✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
१-२९. हारित मुख्य > सुत्तपिटक > थेरगाथा

हारित

अनुवादक: सोनल आवळे | २ मिनट

श्रावस्ती के एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे हारित का जीवन एक दुखद मोड़ पर बदल गया। जब उनकी पत्नी की सर्पदंश से मृत्यु हो गई, तो इस घटना ने उन्हें गहरे वैराग्य से भर दिया। वे भगवान के पास प्रवर्जित हुए, परंतु प्रारंभ में उनका मन बहुत अशांत और विक्षिप्त रहता था। एक दिन भिक्षाटन के दौरान उन्होंने एक तीर बनाने वाले को बहुत ध्यान से तीर सीधा करते देखा। उस दृश्य ने उन्हें झकझोर दिया—उन्होंने सोचा कि जब मनुष्य अचेतन वस्तु को ठीक कर सकता है तो मैं अपने मन को क्यों न ठीक कर सकूँ?

इसी बोध के साथ उन्होंने निरंतर अभ्यास किया और अपने चित्त पर विजय प्राप्त कर अर्हत्व पाया। अपनी इस आंतरिक विजय को उन्होंने इस उदान में पिरोया:

हिन्दी

“जैसे बाण बनाने वाला,
बाण को तीक्ष्ण (पैना) करता है, ओ हारित!
तुम खुद को वैसे ही ठीक करो,
चित्त को अपने सीधा करके,
अविद्या का भेदन करो ।”


पालि

“समुन्नमयमत्तनं,
उसुकारोव तेजनं।
चित्तं उजु करित्वान,
अविज्जं भिन्द हारिता” ति।