
किम्बिल
कपिलवस्तु के शाक्य राजकुमार किम्बिल अपने रूप-सौंदर्य पर अत्यंत मोहित रहते थे। एक दिन अनुपिया में, भगवान ने अपने ऋद्धि-बल से उनके समक्ष एक सुंदर कन्या का निर्माण किया और देखते ही देखते उसे वृद्धावस्था में परिवर्तित कर दिया। सौंदर्य के इस विनाश को देख किम्बिल के मन पर अनित्यता की गहरी छाप पड़ी। भगवान का उपदेश सुनकर वे प्रव्रजित हुए और अर्हत् पद प्राप्त किया।
अपनी मनोदशा और संसार की गति को लक्ष्य कर उन्होंने यह उदान गाया:
हिन्दी
पुरुष की भांति साधक,
रूप-वय में आसक्त जो होते है,
पतन उनका अवश्यम्भावी होता,
परन्तु स्मृतिमान,
आसक्तिरहित हो मै,
अपनी गवेषणा में लगा रहा,
स्थविरों की भाँति ‘अन्य’।”
पालि
वयो रूपं अञ्जमिव तयेव सन्तं।
तस्सेव सतो अविप्पवसतो,
अञ्जस्सेव सरामि अत्तानं” ति।