✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
१-१११. जेन्त मुख्य > सुत्तपिटक > थेरगाथा

जेन्त

अनुवादक: सोनल आवळे | २ मिनट

मगध के एक मण्डलेश्वर के पुत्र जेन्त को युवावस्था में ही संसार से वैराग्य उत्पन्न हुआ, फिर भी वे इस द्वंद्व में फँसे रहे कि गृहस्थ जीवन में रहें या सन्यास लें। अंततः भगवान से उपदेश सुनकर वे प्रव्रजित हुए और योगाभ्यास के माध्यम से अर्हत् पद को प्राप्त किया।

अपनी पूर्व दुविधा और संसार की कठिनाई को लक्ष्य करते हुए स्थविर ने यह उदान गाया:

हिन्दी

“प्रव्रज्या दुष्कर, गृहवास दुःखदायी,
धर्म गम्भीर, सम्पत्ति दुष्प्राप्य,
एक न एक प्रकार कठिन जीविका ‘वृत्ति’।

साधक के लिए यही उचित,
निरन्तर अनित्य संज्ञा की भावना,
सदा साधे अपनी ‘वृत्ति’।”


पालि

“दुप्पब्बजं वे दुरधिवासा गेहा,
धम्मो गम्भीरो दुरधिगमा भोगा।
किच्छा वुत्ति नो इतरीतरेनेव,
युत्तं चिन्तेतुं सततमनिच्चतं” ति।