
नन्दिय
कपिलवस्तु के एक शाक्य राजकुमार नन्दिय, अनुरुद्ध आदि शाक्य कुमारों के साथ भगवान की शरण आकर प्रव्रजित हुए। कठोर साधना के बाद उन्होंने अर्हन्त पद प्राप्त किया। एक समय जब वे एकांतवास कर रहे थे, तब ‘मार’ ने उन्हें डराने और विचलित करने का प्रयास किया।
उस अवसर पर मार को संबोधित करते हुए नन्दिय स्थविर ने यह निर्भय उदान गाया:
हिन्दी
सदैव प्रकाश से युक्त रहता,
वैसे भिक्षु की संगति पाकर
साधक सभी पापमय दुःख को नष्ट कर देता।”
पालि
चित्तं यस्स अभिण्हसो।
तादिसं भिक्खुमासज्ज, कण्ह!
दुक्खं निगच्छसी” ति।