✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
१-१४. सीवक मुख्य > सुत्तपिटक > थेरगाथा

सीवक

अनुवादक: सोनल आवळे | २ मिनट

सीवक, वनवच्छ स्थविर के भानजे थे। अपनी माता की प्रेरणा से वे श्रामणेर बने और अरण्य (वन) में रहकर वनवच्छ स्थविर की सेवा करने लगे। एक बार सीवक गाँव गए और वहाँ बीमार पड़ गए। जब स्थविर ने उन्हें वापस अरण्य चलने को कहा, तब अस्वस्थ होने के बावजूद वे वन लौट आए। वहाँ गुरु की शिक्षा के अनुसार योग-साधना करते हुए उन्होंने अर्हन्त पद प्राप्त किया।

अपने गुरु के आदेश और स्वयं के संकल्प को दोहराते हुए सीवक स्थविर ने यह उदान गाया:

हिन्दी

“(जब) उपाध्याय ने कहा—
चलो सीवक, वन में चले।
तो मैं कहा पड़ा-
तन भले ही गाँव में,
मन को तो वन ही सुहाता।
अस्वस्थ देह होने पर भी
(वन) जाना चाहता हूँ,
ज्ञानी को अब कोई आसक्ति नहीं,
मैं कदम बढाता हूँ।”


पालि

“उपज्झायो मं अवच,
इतो गच्छाम सीवक !
गामे मे वसति कायो,
अरञ्ञे मे गतो मनो।
सेमानकोपि गच्छामि,
नत्थि सङ्गो विजानतं” ति।