदेश।

📜 १-११५. महानाम

भगवान बुद्ध के उपदेशों को अपने आचरण में सिद्ध कर संसार को अंतिम विदाई देना।

📜 १-११६. पारापरिय

इंद्रियों के दरवाजों पर कड़ी पहरेदारी रखकर अकुशल धर्मों को रोक देना।

📜 १-११७. यस

अथाह धन-संपत्ति को मिट्टी के समान मानकर सच्ची आध्यात्मिक संपदा (अर्हत्व) प्राप्त करना।

📜 १-११८. किम्बिल

अचानक आ गिरने वाले बुढ़ापे को देखकर जीवन की अनित्यता का तीव्र अहसास।

📜 १-११९. वज्जिपुत्त (दुतिय)

व्यर्थ की बातों (तिरच्छान कथा) को छोड़कर केवल ध्यान (झान) पर एकाग्र होने की सलाह।

📜 १-१२०. इसिदत्त

पाँचों स्कंधों की जड़ों को काटकर, पूरी तरह अविद्या को नष्ट कर अंतिम ज्ञान पाना।

दुक निपात

इस निपात में कुल ४९ सुत्त हैं, जिन्हें ५ वर्गों में विभाजित किया गया है:

— वग्गो —
पठम | दुतिय | ततिय | चतुत्थ | पञ्चम

पठम वग्ग

📜 २-१. उत्तर

जीवन की अनित्यता का वर्णन करते हुए, पाँचों स्कंधों के निरंतर उत्पन्न और नष्ट होने के चक्र से वैराग्य प्राप्त करने का उपदेश।

📜 २-२. पिण्डोलभारद्वाज

भोजन को केवल शरीर के निर्वाह का साधन मानकर भिक्षाटन करना, और मान-सम्मान को एक ‘सूक्ष्म काँटा’ समझकर उससे बचना।

📜 २-३. वल्लिय

अपने चंचल मन को पाँच दरवाजों (इंद्रियों) वाली कुटिया में भटकने वाले बंदर के समान जानकर, उसे प्रज्ञा से नियंत्रित करने का उदान।

📜 २-४. गङ्गातीरिय

गंगा नदी के किनारे ताड़ के पत्तों की कुटिया में रहकर, तीन वर्षों की कठोर तपस्या के बाद अज्ञान के अंधकार को नष्ट करना।

📜 २-५. अजिन

यदि कोई अर्हत गरीब और अज्ञात हो, तो मूर्ख लोग उसका तिरस्कार करते हैं, जबकि पापी व्यक्ति यदि संपन्न हो, तो उसका सम्मान करते हैं।

📜 २-६. मेळजिन

भगवान बुद्ध के श्रीमुख से धम्म सुनने के बाद, ‘सत्थवाह’ (महान मार्गदर्शक) के प्रति सभी प्रकार के संशयों से मुक्त हो जाना।

📜 २-७. राध

जैसे खराब छत वाले घर में बारिश का पानी घुस जाता है, वैसे ही अ-भावित (अशिक्षित) मन में राग घुस जाता है—मन को साधने का उपदेश।

📜 २-८. सुराध

जन्म-मरण का क्षय कर लेने और तृष्णा के जाल को पूरी तरह से नष्ट कर देने वाले भिक्षु की मुक्ति की घोषणा।

📜 २-९. गोतम

स्त्री मोह से मुक्त होकर मुनियों के समान चैन की नींद सोना, और संसार के कर्ज को चुकाकर परम निर्वाण की ओर प्रस्थान करना।

📜 २-१०. वसभ

जो व्यक्ति पहले स्वयं को पाप से मारता है, वह बाद में दूसरों को मारता है—पाप कर्मों से बचने और अंतर्मन से ‘सच्चा ब्राह्मण’ बनने की प्रेरणा।

दुतिय वग्ग

📜 २-११. महाचुन्द

श्रवण (सुनने) से प्रज्ञा बढ़ती है और प्रज्ञा से अर्थ का ज्ञान होता है—एकांत वनों में रहकर इस ज्ञान के साथ मुक्ति का अनुभव करना।

📜 २-१२. जोतिदास

कर्मों के अटल सिद्धांत का वर्णन—चाहे वह कठोरता से किया गया हो या क्रूरता से, हर अच्छे या बुरे कर्म का परिणाम भोगना ही पड़ता है।

📜 २-१३. हेरञ्ञकानि

दिन-रात बीत रहे हैं और आयु छोटी नदी के पानी की तरह घट रही है—मूर्ख व्यक्ति इसे नहीं समझता और अंत में कटु फल भोगता है।

📜 २-१४. सोममित्त

जैसे छोटी नाव में बैठकर गहरे समुद्र में डूब जाते हैं, वैसे ही आलसी व्यक्ति की संगति से पतन होता है—कल्याण मित्रों की संगति का महत्व।

📜 २-१५. सब्बमित्त

लोगों से अत्यधिक लगाव अंततः दुःख और बाधाओं का कारण बनता है—इसलिए भीड़ को छोड़कर एकांत में विचरने की प्रेरणा।

📜 २-१६. महाकाळ

श्मशान में एक स्त्री को शव के अंगों को क्रूरता से काटते हुए देखकर, जन्म-मरण के चक्र (उपधि) के प्रति गहरा वैराग्य उत्पन्न होना।

📜 २-१७. तिस्स

मान-सम्मान और अत्यधिक लाभ-सत्कार को दुश्मनों के समान खतरनाक जानकर, अल्प लाभ और अनासक्ति के साथ भिक्षाटन करना।

