✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
१-१९. कुल मुख्य > सुत्तपिटक > थेरगाथा

कुल

अनुवादक: सोनल आवळे | २ मिनट

श्रावस्ती के एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे कुण्डल, प्रवर्जित होने के बाद भी मन विक्षिप्त रहता था। एक दिन भिक्षाटन के समय उन्होंने नगर में लोगों को नहरों के ज़रिए पानी ले जाते, बाणों को सीधा करते और लकड़ी को तराशते देखा। भोजन के बाद उन्होंने इन दृश्यों पर गहराई से चिंतन किया कि जब निर्जीव वस्तुओं को मोड़ा और सुधारा जा सकता है, तो मन को क्यों नहीं?

इसी प्रेरणा से वे योग-साधना में जुट गए और शीघ्र ही अर्हन्त बने। अपनी इस सीख को उन्होंने उदान के रूप में गाया:

हिन्दी

“नहर जल को मोड़े,
बाण बनाने वाले बाण को,
बढ़ई लकड़ी को करते ठीक
और बुद्धिमान अपनी इच्छाओं का दमन।”


पालि

“उदकं हि नयन्ति नेत्तिका,
उसुकारा नमयन्ति तेजनं।
दारुं नमयन्ति तच्छका,
अत्तानं दमयन्ति सुब्बता” ति।