
महानाम
श्रावस्ती के एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण कुल में जन्मे महानाम, प्रव्रजित होकर एक पर्वत पर ध्यान कर रहे थे। किंतु मन की विक्षिप्तता से हताश होकर उन्होंने पर्वत से कूदकर आत्महत्या करने का विचार किया। चोटी पर चढ़कर उन्होंने स्वयं को धिक्कारा, जिससे उनके भीतर गहरा संवेग (वैराग्य) जागा। पापी विचारों को त्याग, वे पुनः उद्योगरत हुए और अर्हत् पद प्राप्त किया।
उस समय की स्थिति और विचार को इस उदान में व्यक्त किया गया है:
हिन्दी
शाल वृक्षों से घिरा,
नेसादक नाम विख्यात
‘गिरि’ से गिरते ही हो जाओगे वंचित।
सोचते ही यूँ आया वैराग्य
इसी सोच पर ध्यान भावना करते ही
हो गए परम मुक्त।”
पालि
बहुकुटजसल्लकिकेन।
नेसादकेन गिरिना,
यसस्सिना परिच्छदेना” ति।