📜 २-१८. किमिल

शाक्य वंश के भिक्षुओं का प्राचीन वन में रहकर भिक्षाटन से संतुष्ट होना और लौकिक सुखों को त्यागकर धम्म के आनंद में रमना।

📜 २-१९. नन्द

शुरुआत में काम-राग और साजो-श्रृंगार में फँसे रहने के बाद, भगवान बुद्ध के कुशल मार्गदर्शन से बाहर निकलकर पूर्ण विरक्ति पाना।

📜 २-२०. सिरिम

दूसरों की निंदा या प्रशंसा कोई मायने नहीं रखती, यदि अपना मन एकाग्र और शांत है—आत्म-नियंत्रण की महिमा।

ततिय वग्ग

📜 २-२१. उत्तर

स्कंधों को जानकर और तृष्णा को समूल नष्ट कर, सात बोध्यंगों (Bojjhanga) की भावना से सभी आस्रवों का क्षय करना।

📜 २-२२. भद्दजि

अपने पूर्वजन्म (राजा महापनाद) के उस स्वर्ण-स्तंभ वाले महल और अप्सराओं के वैभव को याद कर सांसारिक सुखों की अनित्यता का बोध।

📜 २-२३. सोभित

अपनी असीम एकाग्रता और स्मृति के बल पर, एक ही रात में अपने पिछले पाँच सौ कल्पों (पूर्वजन्मों) को याद करने की शक्ति का वर्णन।

📜 २-२४. वल्लिय

दृढ़ पराक्रम के साथ भगवान बुद्ध से मुक्ति का मार्ग पूछना, और फिर गंगा की तरह निरंतर निर्वाण की ओर बहने का संकल्प।

📜 २-२५. वीतसोक

बाल कटवाते समय आईने में अपनी छवि देखकर शरीर की शून्यता (तुच्छता) का बोध, और उसी क्षण अर्हत्व की प्राप्ति।

📜 २-२६. पुण्णमास

पाँचों नीवरणों (बाधाओं) को त्यागकर, प्रज्ञा के दर्पण में अपने शरीर को भीतर और बाहर से पूरी तरह तुच्छ और नश्वर देखना।

📜 २-२७. नन्दक

एक उत्तम घोड़े की तरह, जो ठोकर खाकर गिरता है पर पुनः संभल जाता है—उसी तरह धम्म-मार्ग पर पुनः दृढ़ता से खड़े होना।

📜 २-२८. भरत

अपने साथी नन्दक के साथ भगवान बुद्ध के पास जाकर, उनके द्वारा दी गई मुक्ति के लिए कृतज्ञता पूर्वक ‘सिंहनाद’ करना।

📜 २-२९. भारद्वाज

मार की सेना को जीतकर, पहाड़ों की गुफाओं में सिंह की तरह दहाड़ने वाले प्रज्ञावान भिक्षुओं की महानता का गान।

📜 २-३०. कण्हदिन्न

कल्याण मित्रों की संगति और निरंतर धम्म श्रवण से अपने भीतर के ‘भव-राग’ (जन्म की इच्छा) को हमेशा के लिए समाप्त कर देना।

चतुत्थ वग्ग

📜 २-३१. मिगसिर

भगवान बुद्ध के शासन में प्रवर्ज्या लेकर, काम-धातु (इंद्रिय सुखों) को पार कर ब्रह्मा के सामने अपनी पूर्ण विमुक्ति की घोषणा।

📜 २-३२. सिवक

संसार के चक्र में बार-बार शरीर रूपी घर बनाने वाले तृष्णा रूपी ‘बढ़ई’ को खोज लेना, और उसकी सारी पसलियाँ (कड़ियाँ) तोड़कर मुक्त होना।

📜 २-३३. उपवाण

वात रोग से पीड़ित होने पर भी, एक ब्राह्मण से थोड़ा सा गर्म पानी मांगकर, शांत भाव से अपनी व्याधि सहने वाले महान अर्हत।

📜 २-३४. इसिदिन्न

‘काम-भोग अनित्य हैं’ यह जानने के बावजूद भी उनमें फँसे रहने वाले गृहस्थों की विडंबना, और राग को काटने के लिए प्रवर्ज्या का महत्व।

📜 २-३५. सम्बुलकच्चान

भयानक बादलों की गर्जना और बारिश के बीच, खूंखार जानवरों वाली गुफा में एकांतवास करते हुए भी पूरी तरह निर्भय और शांत रहना।

📜 २-३६. नितक

जिसका मन एक चट्टान (पर्वत) की तरह स्थिर हो गया है, जो न राग में फँसता है न क्रोध में, उसे दुनिया का कोई दुःख नहीं छू सकता।

📜 २-३७. सोणपोटिरिय

रात सोने के लिए नहीं, बल्कि जागकर ध्यान करने के लिए है—मैदान-ए-जंग में पीठ दिखाकर जीने से बेहतर, धम्म के मार्ग पर मरना श्रेष्ठ है।

📜 २-३८. निसभ

पाँचों काम-गुणों (इंद्रिय सुखों) का पूरी तरह से त्याग कर, न जीवन की चाह और न मृत्यु का भय—सजगता के साथ निर्वाण में रमना।

📜 २-३९. उसभ

चीवर पहनकर हाथी की सवारी करते हुए भिक्षाटन के लिए जाने पर अचानक उत्पन्न हुए संवेग (वैराग्य) से अर्हत्व प्राप्त करने की कथा।

