
जम्बुगामिकपुत्त
चम्पा के एक उपासक के पुत्र जम्बुगामिय, श्रामणेर होकर साकेत के ‘अञ्जन वन’ में अपनी साधना कर रहे थे। उनके पिता ने उनकी आध्यात्मिक प्रगति की परीक्षा लेने के लिए उन्हें एक पत्र भेजा जिसमें एक गाथा लिखी थी। उस गाथा के मर्म को समझकर जम्बुगामिय के भीतर तीव्र संवेग जागृत हुआ। वे और भी अधिक उद्योगी होकर साधना में लीन हो गए और परम शांति (अर्हत्व) को प्राप्त किया।
पिता की उसी प्रेरणादायी गाथा को उन्होंने अपने उदान के रूप में स्वर दिया:
हिन्दी
कोई आभूषणों में, कोई शील-गन्ध में
हुआ है पूरी तरह से आसक्त।
क्या तेरी आसक्ति भी
अन्य जनता की तरह तो नहीं?”
पालि
कच्चि नो भूसनारतो।
कच्चि सीलमयं गन्धं,
किं त्वं वायसि नेतरा पजा” ति।