
सङ्घरक्खित
श्रावस्ती के एक संपन्न कुल में जन्मे संघरक्खित, प्रव्रज्या ग्रहण कर अपने एक सब्रह्मचारी (साथी भिक्षु) के साथ वन में ध्यान-साधना करते थे। उनके निवास के समीप ही एक हिरनी ने शावक को जन्म दिया। वात्सल्य और मोह के कारण वह अपने बच्चे को छोड़कर भोजन के लिए दूर नहीं जा पाती थी, जिससे वह अत्यंत दुर्बल हो गई।
इस दृश्य को देख, संघरक्खित स्थविर ने ‘तृष्णा’ के बंधन पर गहरा मनन किया और अर्हत् पद प्राप्त किया। जब उन्होंने अपने साथी भिक्षु की चित्त-प्रवृत्ति देखा, तो उसी हिरनी का दृष्टांत देते हुए उन्हें उपदेश दिया। इस उपदेश से संवेग पाकर उनके साथी भी साधना में रत हुए और अर्हत् बने।
हिन्दी
एकांत में रहकर भी
जो मानता न ‘शासन’,
तरुण हिरनी सा भटकता,
इन्द्रियां रहती असंयत।”
पालि
रहोगतो अनुविगणेति सासनं।
तथाहयं विहरति पाकतिन्द्रियो,
मिगी यथा तरुणजातिका वने” ति।