📜 २-४०. कप्पटकुर

चीथड़े पहनने वाले एक दरिद्र व्यक्ति (कप्पट) का भिक्षु बनकर ध्यान में ऊंघना, और फिर जागकर अमत-पद (निर्वाण) के मार्ग पर चलना।

पञ्चम वग्ग

📜 २-४१. कुमारकस्सप

बुद्ध, धम्म और संघ के प्रति गहरा उद्गार—असंख्य कल्पों के जन्म-मरण के चक्र का यह ‘अंतिम शरीर’ है, अब कोई पुनर्जन्म नहीं होगा।

📜 २-४२. धम्मपाल

युवावस्था में ही धम्म से जुड़ने और जागृत रहकर शील-प्रज्ञा का अभ्यास करने वालों का जीवन ही वास्तव में सार्थक (अमोघ) होता है।

📜 २-४३. ब्रह्मालि

जैसे एक कुशल सारथी उत्तम घोड़ों को वश में करता है, वैसे ही अपनी इंद्रियों को शांत और वश में करने वाले भिक्षु से देवता भी ईर्ष्या करते हैं।

📜 २-४४. मोघराज

कड़ाके की ठंड में खराब शरीर के साथ पुआल (सूखी घास) पर सोकर भी, असीम मानसिक सुख और शांति के साथ जीवन व्यतीत करने का आनंद।

📜 २-४५. विसाखपञ्चालपुत्त

किसी को न उकसाना, न नीचा दिखाना, न अभिमान करना—विनम्रता, संयम और सूक्ष्म प्रज्ञा से ही निर्वाण सुलभ होता है।

📜 २-४६. चूळक

मोरों की मधुर ध्वनि, सुंदर पृथ्वी और नीले बादलों के बीच, मन को एकाग्र कर उस अति-सूक्ष्म और श्रेष्ठ पद (निर्वाण) का स्पर्श करना।

📜 २-४७. अनूपम

अपने मन को एक धोखेबाज और सूली पर चढ़ाने वाले के समान जानकर, उसे धम्म के अनुशासन में मजबूती से बाँधने की चेतावनी।

📜 २-४८. वज्जित

संसार के लंबे और अंधेरे रास्तों पर भटकने के बाद, अंततः आर्य सत्यों को जानकर आवागमन के चक्र को पूरी तरह से नष्ट कर देना।

📜 २-४९. सन्धित

अतीत में पीपल (अश्वत्थ) के पेड़ को देखकर उत्पन्न हुई एक ‘बुद्ध-संज्ञा’ (स्मृति) के प्रताप से ३१ कल्पों बाद आस्रवों का क्षय कर लेना।

इस खंड में तिक निपात (३ गाथाएँ) से लेकर नवक निपात (९ गाथाएँ) तक का संग्रह है:

— निपातो —
तिक | चतुक्क | पञ्चक | छक्क | सत्तक | अट्ठक | नवक

तिक निपात

इस निपात में कुल १६ सुत्त हैं, जिन्हें २ वर्गों में विभाजित किया गया है:

— वग्गो —
पठम | दुतिय

पठम वग्ग

📜 ३-१. अङ्गणिकभारद्वाज

अग्नि की पूजा और कर्मकांडों से ‘शुद्धि’ ढूँढने की निरर्थकता को समझकर, बुद्ध के धम्म से सच्ची आंतरिक शुद्धि पाना और ‘सच्चा ब्राह्मण’ बनना।

📜 ३-२. पच्चय

प्रवर्ज्या लेने के मात्र पाँच दिन बाद, कुटिया में बैठकर यह दृढ़ संकल्प लेना कि ‘जब तक तृष्णा का बाण नहीं निकल जाता, तब तक न खाऊँगा, न पीऊँगा।’

📜 ३-३. बाकुल

जो काम पहले करना चाहिए उसे बाद में करने की चाह रखने वाला दुःख ही पाता है—महान अर्हत बाकुल भंते का ‘जैसा कहो, वैसा करो’ का उपदेश।

📜 ३-४. धनिय

सुखपूर्वक भिक्षु-जीवन जीने का मंत्र: संघ की किसी वस्तु का अपमान न करना, साँप या चूहे के बिल की तरह अपनी कुटिया में शांति से रहना और जो मिले उसमें संतुष्ट रहना।

📜 ३-५. मातङ्गपुत्त

‘बहुत ठंड है, बहुत गर्मी है, बहुत देर हो गई’—ऐसे बहाने बनाने वालों का समय (क्षण) व्यर्थ ही बीत जाता है—कठोर तपस्या का उदान।

📜 ३-६. खुज्जसोभित

पाटलिपुत्र के विद्वान और सुवक्ता भिक्षुओं के बीच खड़े, युवा और शांत ‘खुज्जसोभित’ थेर की आध्यात्मिक विजय (ब्रह्मचर्य-पालन) की गाथा।

📜 ३-७. वारण

जो दूसरों (जीवों) को मारता है, वह इस लोक और परलोक दोनों से भ्रष्ट हो जाता है—सबके प्रति मैत्री-भाव रखने और शांत रहने का उपदेश।

📜 ३-८. वस्सिक (पस्सिक)

एक बुद्धिमान व्यक्ति अपने मूर्ख और श्रद्धाहीन रिश्तेदारों के लिए भी ‘कल्याणकारी’ हो सकता है—उन्हें सही मार्ग दिखाकर स्वर्ग पहुँचाने की कथा।

