✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
१-१०३. बन्धुर मुख्य > सुत्तपिटक > थेरगाथा

बन्धुर

अनुवादक: सोनल आवळे | २ मिनट

शीलवती नगर में एक सेठ के पुत्र बन्धुर थे। एक बार वे किसी कार्यवश श्रावस्ती गए। वहाँ भगवान का उपदेश सुनकर वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने प्रव्रज्या ले ली (भिक्षु बन गए) और साधना करते हुए परमपद (अर्हत्व) को प्राप्त किया।

इसके बाद वे वापस अपने देश (शीलवती) लौटे और वहाँ के राजा को चार आर्य-सत्यों का उपदेश दिया। राजा इस उपदेश से बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने बन्धुर स्थविर के लिए एक विहार बनवाया। बन्धुर स्थविर ने वह विहार भिक्षु संघ को सौंप दिया और पुनः श्रावस्ती जाने की तैयारी करने लगे। तब वहाँ उपस्थित कुछ भिक्षुओं ने उनसे वहीं रुकने का अनुरोध किया। इस पर बन्धुर स्थविर ने यह उदान (गाथा) कही:

हिन्दी

“लौकिक ‘अर्थ’ में मुझे,
रहा न अब कोई ‘अर्थ’।
उत्तम रसपान कर,
त्यागा विष अब मैंने,
पीकर ‘रस’ सद्धर्म का हुआ
तृप्त और सुखी मैं।”


पालि

“नाहं एतेन अत्यिको,
सुखितो धम्मरसेन तप्पितो।
पित्वा रसग्गमुत्तमं,
न च काहामि विसेन सन्यवं।”