
सुभूति
दानवीर अनाथपिण्डिक के भतीजे, सुभूति, भगवान के धर्म-उपदेशों से प्रेरित होकर भिक्षु संघ में प्रव्रजित हुए। वे नित्य ‘मैत्री-भावना’ के गहन चिन्तन में मग्न रहते थे और अंततः अपनी समाधि के बल पर अर्हन्त पद को प्राप्त किया। भगवान ने अपने शिष्यों में सुभूति को ‘मैत्री-विहारिओं’ तथा ‘दक्षिणा-पात्रों’ (दान के योग्य) में सर्वश्रेष्ठ घोषित किया।
एक समय की बात है, सुभूति राजगृह पधारे और खुले आकाश के नीचे रहने लगे। वर्षा ऋतु का आगमन हो चुका था, किंतु वर्षा थम सी गई थी। तब राजा बिम्बिसार ने उनके लिए एक कुटी का निर्माण करवाया। जैसे ही स्थविर सुभूति ने उस कुटी में प्रवेश किया, मेघ बरसने लगे। कुटी के भीतर शान्त भाव से विराजमान होकर, लोक-कल्याण हेतु वर्षा का आह्वान करते हुए उन्होंने यह उदान (हर्षोद्गार) गाया:
हिन्दी
सुखद और वायु से सुरक्षित।
हे देव! सुख से बरसो।
चित्त मेरा सु-समाहित,
पूर्णतः विमुक्त,
मैं तत्परता से विहरता हूँ।
हे देव! तुम मन भर बरसो!”
पालि
वस्स देव यथासुखं।
चित्तं मे सुसमाहितं विमुत्तं,
आतापी विहरामि वस्स देवा” ति ॥