📜 ३-९. यसोज

मच्छरों और कीड़ों के काटने पर भी, युद्ध में खड़े हाथी की तरह वन में अडिग होकर ध्यान करना—भीड़ और कोलाहल से दूर रहने की प्रेरणा।

📜 ३-१०. साटिमत्तिय

‘पहले तुम मुझ पर श्रद्धा करते थे, अब नहीं करते’—इस बात से एक मुनि (अर्हत) को कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि श्रद्धा और सम्मान दोनों अनित्य हैं।

दुतिय वग्ग

📜 ३-११. उपालि

नव-प्रव्रजित (नए बने) भिक्षु के लिए तीन नियम: कल्याण मित्रों की संगति करे, संघ के बीच रहकर ‘विनय’ (नियम) सीखे, और हमेशा सतर्क रहे।

📜 ३-१२. उत्तरपाल

मार (पापी) के बाणों और पंच-कामगुणों में फँसे होने पर भी, धम्म के प्रताप से अचानक वैराग्य उत्पन्न होना और जन्म-मरण का चक्र तोड़ देना।

📜 ३-१३. अभिभूत

‘आरम्भ करो, बाहर निकलो और बुद्ध के शासन में लग जाओ! जैसे हाथी नरकट की झोपड़ी को कुचल देता है, वैसे ही मार की सेना को कुचल डालो!’

📜 ३-१४. गोतम

नरक से लेकर स्वर्ग तक, और यहाँ तक कि ‘नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतन’ (अरूप लोक) तक में अनंत काल भटकने के बाद, अंततः अमत-पद (निर्वाण) को पा लेना।

📜 ३-१५. हारित

जो काम पहले करना चाहिए उसे बाद में करने की चाह रखने वाला दुःख ही पाता है—महान अर्हत हारित भंते का ‘जैसा कहो, वैसा करो’ का उपदेश।

📜 ३-१६. विमल

बुरे मित्रों को छोड़कर उत्तम पुरुष की संगति करना, और आलसी व्यक्ति से दूर रहना क्योंकि वह समुद्र में डूबी हुई लकड़ी के समान है।

चतुक्क निपात

📜 ४-१. नागसमाल

भिक्षाटन के दौरान रास्ते में एक सजी-धजी नर्तकी (नचनिया) को देखकर, उसे ‘मृत्यु के जाल’ के रूप में पहचानना और उसी क्षण अर्हत्व प्राप्त करना।

📜 ४-२. भगु

चक्रमण (ध्यान करते हुए चलना) के दौरान नींद के झोंके से गिर पड़ना, फिर शरीर पोंछकर दोबारा दृढ़ संकल्प के साथ ध्यान में लगकर आस्रवों का क्षय करना।

📜 ४-३. सभिय

मूर्ख लोग कभी नहीं जान पाते कि ‘हम यहाँ (मृत्यु की ओर) जा रहे हैं’, जो ज्ञानी इस सत्य को जान लेते हैं, उनके सारे झगड़े शांत हो जाते हैं।

📜 ४-४. नन्दक

इस नव-द्वार वाले ‘दुर्गंधित शरीर’ को धिक्कारते हुए, काम-भोगों और मार के बंधनों से पूरी तरह मुक्त होने का उदान।

📜 ४-५. जम्बुक

पचपन (५५) वर्षों तक नग्न रहकर मल-मूत्र खाने और अत्यंत मलिन तपस्या करने के बाद, भगवान बुद्ध की शरण में आकर सत्य को जानना।

📜 ४-६. सेनक

गया नदी के किनारे भगवान बुद्ध को धम्म-देशना देते हुए देखना, और उनकी करुणा से ‘दृष्टि-बंधनों’ (मिथ्या विचारों) से हमेशा के लिए मुक्त हो जाना।

📜 ४-७. सम्भूत

जो सही समय पर काम नहीं करता और टालमटोल करता है, वह घटते चाँद (कृष्ण पक्ष) की तरह नष्ट होता है; जबकि सजग व्यक्ति बढ़ते चाँद की तरह पूर्ण होता है।

📜 ४-८. राहुल

भगवान बुद्ध के पुत्र राहुल का उद्घोष: ‘काम के अंधकार और तृष्णा के जाल को काटकर, मैं बुद्ध का सच्चा और ज्ञानरूपी पुत्र बन गया हूँ।’

📜 ४-९. चन्दन

अपनी ही पत्नी को गहनों से लदी हुई और बच्चे को गोद में लिए आते देख, उसे ‘मृत्यु के फंदे’ की तरह पहचानना और वैराग्य से अर्हत्व पाना।

📜 ४-१०. धम्मिक

‘धर्म निश्चय ही धर्मचारी की रक्षा करता है।’ धर्म और अधर्म का फल कभी समान नहीं होता; अधर्म नरक ले जाता है, और धर्म सुगति (निर्वाण) देता है।

📜 ४-११. सप्पक

जब काले बादलों से डरे हुए सफेद सारस (बगुले) ‘अजकरणी’ नदी के किनारे पनाह लेते हैं, तब उस एकांत कुटिया में ध्यान करने का जो आनंद है, वह अतुलनीय है।

📜 ४-१२. मुदित

‘चाहे मेरी हड्डियाँ टूट जाएँ, चाहे घुटने गिर जाएँ, लेकिन जब तक तृष्णा का बाण नहीं निकल जाता, मैं आसन से नहीं उठूँगा’—ऐसा कठोर संकल्प लेकर मुक्ति पाना।

