✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
१-२७. लोमसकङ्गिय मुख्य > सुत्तपिटक > थेरगाथा

लोमसकङ्गिय

अनुवादक: सोनल आवळे | २ मिनट

कपिलवस्तु के एक शाक्य राजकुमार लोमसक अत्यंत कोमल और सुकुमार स्वभाव के थे। उनकी सुकुमारता को देखकर माता ने भिक्षु जीवन की दुष्करता दिखाकर उन्हें रोकने का प्रयास किया। किंतु, लोमसक का वैराग्य दृढ़ था। उन्होंने माता की आशंकाओं को पीछे छोड़ते हुए संसार त्याग दिया और वन में एकांत साधना कर अर्हन्त पद प्राप्त किया।

अपने इसी अडिग संकल्प को उन्होंने इस उदान में व्यक्त किया:

हिन्दी

“शान्ति की प्राप्ति के लिए
दूब, कुश, काश, उसीर, मूँज और भाभड़
(रूपी चित्त विकारों) को दूर कर
अपनी एकान्त साधना में वृद्धि करूँगा।”


पालि

“दब्बं कुसं पोटकिलं,
उसीरं मुञ्जपब्बजं।
उरसा पनुदिस्सामि,
विवेकमनुब्रूहयं” ति।