
उसभ
कोशल देश के एक संपन्न परिवार में जन्मे उसभ, संसार त्याग कर प्रव्रजित हुए और एक गुफा में योगाभ्यास करने लगे। वर्षा ऋतु के आगमन पर एक दिन जब वे गुफा से बाहर आए, तो नवीन वर्षा से धुले हुए और हरियाली से लहलहाते पर्वतों को देखा। प्रकृति की इस वृद्धि को देखकर उन्हें प्रेरणा मिली कि जैसे प्रकृति खिल उठी है, वैसे ही मुझे अपनी साधना में वृद्धि करनी चाहिए।
इस प्रकार प्रकृति को ही अपना उपदेशक मानकर, उन्होंने कठोर उद्योग किया और शीघ्र ही अर्हत् पद प्राप्त किया। अपनी साधना की सफलता पर उन्होंने यह उदान गाया:
हिन्दी
जिन पर ‘विशाल’ मेघों ने की वर्षा।
अरण्य-संज्ञा, भावना, एकान्तवासी,
‘साधना’-प्रेमी वृषभ स्थविर को,
‘साधना’ में देते दक्षता।”
पालि
उदग्गमेघेन नवेन सित्ता।
विवेककामस्स अरञ्जसञ्ञिनो,
जनेति भियो उसभस्स कल्यतं” ति।