पञ्चक निपात

📜 ५-१. राजदत्त

श्मशान में फेंके गए शव को देखकर मन में गहरा वैराग्य उठना, कामराग से मुक्त होना और तीन विद्याओं को प्राप्त कर अर्हत्व पाना।

📜 ५-२. सुभूत

केवल सुभाषित वचनों को बोलने के बजाय, उन्हें अपने आचरण में उतारकर ही धम्म का सच्चा फल प्राप्त करने का उपदेश।

📜 ५-३. गिरिमानन्द

सुरक्षित कुटिया के भीतर रागरहित, द्वेषरहित और शांत मन से वर्षा ऋतु का आनंद लेते हुए ध्यान मग्न होना।

📜 ५-४. सुमन

अपने उपाध्याय के अनुग्रह से धम्म में पूर्णता प्राप्त कर, पुनर्जन्म और दिव्य-चक्षु का ज्ञान पाने वाले भिक्षु।

📜 ५-५. वड्ढ

अपनी माता (भिक्षुणी) के प्रेरक वचनों को सुनकर वीर्यवान होना और काम-भोगों के सारे बंधनों को हमेशा के लिए काट देना।

📜 ५-६. नदीकस्सप

पूर्व में अग्नि की पूजा करने वाले जटिल संन्यासी, भगवान बुद्ध के उपदेश से मिथ्या दृष्टि छोड़कर सच्चे धम्म में आना।

📜 ५-७. गयाकस्सप

गया नदी में नहाकर पाप धोने की मिथ्या दृष्टि को त्यागकर, अष्टांगिक मार्ग रूपी धारा में अपने भीतर के पापों को धो डालना।

📜 ५-८. वक्कलि

वात रोग से पीड़ित होने के बावजूद एकांत वन में विपुल प्रीति और आनंद के साथ बोध्यंगों की भावना करना।

📜 ५-९. विजितसेन

अपने चंचल मन को एक जंगली हाथी की तरह जानकर, उसे स्मृति और संयम के खंभे से दृढ़तापूर्वक बांध देना।

📜 ५-१०. यसदत्त

छिद्रान्वेषी (कमियां निकालने वाले) मन से धम्म सुनने की निंदा, और तुष्ट चित्त से सुनकर परम शांति पाने का मार्ग।

📜 ५-११. सोणकुटिकण्ण

भगवान बुद्ध के सम्मुख सद्धर्म का गान करने का सौभाग्य, और पांच स्कंधों को जानकर पूरी तरह अनासक्त होना।

📜 ५-१२. कोसिय

सच्चे पंडित की परिभाषा—जो गुरुओं का सम्मान करे, विपत्ति में धैर्य रखे और धम्म को अर्थ सहित जीवन में उतारे।

छक्क निपात

📜 ६-१. उरुवेळकस्सप

शुरुआत में अहंकार के कारण बुद्ध के चमत्कारों को देखकर भी न झुकना, फिर संवेग उत्पन्न होने पर उनकी शरण आना।

📜 ६-२. तेकिच्छकारि

कड़ाके की ठंड में खुले आसमान के नीचे रहते हुए भी, अप्पमัญญา (मैत्री-करुणा आदि) के अभ्यास से सुखपूर्वक रहना।

📜 ६-३. महानाग

साथी भिक्षुओं के प्रति सम्मान रखने वाले का ही सद्धर्म में विकास होता है, इसका अत्यंत सुंदर और सीधा उपदेश।

📜 ६-४. कुल्ल

श्मशान में सड़े हुए शव को देखकर शरीर की नश्वरता का गहरा बोध और एकाग्रता के सर्वोच्च सुख की प्राप्ति।

📜 ६-५. मालुक्यपुत्त

तृष्णा को एक परजीवी बेल (मालुवा) के समान जानकर उसे जड़ (मूल) से उखाड़ फेंकने की कड़ी चेतावनी।

📜 ६-६. सप्पदास

पच्चीस वर्षों तक ध्यान में भटके रहने और आत्महत्या का विचार आने के बाद, अचानक वैराग्य से अर्हत्व पाना।

📜 ६-७. कातियान

अत्यधिक नींद और आलस्य से ग्रस्त कातियान को जगाकर धम्म-मार्ग पर दृढ़ता से और अप्रमत्त होकर चलने का उपदेश।

📜 ६-८. मिगजाल

भगवान बुद्ध द्वारा बताए गए अष्टांगिक मार्ग को दुखों का शमन करने वाला और शांति का एकमात्र रास्ता बताना।

📜 ६-९. पुरोहितपुत्तजेन्त

जाति, धन और रूप के भारी अहंकार में डूबे रहने के बाद, बुद्ध के तेज के सामने झुककर मान-मद का पूर्ण त्याग।

📜 ६-१०. सुमन

केवल सात वर्ष की आयु में चमत्कारिक शक्तियों से युक्त श्रामणेर, जो अपने गुरु अनुरुद्ध के प्रति पूर्ण समर्पित हैं।

📜 ६-११. न्हातकमुनि

वात रोग से ग्रसित होने के बाद भी सात बोध्यंगों (Bojjhanga) का निरंतर अभ्यास कर परम आनंद और मुक्ति का अनुभव।

📜 ६-१२. ब्रह्मदत्त

क्रोध करने वाले के प्रति वापस क्रोध न कर, शांति और करुणा से उसे जीतने वाले सच्चे ब्राह्मण का महान उपदेश।

📜 ६-१३. सिरिमण्ड

ढके हुए (छिपाए गए पाप) पर ही वर्षा (दुख) होती है, अनावृत (खुले) पर नहीं—मृत्यु और बुढ़ापे की अटल सच्चाई।

