✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
१-१३. वनवच्छ मुख्य > सुत्तपिटक > थेरगाथा

वनवच्छ

अनुवादक: सोनल आवळे | २ मिनट

कपिलवस्तु के एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे इस बालक का गोत्र वच्छ था। वनों के प्रति अगाध प्रेम होने के कारण इनका नाम ‘वनवच्छ’ पड़ा। प्रवज्या लेने के बाद उन्होंने अपना पूरा समय वनों में ध्यानाभ्यास करते हुए बिताया और वहीं अर्हत्व प्राप्त किया।

अपनी इसी सहज प्रकृति-प्रेमी रुचि को उन्होंने इस उदान द्वारा प्रकट किया:

हिन्दी

“सुन्दर, शीतल,
स्वच्छ जलाशयों से युक्त,
इन्द्र-गोपों से आच्छादित।
नील घटाओं से सजे ये पर्वत,
मुझे करते सदा आनंदित।”


पालि

“नीलब्भवण्णा रुचिरा,
सीतवारी सुचिन्धरा।
इन्दगोपकसञ्छन्ना,
ते सेला रमयन्ति मं” ति।