✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
१-१२०. इसिदत्त मुख्य > सुत्तपिटक > थेरगाथा

इसिदत्त

अनुवादक: सोनल आवळे | २ मिनट

अवन्ति जनपद के वेलु गाँव में जन्मे इसिदत्त को जब मच्छिका खण्ड निवासी उनके अदृष्ट मित्र चित्त से भगवान के विषय में पत्र प्राप्त हुआ, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए। इसी प्रेरणा से वे महाकात्यायन स्थविर के पास प्रव्रजित हुए और साधना कर अर्हत् पद प्राप्त किया। तत्पश्चात्, अपने उपाध्याय से अनुमति लेकर वे भगवान के दर्शन हेतु गए।

वहाँ जब भगवान ने उनका कुशल-मंगल पूछा, तो इसिदत्त स्थविर ने अपनी अवस्था का वर्णन करते हुए यह उदान गाया:

हिन्दी

“पाँच स्कन्धों को अच्छी तरह से जानकर,
कर दिया मूलतः विच्छिन्न।
दुःख-क्षय की अवस्था पाई मैंने
और पाई आश्रव-क्षय की अवस्था।”


पालि

“पञ्चक्खन्या परिञाता,
तिट्ठन्ति छिन्नमूलका।
दुक्खक्खयो अनुप्पत्तो,
पत्तो मे आसवक्खयो” ति।