📜 ६-१४. सब्बकामी

इस अशुद्ध शरीर और पांच काम-गुणों को एक खतरनाक जाल समझकर, पूर्ण वैराग्य और आस्रवों के क्षय का शंखनाद।

सत्तक निपात

📜 ७-१. सुन्दरसमुद्द

सजी-धजी वेश्या के द्वारा धन और यौवन का प्रलोभन दिए जाने पर, उसे मृत्यु के पाश (जाल) के समान देखकर वैराग्य पाना और अर्हत्व प्राप्त करना।

📜 ७-२. लकुण्डकभद्दिय

शारीरिक रूप से छोटे (लकुण्डक) होने के कारण लोगों द्वारा उपहासित होने पर भी, रूप और स्वर के आकर्षण से परे जाकर भीतर की असीम शांति में रमण करना।

📜 ७-३. भद्द

माता-पिता के इकलौते और अत्यंत लाड़ले पुत्र का बुद्ध के शासन में आना, और केवल सात वर्ष की आयु में ही अहो धम्मसुधम्मता (धम्म की महानता) का उद्घोष करना।

📜 ७-४. सोपाक

सात वर्ष के बालक का निडर होकर भगवान बुद्ध के प्रश्नों का सटीक उत्तर देना, और बुद्ध द्वारा उसे उसी क्षण उपसंपदा (भिक्षुत्व) प्रदान करने की अद्भुत कथा।

📜 ७-५. सरभङ्ग

पूर्वकाल में सर (तीर/सरकंडे) तोड़ने वाले तपस्वी का बुद्ध के मार्ग पर आकर, अतीत के सभी सात बुद्धों के समान ही आर्य सत्यों को जानकर परम मुक्ति पाना।

अट्ठक निपात

📜 ८-१. महाकच्चायन

अत्यधिक कर्मकांड, भीड़ और मान-सम्मान को एक ‘सूक्ष्म शल्य’ (कांटा) बताकर, एकांत और प्रज्ञा के साथ अनासक्त जीवन जीने का गंभीर उपदेश।

📜 ८-२. सिरिमित्त

क्रोधरहित, मायारहित और कल्याण मित्र वाले भिक्षु की महिमा, और सद्धा-शील-प्रज्ञा को ही जीवन का सच्चा धन बताना।

📜 ८-३. महापन्थक

बुद्ध के दर्शन मात्र से संवेग उत्पन्न होना, और जब तक तृष्णा का बाण न निकल जाए, तब तक आसन से न उठने का कठोर संकल्प लेकर अर्हत्व पाना।

नवक निपात

📜 ९-१. भूत

वन में गरजते बादलों, बरसती वर्षा और हिंसक जानवरों की दहाड़ के बीच भी, पहाड़ों की गुफा में बैठकर ध्यान करने के उस ‘परम आनंद’ का काव्यात्मक वर्णन, जिससे बढ़कर दुनिया में कोई और रति (सुख) नहीं है।

इस खंड में दसक निपात से लेकर महानिपात (सबसे लंबी गाथाओं) तक का अत्यंत गंभीर और दार्शनिक संग्रह है:

— निपातो —
दसक | एकादस | द्वादसक | तेरस | चुद्दसक | सोळसक | वीसति | तिंस | चत्तालीस | पञ्‍ञास | सट्ठि | महानिपात

दसक निपात

📜 १०-१. काळुदायि

वसन्त ऋतु की सुंदरता और प्रकति के खिले हुए रूप का मनमोहक वर्णन करते हुए, भगवान बुद्ध से उनके गृह-नगर कपिलवस्तु लौटने का विनम्र और काव्यात्मक आग्रह।

📜 १०-२. एकविहारिय

आगे कोई नहीं, पीछे कोई नहीं—भीड़ और कोलाहल को छोड़कर, वन में पूर्ण एकांत और स्वतंत्रता के साथ ध्यान करने की तीव्र अभिलाषा।

📜 १०-३. महाकप्पिन

जो व्यक्ति ‘आनापानसति’ (श्वास के प्रति सजगता) की भावना पूर्ण कर लेता है, वह बादलों से मुक्त चन्द्रमा की तरह संसार को प्रकाशित करता है—इसका उद्घोष।

📜 १०-४. चूळपन्थक

मन्दबुद्धि होने के कारण बड़े भाई द्वारा विहार से निकाले जाने पर, भगवान बुद्ध की करुणा और ‘कपड़े के टुकड़े’ (पादपुंछनी) के ध्यान से ऋद्धिबल और अर्हत्व पाना।

📜 १०-५. कप्प

इस शरीर को मल-मूत्र, खून, हड्डियों और बीमारियों से भरा एक ‘महाव्रण’ (बड़ा घाव) बताकर, इसके प्रति आसक्ति छोड़ने का कठोर उपदेश।

📜 १०-६. वङ्गन्तपुत्तउपसेन

एक आदर्श वनवासी भिक्षु का जीवन—फटे-पुराने चीवर पहनना, भिक्षाटन करना, एकांत में रहना और कम बोलते हुए ध्यान में लगे रहना।

📜 १०-७. (अपर)-गोतम

बुद्ध, धम्म और संघ के प्रति गहरा आदर रखते हुए, शील, समाधि और प्रज्ञा (अष्टांगिक मार्ग) का पालन कर पूर्ण विमुक्ति पाने का मार्ग।

