✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
१-२२. चित्तक मुख्य > सुत्तपिटक > थेरगाथा

चित्तक

अनुवादक: सोनल आवळे | २ मिनट

राजगृह के एक संपन्न ब्राह्मण परिवार में जन्मे चित्तक ने भगवान के शासन में प्रव्रजित होकर एक रमणीय वन को अपना निवास बनाया। वहाँ की प्राकृतिक सुंदरता के बीच ध्यान करते हुए उन्होंने परम शांति (अर्हत्व) प्राप्त की।

उस दिव्य आनंद की अवस्था में चित्तक स्थविर ने यह उदान गाया:

हिन्दी

“नील ग्रीवा और शिखावाले
मोर करवीय-वन में गाते हैं।
शीतल वायु पाकर (प्रफुल्लित हो)
मधुर गीत गाने वाले वे सोये हुए
योगी को तन्द्रा का बोध कराते हैं।”


पालि

“नीला सुगीवा सिखिनो, मोरा कारम्भियं अभिनदन्ति। ते सीतवातकीळिता, सुत्तं झायं निबोधेन्ती” ति।