
मलितवम्भ
भरुकच्छ के एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण कुल में जन्मे मलितवम्भ ने प्रव्रज्या ग्रहण की। वे साधना हेतु ऐसे स्थानों का चयन करते, जहाँ भोजन भले ही दुर्लभ हो, किन्तु तीन प्रत्यय सुलभ हों। इस प्रकार अल्पेच्छुक रहकर उन्होंने कठोर योगाभ्यास किया और अर्हत् पद प्राप्त किया।
अपनी चर्या और विवेक को प्रकट करते हुए स्थविर ने यह उदान गाया:
हिन्दी
पर मैं न होता ‘लिप्त’,
रमण-चाह, संपर्क न करता,
अनर्थ से जो ‘लिप्त’।
सम्प्रयुक्त हैं लौकिक कामभोग धर्म ये,
इनका न करता वरण,
इनसे बचकर चलता हूँ,
त्यागता इनकी शरण।”
पालि
रममानोपि पक्कमे।
न त्वेवानत्यसंहितं,
वसे वासं विचक्खणो” ति।