एकादस निपात

📜 ११-१. संकिच्च

श्मशान में कंकालों के बीच एकांतवास करते हुए, ‘न मुझे मरने का दुख है, न जीने की चाह’—एक मज़दूर की तरह पूरी सजगता के साथ अपने समय (मृत्यु) की प्रतीक्षा करना।

द्वादसक निपात

📜 १२-१. सीलव

‘शील’ (नैतिक आचरण) की अद्भुत महिमा—इसे सबसे बड़ा बल, सबसे श्रेष्ठ आभूषण, उत्तम कवच, मजबूत पुल और जीवन का सच्चा पाथेय (यात्रा का भोजन) बताना।

📜 १२-२. सुनीत

एक अछूत ‘फूल फेंकने वाले’ (सफाई कर्मचारी) से लेकर, बुद्ध की करुणा पाकर भिक्षु बनने और देवताओं (इंद्र-ब्रह्मा) द्वारा पूजे जाने वाले महान अर्हत तक की सबसे भावपूर्ण कथा।

तेरस निपात

📜 १३-१. सोणकोळिविस

अत्यधिक कठोर तपस्या से निराश होकर धम्म छोड़ने का विचार करने वाले भिक्षु को भगवान बुद्ध द्वारा ‘वीणा के तारों’ का उदाहरण देकर मध्यम मार्ग सिखाना और अर्हत्व दिलाना।

चुद्दसक निपात

📜 १४-१. खदिरवनियरेवत

सारिपुत्त भंते के छोटे भाई, जिन्होंने बचपन में ही विवाह छोड़कर प्रवर्ज्या ली और ‘खदिर’ (कत्था) के वनों में एकांत साधना कर असीम मैत्री और अर्हत्व प्राप्त किया।

📜 १४-२. गोदत्त

सांसारिक सुख-दुख, लाभ-हानि और निंदा-प्रशंसा में समभाव (उपेक्षा) रखने का गहरा उपदेश, और अधार्मिक लाभ से धार्मिक हानि को श्रेष्ठ बताना।

सोळसक निपात

📜 १५-१. अञ्ञासिकोण्डञ्ञ

भगवान बुद्ध के प्रथम शिष्य (पञ्चवर्गीय भिक्षुओं में से एक), जिनका यह शंखनाद है कि ‘सभी संस्कार अनित्य, दुख और अनात्म हैं’—इसी प्रज्ञा से पूर्ण मुक्ति संभव है।

📜 १५-२. उदायि

भगवान बुद्ध की महिमा का एक ‘महानाग’ (महान हाथी) के रूप में अत्यंत काव्यात्मक वर्णन—जिनकी स्मृति और संपजन्य ही जिनके चरण हैं, और विवेक ही जिनकी पूँछ है।

वीसति निपात

📜 १६-१. अधिमुत्त

डाकुओं द्वारा पकड़े जाने पर और मृत्यु के ठीक सामने खड़े होने पर भी, ज़रा भी भयभीत न होकर पूर्ण निर्भयता के साथ डाकुओं को धम्म सिखाना और उन्हें भिक्षु बना देना।

📜 १६-२. पारापरिय

छह इंद्रियों (आँख, कान आदि) को असंयमित छोड़ने के भयंकर खतरों का वर्णन, और उन्हें ध्यान की कील से ठोक कर वश में करने का मार्ग।

📜 १६-३. तेलकानि

लंबे समय तक धर्म के रहस्यों में उलझे रहने और संशयों के बाण से छिदे रहने के बाद, बुद्ध के उपदेश रूपी नाव से अविद्या के भवसागर को पार कर लेना।

📜 १६-४. रट्ठपाल

अथाह धन-संपत्ति और सुंदर पत्नियों को छोड़कर भिक्षु बने रट्ठपाल का यह अमर उपदेश—‘यह संसार अनित्य है, इसका कोई रक्षक नहीं है, और यह कभी तृप्त न होने वाली तृष्णा का दास है।’

📜 १६-५. मालुक्यपुत्त

रूप, शब्द, गंध आदि के प्रति आसक्ति कैसे मनुष्य को दुखों के जाल में बाँध लेती है, और उनसे विरक्त होने पर कैसे निर्वाण समीप आ जाता है—इसका विस्तृत विश्लेषण।

📜 १६-६. सेल

एक महान ब्राह्मण विद्वान का भगवान बुद्ध के बत्तीस महापुरुष लक्षणों को देखकर उनकी शरण में आना, और अपने ३०० शिष्यों के साथ भिक्षु बनकर अर्हत्व प्राप्त करना।

📜 १६-७. काळिगोधापुत्तभद्दिय

शाक्य वंश के राजा भद्दिय, जिन्होंने राजपाट छोड़कर वनवास चुना और हमेशा ‘अहो सुखं, अहो सुखं’ (अहा! क्या सुख है) का उदान गाते हुए परम शांति का अनुभव किया।

📜 १६-८. अङ्गुलिमाल

एक अत्यंत क्रूर और खूंखार हत्यारे की सबसे विख्यात कहानी—कैसे बुद्ध की करुणा ने उसे हिंसा के अंधकार से निकालकर परम शांति (अहिंसा) के मार्ग पर ला खड़ा किया और वह अर्हत बन गया।

📜 १६-९. अनुरुद्ध

भगवान बुद्ध के चचेरे भाई और ‘दिव्य-चक्षु’ में सर्वश्रेष्ठ अनुरुद्ध भंते का अपने पूर्व जन्मों और ध्यान की गहराईयों का अत्यंत सूक्ष्म और विहंगम वर्णन।

📜 १६-१०. पारापरिय (दुतिय)

भविष्य (पच्छिम काल) में भिक्षुओं के पतन की भविष्यवाणी—कैसे वे एकांत और ध्यान को छोड़कर सुख-सुविधाओं, धन-संपत्ति और कर्मकांडों के मोह में फँस जाएँगे, इस पर गहरी चिंता और चेतावनी।

तिंस निपात

📜 १७-१. फुस्स

भविष्य (अनागत काल) में भिक्षु संघ के पतन की एक अत्यंत विस्तृत और रोंगटे खड़े कर देने वाली भविष्यवाणी—कैसे भिक्षु धन-संपत्ति, खेतों-दासियों और गुटबाज़ी में उलझकर धम्म का नाश करेंगे, और कैसे सच्चे भिक्षुओं को इस पतन से बचकर अप्रमाद के साथ अष्टांगिक मार्ग पर चलना चाहिए।

📜 १७-२. सारिपुत्त

भगवान बुद्ध के बाद प्रज्ञा में सबसे श्रेष्ठ, धम्म सेनापति सारिपुत्त भंते की महागाथा—मन की पूर्ण शांति, अहंकार शून्यता, कल्याण मित्रों का महत्व, और धम्म के प्रति अपनी अगाध निष्ठा का अत्यंत विनम्रता और बुद्धिमत्ता के साथ गान।

📜 १७-३. आनन्द

पच्चीस वर्षों तक भगवान बुद्ध के साये की तरह साथ रहने वाले धम्म-भंडारी (कोसारक्ख) आनंद भंते की मार्मिक गाथाएँ—शास्ता की सेवा का स्मरण, उनके महापरिनिर्वाण के समय उत्पन्न हुआ विरह-शोक, और अंततः सारे बंधनों को काटकर अर्हत्व प्राप्ति का भावपूर्ण वर्णन।

चत्तालीस निपात

📜 १८-१. महाकस्सप

धुतांग (कठोर तपस्या) के अभ्यासी महाकस्सप थेर की यह गाथा एकांत और विरक्ति का चरम रूप है—भीड़ और सम्मान को छोड़कर गुफाओं, झरनों और जंगली जानवरों के बीच (पंसुकूल पहनकर) ध्यान करने के उस असीम आनंद का बखान, जहाँ देवताओं के राजा इंद्र और ब्रह्मा भी आकर उन्हें नमन करते हैं।

पञ्‍ञास निपात

📜 १९-१. तालपुट

एक पूर्व नट (अभिनेता) द्वारा अपने ही चंचल और बेलगाम ‘मन’ के साथ किया गया एक अत्यंत सुंदर और दार्शनिक संवाद—‘हे मेरे मन! तू मुझे कब तक सांसारिक भोगों में भटकाएगा? अब मैंने बुद्ध की शरण ले ली है, अब मैं तुझे हाथी की तरह अंकुश से वश में करूँगा और मोरों की ध्वनि से गूंजती पहाड़ों की गुफाओं में बैठकर निर्वाण का सुख पाऊँगा।’

सट्ठि निपात

📜 २०-१. महामोग्गल्लान

ऋद्धिबल (अलौकिक शक्तियों) में सर्वश्रेष्ठ महामोग्गल्लान भंते का सिंहनाद। इस लंबी गाथा में वे शरीर की घोर मलिनता और नश्वरता का सजीव चित्रण करते हैं। साथ ही, वे अपने उन अद्वितीय चमत्कारों का वर्णन करते हैं—जैसे पैर के अँगूठे से मिगारमाता के प्रासाद (महल) और वैजयंत प्रासाद को हिला देना, क्षण भर में करोड़ों रूप धारण कर लेना, और मार (पापी) को उसकी पिछली योनियों (दुस्सी मार) का स्मरण कराकर उसे कड़ी चेतावनी देकर भगाना। यह गाथा उनके अनंत ऋद्धिबल और सारिपुत्त भंते के साथ उनकी गहरी मित्रता का अद्भुत प्रमाण है।

महानिपात (सत्तति निपात)

📜 २१-१. वङ्गीस

भिक्षु संघ के सर्वश्रेष्ठ कवि और आशु-कवि (तुरुंत कविता रचने वाले) वंगीस थेर की यह सबसे लंबी और महाकाव्यात्मक गाथा है।

इसमें उन्होंने अपने जीवन की संपूर्ण आध्यात्मिक यात्रा का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया है:

  • कैसे प्रव्रज्या के शुरुआती दिनों में कामुक विचारों और महिलाओं के आकर्षण ने उनके मन पर हमला किया, और कैसे उन्होंने बुद्ध के उपदेशों को याद कर अपने मन को डांटा और वश में किया।
  • कैसे उन्होंने सारिपुत्त, आनंद, महामोग्गल्लान और अन्य महान थेरों की महिमा और ध्यान-अवस्थाओं का काव्यात्मक गान किया।
  • कैसे उन्होंने निग्रोधकप्प भंते के परिनिर्वाण के बाद भगवान बुद्ध से उनके गंतव्य के बारे में अत्यंत भावपूर्ण और काव्यात्मक प्रश्न पूछे।
  • और अंततः, कैसे उन्होंने अविद्या और तृष्णा के जाल को काटकर पूर्ण अर्हत्व प्राप्त किया और ‘अहो! मैं बुद्ध का सच्चा और ओरस (हृदय से उत्पन्न) पुत्र हूँ’ का सिंहनाद किया।